विधानसभा चुनाव से पहले यूपी की सियासत को कितना गरमाएगा UCC का मुद्दा?

अमित शाह के 2029 तक सभी NDA राज्यों में UCC लागू करने के दावे से यूपी में सियासी हलचल बढ़ी लेकिन चुनाव से पहले कानून बनाने की प्रक्रिया पर संशय कायम

 amit shah and CM yogi
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और सीएम योगी आदित्यनाथ (फाइल फोटो)

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में करीब पांच महीने बाकी हैं और राजनीतिक दलों ने चुनावी मुद्दों के तीर तराशने शुरू कर दिए हैं. इसी बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले BJP के नेतृत्व वाले NDA के सभी 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता यानी UCC लागू करने का ऐलान कर यूपी की राजनीति में एक पुराने लेकिन संवेदनशील मुद्दे को फिर चर्चा में ले आए हैं.

शाह ने 13 सितंबर को मुंबई में कहा कि NDA शासित सभी 21 राज्यों में 2029 से पहले UCC लागू किया जाएगा. यूपी के लिए इस घोषणा का महत्व इसलिए ज्यादा है क्योंकि अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं.

इससे पहले सभी पार्टियां जातीय समीकरण, PDA की राजनीति, युवाओं की नाराजगी, रोजगार, कानून-व्यवस्था और हिंदुत्व के मुद्दों के बीच संतुलन साधने में जुटी है. ऐसे में सवाल है कि क्या UCC चुनाव से पहले BJP के लिए एक नया वैचारिक और राजनीतिक मुद्दा बनेगा या फिर यह अभी घोषणा और वादे तक ही सीमित रहेगा.

कोर एजेंडे के आखिरी बड़े मुद्दे की वापसी

BJP के लिए UCC कोई नया मुद्दा नहीं है. पार्टी लंबे समय से इसे अपने प्रमुख वैचारिक एजेंडे का हिस्सा बताती रही है. 2024 के लोकसभा चुनाव के संकल्प पत्र में भी UCC का वादा किया गया था. राम मंदिर निर्माण और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के बाद पार्टी के वैचारिक एजेंडे में UCC को एक महत्वपूर्ण लंबित मुद्दे के तौर पर देखा जाता रहा है. 

तीन तलाक पर कानून को भी BJP सरकार अपने सामाजिक-कानूनी सुधारों की सूची में रखती है. शाह ने अपने ताजा बयान में भी तीन तलाक खत्म करने को मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों से जोड़ते हुए UCC के विस्तार की बात कही. 

ओपी राजभर, अनुप्रिया पटेल और संजय निषाद (बाएं से दाएं) ने अभी UCC पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है

यूपी BJP के मुख्य प्रवक्ता दिनेश प्रताप सिंह कहते हैं, "J&K में अनुच्छेद 370 को हटाने की तरह ही UCC हमेशा से BJP के मुख्य लक्ष्यों और चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा रहा है. पार्टी UCC लाने के लिए प्रतिबद्ध है. अब केंद्रीय गृह मंत्री के बयान के बाद राज्य सरकार इस दिशा में कदम उठाएगी." 

यूपी में इसका राजनीतिक असर इसलिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है क्योंकि BJP और विपक्ष के बीच इस समय चुनावी विमर्श को लेकर सीधा मुकाबला है. समाजवादी पार्टी जहां पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी PDA के सामाजिक समीकरण को मजबूत करने की कोशिश कर रही है वहीं BJP गैर-यादव OBC, दलित और अन्य सामाजिक समूहों के बीच अपनी पकड़ बनाए रखने पर जोर दे रही है. 

राजनीतिक विश्लेषक और यूपी की जातिगत व्यवस्था पर शोध करने वाले लखनऊ में बाबा साहेब डा. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सुशील पांडेय ने हाल में यूपी की राजनीति में जातीय प्रतिनिधित्व को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा की ओर इशारा किया है. 

