कैसरगंज से बृजभूषण के बेटे को मैदान में उतार कर भाजपा ने क्या हासिल किया?

भाजपा ने कैसरगंज सांसद बृजभूषण का टिकट काटकर एक तीर से कई निशाने साधे. प्रज्वल रेवन्ना प्रकरण के बाद उन्हें टिकट देना पार्टी के लि‍ए बड़ा खतरा मोल लेना था

कैसरगंज के मौजूदा सांसद बृजभूषण शरण सिंह के बेटे करण भूषण सिंह
कैसरगंज के मौजूदा सांसद बृजभूषण शरण सिंह के बेटे करण भूषण सिंह

उत्तर प्रदेश की कैसरगंज लोकसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवार को लेकर अटकलों का दौर पिछले एक महीने से चल रहा था. इसी बीच पांचवें दौर के लोकसभा चुनाव के लिए कैसरगंज सीट पर नामांकन भी शुरू हो गया लेकिन भाजपा ने अपने पत्ते नहीं खोले थे.

कैसरगंज लोकसभा सीट पर वर्तमान में भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह पर महिला पहलवानों के कथित यौन उत्पीड़न के आरोप के बाद पार्टी उम्मीदवारों के कई विकल्पों पर विचार कर रही थी. इनमें से एक बृजभूषण को उम्मीदवार न बनाकर उनके परिवार के किसी सदस्य को चुनाव लड़ाना भी शामिल था लेकिन कैसरगंज के वर्तमान सांसद इसके लिए तैयार नहीं थे. 

दो पक्षों के अड़े रहने के कारण कैसरगंज लोकसभा सीट पर कोई फैसला नहीं हो पाया और अब नामांकन की अंतिम तारीख 3 मई भी नजदीक आ गई थी. इसके एक दिन पहले 2 मई को बृजभूषण गोंडा जिले के नवाबगंज इलाके के विश्नोहरपुर गांव में अपनी कोठी में कुछ समर्थकों के साथ बैठे थे. सुबह ठीक नौ बजे उनके फोन की घंटी बजी. उधर से भाजपा के एक बड़े नेता लाइन पर थे. करीब एक मिनट की बातचीत में बृजभूषण को सूचना दे दी गई कि पार्टी ने उनका टिकट काटकर उनके बेटे करणभूषण सिंह को कैसरगंज लोकसभा सीट से अपना उम्मीदवार बना दिया है. 

फोन पर बातचीत के बाद बृजभूषण तो खामोश रहे लेकिन वहां मौजूद समर्थक यह भांप गए कि उनके बेटे का टिकट फाइनल हो गया है. करीब साढ़े नौ बजे बृजभूषण के बेटे और गोंडा सदर से विधायक प्रतीक भूषण ने एक वॉट्सएप ग्रुप में लिखा, "करणभूषण जिंदाबाद, कैसरगंज जिंदाबाद". बस इसके बाद तो सोशल मीडिया पर बधाइयों का सिलसिला शुरू हो गया. समर्थकों का हुजूम बृजभूषण के घर पहुंचने लगा. करण भूषण को फूल मालाओं से लाद दिया गया. करण ने अपने पिता के पैर छूकर आशीर्वाद लिया और नामांकन करने की औपचारिकताओं को पूरा करने में जुट गए. 

उत्तर प्रदेश की कैसरगंज लोकसभा सीट पर मौजूदा सांसद बृजभूषण के सबसे छोटे बेटे करण भूषण को मैदान में उतारकर भाजपा ने एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है. गोंडा में एक स्कूल के प्रबंधक अजय प्रकाश बताते हैं, "भाजपा ने कथित यौन उत्पीड़न के आरोपी छह बार के सांसद को मैदान में न उतारकर महिला सम्मान और सुरक्षा पर विपक्ष को बैठे-बिठाए कोई मुद्दा न पकड़ाने की कोशिश की है. साथ ही यह सुनिश्चित करने के लिए कि कैसरगंज और आस-पास के इलाकों में भाजपा का प्रभाव कम न हो इसलिए सिंह के परिवार के व्यक्ति को ही टिकट दिया है."

गोंडा के कांग्रेसी नेता रहे चंद्रभान शरण सिंह के बेटे बृजभूषण का अयोध्या की सियासत में अहम स्थान है. उन्होंने अवध विश्वविद्यालय से लॉ में मास्टर्स डिग्री हासिल की. इसके बाद साकेत महाविद्यालय से छात्रसंघ का चुनाव लड़ा और जीता भी. साकेत महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य वी. एन. अरोड़ा बताते हैं, "अस्सी के दशक में पूर्वांचल के कई जिलों में युवा नेता के रूप में बृजभूषण का नाम गूंजता था. 1987 में उन्होंने गन्ना समिति के चेयरमैन का चुनाव लड़ा और पहली बार में ही जीत गए." 

