'वन डिस्ट्रिक्ट, वन डेस्टिनेशन' से बदल पाएगा बंगाल का पर्यटन?
पश्चिम बंगाल के पास पर्यटन के लिए बहुत कुछ है, अब चुनौती इन जगहों को बेहतर सुविधाओं और सही प्रचार के साथ जोड़ने की है जिसके लिए सरकार कर रही है हर जिले के एक खास पर्यटन स्थल को बढ़ावा देने की तैयारी

पुरुलिया जिले का छऊ नाच (फोटो : Bengal Tourism)
पश्चिम बंगाल अब पर्यटन को बढ़ावा देने के अपने तरीके में बदलाव की तैयारी कर रहा है. अब पर्यटन कुछ गिने-चुने मशहूर ठिकानों और खास मौसम तक सीमित नहीं रहेगा. इसके बजाय पूरे साल और राज्य के अलग-अलग हिस्सों में पर्यटन को बढ़ावा देने की योजना है. इसके तहत हर जिले से कम से कम एक खास पर्यटन स्थल विकसित करने और उसका प्रचार करने की उम्मीद है.
राज्य के पर्यटन विभाग ने पर्यटन योजनाओं की तैयारी और उन्हें लागू करने में जिला प्रशासन और स्थानीय निकायों की भूमिका बढ़ाने का फैसला किया है. इसके साथ ही 'वन डिस्ट्रिक्ट, वन डेस्टिनेशन' यानी 'एक जिला, एक पर्यटन स्थल' नीति अपनाई गई है. इसका मकसद राज्य के अलग-अलग पर्यटन आकर्षणों को एक साथ जोड़कर पर्यटन को बढ़ावा देना है.
24 अगस्त को कोलकाता के सॉल्ट लेक स्थित उदयाचल टूरिज्म प्रॉपर्टी में इस पहल की घोषणा करते हुए पर्यटन मंत्री शंकर घोष ने कहा कि विभाग जिला प्रशासन और स्थानीय निकायों को विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार करने और पर्यटन परियोजनाओं को लागू करने में मदद करेगा. इसके लिए शहरी विकास और नगर मामलों के विभाग के साथ मिलकर काम किया जाएगा.
यह कदम मौजूदा व्यवस्था की उस कमी को दूर करने के लिए उठाया गया है, जिसे मंत्री ने एक बड़ी समस्या बताया. जिलों के पास पर्यटन की संभावनाओं वाली परियोजनाओं की पहचान करने का अधिकार था लेकिन डीपीआर तैयार करने और उन्हें लागू करने के लिए जरूरी अधिकार और व्यवस्था नहीं थी.
घोष ने कहा, "हमें अलग-अलग जिलों में पर्यटन परियोजनाओं को लेकर जनप्रतिनिधियों, पर्यटन से जुड़े लोगों और आम लोगों से प्रस्ताव मिले हैं लेकिन हमने पाया कि जिला प्रशासन के पास संभावित पर्यटन परियोजनाओं की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने या ऐसी परियोजनाओं को लागू करने का अधिकार नहीं था."
उन्होंने आगे बताया, "हमने तय किया है कि हमारा विभाग अलग-अलग जिलों के प्रशासन और स्थानीय निकायों को शहरी विकास और नगर मामलों के विभाग के जरिए इन परियोजनाओं की रिपोर्ट तैयार करने और उन्हें लागू करने में मदद करेगा."
25 अगस्त को मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने अपने सलाहकार डॉ. सुब्रत गुप्ता, मुख्य सचिव मनोज अग्रवाल और दूसरे वरिष्ठ अधिकारियों के साथ पर्यटन विभाग के सदस्यों से मुलाकात की. इसके बाद घोष ने बताया कि अधिकारी ने विभाग को अपने तहत आने वाली हर संपत्ति को आधुनिक बनाने और नए पर्यटन स्थल विकसित करने की सलाह दी है.
'वन डिस्ट्रिक्ट, वन डेस्टिनेशन' मॉडल के तहत हर जिला एक प्रमुख पर्यटन स्थल चुनेगा और उसके आसपास पर्यटन पैकेज तैयार करेगा. इन पैकेजों को राज्य के बड़े पर्यटन प्रचार अभियान का हिस्सा बनाया जाएगा. इसका मकसद सिर्फ नए पर्यटन स्थल जोड़ना नहीं है बल्कि हर जिले के लिए ऐसे खास पर्यटन ब्रांड तैयार करना है जिनका पूरे साल प्रचार किया जा सके.
