यूपी में इंजीनियरिंग कॉलेजों से छात्रों का भरोसा क्यों उठ रहा?

उत्तर प्रदेश में पांच चरण की काउंसिलिंग के बाद भी सरकारी इंजीनियरिंग संस्थानों में कोर ब्रांच की सीटें खाली हैं. इंजीनियरिंग और उसकी शाखाओं को लेकर छात्रों में दिखाई दे रहा बड़ा बदलाव

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सांकेतिक तस्वीर

उत्तर प्रदेश में इंजीनियरिंग शिक्षा को लेकर तस्वीर बदल रही है. कभी सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिले के लिए छात्रों की लंबी कतार लगती थी लेकिन इस साल पांच चरण की काउंसिलिंग के बाद भी कई प्रतिष्ठित संस्थानों में इंजीनियरिंग की कोर ब्रांच की सीटें खाली रह गई हैं. 

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम तकनीकी विश्वविद्यालय (AKTU) की ओर से विशेष चरण की काउंसिलिंग के लिए जारी सीटों के आंकड़े इस बदलते रुझान की तस्वीर दिखाते हैं.

लखनऊ के IET में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की 64, केमिकल इंजीनियरिंग की 57, मैकेनिकल इंजीनियरिंग की 56 और सिविल इंजीनियरिंग की 52 सीटें खाली हैं. BIET झांसी में भी मैकेनिकल की 60, सिविल की 52, केमिकल की 53 और इलेक्ट्रिकल की 52 सीटें खाली हैं. यहां एआई एंड डेटा साइंस की दो सीटें भी खाली रह गई हैं. 

KNIT सुल्तानपुर में सीएस एंड इंजीनियरिंग की 88, मैकेनिकल की 30 और सिविल की 26 सीटों पर दाखिला नहीं हो सका. नए सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों की स्थिति तो और चुनौतीपूर्ण है. बस्ती में इलेक्ट्रिकल की 63, सिविल की 61 और इलेक्ट्रॉनिक्स की 48 सीटें खाली हैं. 

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम टेक्निकल यूनिवर्सिटी (AKTU)

प्रतापगढ़ में सिविल की 70, मैकेनिकल की 68 और इलेक्ट्रिकल की 64 सीटें उपलब्ध हैं. मिर्जापुर में इलेक्ट्रिकल की 57 और इलेक्ट्रॉनिक्स की 41, जबकि गोंडा में मैकेनिकल की 69, सिविल की 68 और इलेक्ट्रिकल की 55 सीटें खाली हैं.

CS-IT की चमक, कोर ब्रांच से दूरी

छात्रों की पसंद में सबसे बड़ा बदलाव इंजीनियरिंग की शाखाओं को लेकर दिखाई दे रहा है. कंप्यूटर साइंस (CS), IT, एआई और डेटा साइंस जैसे पाठ्यक्रम अब रोजगार और बेहतर पैकेज की उम्मीद से सीधे जोड़े जा रहे हैं.

इनके मुकाबले मैकेनिकल, सिविल, इलेक्ट्रिकल और केमिकल इंजीनियरिंग जैसी पारंपरिक शाखाओं को लेकर छात्रों में आकर्षण कम हुआ है. यह बदलाव केवल निजी कॉलेजों तक सीमित नहीं है. IET लखनऊ, BIET झांसी और KNIT सुल्तानपुर जैसे संस्थानों में भी कोर ब्रांच की सीटों का खाली रहना इस बात का संकेत है कि छात्र अब सिर्फ इंजीनियरिंग की डिग्री नहीं, बल्कि ऐसी ब्रांच चाहते हैं जिससे पढ़ाई के बाद सीधे रोजगार के अवसर मिल सकें. 

