मथुरा में 2027 की किस रणनीति का इशारा दे गए योगी आदित्यनाथ?
कृष्ण जन्मभूमि से जाट अस्मिता तक, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दो दिन के मथुरा दौरे में BJP के 2027 चुनावी नैरेटिव के कई संकेत दिखे

मथुरा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ
मथुरा में जन्माष्टमी की रात कान्हा के जन्म का इंतजार था लेकिन इसके पहले ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत के लिए कई संकेत छोड़ दिए.
वृंदावन के मंच से सनातन और मंदिरों की बात, श्रीकृष्ण जन्मभूमि से आस्था और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का संदेश, जाटों के बीच चर्चित ‘चवन्नी’ प्रसंग को हवा और पश्चिमी यूपी के पुराने दंगों-पलायन की याद.
3 से 4 सितंबर, दो दिन के इस प्रवास में धार्मिक आयोजन और सरकारी कार्यक्रम जरूर थे लेकिन मुख्यमंत्री योगी के भाषणों में 2027 की चुनावी पटकथा के कई पन्ने साफ पढ़े जा सकते थे. 3 सितंबर को मुख्यमंत्री ने वृंदावन में गीता शोध संस्थान एवं रासलीला अकादमी में स्वामी श्री हरिदास प्रेक्षागृह समेत 1,051 करोड़ रुपए की 229 विकास परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया.
इनमें 540 करोड़ रुपए से अधिक की 62 परियोजनाओं का लोकार्पण और 437 करोड़ रुपए से अधिक की 167 परियोजनाओं का शिलान्यास शामिल था. आवास योजना के लाभार्थियों के खातों में 72 करोड़ रुपए से अधिक की धनराशि भी भेजी गई.
अगले दिन 4 सितंबर को जन्माष्टमी पर मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण जन्मभूमि पहुंचे. गोमाता का पूजन किया, गर्भगृह में बाल कृष्ण के दर्शन किए और योगमाया मंदिर, केशवदेव मंदिर तथा भागवत भवन में पूजा-अर्चना की. लेकिन इस धार्मिक यात्रा के समानांतर राजनीतिक संदेश लगातार चलते रहे.
मथुरा से योगी ने दरअसल दो बड़े सियासी निशाने साधे. पहला, हिंदुत्व और श्रीकृष्ण जन्मभूमि का एजेंडा. दूसरा, पश्चिमी यूपी के जाट वोटरों को साधने की कोशिश. इनके बीच कानून-व्यवस्था और विकास को तीसरे सहारे के रूप में रखा गया.
हिंदुत्व की नई चुनावी लकीर
योगी के भाषण का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यह था कि अयोध्या और काशी के बाद ब्रज भी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांस्कृतिक एजेंडे का प्रमुख केंद्र बनने जा रहा है. उन्होंने विदेशी आक्रांताओं द्वारा मंदिर तोड़े जाने का जिक्र किया और कहा कि वे सनातन आस्था को नहीं मिटा सके.
यह बयान अपने आप में नया नहीं है, लेकिन मथुरा में जन्माष्टमी के मौके पर इसका राजनीतिक महत्व जरूर बढ़ जाता है. खासकर तब, जब मुख्यमंत्री ने मथुरा-वृंदावन को अयोध्या और काशी की तर्ज पर विकसित करने की बात कही. उनका तर्क धार्मिक आस्था के साथ सुविधाओं और पर्यटन से भी जुड़ा था. यानी मंदिर और विकास को एक ही राजनीतिक पैकेज में रखने की कोशिश.
यही BJP की मौजूदा राजनीति का प्रमुख मॉडल भी है. अयोध्या में राम मंदिर, काशी में विश्वनाथ धाम और अब ब्रज में कृष्णभूमि. इन तीनों को एक सांस्कृतिक धुरी के रूप में पेश किया जा रहा है. मथुरा में योगी ने इतिहास के पन्ने पलटते हुए बाबर और औरंगजेब का उल्लेख किया. विपक्ष का नाम लिए बिना सवाल खड़ा किया कि अयोध्या पर बोलने वाले श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर चुप क्यों हैं.
