UPPSC भर्तियों की CBI जांच सुस्त क्यों हो गई?
UPPSC भर्तियों की साढ़े आठ साल से चल रही CBI जांच में हजारों अभ्यर्थियों के बयान और दो एफआईआर के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई

जनवरी 2018 से इस मामले में CBI जांच शुरू हुई थी (सांकेतिक फोटो)
उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) की भर्तियों में भ्रष्टाचार के खिलाफ 2017 खूब आवाजें उठी थीं. हालांकि शिकायतकर्ताओं ने तब राहत की सांस ली जब योगी आदित्यनाथ सरकार ने पूरे मामले की CBI जांच कराने की संस्तुति की.
विधानसभा चुनाव के दौरान आयोग की भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी सबसे बड़े मुद्दों में शामिल थी. प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति के बैनर तले प्रयागराज से लेकर लखनऊ तक आंदोलन हुए थे और भारतीय जनता पाटी (BJP) ने सरकार बनने पर CBI जांच कराने का वादा किया था.
जनवरी 2018 में CBI ने UPPSC की भर्तियों की जांच शुरू कर इस वादे को पूरा भी किया. शुरुआती दौर में जांच की रफ्तार देखकर प्रतियोगी छात्रों को लगा कि वर्षों से चली आ रही उनकी लड़ाई अब निर्णायक मुकाम तक पहुंचेगी.
बड़ी संख्या में अभ्यर्थी शिकायतें लेकर CBI के सामने पहुंचे. जांच अधिकारियों ने बयान दर्ज किए, दस्तावेज जुटाए और कई भर्तियों में धांधली की आशंका पर प्राथमिक जांच शुरू की. PCS-2015 और अपर निजी सचिव यानी APS-2010 में एफआईआर भी दर्ज हुई.
लेकिन समय बीतने के साथ जिस जांच से दोषियों पर कार्रवाई और प्रभावित परीक्षाओं के परिणाम की समीक्षा की उम्मीद थी, उसकी गति धीमी पड़ती चली गई.
अब स्थिति यह है कि CBI जांच शुरू हुए करीब साढ़े आठ साल होने जा रहे हैं लेकिन अभी तक व्यापक जांच का कोई ठोस निष्कर्ष सामने नहीं आया है.
जिन अभ्यर्थियों ने अपनी नौकरी और उम्र की सीमा की परवाह किए बिना भ्रष्टाचार के खिलाफ शिकायतें की थीं, उनमें से कई अब ओवरएज हो चुके हैं. कुछ ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी छोड़ दी, कुछ निजी नौकरियों में चले गए और कुछ आज भी इस उम्मीद में हैं कि कभी तो जांच पूरी होगी.
‘व्हिसल ब्लोअर’ भी ओवरएज हुए
अयोध्या की रहने वाली एक प्रतियोगी छात्रा की कहानी इस पूरी जांच की सबसे बड़ी विडंबना सामने रखती है. उन्होंने PCS की चार और लोअर सबऑर्डिनेट की दो परीक्षाओं के इंटरव्यू दिए, लेकिन चयन नहीं हुआ. उन्हें आशंका थी कि आयोग की चयन प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है.
CBI जांच शुरू होने के बाद जांच टीम के सामने उन्होंने लिखित शिकायत दी और गड़बड़ी से जुड़े तथ्यों को उपलब्ध कराया. उस समय उन्हें भरोसा था कि जांच एजेंसी निष्पक्ष तरीके से मामले की तह तक पहुंचेगी और यदि चयन प्रक्रिया में भ्रष्टाचार साबित हुआ तो योग्य अभ्यर्थियों को न्याय मिलेगा. लेकिन जांच आगे बढ़ने में साल दर साल लगते गए.
वर्ष 2020 में वे ओवरएज हो गईं. प्रयागराज में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का सिलसिला खत्म हुआ और उन्हें अयोध्या लौटना पड़ा. आज उनकी सबसे बड़ी शिकायत यह नहीं है कि उनका चयन नहीं हुआ, बल्कि यह है कि जिस जांच पर उन्होंने भरोसा करके अपनी शिकायत और जानकारियां दी थीं, उसका परिणाम इतने वर्षों बाद भी सामने नहीं आया.
