लॉकडाउन डायरीः माता का क्वॉरंटाइन बनाम भूख का क्वॉरंटाइन

क्वॉरंटाइन नया थोड़े ही है. देश के गांवों में जब छोटी माता आती थी तो उस मरीज को कमरे में क्वॉरंटाइन ही तो करते थे. जो वर्ग माता को क्वॉरंटाइ कर सकता है, बस वह भूख को आइसोलेशन में नहीं डाल सकता, तो फिर उसके पास सड़क पर पैदल गांव तक चल निकलने के अलावा कोई रास्ता है क्या. नवीन चौधरी की कलम से लॉकडाउन डायरी

फोटोः संतोष पाठक
फोटोः संतोष पाठक

नवीन चौधरी/ लॉकडाउन डायरीः चौबीस

“किसी को कोरोना हो गया तो 14 दिन तक वह बाहर नहीं निकलेगा, अकेले रहना होगा क्योंकि एक से दूसरे को ये बीमारी फैलती है. जो सुरक्षित हैं उन्हें दूर रहना है कोरोना पॉजिटिव वाले व्यक्ति से.” यह कहने पर जवाब मिला, “अच्छा, बस यही. ये सब तो माता निकलने पर भी होता है. 14 दिन घर में बंद रहो, जिसे हुआ उससे दूर रहो, उसे अलग कमरे में रखो, उसके कपड़े अलग धो दो… यही सब तो होता है जो तुम कोरोना में कह रहे हो. अब कोरोना है तो उसे क्वारंटाइन कह दो, लेकिन हम तो माता निकलने पर खुद ही क्वारंटाइन कर देते थे.”

यानी, जिस क्वारंटाइन को मैं इतना नया समझ रहा हूं उस क्वारंटाइन को हमारे गांव के लोग बिलकुल नया नहीं समझते. चिकन पॉक्स या स्माल पॉक्स को हमारे गांवों में माता निकलना कहते हैं. अब इलाज है, डॉक्टर है पर जब यह सब सभी की पहुंच में नहीं था तब गांवों में पीड़ित को क्वारंटाइन किया जाता था.

अब जब इलाज है तब भी उन्हें अलग ही रखना होता है.

जब कोरोना का भय फैलना शुरू हुआ और लगने लगा कि लॉकडाउन हो सकता है तो हम जैसे लोग गाड़ियों में दुकानों से सामान गाड़ियों में भर लाए और एक वर्ग खाली पेट खाली हाथ पैदल सड़क पर निकल पड़ा. हमारे वर्क फ्रॉम होम के समय में खाने की कमी न रहे इसलिए हमने जरूरत का सामान जरूरत से कहीं ज्यादा भर लिया.

जब हम यह सब कर रहे थे ये वर्ग था जो वर्क न करें तो होम न चले, वो वर्ग जिसके पास जरूरत का सामान आम दिनों में भी जरूरत से कम ही रहता है वह समझ ही नहीं पाया कि वह क्या करे. समाज का यह बड़ा वर्ग जिसमें गरीब, मजदूर, रोज रेहड़ी लगाने वाले आते हैं, यह वर्ग सोशल डिस्टेंसिंग, आइसोलेशन, क्वारंटाइन जैसे शब्दों को दरकिनार कर निकल पड़ा अपने घर की ओर.

बिना किसी वायरस की परवाह किये, बिना साधन के, जान भी जा सकती है ये सब सोचे बिना ये लोग बस निकल पड़े. जाने कितनी ह्रदयविदारक तस्वीरें थी जिसमें से किसी में एक छोटी-सी बच्ची माथे पर सामान लिए जा रही है तो कोई पिता बच्चों को या पत्नी को कंधे पर उठाये चला जा रहा है.

हम सोशल मीडिया पर विचलित थे, कविताएं लिख रहे थे, सरकार के पक्ष और विपक्ष में लड़ रहे थे और इन सबसे अनजान वो गरीब जाति, धर्मं, राज्य की सीमाओं से परे कभी आनंद विहार बस अड्डे पर भीड़ लगाए थे तो कभी सड़क पर चले जा रहे थे.

पता नहीं उन्हें मील के पत्थर देखना भी आता हैं या नहीं. पर, उन्हें घर पहुंचना था.

हमें दरअसल उनकी चिंता कम थी. हम अपनी चिंता कर रहे थे. हमें ज्यादा चिंता थी कि इनके निकलने से वायरस न फैल जाए. और उन्हें चिंता थी कि वो बस अपने घर पहुंच जाएं. यह बहुत ही अजीब परिस्थिति है जहाँ वो बाहर निकलते हैं तो कोरोना से मरने का डर और अगर घर में बंद रहते हैं तो भूख से मरने का डर. कभी-कभी मुझे लगता है कि ये वर्ग मौत से नहीं डरता क्योंकि जब ये ऊंची बिल्डिंगों में काम करता है तो उसकी सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं होता लेकिन वो रस्सी में बंधा लटका होता है उन दीवारों को बनाने में, जिसमें सुरक्षित बैठकर मैं ये लेख लिख रहा हूं.

