यूपी की वोटर लिस्ट में गड़बड़ियों का मामला कितना बड़ा?

उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद मतदाता सूची में नामों की अदला-बदली, संदिग्ध प्रविष्टियों और डुप्लीकेट वोटरों के आरोपों ने चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं

यूपी एसआईआर में दिग्गज नेताओं की सीट पर भारी फेरबदल सामने आया है.
पीलीभीत में मतदातों के नाम और पहचान से जुड़ी गड़बड़ियां सामने आई हैं (सांकेतिक तस्वीर)

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची की शुद्धता राजनीतिक टकराव का बड़ा मुद्दा बनती जा रही है. विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद प्रकाशित मतदाता सूची में नामों की अदला-बदली, संदिग्ध प्रविष्टियों और डुप्लीकेट वोटरों की शिकायतों ने निर्वाचन प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं. 

पीलीभीत में मतदाताओं के नाम और पहचान संबंधी विवरणों में कथित फेरबदल का मामला सामने आने के बाद चुनाव आयोग ने पूरे प्रदेश में मतदाता सूचियों की जांच के निर्देश दिए हैं. जिला स्तर पर जांच के दौरान गड़बड़ियों की पुष्टि होने और अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज होने से यह मामला महज राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रह गया है.

पीलीभीत में सहायक जिला निर्वाचन अधिकारी केके कश्यप की कंप्लेंट पर नगर कोतवाली में तत्कालीन एसडीएम मयंक गोस्वामी, हेमंत चौधरी और वोटर रजिस्ट्रेशन सेंटर (वीआरसी) के पूर्व कंप्यूटर ऑपरेटर अनिल कुमार के खिलाफ FIR दर्ज की गई है. 

जिलाधिकारी आलोक कुमार के मुताबिक, दोनों एसडीएम के खिलाफ जनप्रतिनिधित्व अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता की धाराओं में मामला दर्ज कराया गया है. विभागीय जांच शुरू करने के साथ दोनों अधिकारियों के निलंबन की संस्तुति भी की गई है. जिलाधिकारी ने 21 अक्टूबर की देर रात दोनों अधिकारियों को जिला मुख्यालय से संबद्ध कर दिया था जबकि संविदा कंप्यूटर ऑपरेटर की सेवाएं समाप्त कर दी गईं.

मयंक गोस्वामी तत्कालीन एसडीएम पूरनपुर और हेमंत चौधरी तत्कालीन एसडीएम अमरिया के रूप में सदर विधानसभा क्षेत्र में निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) की जिम्मेदारी संभाल रहे थे. प्रशासनिक जांच के अनुसार, 31 मई से 29 अगस्त 2026 के बीच वीआरसी के माध्यम से कुल 13,779 फॉर्मों की प्रविष्टियां की गईं. 

निर्वाचन आयोग ने पूरे प्रदेश में मतदाता सूचियों की जांच के निर्देश दिए हैं (फाइल फोटो)

इनमें मयंक गोस्वामी के कार्यकाल में 4,717 और हेमंत चौधरी के कार्यकाल में 9,062 फॉर्म दर्ज किए गए. जांच में इनसे संबंधित आंकड़ों का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं मिला. कुल 10,470 फॉर्म स्वीकृत और 3,309 फॉर्म अस्वीकृत किए गए थे लेकिन इनका ऑफलाइन या ऑनलाइन रिकॉर्ड कार्यालय में नहीं पाया गया.

जांच में मतदाता सूची में नाम बदलने के कई मामले भी सामने आए हैं. अमरिया तहसील के बूथ संख्या 83 समेत शहरी क्षेत्रों में एक ही वोटर आईडी नंबर पर मूल मतदाता का नाम बदलने की शिकायतें मिलीं. कुछ मामलों में शानू का नाम अयान, तौफीक का तुषार और राजू का रहीम किए जाने की बात सामने आई. महिला मतदाताओं के नामों में भी बदलाव के मामले दर्ज किए गए. ऑनलाइन परीक्षण के दौरान कुछ EPIC नंबरों से जुड़ी प्रविष्टियों में गंभीर विसंगतियां पाई गईं.

इन मामलों की गंभीरता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि मतदाता की पहचान के लिए इस्तेमाल होने वाले EPIC नंबर में बदलाव किए बिना नाम बदलने का आरोप है. यदि किसी मतदाता की पहचान संख्या पर दूसरे व्यक्ति का नाम दर्ज हो जाए तो इससे मतदाता सूची की प्रामाणिकता और मतदान के समय पहचान सत्यापन की प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है. 

