यूपी की नदियां क्यों दिखा रहीं बाढ़ का नया पैटर्न?

यूपी में सिर्फ बड़ी नदियां ही नहीं, छोटी नदियां भी असामान्य जलस्तर दर्ज कर रही हैं. सिकुड़ते बाढ़ क्षेत्र और प्राकृतिक जल निकासी में बदलाव ने यूपी में बाढ़ के खतरे को और बढ़ा दिया है

Flood threat rises in Pilibhit, UP (Photo- ITG)
यूपी की नदियों ने पिछले दिनों जलस्तर के नए रिकॉर्ड बनाए (सांकेतिक तस्वीर)

लखनऊ में गोमती नदी का जलस्तर लगातार बढ़ना अब केवल शहर के नदी किनारे बसे इलाकों के लिए तत्काल चिंता का विषय नहीं रह गया है. 3 अक्टूबर को नदी का पानी भैंसाकुंड के शवदाह स्थल के चबूतरे तक पहुंच गया और हनुमंत धाम परिसर के कुछ हिस्से भी जलमग्न हो गए. इससे एक दिन पहले रिवरफ्रंट का बड़ा हिस्सा पानी में डूब चुका था और गुलालघाट पर भी जलस्तर बढ़ता दिखाई दिया. 

सिंचाई विभाग के मुताबिक गोमती बैराज पर 24 घंटे में करीब छह इंच पानी बढ़ा. अहम बात यह है कि लखनऊ में इस बढ़ोतरी का मुख्य कारण शहर में हुई बारिश नहीं बल्कि सीतापुर, लखीमपुर खीरी और दूसरे ऊपरी जिलों के जलग्रहण क्षेत्रों से नीचे की ओर आ रहा पानी है. 

यानी लखनऊ में नदी का बढ़ता पानी दरअसल उस पूरी जल-व्यवस्था का परिणाम है जिसमें बारिश कहीं और हो रही है लेकिन उसका असर कई घंटे बाद राजधानी में दिखाई दे रहा है. सिंचाई विभाग के लखनऊ डिवीजन के अधिशासी अभियंता मुकेश वैश के मुताबिक ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों से पानी पहुंचने के बाद गोमती का बहाव तेज हुआ है. 

वे यह भी बताते हैं कि नदी की प्रवाह गति पहले करीब एक किलोमीटर प्रति घंटे थी जो अब करीब 30 किलोमीटर प्रति घंटे बताई गई है. जलस्तर बढ़ने के साथ गोमती बैराज के सभी 10 गेट खोल दिए गए हैं ताकि पानी को डाउनस्ट्रीम की ओर निकाला जा सके और शहर की तरफ पानी के दबाव को कम किया जा सके. 

इस घटनाक्रम की गंभीरता समझने के लिए गोमती के लखनऊ में बढ़ते जलस्तर को अकेली घटना की तरह देखने के बजाय इस साल उत्तर प्रदेश की दूसरी नदियों के व्यवहार के साथ जोड़कर देखना जरूरी है. 

चित्रकूट में मंदाकिनी नदी का पानी (फाइल फोटो)

हाल के महीनों में राज्य की कई अपेक्षाकृत छोटी नदियों ने अपने पुराने उच्चतम बाढ़ स्तर को छुआ या उसके करीब पहुंचीं. चित्रकूट की मंदाकिनी इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनी. 29 अगस्त को मंदाकिनी ने रामघाट पर 135.20 मीटर का जलस्तर दर्ज किया जबकि उसका पिछला उच्चतम बाढ़ स्तर 2003 में 134.50 मीटर था. यानी पुराना रिकॉर्ड करीब 70 सेंटीमीटर से टूट गया. मध्य प्रदेश के सतना में इसी नदी ने 145.60 मीटर का स्तर छुआ जो 2003 के 142.65 मीटर के रिकॉर्ड से 2.95 मीटर अधिक था. 

मंदाकिनी की बाढ़ ने यह भी दिखाया कि छोटी नदी का मतलब छोटी आपदा नहीं होता. चित्रकूट में करीब 400 दुकानें डूब गईं, 41 साल पुराना रामघाट-हनुमान धारा पुल बह गया, सड़क और रेलवे ढांचे पर असर पड़ा और सतना-मानिकपुर रेलखंड प्रभावित होने से करीब 40 ट्रेनें प्रभावित हुईं. 

16 गांवों से करीब 400 लोगों को निकालना पड़ा. नदी का जलस्तर 29 अगस्त की सुबह 6.45 बजे 125.7 मीटर था और दोपहर तीन बजे तक 135.2 मीटर पहुंच गया. यानी करीब आठ घंटे में लगभग 9.5 मीटर की वृद्धि. 17 अगस्त से 3 सितंबर के बीच मंदाकिनी 11 बार खतरे के निशान से ऊपर गई. 

यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आखिर नदियां अचानक इतनी तेजी से क्यों बढ़ रही हैं. उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि केवल बारिश की कुल मात्रा इस सवाल का पूरा जवाब नहीं देती. मंदाकिनी के मामले में 29 अगस्त को चित्रकूट में औसत बारिश 31 मिलीमीटर रही जबकि सामान्य बारिश 6.2 मिलीमीटर है. 

सतना में 73.6 मिलीमीटर बारिश हुई जबकि सामान्य औसत 6.6 मिलीमीटर है. सतना में यह सामान्य से करीब 1,015 प्रतिशत अधिक थी. यानी नदी का जलस्तर बढ़ाने में बारिश की तीव्रता और उसके थोड़े समय में एकत्र होकर नदी के जलग्रहण क्षेत्र में पहुंचने की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही. 

यही पैटर्न अब गोमती के मामले में भी दिखाई देता है हालांकि दोनों घटनाओं की भौगोलिक और नदीगत परिस्थितियां अलग हैं. लखनऊ में स्थानीय बारिश रुक जाने के बाद भी नदी का पानी बढ़ रहा है क्योंकि ऊपर के जिलों में हुई बारिश का पानी नीचे की ओर पहुंच रहा है. 

इसका मतलब है कि शहर के किसी एक दिन के बारिश के आंकड़े से गोमती के तत्काल खतरे का अनुमान लगाना पर्याप्त नहीं है. नदी का जलस्तर उसके पूरे ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में हुई बारिश, वहां जमा हुए पानी और उस पानी की नीचे की ओर गति से तय होता है. यही वजह है कि लखनऊ में नदी का जलस्तर उस समय भी बढ़ सकता है जब शहर में बारिश कम हो या बिल्कुल न हो. 

गोमती में बढ़ते पानी का एक और महत्वपूर्ण पहलू शहर की जल निकासी व्यवस्था है. सिंचाई विभाग ने पहले ही लखनऊ के 48 ड्रेनेज आउटलेट सील कर दिए थे ताकि उफनती नदी का पानी उलटे शहर के नालों में प्रवेश न कर सके. 

नदियों के बाढ़ क्षेत्र में निर्माण की वजह से हालात और खराब हो रहे हैं (सांकेतिक तस्वीर)

सामान्य परिस्थितियों में शहर का पानी ड्रेनेज नेटवर्क के जरिये नदी की तरफ जाता है लेकिन जब नदी का जलस्तर नालों से ऊपर पहुंच जाता है तो यही व्यवस्था उलटी दिशा में काम कर सकती है. इसलिए बैराज के गेट खोलना केवल नदी का पानी आगे भेजने की कवायद नहीं है बल्कि शहर के भीतर पानी की वापसी रोकने की रणनीति का भी हिस्सा है. 

लखनऊ में इसका असर अब नदी किनारे के प्रमुख सार्वजनिक और धार्मिक स्थलों तक पहुंच चुका है. भैंसाकुंड में पानी उस चबूतरे तक पहुंच गया जहां आम तौर पर लकड़ी से अंतिम संस्कार किया जाता है. हालांकि नगर निगम के अनुसार अभी वहां अंतिम संस्कार का काम प्रभावित नहीं हुआ है. 

हनुमंत धाम के कुछ हिस्सों में पानी घुसा है. रिवरफ्रंट के बड़े हिस्से में पानी फैलने के बाद लखनऊ विकास प्राधिकरण ने एहतियात के तौर पर फूड वैली को एक दिन बंद रखने को कहा. उधर बख्शी का तालाब क्षेत्र में बाढ़ राहत कार्य तेज किए गए हैं और 30 से अधिक नावें प्रभावित इलाकों में चल रही हैं. चार राहत शिविर और सहायता केंद्र संचालित किए जा रहे हैं. 

लेकिन क्या इसे केवल असामान्य बारिश का मामला माना जाए? उत्तर प्रदेश की इस साल की नदी तस्वीर इस निष्कर्ष को अधूरा बताती है. सिंचाई विभाग के आंकड़ों के मुताबिक शाहजहांपुर की गर्रा नदी 2024 में 149.80 मीटर के अपने उच्चतम बाढ़ स्तर तक पहुंच गई. खन्नौत ने भी 2024 में 146.75 मीटर का पुराना उच्चतम स्तर छुआ. 

मुरादाबाद की गगन नदी 2025 में 192.60 मीटर तक पहुंची जो उसके 193.60 मीटर के पुराने रिकॉर्ड के बाद दूसरा सबसे ऊंचा स्तर था. इस साल गाजीपुर की कर्मनासा 67.40 मीटर तक पहुंची, कानपुर की पांडु 102.83 मीटर और प्रयागराज की टोंस 96.14 मीटर तक पहुंची. मिर्जापुर की बेलन नदी ने इस साल 139.15 मीटर का अपना सर्वकालिक उच्चतम स्तर छुआ. 

