मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व की सबसे कठिन परीक्षा क्यों है दतिया उपचुनाव?

मुख्यमंत्री बनने के बाद मोहन यादव पहली बार ऐसे उपचुनाव का सामना कर रहे हैं, जिसमें उम्मीदवार और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दोनों उनकी पसंद के हैं. जीत उनके नेतृत्व को और मजबूत करेगी जबकि हार पार्टी के भीतर विरोधी खेमे को उन पर सवाल उठाने का मौका दे सकती है.

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव

मध्य प्रदेश में 30 जुलाई को जब दतिया विधानसभा उपचुनाव के लिए मतदान होगा तो इस फैसले का सबसे ज्यादा असर प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव पर पड़ेगा. इसलिए नहीं कि सरकार की स्थिरता इससे प्रभावित होगी बल्कि इसलिए कि यह पहला ऐसा उपचुनाव है जिसमें उम्मीदवार और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष दोनों ही मुख्यमंत्री की पसंद के हैं.

साल 2023 में मुख्यमंत्री बनने के बाद अब तक मध्य प्रदेश में अमरवाड़ा, विजयपुर और विदिशा विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हो चुके हैं. अमरवाड़ा और विजयपुर में 2024 में इसलिए चुनाव हुए क्योंकि कांग्रेस विधायक कमलेश शाह और रामनिवास रावत BJP में शामिल हो गए थे. उसी वर्ष विदिशा सीट पर भी उपचुनाव हुआ क्योंकि शिवराज सिंह चौहान लोकसभा सांसद बनने के बाद विधायक पद से इस्तीफा दे चुके थे.

विदिशा में बीजेपी की जीत लगभग तय मानी जा रही थी लेकिन अमरवाड़ा और विजयपुर के नतीजे मिले-जुले रहे. अमरवाड़ा में कमलेश शाह बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीत गए जबकि विजयपुर सीट कांग्रेस के खाते में चली गई.

जुलाई 2025 में हेमंत खंडेलवाल को बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. उन्हें मोहन यादव का करीबी माना जाता है. ऐसे में दतिया उपचुनाव पहली बार मोहन यादव और हेमंत खंडेलवाल की राजनीतिक जोड़ी की चुनावी क्षमता की भी परीक्षा माना जा रहा है.

इस चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक फैसला पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटना रहा. बीजेपी ने उनकी जगह आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया. माना जा रहा है कि इस फैसले के पीछे मुख्यमंत्री मोहन यादव की सहमति थी. ऐसे में उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि नरोत्तम मिश्रा की नाराजगी पार्टी उम्मीदवार को नुकसान न पहुंचाए.

शुरुआत में नरोत्तम मिश्रा समर्थकों ने टिकट कटने का विरोध किया. प्रदर्शन करने वाले बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ कई मामले भी दर्ज किए गए. बाद में नरोत्तम मिश्रा को भोपाल बुलाया गया, जहां उनकी मुख्यमंत्री मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल से मुलाकात हुई. इसके बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से आशुतोष तिवारी के पक्ष में प्रचार करने का ऐलान किया.

हालांकि चुनाव प्रचार में नरोत्तम मिश्रा की भूमिका पर अब भी सभी की नजर बनी हुई है. प्रचार के शुरुआती दिनों में उन्होंने अपने समर्थकों पर दर्ज पुलिस मामलों को लेकर खुलकर नाराजगी जताई थी. एक चुनावी सभा में टिकट न मिलने का जिक्र करते हुए वे मंच पर भावुक होकर रो भी पड़े थे. विपक्ष का दावा है कि नरोत्तम मिश्रा ने अब तक अपने समर्थकों को स्पष्ट संकेत नहीं दिया है कि उन्हें किसके पक्ष में मतदान करना है. इसी वजह से मुकाबला अब भी दिलचस्प बना हुआ है.

कांग्रेस ने दतिया से पूर्व विधायक और पूर्व राजघराने से जुड़े घनश्याम सिंह को उम्मीदवार बनाया है. वे 1993 और 2003 में इस सीट से चुनाव जीत चुके हैं और इलाके में उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है. हालांकि कांग्रेस की चिंता आजाद समाज पार्टी के उम्मीदवार दामोदर यादव को लेकर भी है. दामोदर यादव चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी और कांग्रेस दोनों पर जातिगत राजनीति के आधार पर लगातार हमला कर रहे हैं.

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि दामोदर यादव करीब 40 हजार अनुसूचित जाति मतदाताओं में सेंध लगाकर कांग्रेस को नुकसान पहुंचा सकते हैं. वहीं कुछ विश्लेषकों का कहना है कि वे 10 हजार से ज्यादा यादव मतदाताओं और कुछ ओबीसी वोट हासिल कर बीजेपी की संभावनाओं को भी प्रभावित कर सकते हैं.

दतिया सीट उस समय खाली हुई थी, जब 2023 में नरोत्तम मिश्रा को हराने वाले विधायक राजेंद्र भारती को एक मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद इस्तीफा देने पर मजबूर होना पड़ा था.

उपचुनाव का परिणाम 3 अगस्त को घोषित होगा. यदि भाजपा यह उपचुनाव जीतती है तो संपत्ति को लेकर लगे आरोपों के बावजूद मुख्यमंत्री मोहन यादव की स्थिति पार्टी और सरकार के भीतर मजबूत होगी, वहीं अगर हार का मुंह देखना पड़ा तो भाजपा का पुराना नेतृत्व और विरोधी खेमा उन्हें निशाने पर ले सकता है.

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