पर्यटन मंत्री ने कहा, "जिलों के प्रशासन से कहा गया है कि वे अपने-अपने पर्यटन स्थलों को सामने रखते हुए पर्यटन पैकेज तैयार करें. इसके बाद इनका प्रचार राज्य के व्यापक पर्यटन अभियान के तहत किया जाएगा.''
अपनी बात आगे बढ़ाते हुए उन्होंने बताया, ''हम अपनी नई 'वन डिस्ट्रिक्ट, वन डेस्टिनेशन' नीति के तहत हर जिले के प्रशासन को राज्य के व्यापक पर्यटन प्रचार कार्यक्रम से जोड़कर हर जिले को बढ़ावा दे रहे हैं."
सरकार को उम्मीद है कि पर्यटन स्थलों को राज्य के ज्यादा हिस्सों में फैलाने से बंगाल पर्यटन की एक पुरानी समस्या भी दूर होगी. अभी पर्यटन कुछ गिने-चुने इलाकों और खास मौसम पर ज्यादा निर्भर है. घोष ने कहा कि मकसद पर्यटन के ऐसे कैलेंडर से बाहर निकलना है जो साल के कुछ खास समय तक ही सीमित रहता है.
पर्यटन मंत्री के अनुसार, "इसके बाद राज्य में पर्यटन का मौसम किसी खास समय तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि 365 दिन पर्यटन का मौसम होगा."
हालांकि चुनौती प्रशासन की जिम्मेदारी को ऐसे पर्यटन स्थलों में बदलने की होगी जहां लोग वास्तव में जाना चाहें. हर जिले में एक पर्यटन स्थल चुनना आसान है लेकिन वहां सड़क, रहने की जगह, साफ-सफाई, पर्यटकों के लिए सुविधाएं, गतिविधियां और प्रचार की पूरी व्यवस्था तैयार करने के लिए लगातार निवेश और अलग-अलग विभागों के बीच तालमेल की जरूरत होगी.
तालमेल बेहतर करने के लिए BJP सरकार हर जिले में एक सेल बनाने की योजना बना रही है. इसमें जिला, अनुमंडल और प्रखंड प्रशासन के अधिकारियों के साथ विधायक भी शामिल होंगे. इसका मकसद अलग-अलग पर्यटन परियोजनाओं के लिए विभागों और जनप्रतिनिधियों को एक साथ लाना है ताकि हर काम के लिए सिर्फ पर्यटन विभाग पर निर्भर न रहना पड़े.
बुनियादी ढांचे और पर्यटकों के लिए जरूरी सुविधाएं भी इस योजना का अहम हिस्सा होंगी. सरकार की योजना पूरे राज्य में खासकर बड़े पर्यटन स्थलों पर 1,000 टूरिस्ट एमेनिटी सेंटर बनाने की है. इन केंद्रों पर पीने का पानी, शौचालय, थोड़ी देर आराम करने की जगह और छोटे बच्चों के साथ यात्रा करने वाले परिवारों के लिए सुविधाएं मिलने की उम्मीद है.
बुनियादी सुविधाओं पर जोर इसलिए भी अहम है क्योंकि पर्यटकों के लिए अच्छी व्यवस्था यह तय कर सकती है कि कोई आकर्षक जगह लंबे समय तक चलने वाले पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो पाएगी या नहीं. घोष ने बताया कि सरकार इन एमेनिटी सेंटरों के लिए सीएसआर के जरिए भी पैसा जुटाने के मॉडल पर विचार कर रही है ताकि राज्य के खजाने पर बोझ कम हो.
सरकार बंगाल के पर्यटन कारोबार को सिर्फ घूमने-फिरने तक सीमित नहीं रखना चाहती. घोष ने बताया कि उन्होंने 450 से ज्यादा डेस्टिनेशन वेडिंग एजेंसियों के प्रतिनिधियों से बातचीत की है. इससे संकेत मिलता है कि शादियां, कॉरपोरेट कार्यक्रम और नए तरह के पर्यटन को पारंपरिक पर्यटन के कमजोर मौसम में भी लोगों को आकर्षित करने के दूसरे साधन के तौर पर देखा जा रहा है.