अगर वह गांव में अपने खेतों में निकलता है, या घर में सोया होता है तो उसे नहीं पता होता कि किधर से कोई सांप उसे आकर काट लेगा. भारत में हर वर्ष तकरीबन 15 हजार लोग सांप काटने से मर जाते हैं और ये तब है जब हमारे यहाँ दुनिया के सबसे जहरीले साँपों में से चंद प्रजातियाँ ही हैं. सांप का हमारे पास इलाज नहीं पर सांप काटे का इलाज तो है लेकिन हमारे सिस्टम ने इन्हें ऐसा कंडीशन किया है कि ये सोच ही नहीं पाते कि इनकी मौत का कारण सांप काटना नहीं बल्कि सांप काटने का इलाज न मिलना था.

पूरी दुनिया में सांप के डसने से सर्वाधिक मौतें भारत में होती हैं.

देश में बड़े समय तक तो गाँवों में विद्युतीकरण न होना एक समस्या रहा और जब विद्युतीकरण होने लगा तो औसतन 35 लोग हर रोज बिजली के करंट से मर जाते हैं. कारण? बिजली के खुले तारों का लटकना, ट्रांसफार्मर के आसपास पानी में करंट फ़ैल जाना, ढंग से अर्थिंग न होना. हर दूसरे दिन ऐसी खबर पढने के बाद भी ये लोग यही समझते हैं कि बिजली के तार तो ऐसे ही खुले लटके रहेंगे, इन्हें ही इससे बच कर जाना है. मुझे उम्मीद है कोई न कोई कमेंट में आकर कह देगा कि कई घटनाएँ बिजली की चोरी के कारण भी होती हैं लेकिन क्या इसलिए बिजली के खुले तार छोड़ देने वालों को माफ़ किया जाये? मैं सिर्फ इंसानों की बात कर रहा हूँ. करंट लगने से मरने वाले मवेशियों की संख्या अलग है, वही मवेशी जो इन गरीबों के जीवनयापन का एक साधन होते हैं.

ये वर्ग तो मरता ही रहा है, कभी ऊपर लिखे कारणों से तो कभी बीमारियों और इलाज न मिलने से. कभी बेरोजगारी से तो कभी कर्जे के बोझ से. इसके बावजूद भी जब यह वर्ग आज अपने घर को भाग रहा है तो सवाल उठता है कि ये डर किससे रहा है?

जब आप थोड़ा भी ध्यान देंगे तो पाएंगे इनका डर कोरोना नहीं, इनका डर भूख है. देश की राजधानी दिल्ली में 2 साल पहले मंडावली में 3 बच्चियां भूख से मर गयी थी. जब पोस्टमार्टम हुआ तो उनके पेट में एक दाना भी अन्न का नहीं था. दो-तीन दिन भूखे रहने से कोई नहीं मरता. आप खुद अंदाजा लगा लीजिये वो बच्चियां कितने दिन से भूखी होंगी.

हमारे देश में हर रोज लगभग 19 करोड़ लोग भूखे सोते है. ऐसा किसी फैशन या डाइटिंग के लिए वो नहीं करते, वो भूखे सोने के लिए मजबूर हैं. सोशल मीडिया पर कहीं पढ़ा था कि दोष पासपोर्ट का था लेकिन दर-बदर राशन कार्ड हो गया. हम पासपोर्टों ने खूब बहस की कि उन्होंने 70 साल में क्या किया और इन्होंने 6 साल में क्या किया. दोनों पक्षों के पास अपने आंकड़े हैं, अपने तर्क हैं लेकिन इन 19 करोड़ का आंकड़ा देखते समय दोनों ही पक्ष मोतियाबिंद से ग्रसित हो जाते हैं.

चाहे 70 साल वाले हों या 6 साल वाले, हम नहीं पूछना चाहते कि उन्होंने क्या किया कि यह तबका छोटी-मोटी बीमारियों से न मरे. हमने क्या किया कि मजदूर का बेटा भी मजदूर ही न रहे, हमने क्या किया कि ये वर्ग अपने घरों को छोड़ सिर्फ 2 वक़्त की रोटी के लिए महानगरों में किसी गन्दी बस्ती में न रहे.

ये सब इस उम्मीद से आते हैं कि पेट भरेंगे और कुछ पैसे जोड़कर वापस चले जायेंगे और इनकी पूरी जिंदगी में न ये पेट भर पाते हैं न इतने पैसे जोड़ पाते हैं कि वापस जा पायें.

जिस वर्ग ने हमेशा से यही सब देखा और सहा है वो बस अपने बच्चों को भूखा नहीं देख सकते. ये तो माता को क्वारंटाइन कर देते हैं, कोरोना को भी कर ही देंगे. बस भूख को ये क्वारंटाइन करना अब भी इन्हें नहीं आया. ये बस इसी उम्मीद में पैदल चल पड़े हैं कि आज नहीं तो कल भूख भी क्वारंटाइन हो जाएगी.

(नवीन चौधरी अकादमिक प्रकाशन संस्थान ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से जुड़े हैं और चर्चित राजनैतिक उपन्यास जनता स्टोर के लेखक हैं. यहां व्यक्त विचार उनके अपने हैं और उससे इंडिया टुडे की सहमति आवश्यक नहीं है)

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