राजनीतिक तौर पर यह विपक्ष को एक वैचारिक कसौटी पर खड़ा करने की कोशिश है. यानी चुनावी सवाल यह नहीं रहने देना कि सरकार ने क्या किया बल्कि यह भी बनाना कि कौन सनातन आस्था और धार्मिक विरासत के साथ खड़ा है और कौन नहीं.
राजनीतिक विश्लेषक और आगरा कालेज में प्रोफेसर डॉ. लवकुश मिश्र मानते हैं कि 2027 के चुनाव में BJP के लिए हिंदुत्व का मुद्दा खत्म होने वाला नहीं है लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी को इसे नए सामाजिक और विकासात्मक नैरेटिव के साथ जोड़ना होगा.
डॉ. लवकुश मिश्र बताते हैं, “मथुरा में योगी ने यही प्रयोग किया. हालिया राजनीतिक विश्लेषणों में भी पश्चिमी यूपी में किसान समुदाय और जाट वोट की भूमिका को BJP के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है.”
मथुरा में योगी के दो दिन का दौरा अगर चुनावी नजरिए से देखें तो BJP की चिंता साफ नजर आती है. 2022 में पार्टी ने पश्चिमी यूपी में मजबूत प्रदर्शन किया लेकिन किसान आंदोलन और सपा-RLD गठबंधन ने कई सीटों पर चुनौती पैदा की. 2024 के लोकसभा चुनाव ने इस चिंता को और बढ़ाया.
मथुरा लोकसभा सीट BJP के लिए सुरक्षित रही. 2024 में यहां BJP की हेमा मालिनी ने मजबूत बढ़त के साथ जीत हासिल की और विधानसभा क्षेत्रों में भी BJP का प्रदर्शन प्रभावी रहा. लेकिन पूरे पश्चिमी यूपी की तस्वीर सिर्फ मथुरा से नहीं बनती.
मुजफ्फरनगर, कैराना, सहारनपुर, मेरठ, बागपत और बिजनौर जैसे इलाकों में सामाजिक समीकरण अधिक जटिल हैं. इसलिए BJP की रणनीति अब एक साथ कई सामाजिक समूहों को साधने की दिखाई देती है.
‘चवन्नी’ के बहाने जाटों को संदेश
मथुरा दौरे का दूसरा राजनीतिक संकेत और ज्यादा बारीक था. मुख्यमंत्री ने अखिलेश यादव के उस चर्चित बयान को उठाया जिसमें जयंत चौधरी को लेकर ‘चवन्नी को रुपया बनाने’ की बात कही गई थी. योगी ने इसे केवल जयंत का राजनीतिक अपमान नहीं बताया, बल्कि किसानों, लोकतंत्र और चौधरी चरण सिंह की विरासत से जोड़ने की कोशिश की.
यहीं मथुरा का भाषण पश्चिमी यूपी की चुनावी जमीन से सीधे जुड़ जाता है. जाट मतदाता पश्चिमी यूपी की राजनीति में संख्या से ज्यादा प्रभाव के कारण महत्वपूर्ण हैं. चौधरी चरण सिंह की विरासत इस समुदाय की राजनीतिक पहचान का बड़ा हिस्सा रही है. राष्ट्रीय लोकदल (RLD) इसी विरासत की सबसे प्रमुख राजनीतिक दावेदार पार्टी रही है. यही वजह है कि BJP और RLD की मौजूदा साझेदारी में जाट वोट का महत्व और बढ़ जाता है.
इस दौरान योगी का निशाना अखिलेश से ज्यादा उस सामाजिक भावनात्मक जमीन पर था जिस पर चौधरी चरण सिंह की राजनीति खड़ी हुई थी. संदेश यह था कि जाट अस्मिता का सम्मान BJP के लिए भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है. मथुरा में यह और अहम हो जाता है क्योंकि ब्रज की राजनीति में जाट मतदाता की भूमिका महत्वपूर्ण है.
2022 में छाता सीट पर BJP ने जाट बहुल राजनीतिक समीकरण के बावजूद मजबूत जीत दर्ज की थी, जबकि RLD दूसरे स्थान पर रहा था. इसलिए मुख्यमंत्री का बयान केवल एक पुराने राजनीतिक कटाक्ष की याद दिलाना नहीं था. यह पश्चिमी यूपी के जाट मतदाता से सीधा संवाद स्थापित करने की कोशिश थी.
