कैमरा ऑन, कानून ऑफ! यूपी में रीलबाजी बनी पुलिस-प्रशासन के लिए सिरदर्द

हाईवे पर स्टंट से लेकर ट्रेन की चेन पुलिंग और फर्जी वीडियो तक, लाइक्स की होड़ में रीलबाज कानून तोड़ रहे हैं और पुलिस-प्रशासन की मुश्किल बढ़ा रहे हैं

स्टंटबाजों की तलाश शुरू.(Photo: Screengrab)
बाइक पर स्टंट दिखाता एक युवक (सांकेतिक तस्वीर)

महाराजगंज के फरेंदा में गोरखपुर-सोनौली हाईवे के ओवरब्रिज पर दो स्पोर्ट्स बाइक सवार युवतियों की रील ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि सोशल मीडिया पर कुछ सेकेंड की लोकप्रियता के लिए सार्वजनिक व्यवस्था और लोगों की सुरक्षा को कितनी आसानी से जोखिम में डाला जा रहा है.

वायरल वीडियो में एक युवती बाइक से स्टंट करती दिखाई दी, जबकि दूसरी बाइक पर सवार लोग उसका वीडियो बनाते नजर आए. वीडियो सामने आने के बाद फरेंदा पुलिस सक्रिय हुई और रील में इस्तेमाल दो बाइकों में से एक यामाहा आर-15 बरामद कर ली. पुलिस ने मामले में विधिक कार्रवाई शुरू की है. गोरखपुर-सोनौली हाईवे पर रील और स्टंट के लिए यातायात नियमों की अनदेखी की शिकायतें बढ़ने की बात भी सामने आई है.

फरेंदा का यह मामला अकेला नहीं है. यूपी में रील बनाने और सोशल मीडिया पर 'भौकाल' दिखाने का शौक अब सिर्फ सड़क पर खतरनाक स्टंट तक सीमित नहीं रह गया है. हाईवे पर तेज रफ्तार गाड़ियां दौड़ाने, चलती ट्रेन की चेन खींचने, सरकारी परिसरों में वीडियो बनाने, पुलिस की वर्दी में रील शूट करने और यहां तक कि फर्जी घटनाओं को वास्तविक बताकर वायरल करने तक इसकी पहुंच हो चुकी है.

कार के सनरूफ से स्टंट दिखाता एक युवक (फाइल फोटो)

कई मामलों में पुलिस और प्रशासन को वायरल वीडियो के बाद कार्रवाई करनी पड़ती है. यानी जिस सोशल मीडिया को प्रशासन सूचना और जनसंपर्क का माध्यम मानता है, वही अब कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए नई चुनौती बन रहा है.

हाईवे से रेलवे ट्रैक तक रील

फरेंदा के बाद फिरोजाबाद के टूंडला में हाईवे पर रील बनाने का मामला सामने आया. वायरल वीडियो में दो कारें तेज रफ्तार में साथ चलती दिखाई दीं. एक कार की सनरूफ और खिड़की से युवक बाहर निकलकर वीडियो बनाते नजर आए, जबकि एक कार सड़क पर लहराते हुए चलती दिखी.

पुलिस ने सीसीटीवी की मदद से कार सवारों की पहचान कर कार्रवाई की बात कही. इन दोनों मामलों में फर्क सिर्फ जगह का है. एक में बाइक पर स्टंट हुआ और दूसरे में कारों को सड़क पर खतरनाक तरीके से चलाकर वीडियो बनाया गया. दोनों में मकसद सोशल मीडिया के लिए ऐसा कंटेंट तैयार करना था, जो सामान्य ड्राइविंग से अलग और ज्यादा आकर्षक दिखाई दे.

आगरा में सामने आए आंकड़े इस प्रवृत्ति का बड़ा पैमाना बताते हैं. जून 2026 में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक आगरा ट्रैफिक पुलिस ने दो साल में स्टंट करने वाले करीब 3200 वाहनों के चालान किए और लगभग 1000 वाहन सीज किए. वर्ष 2025 में 2400 वाहनों के चालान, 727 वाहन सीज और 45 लोगों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए गए. 2026 के शुरुआती छह महीनों में ही करीब 800 चालान, 273 वाहन सीज और 22 मुकदमे दर्ज किए जा चुके थे.

सोशल मीडिया के लिए सार्वजनिक सड़कों को शूटिंग लोकेशन की तरह इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति लगातार प्रशासन के सामने आ रही है. इसका असर केवल रील बनाने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता. हाईवे पर तेज रफ्तार या स्टंट करते समय वाहन का नियंत्रण बिगड़ने पर दूसरा वाहन, राहगीर या बाइक सवार भी दुर्घटना का शिकार हो सकता है.

रेलवे ट्रैक पर भी रील बनाने कम नहीं हैं (सांकेतिक तस्वीर)

यही स्थिति रेलवे में भी सामने आ रही है. कानपुर सेंट्रल पर जनवरी से सितंबर 2026 के बीच अकारण चेन पुलिंग के आरोप में पकड़े गए 397 लोगों में 224 ऐसे थे, जिन्होंने रील बनाने या 'भौकाल' दिखाने के लिए ट्रेन की चेन खींची. इन लोगों को जेल जाना पड़ा. प्रयागराज मंडल में इसी अवधि में अकारण चेन पुलिंग के आरोप में कुल 2833 लोगों को गिरफ्तार किया गया.