इन आंकड़ों से यह जरूर संकेत मिलता है कि असामान्य ऊंचे बाढ़ स्तर केवल बड़ी नदियों तक सीमित नहीं हैं. छोटी नदियों में समस्या और गंभीर हो सकती है क्योंकि उनका जलग्रहण क्षेत्र छोटा, नदी चैनल अपेक्षाकृत संकरा और पानी को रोकने की प्राकृतिक क्षमता सीमित होती है. ऐसे में जलग्रहण क्षेत्र में कुछ घंटों की अत्यधिक बारिश तेजी से नदी के बहाव में बदल जाती है. 

जब जमीन पहले से संतृप्त हो तो बारिश का बड़ा हिस्सा जमीन में जाने के बजाय सतही बहाव बन जाता है और नदी में अचानक पहुंचता है. विशेषज्ञों ने इसी वजह से छोटी नदियों को अचानक आने वाली बाढ़ के लिहाज से ज्यादा संवेदनशील माना है.

मेरठ विश्वविद्यालय में भौतिक शास्त्र विभाग के सहायक प्रोफेसर विवेक नौटियाल बताते हैं, “जलवायु परिवर्तन इस तस्वीर में एक संभावित कारक जरूर है लेकिन हर बाढ़ को केवल जलवायु परिवर्तन का परिणाम मान लेना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा. वातावरण का तापमान बढ़ने पर उसमें जलवाष्प रखने की क्षमता बढ़ती है.” 

आईपीसीसी के अनुसार तापमान में एक डिग्री सेल्सियस वृद्धि पर वातावरण की जलवाष्प धारण क्षमता करीब सात प्रतिशत बढ़ती है. इससे जरूरी नहीं कि बारिश वाले दिनों की संख्या बढ़े लेकिन कम समय में अत्यधिक बारिश की घटनाओं की तीव्रता बढ़ सकती है. 

यही अंतर सामान्य मानसूनी बारिश और अचानक आई बाढ़ के बीच निर्णायक हो सकता है. विवेक नौट‍ियाल के मुताबिक दूसरा सवाल मानवीय दखल का है. बाढ़ अपने आप में प्राकृतिक घटना है लेकिन वह आपदा तब बनती है जब नदी के प्राकृतिक फैलाव क्षेत्र में आबादी और ढांचा मौजूद हो. 

नदियों के बाढ़ क्षेत्र में निर्माण, तालाबों और आर्द्रभूमियों का सिकुड़ना, प्राकृतिक जल निकासी मार्गों पर अतिक्रमण और शहरों के तेजी से फैलने से अतिरिक्त पानी को फैलने और अस्थाई रूप से रोकने की जगह कम होती जा रही है. ऐसे में वही पानी, जो पहले नदी के आसपास के प्राकृतिक क्षेत्र में फैलकर धीरे-धीरे आगे बढ़ सकता था कम जगह में ज्यादा दबाव पैदा करता है. 

लखनऊ के मामले में यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि गोमती का नदी तंत्र शहर के भीतर अत्यधिक मानवीय दखल से गुजरता है. रिवरफ्रंट, सड़कें, घाट, धार्मिक स्थल और दूसरी शहरी संरचनाएं नदी के किनारे मौजूद हैं. इसलिए नदी का सामान्य से कुछ ऊपर जाना और नदी का बाढ़ क्षेत्र में फैल जाना दो अलग स्थितियां हैं. 

खतरा केवल इस बात से नहीं तय होगा कि बैराज पर पानी कितने मीटर है बल्कि इससे भी कि नदी के प्राकृतिक फैलाव क्षेत्र में कितना पानी पहुंच रहा है और शहर की संरचनाएं उस बढ़े हुए बहाव के सामने कितनी सुरक्षित हैं.

इसी संदर्भ में केंद्र सरकार की 10 अगस्त 2026 की अधिसूचना भी महत्वपूर्ण है, जिसमें गंगा और उसकी सहायक नदियों के लिए सक्रिय बाढ़ क्षेत्र, नियामक क्षेत्र और चेतावनी क्षेत्र की स्पष्ट अवधारणाएं दी गई हैं. उद्देश्य नदी के बाढ़ क्षेत्र को केवल खाली जमीन के रूप में नहीं, बल्कि नदी की प्राकृतिक कार्यप्रणाली का हिस्सा मानना है. 

विशेषज्ञों के मुताबिक बाढ़ से बचाव का मतलब सिर्फ तटबंध और बैराज बनाना नहीं बल्कि उन प्राकृतिक क्षेत्रों को बचाना भी है जहां नदी अतिरिक्त पानी को फैलाकर अपने प्रवाह का दबाव कम करती है. इसलिए यूपी में बाढ़ प्रबंधन की अगली चुनौती इसी बदलते समीकरण को समझने और नदी के साथ शहर के रिश्ते को नए सिरे से तय करने की है.

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