विपक्ष की बढ़ी चिंता

पीलीभीत में गड़बड़ियों का मामला ऐसे समय सामने आया है, जब SIR के बाद उत्तर प्रदेश की मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम घटने को लेकर विपक्ष पहले से सवाल उठा रहा है. 27 अक्टूबर 2025 को प्रकाशित मतदाता सूची में प्रदेश में 15.44 करोड़ मतदाता थे. इसके बाद 10 अप्रैल 2026 को प्रकाशित अंतिम सूची में इनकी संख्या घटकर 13,39,84,792 रह गई. यानी करीब 2.04 करोड़ मतदाताओं की कमी दर्ज की गई. 

निर्वाचन आयोग की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक पुनरीक्षण प्रक्रिया में ऐसे मतदाताओं की पहचान की गई थी जिनके पते का सत्यापन नहीं हो सका जो स्थाई रूप से स्थानांतरित हो चुके थे, जिनकी मृत्यु हो चुकी थी या जिनकी प्रविष्टियां डुप्लीकेट थीं.

6 जनवरी को प्रकाशित मसौदा सूची में 2.89 करोड़ मतदाताओं को अनकलेक्टिबल कैटिगरी (जिनका पता नहीं चल पाया) में रखा गया था. इनमें 1.29 करोड़ ऐसे मतदाता शामिल थे जो स्थाई रूप से दूसरी जगह चले गए.

करीब 46 लाख मृत मतदाता, 25.4 लाख डुप्लीकेट प्रविष्टियां और 79.5 लाख ऐसे मतदाता भी शामिल थे जिनका पता नहीं चल सका था. अंतिम सूची के बाद हटाए गए नामों में नोटिस का जवाब नहीं देने वाले करीब 3.50 लाख, स्थाई रूप से स्थानांतरित या लापता 3.28 लाख, 79,076 डुप्लीकेट प्रविष्टियां, 55,865 मृत मतदाता और 2,269 गैर-नागरिक या कम उम्र के बताए गए लोग शामिल थे.

मतदाता सूची का विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SSR) 12 नवंबर से शुरू होगा (सांकेतिक तस्वीर)

निर्वाचन आयोग की दलील है कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची से अपात्र और डुप्लीकेट प्रविष्टियां हटाकर उसे शुद्ध करना है. लेकिन विपक्ष का सवाल है कि नाम हटाने और जोड़ने की प्रक्रिया में कहीं पात्र मतदाता प्रभावित तो नहीं हुए. पीलीभीत में नामों की कथित अदला-बदली ने इस आशंका को और बल दिया है कि सूची में बदलाव के दौरान केवल मतदाताओं की संख्या ही नहीं बल्कि उनकी पहचान से संबंधित विवरणों की भी गंभीरता से जांच होनी चाहिए.

उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने 21 अक्टूबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस में पीलीभीत सदर विधानसभा क्षेत्र में 13,150 मतदाताओं के नाम बदले जाने का आरोप लगाया. उन्होंने दावा किया कि 884 मतदाताओं के नाम हटा दिए गए जबकि वे संबंधित विधानसभा क्षेत्र में रह रहे थे और अपने निवास की पुष्टि के लिए आवेदन भी जमा कर रहे थे. 

गौतम ने इसके अलावा करीब 2,600 ऐसे नाम जोड़ने का आरोप लगाया गया जिनसे जुड़े लोग कथित तौर पर वहां नहीं रहते थे. कांग्रेस नेताओं ने अलग-अलग प्रविष्टियों को मिलाकर 16,500 से अधिक मतदाताओं के रिकॉर्ड प्रभावित होने का दावा किया है. पार्टी ने मामले की सीबीआई और फॉरेंसिक जांच कराने की मांग की है.

समाजवादी पार्टी भी इस मुद्दे को लेकर निर्वाचन आयोग के सामने शिकायतें रख चुकी है. पार्टी के प्रदेश सचिव केके श्रीवास्तव के मुताबिक, सपा ने प्रदेश में तीन लाख से अधिक संदिग्ध डुप्लीकेट मतदाताओं के संबंध में शिकायतें दर्ज कराई हैं. पार्टी ने मतदाताओं के नामों में उपसर्ग और प्रत्यय से जुड़ी विसंगतियों के साथ ऐसे मामलों की ओर भी ध्यान दिलाया है जिनमें एक EPIC नंबर पर दूसरे मतदाता का विवरण दिखाई देने का आरोप है. सपा का सवाल है कि यदि पीलीभीत में अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हुई है तो अन्य जिलों में भी इसी तरह की शिकायतों की व्यापक जांच क्यों नहीं होनी चाहिए.