ऐसी ही कहानी आजमगढ़ से प्रयागराज आकर तैयारी करने वाले एक अन्य शिकायतकर्ता की है. उन्होंने CBI पर भरोसा करते हुए एक एसडीएम पद पर चयनित अधिकारी से जुड़ी बैंक डिटेल और चयन प्रक्रिया में गड़बड़ी से संबंधित कई महत्वपूर्ण जानकारियां जांच एजेंसी को दी थीं.
उन्हें उम्मीद थी कि उनके दिए साक्ष्यों के आधार पर जांच तेजी से आगे बढ़ेगी. लेकिन समय बीतता गया और 2019 में वह भी ओवरएज हो गए. प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी छोड़कर आजमगढ़ लौटे और एक निजी स्कूल में पढ़ाने लगे.
विडंबना यह है कि दो वर्ष पहले CBI ने उन्हें ही समन भेजकर शिकायत के पक्ष में जरूरी साक्ष्य उपलब्ध कराने को कहा था. यानी जिस समय वे प्रतियोगी छात्र थे, तब जांच एजेंसी को जानकारी देने वाले अभ्यर्थी आज प्रतियोगी परीक्षा की उम्र पार कर चुके हैं और उनकी जिंदगी की दिशा बदल चुकी है.
इन अभ्यर्थियों की पीड़ा सिर्फ व्यक्तिगत नहीं है. यह उस व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा करती है जिसमें भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले युवाओं से जांच में सहयोग तो लिया जाता है, लेकिन जांच का परिणाम आने तक वही युवा अपनी उम्र, करियर और अवसर गंवा देते हैं.
एक शिकायतकर्ता का कहना है, “हमारी आस थी कि CBI तेजी से जांच पूरी करके दोषियों को सजा दिलाएगी. समय रहते गड़बड़ी वाली परीक्षाएं निरस्त होंगी और योग्य अभ्यर्थियों का चयन होगा. जांच की सुस्त गति से न्याय तो मिलना दूर, ज्यादातर अभ्यर्थी अब ओवरएज होकर नौकरी के लायक भी नहीं रह गए हैं.”
छह सौ के करीब परीक्षाएं लेकिन सिर्फ दो एफआईआर
CBI के सामने शुरुआत में जांच का दायरा बेहद बड़ा था. अप्रैल 2012 से मार्च 2017 के बीच UPPSC की करीब छह सौ भर्ती परीक्षाओं की जांच की जानी थी. इन परीक्षाओं के जरिए 40 हजार से अधिक पदों पर चयन हुए थे.
अलग-अलग रिकॉर्ड में जांच के दायरे में आने वाली परीक्षाओं की संख्या 598 से लेकर करीब 633 तक बताई गई है, लेकिन यह साफ है कि मामला सैकड़ों परीक्षाओं और हजारों चयनित अभ्यर्थियों से जुड़ा था.
जांच शुरू होने के बाद बड़ी संख्या में प्रतियोगी छात्र CBI के सामने पहुंचे. शिकायतों और उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों के आधार पर जांच टीम ने अभ्यर्थियों के बयान दर्ज किए. अब तक 10 हजार से अधिक और कुछ आकलनों के मुताबिक करीब 12 हजार अभ्यर्थियों के बयान दर्ज किए जा चुके हैं.
चयनित अभ्यर्थियों में टॉप करने वालों से भी पूछताछ हुई क्योंकि कई परीक्षाओं में टॉपर्स के चयन को लेकर भी सवाल उठे थे.
इतनी बड़ी कवायद के बावजूद छह प्रमुख वर्षों में CBI की कार्रवाई का परिणाम सीमित दिखाई देता है. दो प्रमुख परीक्षाओं, PCS-2015 और APS-2010 में एफआईआर दर्ज हुई. इसके अलावा समीक्षा अधिकारी/सहायक समीक्षा अधिकारी-2013, मेडिकल अफसर-2014 की सीधी भर्ती, लोअर सबऑर्डिनेट-2013 सहित कई मामलों में प्राथमिक जांच यानी पीई दर्ज की गई.
छह भर्ती परीक्षाओं में धांधली की आशंका को लेकर पीई दर्ज होने की बात सामने आई है, लेकिन इन मामलों में जांच एफआईआर तक नहीं पहुंच सकी. अगर हजारों अभ्यर्थियों के बयान दर्ज किए गए, शिकायतों और दस्तावेजों की पड़ताल हुई और कई मामलों में प्राथमिक जांच में भी गड़बड़ी की आशंका सामने आई, तो आखिर जांच आगे क्यों नहीं बढ़ी?