पांडेय के मुताबिक, पार्टियों की जातीय समूहों तक पहुंच केवल प्रतिनिधित्व का सवाल नहीं रह गई है, बल्कि इससे चुनावी समीकरण प्रभावित हो सकते हैं. UCC के संदर्भ में यही बात महत्वपूर्ण है. यदि BJP इसे समान कानून और महिला अधिकारों के सवाल से जोड़ती है तो विपक्ष इसे व्यक्तिगत कानून और सामाजिक विविधता के सवाल के रूप में पेश कर सकता है. यानी मुद्दा केवल कानून का नहीं, चुनावी नैरेटिव का भी बन सकता है.

सहयोगियों की चुप्पी 

हालांकि BJP के लिए रास्ता अपेक्षाकृत स्पष्ट दिखाई देता है, लेकिन NDA के सहयोगी दलों के लिए UCC उतना सरल राजनीतिक मुद्दा नहीं है. खासकर पश्चिमी और पूर्वी यूपी में जातीय तथा सामाजिक आधार वाले सहयोगी दलों के लिए इसका समर्थन स्थानीय स्तर पर संवेदनशील सवाल पैदा कर सकता है. 

खबर है कि यूपी में UCC के ड्राफ्ट पर भी काम शुरू नहीं हुआ है

जयंत चौधरी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय लोकदल यानी RLD केंद्र और योगी सरकार दोनों में NDA का हिस्सा है. RLD के नेता सीधे तौर पर इस मुद्दे पर कोई बयान देने से बच रहे हैं. अपना दल (सोनेलाल) भी इसी तरह सावधानी बरत रहा है. पूर्वी यूपी में कुर्मी और गैर-यादव OBC समुदाय के बीच आधार रखने वाली पार्टी के लिए UCC का सवाल केवल हिंदुत्व बनाम सेक्युलरिज्म के चश्मे से नहीं देखा जाएगा. 

निजी कानूनों में बदलाव के साथ OBC और आदिवासी समुदायों की पारंपरिक प्रथाओं पर संभावित असर भी राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बनेगा. ओम प्रकाश राजभर के नेतृत्व वाली सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का आधार राजभर और अन्य पिछड़े समुदायों में है. 

राजभर अतीत में ऐसे मुद्दों पर सावधानी की बात करते रहे हैं जिन्हें सामाजिक रूप से ऊपर से थोपा गया माना जा सकता है. इसलिए पार्टी की ओर से ड्राफ्ट देखने, आदिवासी समुदायों के लिए छूट और पिछड़े समुदायों की परंपराओं को सुरक्षित रखने जैसी मांगें सामने आ सकती हैं. 

राष्ट्रीय स्तर पर भी NDA में UCC को लेकर एक समान रुख नहीं दिख रहा. बिहार में JD(U) ने इस मुद्दे पर अलग रुख जताया है जबकि कुछ अन्य सहयोगी दलों ने ड्राफ्ट देखने और बातचीत की जरूरत बताई है. यूपी में अभी सहयोगी दलों का मोटा रुख यही दिखता है: BJP के मुख्य वैचारिक एजेंडे का खुला विरोध नहीं, लेकिन ड्राफ्ट सामने आए बिना तत्काल समर्थन भी नहीं.

यूपी में अभी या चुनाव के बाद?

UCC पर राजनीतिक हलचल के बावजूद सबसे अहम तथ्य यह है कि यूपी सरकार ने अभी तक स्टेट लॉ कमीशन से इसका ड्राफ्ट तैयार करने को नहीं कहा है. मामले की जानकारी रखने वाले लोगों के मुताबिक, राज्य सरकार किसी बड़े कानून को आगे बढ़ाने से पहले आम तौर पर स्टेट लॉ कमीशन से कानूनी मसौदा तैयार कराती है. 

कमीशन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, "स्टेट लॉ कमीशन के ऑफिस को अभी तक राज्य सरकार से UCC का ड्राफ्ट तैयार करने का कोई अनुरोध नहीं मिला है." इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव मौजूदा समय में आयोग के चेयरमैन हैं.