बृजभूषण ने अयोध्या की हनुमानगढ़ी में ही पहलवानी के दांव-पेंच सीखे. अस्सी के दशक में यहां पर हिंद केसरी बाबा हरिशंकर दास के साथ उन्होंने लंबे समय तक पहलवानी में हाथ आजमाया था. वर्ष 1988 में वे भाजपा के संपर्क में आए. ये मंदिर आंदोलन के बड़े चेहरों में थे. वर्ष 1992 में बाबरी ढांचा ध्वंस के मामले में सीबीआई ने सबसे पहले बृजभूषण को ही गिरफ्तार किया था. वर्ष 1991 में बृजभूषण भाजपा के टिकट पर गोंडा से लोकसभा चुनाव जीतकर पहली बार सांसद बने. सांसद बनने के बाद बृजभूषण एक बड़े विवाद में फंस गए. इनपर फरवरी से जून 1993 के बीच अंडरवर्ल्ड माफिया दाऊद इब्राहिम के चार साथियों को अपने आवास पर शरण देने का आरोप लगा. बृजभूषण टाडा में गि‍रफ्तार हुए. हालांकि इससे उनके रसूख पर कोई फर्क नहीं पड़ा. 1996 में  उन्होंने जेल में रहते हुए अपनी पत्नी केतकी सिंह को गोंडा से लोकसभा चुनाव जिता दिया. 1999 के लोकसभा चुनाव में बृजभूषण गोंडा से चुनाव जीते और इसके बाद लगातार पांच बार चुनाव जीत चुके हैं. 

सियासत के साथ-साथ बृजभूषण ने कुश्ती को भी साधे रखा. 2008 में वे कुश्ती महासंघ से जुड़े. इसी वर्ष नंदिनीनगर, गोंडा में पहली बार राष्ट्रीय कुश्ती चैम्पियनशिप का आयोजन किया गया. 2012 में बृजभूषण ने हरियाणा के कांग्रेसी नेता दीपक हुड्डा को हराकर भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष का चुनाव जीता. इससे पहले कुश्ती के अपने शगल को संस्थागत रूप देने के लिए उन्होंने 2010 में नंदिनीनगर महाविद्यालय परिसर में "नेशनल रेसलिंग एकेडमी" की नींव डाली. दो वर्ष बाद नंदिनीनगर में भारतीय खेल प्राधिकरण प्रशिक्षण केंद्र (साई) की स्थापना भी हुई. बृजभूषण के प्रतिनिधि‍ महेंद्र सिंह बताते हैं, "विश्व के प्रमुख केंद्रों में मिलने वाली सुविधाओं का अध्ययन कर नंदिनीनगरी में विश्व स्तर की कुश्ती अकादमी तैयार की गई है. खिलाडि़यों को कुश्ती का प्रशि‍क्षण दिलाने के लिए बेलारूस के एक प्रसिद्ध पहलवाल को नंदनीनगर की अकादमी में बतौर मुख्य प्रशिक्षक तैनात किया गया. इनकी निगरानी में छह पर्सनल कोच भी खिलाड़ियों को कुश्ती के दांवपेंच के गुर सिखा रहे हैं." 

कुश्ती अकादमी में एक समय में सवा सौ खिलाड़ी प्रशि‍क्षण लेते हैं. 12 साल या इससे अधि‍क उम्र वाले पहलवानी के शौकीन बच्चे अकादमी में कुश्ती के गुर सीखते हैं. महेंद सिंह का दावा है कि नंदिनीनगर देश की इकलौती कुश्ती अकादमी है जहां सबसे कम फीस में विश्वस्तरीय सुविधाएं मुहैया हैं. अकादमी में प्रवेश लेने वाले पुरुष खिलाड़ियों से ढाई हजार रुपए महीना और महिला खिलाड़ियों से दो हजार रुपए महीना फीस ली जाती है. इस फीस में खिलाड़ियों के प्रशिक्षण से लेकर उनका रहना और खाना सभी शामिल है. इसके अलावा किसी भी स्तर पर पदक जीतने वाले और गरीब परिवार से आने वाले खिलाड़ियों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता है. इस अकादमी में यूपी के अलावा हरियाणा, राजस्थान से खिलाड़ी प्रशिक्षण लेने आते हैं. अबतक 1000 से अधिक पहलवान नंदिनीनगर के अखाड़े में कुश्ती के दांव-पेंच सीख चुके हैं.

