यूपी में दवाओं के संकट से भी जूझ रहे ब्लैक फंगस के मरीज

यूपी में ब्लैक फंगस बीमारी ने पांव पसारने शुरू कर दिए हैं. बीमारी के बढ़ने के साथ दवाओं की मांग भी तेजी से बढ़ रही है. सरकारी मेडिकल कॉलेजों में ब्लैक फंगस बीमारी के इलाज में काम आने वाली दवाओं की कमी हो गई है.

प्रतीकात्मक फोटो (रॉयटर्स)
प्रतीकात्मक फोटो (रॉयटर्स)

यूपी में ब्लैक फंगस बीमारी ने पांव पसारने शुरू कर दिए हैं. डॉक्टरों ने इस बीमारी के संक्रामक होने की संभावना से इंकार किया है. यह बीमारी उन कोरोना संक्रमण मरीजों को गिरफ्त में ले रही है जिन्हें स्टेरायड की अत्यधि‍क डोज दी गई है. आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज में ब्लैक फंगस के दो मरीज इलाज करा रहे हैं. एसएन मेडिकल कॉलेज में ब्लैक फंगस के मरीजों के उचित उपचार के लिए दवाएं और इंजेक्शन उपलब्ध नहीं है. डॉक्टरों के मुताबिक, ब्लैक फंगस बीमारी के इलाज में सर्वाधिक प्रभावी अम्फोटेरिसिन-बी इंजेक्शन है. इस समय यह बाजार में भी उपलब्ध नहीं है. इसके बाद आईसोकोनाजोल टेबलेट असरदार है. ब्लैक फंगस के मरीजों की संख्या बढ़ने की संभावना को देखते हुए शासन स्तर से कम से कम 200-300 टेबलेट उपलब्ध कराने की मांग आगरा मेडिकल कालेज प्रशासन द्वारा की जा रही है. मरीज को कम से कम 14 दिन दवा देनी होती है. आगरा मेडिकल कॉलेज में मेडिसिन विभाग के वरिष्ठ चिकित्सक बताते हैं कि पोसोकोनाजोल सिरप भी ब्लैक फंगस के इलाज में इस्तेमाल किया जाता है. इसकी भी उपलब्धता नहीं है. एसएन मेडिकल कॉलेज में अभी वोरिकोनाजोल टेबलेट की उपलब्धता है. डॉक्टरों के मुताबिक यह 15 से 20 फीसद ही प्रभावी है. शुरुआती दौर में यह दवा दी जाती है. आगरा के एसएन मेडिकल कालेज के प्राचार्य डॉ. संजय काला बताते हैं कि शासन को ब्लैक फंगस मरीजों के इलाज में काम आने वाली दवाएं मुहैया कराने के लिए पत्र लिखा गया है.

मेरठ के कंकड़खेड़ा स्थ‍ित एक निजी अस्पताल में इलाज करा रही एक 60 वर्षीय महिला कोरोना संक्रमण से तो ठीक हो गई लेकिन उसे ब्लैक फंगस ने जकड़ लिया. डॉक्टरों ने इलाज के लिए कुछ दवाएं बाहर से खरीद कर लाने को कहा. परिजन ने मेरठ के खैैरनगर स्थ‍ित पश्च‍िमी यूपी के सबसे बड़े दवा बाजार में दवाएं तलाशी लेकिन सभी दवाएं नहीं मिल सकीं. बाद में उन्हें ये दवाएं दिल्ली से मंगानी पड़ीं. मेरठ के खैरनगर में दवा का थोक व्यापार करने वाले महावीर त्यागी बताते हैं, “ब्लैक फंगस के इलाज के लिए डॉक्टर जो दवाएं लिख रहे हैं उसमें पोसाकोनाजोल बहुत कम मिलती है. ये विदेश से आयात होती है. इसके अलावा एक अन्य दवा लाइपोसोमल का भी उपयोग हो रहा है जो विदेशों से आयात होने के कारण इसे डिमांड के अनुरूप ही मंगाया जाता है. दवा मंगाने में तीन से पांच दिन का समय लग रहा है.” ब्लैक फंगस के इलाज में काम आने वाली दवाएं महंगी होने के कारण भी दवा व्यापारी इन्हें रखने से बच रहे हैं. ब्लैक फंगस के इलाज में काम आने वाले सिरप की एमआरपी 19 हजार रुपए के करीब है. जो टैबलेट की मांग की जा रही है वह 100 एमजी की दस गोली चार हजार रुपए के करीब पड़ती है. महंगी होने के कारण दवा व्यापारी इसे रखने से बच रहे हैं.

कोरोना संक्रमण में ब्लैक फंगस के इलाज में उपयोग आने वाले अम्फोटेरिसिन-बी इंजेक्शन पर कालाबाजारी हावी हो गई है. सवा दो हजार रुपये का इंजेक्शन अब सात हजार रुपए में दवा की चुनिंदा बड़ी दुकानों पर मिल रहा है. कानपुर जिला केमिष्ट एसोसिएशन के पदाधि‍कारी सतीश सिंह बताते हैं, “अम्फोटेरिसिन-बी इंजेक्शन की कभी कभार ही जरूरत पड़ती थी, इसलिए इसे हर केमिस्ट नहीं रखता. जरूरत न होने के चलते यह एक्सपायर हो जाता था. अब यह इंजेक्शन उन्हीं के पास मिल सकता है, जो केमिस्ट इसे लगातार रखते हों. इसकी इतनी मात्रा किसी के पास नहीं होगी कि इसे जमा किया जाए. यदि कोई अधिक कीमत में बेच रहा है तो ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन विभाग को उसपर कार्रवाई करनी चाहिए.”

उत्तर प्रदेश में कोरोना वायरस की चपेट में आने वाले मरीजों में मिल रहे म्यूकर माइकोसिस (ब्लैक फंगस) के इलाज को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राज्य स्तरीय सलाहकार समिति प्रोटोकॉल तैयार करेगी. इस संबंध में मुख्यमंत्री कार्यालय ने भी रिपोर्ट मांगी है. मुख्यमंत्री ने निर्देश दिया है कि अपर मुख्य सचिव स्वास्थ्य और प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा, राज्य स्तर पर गठित स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाहकार समिति ब्लैक फंगस को लेकर विस्तृत रणनीति अपनाएं. इससे बचाव के लिए सावधानियां, लाइन ऑफ ट्रीटमेंट, तैयारियों आदि की कार्य योजना तैयार करें. इसके बारे में मुख्यमंत्री कार्यालय को विस्तृत रिपोर्ट दें. इस निर्देश के बाद सलाहकार समिति ब्लैक फंगस को लेकर प्रोटोकॉल तैयार करने में जुट गई है. समिति के अध्यक्ष प्रोफेसर आरके धीमान ने बताया कि फंगस को लेकर विस्तृत कार्य योजना तैयार की जा रही है. प्रयास है कि यह कम से कम मरीजों को प्रभावित करें. इलाज और जांच के साथ ही प्रभावित हो चुके मरीजों को अतिरिक्त इलाज देने का भी प्रोटोकॉल तैयार किया जाएगा.

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