यूपी में गन्ने के दाम पर क्यों बढ़ रहा किसानों और मिलों के बीच टकराव?
खेती की बढ़ती लागत के बीच किसान गन्ने का दाम 500 रुपए प्रति क्विंटल करने की मांग कर रहे हैं जबकि मिलें इसका विरोध कर रही हैं

गन्ना किसान (सांकेतिक तस्वीर)
लखनऊ के डालीबाग स्थित गन्ना संस्थान में 23 अक्टूबर को आयोजित किसान मजदूर महापंचायत में भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने गन्ना किसानों की मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बढ़ाया. उन्होंने गन्ने का लाभकारी मूल्य 500 रुपए प्रति क्विंटल से अधिक करने, चीनी मिलों पर बकाया भुगतान जल्द कराने और देरी होने पर नियमानुसार ब्याज देने की मांग की.
संयुक्त गन्ना आयुक्त सत्येंद्र सिंह ने मांगों को शासन तक पहुंचाने का आश्वासन दिया लेकिन टिकैत ने किसानों के प्रतिनिधिमंडल की उच्चस्तरीय अधिकारियों से सीधे वार्ता कराने पर जोर दिया. उन्होंने चेतावनी दी कि ठोस पहल नहीं हुई तो किसान मार्च निकालकर आंदोलन तेज करेंगे. मांगों का समाधान होने तक जिला मुख्यालयों पर धरने जारी रहेंगे.
महापंचायत में शामिल होने के लिए 22 अक्टूबर से ही किसानों का लखनऊ पहुंचना शुरू हो गया था. 23 अक्टूबर को मेरठ, मुजफ्फरनगर, बिजनौर और बदायूं समेत कई जिलों से किसान और यूनियन कार्यकर्ता पहुंचे थे. इस प्रदर्शन के केंद्र में आगामी पेराई सत्र 2026-27 के लिए गन्ने का राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) बढ़ाने की मांग है.
किसान संगठनों का कहना है कि खेती की लागत बढ़ने के बावजूद पिछले सत्र में तय 400 रुपए प्रति क्विंटल का अधिकतम मूल्य पर्याप्त नहीं है. दूसरी ओर चीनी मिल संचालक बढ़ते परिचालन खर्च का हवाला देकर मूल्य वृद्धि का विरोध कर रहे हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना लाखों किसानों की आजीविका और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार है. ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले गन्ना मूल्य का सवाल राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण हो गया है.
लागत में 10 हजार रुपए की बढ़ोतरी
गन्ने का मूल्य बढ़ाने के पीछे खेती की लागत में वृद्धि प्रमुख वजह है. किसान संगठनों के मुताबिक, पौध और पैड़ी फसल को मिलाकर इस सत्र में गन्ने की औसत उत्पादन लागत करीब 2,22,520 रुपए प्रति हेक्टेयर आंकी गई है जबकि पिछले वर्ष यह 2,12,043 रुपए थी. यानी लागत में लगभग 10,477 रुपए की वृद्धि हुई है.
खाद, बीज, खेत की तैयारी, निराई-गुड़ाई और दूसरे कृषि कार्यों पर बढ़ते खर्च ने किसानों की चिंता बढ़ाई है. गन्ने की पौध फसल में खेत तैयार करने, बीज, खाद और निराई-गुड़ाई पर अधिक खर्च आता है जबकि पैड़ी फसल की लागत अपेक्षाकृत कम रहती है. किसान संगठनों का कहना है कि गन्ने का मूल्य तय करते समय इन खर्चों को ध्यान में रखना चाहिए.
भारतीय किसान यूनियन अराजनैतिक के युवा प्रदेश अध्यक्ष दिगंबर सिंह के मुताबिक 400 रुपए प्रति क्विंटल का भाव पर्याप्त नहीं है और चीनी के दाम बढ़ने के साथ गन्ने की कीमत भी बढ़नी चाहिए. पिछले पेराई सत्र में उत्तर प्रदेश सरकार ने गन्ने के राज्य परामर्श मूल्य में 30 रुपए प्रति क्विंटल की वृद्धि की थी. इसके बाद अगेती किस्म का मूल्य 400 रुपए, सामान्य किस्म का 390 रुपए और अनुपयुक्त किस्म का 355 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित हुआ था.
इस बार किसान संगठन कम से कम 500 रुपए प्रति क्विंटल की मांग कर रहे हैं. चीनी के बाजार भाव में बढ़ोतरी भी किसानों की मांग को आधार दे रही है. पिछले पेराई सत्र में मिलों से बिकने वाली चीनी की कीमत शुरुआती दौर में लगभग 4,000 रुपए प्रति क्विंटल थी जो बाद में करीब 6,000 रुपए तक पहुंच गई.
किसानों का तर्क है कि चीनी की बेहतर कीमत का लाभ गन्ना उत्पादकों को भी मिलना चाहिए. हालांकि, चीनी की बिक्री से मिलने वाली पूरी रकम मिलों का मुनाफा नहीं होती. गन्ने की खरीद, ढुलाई, प्रसंस्करण और कर्मचारियों के वेतन पर भी खर्च होता है.
मिलों के खर्च का सवाल
गन्ना मूल्य को लेकर किसानों और मिलों के बीच मतभेद का बड़ा कारण चीनी, शीरा और एथेनॉल की अर्थव्यवस्था है. मिलों के आकलन के मुताबिक, एक क्विंटल चीनी बनाने में औसतन नौ क्विंटल गन्ना लगता है. 400 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से इसकी लागत 3,600 रुपए बैठती है. इसके अतिरिक्त गन्ने की ढुलाई पर करीब 20 रुपए प्रति क्विंटल तक और कर्मचारियों के वेतन तथा चीनी बनाने की प्रक्रिया पर लगभग 50 से 55 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से खर्च बताया जाता है.