यही स्थिति फिलहाल सबसे बड़ा संकेत देती है. अगर सरकार को चुनाव से पहले UCC लागू करना होता तो अब तक ड्राफ्टिंग की प्रक्रिया शुरू हो चुकी होती. कमीशन से जुड़े सूत्रों का कहना है कि अनुरोध मिलने पर व्यापक विचार-विमर्श, उत्तराखंड मॉडल का अध्ययन और यूपी की आबादी तथा सामाजिक विविधता के मुताबिक उसमें बदलाव करना जरूरी होगा.

अखिलेश यादव ने UCC को सांप्रदायिक साजिश बताया है (फाइल फोटो)

उत्तराखंड में UCC विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे निजी नागरिक मामलों के लिए एक समान कानूनी व्यवस्था का ढांचा देता है. उत्तराखंड में यह जनवरी 2025 से लागू है और 2026 में इसमें संशोधन भी किए गए हैं. 

गुजरात, असम और मध्य प्रदेश में UCC से जुड़ी विधायी प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है, लेकिन इन राज्यों की स्थिति उत्तराखंड से अलग है. महाराष्ट्र समेत कुछ अन्य राज्यों में भी समितियों और ड्राफ्टिंग की प्रक्रिया पर काम हुआ है. 

यूपी में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पहले यह कह चुके हैं कि प्रशासनिक कामकाज में सरकार समान नागरिक संहिता की भावना के अनुरूप कई कदम उठा चुकी है. तीन तलाक कानून पर कार्रवाई और धर्मांतरण विरोधी कानून को इसका उदाहरण बताया जाता है. 

लेकिन सरकार के सामने दूसरी तरफ निवेश, इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर हब, एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था, रोजगार और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे भी हैं. ऐसे में चुनाव से ठीक पहले UCC को कानून में बदलने की बजाय इसे चुनावी विमर्श में प्रमुख मुद्दे के तौर पर इस्तेमाल करना एक अलग रणनीतिक विकल्प हो सकता है.

अखिलेश के हमले ने छेड़ी बहस

UCC पर BJP की सक्रियता का सीधा जवाब समाजवादी पार्टी की ओर से आना शुरू हो गया है. अखिलेश यादव ने X पर BJP के UCC को ‘Underground Communal Conspiracy’ यानी छिपी हुई सांप्रदायिक साजिश बताते हुए कहा कि पहले पुराने वादे पूरे किए जाएं. 

उन्होंने 15 लाख रुपए, दो करोड़ नौकरियों और अन्य पुराने वादों का हवाला देते हुए UCC पर सवाल उठाया. यानी BJP जहां UCC को समान नागरिक अधिकार, महिला अधिकार और अपने पुराने वैचारिक वादे को पूरा करने के रूप में पेश कर सकती है, वहीं SP इसे रोजगार, महंगाई और सामाजिक न्याय के मुद्दों से काटकर देखने की कोशिश करेगी. 

यही टकराव 2027 के चुनावी विमर्श में UCC को गरमाने की सबसे बड़ी वजह बन सकता है. संविधान का अनुच्छेद 44 राज्य को नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करने की बात कहता है. 

विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे निजी नागरिक मामलों में अलग-अलग धार्मिक और व्यक्तिगत कानूनों की मौजूदगी के कारण UCC लंबे समय से बहस का विषय रहा है. 2021 में अंतरधार्मिक विवाह से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी केंद्र सरकार से UCC पर सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों पर विचार करने को कहा था.

यूपी की राजनीति में UCC का असर केवल मुस्लिम समुदाय तक सीमित नहीं रहेगा. इसके दायरे में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और अन्य समुदायों के पारिवारिक कानूनों से जुड़े सवाल आएंगे. साथ ही आदिवासी और स्थानीय परंपराओं को लेकर छूट तथा प्रावधानों की प्रकृति भी राजनीतिक बहस का हिस्सा होगी.

इसलिए विधानसभा चुनाव से पहले UCC निश्चित तौर पर यूपी की सियासत को गरमाने वाला मुद्दा बन चुका है लेकिन इसे चुनावी कानून में बदलने की दिशा में सरकार कितनी तेजी दिखाती है फिलहाल इसका कोई आधिकारिक संकेत नहीं है. शाह की 2029 की समयसीमा और यूपी के 2027 चुनाव के बीच यही अंतर इस पूरे मुद्दे की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक कहानी है. 

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