प्रस्तावित योजना में ऐसे ठहरने के अनुभव, स्थानीय खाना दिखाने और बड़े स्तर पर कॉरपोरेट कार्यक्रम आयोजित करने को शामिल किया गया है. सरकार स्थानीय एमएसएमई के लिए प्रशिक्षण और कौशल विकास कार्यक्रम भी शुरू करने की योजना बना रही है. इससे पर्यटन को स्थानीय कारोबार से जोड़ने की कोशिश दिखती है बजाय इसके कि पर्यटन स्थलों को सिर्फ कुछ घंटों के लिए घूमने की जगह माना जाए.
डेस्टिनेशन वेडिंग पर जोर इसलिए भी खास है क्योंकि इससे उन समयों में होटल, विरासत वाली इमारतों और स्थानीय सेवाओं का इस्तेमाल बढ़ाया जा सकता है जब आम पर्यटन कम होता है. लेकिन इसके लिए पर्यटन स्थलों पर बेहतर मेहमाननवाजी, अच्छी कनेक्टिविटी और कार्यक्रमों के लिए जरूरी सुविधाएं भी देनी होंगी तभी बंगाल देश के दूसरे मशहूर वेडिंग डेस्टिनेशन से मुकाबला कर पाएगा.
सरकार पर्यटन कारोबार में काम करने वाले लोगों की कमी दूर करने पर भी ध्यान दे रही है. दार्जिलिंग जिले के सिलीगुड़ी में एक होटल मैनेजमेंट संस्थान बनाने की योजना है. इसका मकसद बढ़ते पर्यटन क्षेत्र के लिए प्रशिक्षित लोगों को तैयार करना है. घोष ने कहा, "यह संस्थान पर्यटन क्षेत्र के लिए जरूरी प्रशिक्षित लोगों को तैयार करने में मदद करेगा."
घोष ने पिछली तृणमूल कांग्रेस सरकार के दौरान पर्यटन विभाग के कामकाज की भी आलोचना की. उन्होंने आरोप लगाया कि विभाग अपने बजट का सही इस्तेमाल नहीं कर पाया और तय बजट का सिर्फ करीब 20 फीसदी ही खर्च हुआ.
अगर सरकारी खर्च के आंकड़ों से यह बात सही साबित होती है तो यह सिर्फ पर्यटन स्थलों या योजनाओं की संख्या की समस्या नहीं है. इससे यह सवाल भी उठता है कि सरकार घोषित बजट को जमीन पर काम करने वाले पर्यटन ढांचे में कितना बदल पाती है.
आखिर में नई योजना की सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी. बंगाल में पर्यटन की संभावनाओं की कमी नहीं है. हिमालय और जंगलों से लेकर समुद्र तट, झील और दलदली इलाके, पुराने शहर, मंदिर, व्यंजन और सांस्कृतिक परंपराएं तक यहां बहुत कुछ है. कमी एक ऐसी मजबूत और जुड़ी हुई व्यवस्था की रही है जो इन अलग-अलग जगहों को अच्छी कनेक्टिविटी और बेहतर प्रबंधन वाले पर्यटन अनुभव में बदल सके.
'वन डिस्ट्रिक्ट, वन डेस्टिनेशन' मॉडल इसी कमी को दूर करने की कोशिश है. इसमें जिम्मेदारी को स्थानीय स्तर तक ले जाया जाएगा और पर्यटन विभाग एक साथ काम करने और मदद करने वाले विभाग के तौर पर रहेगा. इसलिए इसकी सफलता इस बात से कम तय होगी कि कितने पर्यटन स्थल चुने गए बल्कि इस बात से ज्यादा कि उनके चुने जाने के बाद होता क्या है. क्या डीपीआर वास्तव में तैयार होती हैं, क्या परियोजनाएं पूरी होती हैं, क्या सुविधाओं का रखरखाव होता है, क्या स्थानीय कारोबार को जोड़ा जाता है, क्या लोगों को जरूरी प्रशिक्षण मिलता है और क्या इन जगहों को एक पूरे पर्यटन अनुभव के तौर पर प्रचारित किया जाता है.
अगर ये सभी चीजें सही तरीके से हो पाती हैं तो यह नीति बंगाल को कुछ गिने-चुने मशहूर नामों पर टिके पर्यटन नक्शे से आगे ले जाकर ज्यादा जिलों तक फैले पर्यटन कारोबार की ओर ले जा सकती है लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो 'वन डिस्ट्रिक्ट, वन डेस्टिनेशन' सिर्फ पर्यटन स्थलों की एक और सूची बनकर रह सकती है जिसमें पूरे साल पर्यटकों को खींचने के लिए जरूरी ढांचा और व्यवस्था नहीं होगी.