तकनीकी शिक्षा के विशेषज्ञों के मुताबिक पिछले कुछ वर्षों में IT और डिजिटल सेक्टर में रोजगार के विस्तार ने छात्रों और अभिभावकों की प्राथमिकताएं बदल दी हैं. AI, डेटा साइंस, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और साइबर टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में रोजगार की खबरें छात्रों को आकर्षित कर रही हैं. इसके उलट पारंपरिक इंजीनियरिंग ब्रांचों में रोजगार के अवसरों को लेकर धारणा कमजोर हुई है. 

इसका असर यह है कि छात्र अच्छी रैंक होने के बावजूद कई बार कोर ब्रांच लेने के बजाय किसी दूसरे संस्थान में CS या उससे जुड़ी शाखा को प्राथमिकता दे रहे हैं. यानी अब कॉलेज से ज्यादा महत्वपूर्ण शाखा और उससे जुड़ा करियर विकल्प बन गया है. 

कंप्यूटर साइंस (CS) और IT अभी-भी छात्रों की पसंद बने हुए हैं

AKTU के कुलपति प्रो. जेपी पांडेय के अनुसार, हाल में देश की IIT में प्रवेश के लिए विशेष काउंसिलिंग हुई, जिसके चलते कुछ छात्र वहां चले गए हैं. उनका कहना है कि अभी JEE, CUET और 12वीं पास करने वाले कई छात्र उपलब्ध हैं और सभी सरकारी संस्थानों की सीटें भरने की उम्मीद है. 

उनके मुताबिक आवश्यकता पड़ने पर एक और विशेष चरण की काउंसिलिंग पर विचार किया जा सकता है. लेकिन खाली सीटों का पैटर्न केवल इस साल की काउंसिलिंग से जोड़कर नहीं देखा जा सकता. इसके पीछे इंजीनियरिंग शिक्षा में पिछले कई वर्षों से चल रहा बदलाव भी है.

कमजोर प्लेसमेंट ने गिराई साख

इंजीनियरिंग कॉलेजों से छात्रों के मोहभंग की दूसरी बड़ी वजह शिक्षा की गुणवत्ता और प्लेसमेंट है. AKTU से संबद्ध 50 से अधिक निजी कॉलेजों में पिछले पांच से सात वर्षों के दौरान इंजीनियरिंग की पढ़ाई बंद हो चुकी है. 

उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 2018-19 में 21 निजी संस्थानों में इंजीनियरिंग बंद हुई. 2019-20 में 14, 2020-21 में छह, 2021-22 में तीन, 2022-23 में एक, 2023-24 में दो और 2024-25 में चार संस्थानों में इंजीनियरिंग की पढ़ाई बंद हुई. यानी सात वर्षों में कुल 51 संस्थानों में इंजीनियरिंग का पाठ्यक्रम बंद हुआ. 

कुछ संस्थानों ने छात्रों की कमी के कारण पाठ्यक्रम बंद किए जबकि कुछ की मान्यता अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद यानी AICTE के मानक पूरे न करने के कारण खत्म हुई. विशेषज्ञों की शिकायत है कि बड़ी संख्या में निजी संस्थानों में न तो पढ़ाई का स्तर अपेक्षित रहा और न ही प्रशिक्षित फैकल्टी उपलब्ध रही. 

छात्र हमेशा सबसे अच्छे प्लेसमेंट रिकॉर्ड वाले कॉलेजों को चुनते हैं, कमजोर रिकॉर्ड वाले कॉलेज धीरे-धीरे बंद हो जाते हैं

उद्योगों से संस्थानों का संपर्क भी सीमित रहा. इसका सीधा असर प्लेसमेंट पर पड़ा. जब छात्रों को कॉलेज से पढ़ाई के बाद बेहतर नौकरी नहीं मिली तो नए दाखिला लेने वालों की संख्या भी कम होती गई. 

