39 साल, 10 माह से कानूनी दांवपेंच में फंसा बेहमई कांड
देश को झकझोरने वाले बेहमई कांड के मुकदमे में 31 साल बाद आरोप तय हुए, 33 साल में गवाही पूरी हुई और अब फैसले का इंतजार है.

पूरे देश को हिलाकर रख देने वाले 39 साल पूर्व हुए कानपुर देहात के बेहमई नरसंहार के मामले में अब अगली तारीख लग गई. गुरुवार 24 दिसंबर को कानपुर देहात की अदालत में बेहमई कांड की सुनवाई थी. इस दौरान पुलिस ने और समय की मांग की जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया. अब मामले की सुनवाई के लिए अगली तारीख 10 फरवरी तय की गई है. पुलिस ने मूल केस डायरी के लिए 10 दिन की समय की मांग की थी. इससे पहले 18 जनवरी, 2020 को सुनवाई के दौरान मूल केस डायरी उपलब्ध नहीं हो पाई थी. इस पर कोर्ट ने पूर्व सत्र लिपिक को नोटिस जारी कर केस डायरी के साथ हाजिर होने का आदेश दिया था.
जमीन के लिए चाचा की धोखेबाजी और उसके बाद अपने साथ हुए गैंगरेप का बदला लेने के लिए फूलन देवी ने अपने साथियों के साथ 18 फरवरी, 1981 को बेहमई में सामूहिक नरसंहार किया था. कानपुर देहात के शासकीय अधिवक्ता राजू पोरवाल के मुताबिक, फूलन के गैंग ने जगन्नाथ सिंह, तुलसीराम, सुरेंद्र सिंह, राजेंद्र सिंह, लाल सिंह, रामाधार सिंह, वीरेंद्र सिंह, शिवराम सिंह, रामचंद्र सिंह, शिव बालक सिंह, नरेश सिंह, दशरथ सिंह, बनवारी सिंह, हिम्मत सिंह, हरिओम सिंह, हुकुम सिंह समेत 20 लोगों की हत्या कर दी थी. इसके अलावा जंटर सिंह समेत आधा दर्जन ग्रामीण गोली से घायल हुए थे. बेहमई कांड में पहली चार्जशीट में पुलिस ने छत पर मिले पत्रों में नाम के आधार पर गिरफ्तारी की थी. इसी आधार पर चार्जशीट भी लगाई थी. पुलिस के अनुसार, 14 फरवरी, 1981 को बेहमई नरसंहार के बाद डकैतों ने मरजात सिंह के घर की छत पर तीन पत्र फेंके थे. नरसंहार के बाद फूलन देवी समेत 35 के खिलाफ थाना सिकंदरा में रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी. इसके बाद यह कांड देशभर की सुर्खियों में रहा था.
हत्याकांड के बाद से लगातार तारीख पर तारीख पड़ती रही. घटना के 31 साल बाद वर्ष 2012 में फूलन देवी और उनके अन्य साथियों पर आरोप तय किए गए थे. मामले की सुनवाई विशेष न्यायाधीश दस्यु प्रभावित की अदालत में चल रही है. राज्य की ओर से अभियोजन पक्ष ने वर्ष 2014 में गवाही पूरी कर ली थी. इसके बाद से अभियुक्तों की ओर से बचाव पक्ष ने बहस शुरू की. इस दौरान 23 नवंबर 2015 को महेशपुर के आरोपित डकैत ने घटना के दौरान नाबालिग होने का सर्टिफिकेट लगाकर मामले में पेंच फंसा दिया. 19 दिसंबर 2019 को बहस पूरी हो गई. इसके बाद कोर्ट ने छह जनवरी, 2020 को फैसला सुनाने की तारीख तय की थी. इस दिन बचाव पक्ष ने लिखित बहस और हाइकोर्ट की रूलिंग दाखिल करने की बात कहते हुए समय मांगा. कोर्ट ने 16 जनवरी, 2020 तक का समय लिखित बहस दाखिल करने के लिए देते हुए 18 जनवरी, 2020 को फैसले की तारीख मुकर्रर कर दी. फैसले की खड़ी आई तो बचाव पक्ष ने मूल केस डायरी के न होने की बात कहकर पेंच फंसा दिया. केस डायरी विवेचक तैयार करता है. केस डायरी मुकदमे का अहम हिस्सा होती है. इसके बिना फैसला नहीं सुनाया जा सकता है. इस मुकदमे में केस डायरी की फोटो कॉपी से ही पूरा ट्रायल हुआ. कोर्ट के संज्ञान में यह बात आने के बाद कोर्ट ने मूल केस डायरी की बाबत यूपी के पुलिस महानिदेशक को जांच करने का आदेश दिया था.
कानपुर एसएसपी, एसपी क्राइम कानपुर और सीओ अकबरपुर की टीम ने पत्रावली न मिलने की जांच की थी. इसी की सुनवाई 24 दिसंबर को होनी थी. बेहमई कांड की फाइल में मूल केस डायरी न होने के पीछे इस मामले से जुड़े वकीलों के अलग-अलग तर्क दिए जा रहे हैं. वकीलों का कहना है कि फूलन देवी वर्ष 1996 में मिर्जापुर से सांसद चुनी गई थीं. इससे पहले तत्कालीन सपा सरकार ने इनपर से मुकदमे वापस लेने का प्रयास किया था. उस समय प्रदेश सरकार की पहल पर अभियोजन विभाग ने कार्यवाही भी शुरू की थी. इस दौरान बेहमई कांड से जुड़ी फाइलों का अभियोजन समेत कई विभागों ने अध्ययन किया था. वकीलों को आशंका है कि संभवत: फाइलों को इधर-उधर ले जाने के कारण मूल केस डायरी कहीं गायब हो गई हो. बाद में फोटो कॉपी के रिकॉर्ड पर ही इस पूरे केस की सुनवाई होती रही. मामले से जुड़े वकील प्रवीण सिंह का कहना है कि मूल केस डायरी की जगह फोटो कॉपी होने की बात पहले ही पता चल जाती तो हाइकोर्ट में यह मामला ले जाकर इसपर आदेश ले आते. फैसले की घड़ी में अचानक मूल केस डायरी के न होने से न्याय लटक गया है. पुलिस द्वारा मूल केस डायरी के लिए बार-बार समय मांगे जाने और बाद में कोरोना काल के कारण 11 माह से इस मामले में फैसला लंबित है.
इसी दौरान 14 दिसंबर को बेहमई मामले के वादी 85 वर्षीय राजाराम का निधन हो गया. बेहमई कांड में पुलिस ने कुल 40 गवाह बनाए थे. कोर्ट में कुल 15 गवाहों की गवाही हुई थी. पहली गवाही वादी राजाराम ने 24 दिसंबर 2012 और अंतिम 15 वीं गवाही 21 दिसंबर 2014 को सत्य प्रकाश सिंह ने दी थी. फूलन देवी समेत 15 डकैतों की मौत सुनवाई के दौरान ही हो चुकी थी. इस मामले के चार आरोपी फरार हैं. मुकदमें में चार अभियुक्त पोसा, विश्वनाथ, भीखा, श्यामबाबू ही बचे हैं. पोसा जेल में है और बाकी तीन अभियुक्त जमानत पर हैं. इस तरह कानूनी दांवपेच में उलझे देश को झकझोरने वाले बेहमई कांड के मुकदमे में 31 साल बाद आरोप तय हुए, 33 साल में गवाही पूरी हुई और अब फैसले का इंतजार है.
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