कितना बड़ा गड़बड़ियों का दायरा

पीलीभीत में मामला दर्ज होने के बाद निर्वाचन आयोग ने जिला निर्वाचन अधिकारियों को अपने-अपने जिलों की सभी विधानसभा क्षेत्रों की मतदाता सूचियों की जांच करने के निर्देश दिए हैं. अधिकारियों को जांच रिपोर्ट दो दिन के भीतर मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय में जमा करनी है. पीलीभीत में जिलाधिकारी ने सदर विधानसभा क्षेत्र के अलावा बरखेड़ा, पूरनपुर और बीसलपुर विधानसभा क्षेत्रों में भी बूथवार पड़ताल और समीक्षा शुरू कराई है. प्रशासन ने अगले दो दिनों में शत-प्रतिशत शुद्ध मतदाता सूची तैयार करने का लक्ष्य रखा है ताकि पात्र मतदाताओं के नाम छूटने और फर्जी प्रविष्टियां बने रहने की आशंका दूर की जा सके.

इस जांच का दायरा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पीलीभीत में सामने आए मामले में रिकॉर्ड का उपलब्ध न होना और पहचान संबंधी विवरणों में बदलाव दोनों अलग-अलग तरह की प्रशासनिक विफलताओं की ओर संकेत करते हैं. रिकॉर्ड नहीं मिलने से यह सत्यापित करना कठिन हो जाता है कि किसी फॉर्म को किस आधार पर स्वीकार या अस्वीकार किया गया. 

वहीं एक ही पहचान संख्या से जुड़ी प्रविष्टियों में अलग-अलग नाम मिलने पर यह जांचना जरूरी हो जाता है कि बदलाव किस स्तर पर हुआ उसे किस अधिकारी ने मंजूरी दी और निर्धारित सत्यापन प्रक्रिया का पालन किया गया या नहीं.

FIR में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950, 1951 और 1989 की धारा 32 तथा भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 201 का उल्लेख किया गया है. प्रशासन ने आरोपों को केवल तकनीकी या  क्लेरिकल गलती मानने के बजाय संभावित आपराधिक अनियमितता के रूप में लिया है. 

राजनीतिक स्तर पर BJP ने SIR का बचाव किया है. पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता दिनेश प्रताप सिंह का कहना है कि पीलीभीत में नाम बदलने के मामले में मुकदमा दर्ज हुआ है और चुनाव आयोग उचित कार्रवाई कर रहा है. BJP के मुताबिक SIR डुप्लीकेट प्रविष्टियां खत्म करने और मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए जरूरी प्रक्रिया है. दूसरी ओर कांग्रेस और सपा ने गन्ना राज्यमंत्री संजय गंगवार तथा अधिकारियों पर कथित हेराफेरी के आरोप लगाए हैं. मंत्री ने इन आरोपों को विरोधियों की साजिश करार दिया है. 

मतदाता सूची में अगला चरण विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SSR) है, जो 12 नवंबर से शुरू होना प्रस्तावित है. मतदान केंद्रों का पुनर्गठन और आवंटन 2 नवंबर तक पूरा किया जाना है. दावे और आपत्तियां 12 नवंबर से 11 दिसंबर के बीच जमा होंगी, जिनका निस्तारण 28 दिसंबर तक किया जाना है. अंतिम मतदाता सूची 4 जनवरी को प्रकाशित होने वाली है. मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिनवा ने जिला निर्वाचन अधिकारियों और EROs को डुप्लीकेट प्रविष्टियों के निस्तारण को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए हैं.

ऐसे में पीलीभीत की जांच के नतीजे केवल एक जिले में जिम्मेदारी तय करने तक सीमित नहीं रहेंगे. उनसे यह भी स्पष्ट होगा कि मतदाता सूची में बदलाव की निगरानी, डिजिटल रिकॉर्ड के संरक्षण और बूथवार सत्यापन की मौजूदा व्यवस्था कितनी प्रभावी है. प्रदेशव्यापी जांच में यदि अन्य जिलों में भी ऐसी विसंगतियां मिलती हैं तो चुनाव आयोग के सामने सुधारात्मक कार्रवाई और जवाबदेही तय करने की चुनौती बढ़ेगी. 

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए सबसे अहम सवाल यही है कि हर प्रविष्टि का सत्यापन रिकॉर्ड के आधार पर हो और किसी पात्र मतदाता का नाम छूटने या उसकी पहचान बदलने की गुंजाइश न रहे.

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