एक मंझे हुए पहलवान की तरह हर बार विवादों की 'धूल' झाड़कर खड़े होने वाले बृजभूषण सिंह इस बार यौन शोषण के आरोपों में बुरी तरह घिर गए हैं. इसकी कीमत उन्हें कैसरगंज से टिकट कटने के रूप में चुकानी पड़ी है. हालांकि राहत की बात यह भी है कि इस पूरे प्रकरण ने उनके परिवार के ही एक सदस्य के लोकसभा चुनाव में पदार्पण की राह खोली है. करण भूषण, जो 31 साल के हैं, बृज भूषण के तीन बेटों में सबसे छोटे हैं. चुनावी महासमर में पहली बार उतर रहे करण ने राजनीति का ककहरा अपने पिता बृज भूषण से ही सीखा है. इनके माता-पिता, दोनों संसद की दहलीज लांघ चुके हैं. भाई प्रतीक भूषण गोंडा सदर से भाजपा विधायक हैं. करण राष्ट्रीय कुश्ती संघ के उपाध्यक्ष रह चुके हैं. अब वह यूपी कुश्ती संघ के अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. वर्तमान में वह उत्तर प्रदेश सहकारी ग्राम विकास बैंक नवाबगंज के अध्यक्ष भी हैं. वे राष्ट्रीय ट्रेप शूटर, राष्ट्रीय फुटबाल खिलाड़ी भी हैं. कुश्ती व बैडमिंटन के खेल में भी उनकी विशेष रुचि है. करण की पत्नी नेहा सिंह एक स्कूल की प्रबंधक है. 

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यदि भाजपा ने भारतीय कुश्ती महासंघ (डब्ल्यूएफआई) के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण, जिन पर देश की शीर्ष महिला पहलवानों ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है, को फिर से चुनाव मैदान में उतारा होता तो विपक्ष की आलोचना का सामना करना पड़ता. यह ऐसे समय में और भी खराब निर्णय होता जब पार्टी को प्रज्वल रेवन्ना, जो पार्टी के कर्नाटक सहयोगी जनता दल (सेक्युलर) से हैं, के खिलाफ यौन शोषण के आरोपों पर आलोचना का सामना करना पड़ रहा है. अजय प्रकाश बताते हैं, "कैसरगंज के ताकतवर नेता बृजभूषण या उनके करीबी को टिकट न देने से कैसरगंज, श्रावस्ती, बस्ती और अयोध्या सहित कम से कम छह लोकसभा सीटों पर भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा सकता था." बृजभूषण का पूर्वी उत्तर प्रदेश की राजनीति में दबदबा है और वे इंजीनियरिंग, फार्मेसी, शिक्षा, कानून और सहित 50 से अधिक शैक्षणिक संस्थानों से सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं, जिन्हें उन्होंने बहराइच, गोंडा, बलरामपुर, अयोध्या और श्रावस्ती जिलों में स्थापित किया था.

बृजभूषण के बेटे को कैसरगंज से टिकट देने के पीछे भाजपा को लेकर ठाकुर समुदाय में पनपा असंतोष भी है. ठाकुर समुदाय के नेताओं को टिकट नहीं मिलने पर भाजपा को पश्चिमी और यूपी के अन्य हिस्सों में कुछ विरोध का सामना करना पड़ा है. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बृजभूषण को टिकट देने से इनकार करने से विपक्षी दलों को ठाकुरों तक पहुंचने का मौका मिल जाता, जो राज्य की आबादी के लगभग 7% हैं और भाजपा के लिए एक महत्वपूर्ण वोट बैंक हैं. हालांकि कैसरगंज के रहने वाले भाजपा नेता यह भी बताते हैं कि भाजपा द्वारा बृजभूषण का‍ टिकट काटकर उनके बेटे को थमाने के पीछे एक कारण यह भी था कि ऐसा न होने पर भाजपा की मुख्य विपक्षी समाजवादी पार्टी (सपा) बृजभूषण या उनके परिवार के सदस्य को कैसरगंज लोकसभा सीट से मैदान में उतार सकती थी. 

सपा द्वारा 2 मई की शाम तक कोई उम्मीदवार नहीं उतारना इस बात का संकेत है कि पार्टी भाजपा के कदम पर करीबी से नजर रखे हुए थी. बृजभूषण के प्रति सपा सुप्रीमो अखि‍लेश यादव लगातार नरम रवैया अपनाए हुए हैं. यौन उत्पीड़न के विवाद में फंसने के बाद भी अखि‍लेश ने सार्वजनिक तौर पर एक बार भी बृजभूषण की आलोचना नहीं की, जबकि अन्य विपक्षी नेताओं ने बार-बार भाजपा पर निशाना साधा है और सांसद को हटाने की मांग की है. आखिरकार, सपा ने देर शाम बहराइच के रहने वाले भगतराम मिश्र को कैसरगंज लोकसभा सीट से सपा उम्मीदवार घोषि‍त किया है. इस कदम को भी बृजभूषण के प्रति इंडिया गठबंधन की नरमी के रूप में देखा जा रहा है.

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