CBI ने जांच के दौरान कई अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी खंगाली. कुछ लोकसेवकों के खिलाफ कार्रवाई के लिए शासन और आयोग से अभियोजन की अनुमति मांगी गई. लेकिन अनुमति की प्रक्रिया भी जांच की रफ्तार पर भारी पड़ती रही. परिणाम यह रहा कि शिकायतकर्ताओं की उम्मीद और जांच की वास्तविक गति के बीच लगातार दूरी बढ़ती गई.
जांच की जिम्मेदारी भी समय के साथ बदलती रही. शुरुआत में आइपीएस अधिकारी राजीव रंजन को जिम्मेदारी दी गई. इसके बाद आइआरएस अधिकारी जितेंद्र कुमार ने 2019 से 2021 तक जांच संभाली. वर्ष 2021 से जुलाई 2022 तक दिल्ली कैडर के आइपीएस अधिकारी अतुल ठाकुर इस जांच से जुड़े रहे.
जुलाई 2022 से आइपीएस अधिकारी सुमन कुमार और विकास कुमार द्वितीय को जिम्मेदारी दी गई. अधिकारियों के बदलने के बावजूद जांच की दिशा और गति में अपेक्षित तेजी नहीं आई.
APS-2010: आठ साल से एफआईआर, नतीजा शून्य
CBI जांच की सुस्ती को समझने के लिए APS भर्ती परीक्षा-2010 सबसे बड़ा उदाहरण है. इस भर्ती में शॉर्टहैंड और टाइप टेस्ट में नियमों को कथित तौर पर तोड़-मरोड़कर दर्जनों अभ्यर्थियों को चयनित किए जाने के आरोप लगे थे. CBI को जांच के दौरान धांधली के पर्याप्त साक्ष्य मिले और तत्कालीन परीक्षा नियंत्रक प्रभुनाथ के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज की गई.
मामला यहीं नहीं रुका. CBI ने आयोग के तीन तत्कालीन अधिकारियों की भूमिका भी चिह्नित की. ये अधिकारी बाद में सेवानिवृत्त हो गए. इनसे पूछताछ के लिए अनुमति लेने में जांच एजेंसी को वर्षों लग गए.
करीब चार साल तक अनुमति की प्रक्रिया चलती रही, लेकिन इसके बाद भी पूछताछ और आगे की कार्रवाई का परिणाम सामने नहीं आया. CBI ने करीब एक दर्जन ऐसे चयनित अभ्यर्थियों को भी चिह्नित किया, जिनके चयन में गड़बड़ी की आशंका जताई गई.
जांच एजेंसी ने दावा किया कि इनके चयन में हुई अनियमितताओं के पर्याप्त साक्ष्य उसके पास हैं. इसके बावजूद APS-2010 में चयनित 223 अभ्यर्थी सचिवालय में अपनी सेवाएं दे रहे हैं.
यही स्थिति प्रतियोगी छात्रों के लिए सबसे ज्यादा परेशान करने वाली है. अगर जांच एजेंसी के पास गड़बड़ी के साक्ष्य हैं और गलत तरीके से चयनित अभ्यर्थियों की पहचान भी हो चुकी है, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति के अध्यक्ष अवनीश पांडेय ने CBI निदेशक को पत्र भेजकर आरोप लगाया है कि सचिवालय में तैनात कुछ चयनित अभ्यर्थी नौकरशाहों से मिलकर जांच को प्रभावित कर रहे हैं. उनका यह भी कहना है कि जांच की धीमी गति से पीड़ित अभ्यर्थियों का भरोसा टूट रहा है.
चुनाव से पहले फिर गरमाएगा मुद्दा
यूपी में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू हो चुकी है. ऐसे में UPPSC की भर्तियों में भ्रष्टाचार और लंबित CBI जांच का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस में लौट सकता है. UPPSC की CBI जांच अब सिर्फ भ्रष्टाचार की पड़ताल नहीं रह गई है.
यह उस भरोसे की परीक्षा भी बन गई है जो प्रतियोगी छात्रों ने जांच एजेंसी और सरकार पर किया था.