मिल पक्ष के मुताबिक इन मदों को जोड़ने पर एक क्विंटल चीनी की उत्पादन लागत करीब 4,200 से 4,300 रुपए तक पहुंचती है. एक क्विंटल गन्ने से औसतन 10 से 11 किलोग्राम चीनी, करीब पांच किलोग्राम सी-हैवी शीरा और लगभग इतनी ही खोई प्राप्त होती है. शीरे का बाजार भाव करीब 1,300 रुपए प्रति क्विंटल बताया जा रहा है. हालांकि पूरी मात्रा इसी दर पर नहीं बिकती.
सरकार मिलों से 30 प्रतिशत तक शीरा 152 रुपए प्रति क्विंटल की दर से लेती है. इस बार सरकार ने अधिक चीनी उत्पादन पर जोर देते हुए मिलों को सी-हैवी शीरे पर चलाने का निर्देश दिया है. इससे मिलें बी-हैवी शीरे या सीधे गन्ने के रस से एथेनॉल का उत्पादन नहीं कर पाएंगी.
मिल संचालकों का कहना है कि इससे उनकी आय का गणित प्रभावित हो सकता है. वे चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य मौजूदा 31 रुपए प्रति किलोग्राम से बढ़ाकर 50 रुपए प्रति किलोग्राम से अधिक करने की मांग कर रहे हैं. सी-हैवी शीरे से बनने वाले एथेनॉल की कीमत बढ़ाने की मांग भी की जा रही है.
इस तरह किसान गन्ने की बढ़ती लागत और चीनी के बेहतर बाजार भाव के आधार पर मूल्य वृद्धि चाहते हैं जबकि मिलें परिचालन खर्च और सह-उत्पादों से होने वाली आय के बीच संतुलन की दलील दे रही हैं. महाराष्ट्र और कर्नाटक में गन्ने की पैदावार कम होने तथा बारिश से रिकवरी प्रभावित होने की आशंका भी चीनी बाजार के समीकरणों को प्रभावित कर सकती है.
सरकार की चुनौती
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना किसान बड़ा मतदाता वर्ग हैं और फसल का मूल्य लंबे समय से क्षेत्रीय राजनीति का प्रमुख मुद्दा रहा है. नए पेराई सत्र की शुरुआत से पहले सरकार पर 2026-27 के लिए एसएपी घोषित करने का दबाव बढ़ रहा है. गन्ना विकास विभाग के सूत्रों के मुताबिक सरकारी अधिकारियों और चीनी मिल प्रतिनिधियों के बीच हाल में हुई बैठक में मूल्य में बदलाव की संभावना पर चर्चा हुई.
किसान संगठन लागत बढ़ने के आधार पर मूल्य वृद्धि चाहते हैं जबकि मिल मालिकों ने एसएपी नहीं बढ़ाने का आग्रह किया है. गन्ना विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक विधानसभा चुनाव से पहले एसएपी में बदलाव की संभावना है और मूल्य वृद्धि से इनकार नहीं किया जा सकता. हालांकि यह अधिकारी का आकलन है, सरकार का घोषित फैसला नहीं.
अंतिम निर्णय राज्य मंत्रिमंडल को लेना है. सरकार के सामने गन्ना भुगतान समय पर सुनिश्चित करने की चुनौती भी है. उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 2025-26 पेराई सत्र के लिए सितंबर तक चीनी मिलों ने 34,500 करोड़ रुपए से अधिक के कुल बकाये में से करीब 33,000 करोड़ रुपए का भुगतान कर दिया था. यह कुल बकाये का 95 प्रतिशत से अधिक है.
राज्य में 121 चीनी मिलें संचालित हैं. इनमें 23 सहकारी, राज्य चीनी निगम की तीन और लगभग 95 निजी मिलें शामिल हैं. सहकारी मिलों ने किसानों को करीब 2,820 करोड़ रुपए और सरकारी मिलों ने 543.51 करोड़ रुपए का भुगतान किया. निजी मिलों की ओर से 29,000 करोड़ रुपए से अधिक का भुगतान किया गया.
राज्य सरकार का दावा है कि 2017 से अब तक गन्ना किसानों के बैंक खातों में सीधे 3.25 लाख करोड़ रुपए का भुगतान किया जा चुका है. इसके बावजूद किसान संगठनों की मांग है कि बकाये का भुगतान जल्द हो और देरी होने पर नियमानुसार ब्याज दिया जाए.
लखनऊ की महापंचायत में राकेश टिकैत ने स्पष्ट किया कि केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं है. उन्होंने उच्चस्तरीय अधिकारियों से सीधे वार्ता कराने की मांग करते हुए आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी.
आगामी पेराई सत्र से पहले किसानों की मांग तीन मुद्दों पर केंद्रित है: गन्ने का मूल्य कम से कम 500 रुपए प्रति क्विंटल करना, बकाये का समय पर भुगतान और देरी होने पर ब्याज दिलाना. दूसरी ओर, मिलें उत्पादन लागत, चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य और एथेनॉल से होने वाली आय में संतुलन चाहती हैं. 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सरकार का फैसला किसानों की अपेक्षाओं और उत्तर प्रदेश की गन्ना अर्थव्यवस्था, दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण होगा.