इंजीनियरिंग कॉलेज की सबसे बड़ी ताकत उसका प्लेसमेंट रिकॉर्ड होता है. छात्र और अभिभावक अब कॉलेज चुनते समय केवल फीस या कैंपस नहीं देखते, बल्कि यह जानना चाहते हैं कि पिछले बैच के कितने छात्रों को नौकरी मिली, किस तरह की कंपनियां आईं और औसत पैकेज कितना रहा. जिन कॉलेजों के पास इन सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं है, वहां प्रवेश मुश्किल होता जा रहा है. 

इसी वजह से कई कॉलेजों ने इंजीनियरिंग की जगह फार्मेसी या दूसरे व्यावसायिक पाठ्यक्रम शुरू किए हैं. कुछ संस्थानों ने इंजीनियरिंग शाखाओं को कम करके 12वीं तक की पढ़ाई शुरू कर दी है. दूसरी ओर जिन कॉलेजों ने गुणवत्ता, फैकल्टी और प्लेसमेंट पर काम किया है, वहां छात्रों की संख्या बढ़ रही है. 

यह बदलाव बताता है कि छात्रों का इंजीनियरिंग से पूरी तरह मोहभंग नहीं हुआ है. उनका मोहभंग कमजोर संस्थानों और सीमित रोजगार संभावनाओं वाली पढ़ाई से है.

कॉलेज बढ़े, भरोसा नहीं

उत्तर प्रदेश में तकनीकी शिक्षा के विस्तार के साथ इंजीनियरिंग कॉलेजों की संख्या तेजी से बढ़ी. लेकिन संस्थानों की संख्या बढ़ना और गुणवत्तापूर्ण तकनीकी शिक्षा उपलब्ध होना दो अलग बातें हैं. कई संस्थान ऐसे खुले जहां पर्याप्त छात्र, फैकल्टी, प्रयोगशाला, उद्योग से संपर्क और प्लेसमेंट की व्यवस्था नहीं बन सकी. 

AKTU के कुलपति प्रो. जेपी पांडेय के अनुसार विश्वविद्यालय से 753 संस्थान संबद्ध हैं. उनका कहना है कि कुछ संस्थानों ने इंजीनियरिंग की शाखाएं घटाकर 12वीं तक की पढ़ाई शुरू की है हालांकि ऐसे संस्थानों की संख्या कम है. 

विश्वविद्यालय का यह भी कहना है कि इंजीनियरिंग और फार्मेसी में नए कॉलेज खुल रहे हैं और अच्छे प्लेसमेंट वाले संस्थानों में छात्रों की संख्या बढ़ रही है. यानी तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है. समस्या संस्थानों की संख्या से ज्यादा उनकी गुणवत्ता और उपयोगिता की है. 

जेपी पांडेय के मुताबिक नई शिक्षा नीति और बदलते रोजगार बाजार ने भी इंजीनियरिंग शिक्षा को पुराने ढर्रे से बाहर निकलने के लिए मजबूर किया है. उद्योग अब ऐसे युवाओं की मांग कर रहा है जिन्हें सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि आधुनिक तकनीक का व्यावहारिक ज्ञान हो. ऐसे में चार साल की पारंपरिक इंजीनियरिंग डिग्री और उसके बाद नौकरी की गारंटी वाला पुराना मॉडल छात्रों को उतना आकर्षित नहीं कर रहा. 

यूपी के एक इंजीनियरिंग कालेज में प्रोफेसर रहे रामअचल राय कहते हैं, “सरकार तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए नए संस्थान और नए पाठ्यक्रम शुरू कर रही है, लेकिन साथ ही पुराने संस्थानों की गुणवत्ता पर निगरानी भी जरूरी है. सिर्फ कॉलेज खोलने से इंजीनियरिंग शिक्षा मजबूत नहीं होगी. छात्रों को भरोसा दिलाना होगा कि जिस संस्थान में वे चार साल और लाखों रुपए खर्च कर रहे हैं, वहां उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक प्रयोगशाला, उद्योग से जुड़ा प्रशिक्षण और रोजगार का वास्तविक अवसर मिलेगा.” 

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