कानून-व्यवस्था का नैरेटिव
योगी ने अपने भाषण में कैराना के पलायन, मुजफ्फरनगर के दंगे और पश्चिमी यूपी के दूसरे शहरों में हुए उपद्रवों का उल्लेख किया. यह BJP की पुरानी लेकिन प्रभावी चुनावी रणनीति है. पिछली सरकारों के दौर की कानून-व्यवस्था को याद दिलाकर मौजूदा सरकार की उपलब्धि के रूप में ‘सुरक्षा’ को सामने रखना.
पश्चिमी यूपी में इसका राजनीतिक असर इसलिए भी हो सकता है क्योंकि 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों ने पूरे क्षेत्र की राजनीति को लंबे समय तक प्रभावित किया. उसके बाद हुए चुनावों में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और किसान-जाट राजनीति के बीच संबंध लगातार चुनावी विमर्श का हिस्सा रहा.
योगी ने मथुरा से यही पुराना संदर्भ नए चुनावी फ्रेम में पेश किया. उनका संदेश था कि आज उत्तर प्रदेश कर्फ्यू, दंगों और उपद्रव से मुक्त है. यहां BJP का लक्ष्य केवल अपने समर्थकों को संतुष्ट करना नहीं है. सरकार कानून-व्यवस्था को महिला सुरक्षा, व्यापार, निवेश और युवाओं के अवसर से जोड़कर इसे व्यापक सुशासन के मुद्दे में बदलना चाहती है. यानी चुनावी फ्रेम कुछ इस तरह तैयार किया जा रहा है: पहले दंगे और पलायन, अब सुरक्षा और विकास.
डॉ. लवकुश मिश्र कहते हैं, “यह BJP के लिए खास तौर पर पश्चिमी यूपी में महत्वपूर्ण नैरेटिव है, जहां विपक्ष किसान, बेरोजगारी, महंगाई और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों के जरिए सरकार को घेरने की कोशिश कर सकता है.”
मंदिर के साथ विकास
योगी के दो दिवसीय दौरे में एक बात लगातार दिखाई दी. उन्होंने आस्था और विकास को अलग-अलग नहीं रखा. एक तरफ श्रीकृष्ण जन्मभूमि, सनातन परंपरा और मंदिरों की बात थी, तो दूसरी तरफ 1,051 करोड़ रुपए की परियोजनाएं.
यही मॉडल अयोध्या और काशी में BJP के लिए राजनीतिक रूप से उपयोगी रहा है. धार्मिक केंद्र का विकास, बेहतर सड़कें, श्रद्धालुओं के लिए सुविधाएं, पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था. मथुरा-वृंदावन के लिए भी इसी मॉडल का संकेत दिया गया. मुख्यमंत्री ने कहा कि ब्रज को अयोध्या और काशी की तरह भव्य रूप दिया जाएगा.
वृंदावन के एक होटल व्यवसायी अरुण भारती कहते हैं, “मथुरा में यह केवल धार्मिक मुद्दा नहीं है. यहां पर्यटन का मतलब होटल, परिवहन, प्रसाद, स्थानीय बाजार, हस्तशिल्प और छोटे कारोबार से भी है. इसलिए BJP की कोशिश सांस्कृतिक एजेंडे को स्थानीय आर्थिक हितों से जोड़ने की है.” यही वजह है कि मुख्यमंत्री ने 229 परियोजनाओं का हिसाब भी सामने रखा. संदेश था कि कृष्णभूमि केवल आस्था का केंद्र नहीं बल्कि विकास का भी केंद्र बनेगी.
यही कारण है कि मुख्यमंत्री योगी का मथुरा का दौरा केवल जन्माष्टमी का कार्यक्रम नहीं रह गया था. राजनीतिक विश्लेषण की दृष्टि से देखें तो योगी ने यहां विपक्ष के खिलाफ कोई नया मुद्दा गढ़ने के बजाय पुराने और प्रभावी मुद्दों को एक नए पैकेज में रखा.