रेलवे सुरक्षा बल के मुताबिक ट्रेनों में अकारण चेन पुलिंग रोकने के लिए सीसीटीवी कैमरों से लगातार निगरानी की जा रही है. प्रमुख ट्रेनों के आगमन और प्रस्थान के समय आरपीएफ की तैनाती भी रहती है. कानपुर सेंट्रल पर जनवरी से 30 सितंबर तक अकारण चेन पुलिंग के मामलों में 437 लोगों की गिरफ्तारी हुई, जो प्रयागराज मंडल के स्टेशनों में सबसे अधिक है. अनवरगंज में यह संख्या 20 रही.

आरपीएफ कानपुर पोस्ट प्रभारी एसएन पाटीदार के मुताबिक कुछ यात्री वास्तविक मजबूरी में चेन खींचते हैं, लेकिन कुछ लोग भौकाल दिखाने या रील बनाने के लिए जानबूझकर ऐसा करते हैं. चेन पुलिंग से ट्रेन आठ से दस मिनट तक प्रभावित हो सकती है. यानी एक व्यक्ति की रील के लिए सैकड़ों यात्रियों को देरी का सामना करना पड़ता है.

प्रयागराज मंडल में पकड़े गए 2833 लोगों में करीब 45 फीसदी ने जुर्माना जमा कर मामला खत्म कराया, जबकि बाकी मामले लंबित बताए गए हैं. रेलवे ने जागरूकता के साथ निगरानी भी बढ़ाई है. सीसीटीवी के कारण अब चेन खींचने वाले की पहचान करना आसान हो गया है. लेकिन आंकड़े बताते हैं कि कार्रवाई के बावजूद यह प्रवृत्ति पूरी तरह रुक नहीं रही है.

फर्जी वीडियो से नई चुनौती

सितंबर में गोरखपुर में पुलिस और वकील के बीच मारपीट का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ. पहली नजर में यह वास्तविक विवाद लगा. लेकिन पुलिस जांच में सामने आया कि पूरा घटनाक्रम कथित तौर पर स्क्रिप्टेड था. वीडियो में दिखाई देने वाले लोग वास्तविक पुलिसकर्मी या वकील नहीं थे. पुलिस के मुताबिक, ज्यादा व्यूज और वायरलिटी हासिल करने के लिए पूरा घटनाक्रम तैयार किया गया था.

शाहपुर पुलिस ने मामला दर्ज कर दो आरोपियों को हिरासत में लिया. पुलिस अधिकारियों ने लोगों से अपील की कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाले वीडियो या दावे को बिना सत्यापन सच न मानें और उसे आगे प्रसारित न करें.

कई पुलिसवालों को रील बनाने के खिलाफ चेतावनी दी गई है (सांकेतिक तस्वीर)

यह मामला प्रशासन के सामने एक नई समस्या रखता है. पहले पुलिस को वास्तविक घटना की सूचना मिलती थी और उसके बाद जांच होती थी. अब कई बार पुलिस को पहले यह पता लगाना पड़ता है कि वायरल वीडियो वास्तविक घटना है भी या नहीं. यदि वीडियो वास्तविक नहीं है, तो भी उसके वायरल होने से लोगों में भ्रम पैदा हो सकता है.

अगर उसमें पुलिस, प्रशासन या किसी समुदाय से जुड़ा संवेदनशील संदर्भ हो, तो उसका असर और व्यापक हो सकता है. यानी रीलबाजी अब सिर्फ यातायात नियमों का उल्लंघन नहीं है. यह सूचना की विश्वसनीयता से जुड़ा मुद्दा भी बन रही है. कुछ सेकेंड के वीडियो को लाखों लोग वास्तविक मान सकते हैं, जबकि प्रशासन को उसकी सत्यता जांचने में समय लग सकता है.

रील की पहुंच सरकारी संस्थानों तक भी हो गई है. सितंबर में श्रावस्ती के एक प्राथमिक विद्यालय में रील बनाने को लेकर विवाद सामने आया. प्रभारी प्रधान शिक्षिका ने एक सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर पर स्कूल में रील बनाने से रोकने के बाद गाली-गलौज, मारपीट और धमकी के आरोप लगाए.

शिक्षिका के मुताबिक कुछ लोग स्कूल पहुंचे और मोबाइल तथा सरकारी अभिलेख छीनने का प्रयास भी किया गया. मामले में बीईओ और पुलिस से शिकायत की गई. सरकारी स्कूल प्रशासन के लिए कार्यस्थल है, जबकि सोशल मीडिया कंटेंट बनाने वाले के लिए वह एक संभावित शूटिंग लोकेशन. यही अंतर कई बार विवाद की वजह बन रहा है.

सवाल यह है कि क्या किसी सरकारी संस्थान में सिर्फ इसलिए शूटिंग की जा सकती है क्योंकि वह वीडियो सोशल मीडिया पर लोकप्रिय हो सकता है? प्रशासन को अब ऐसी स्थितियों से भी निपटना पड़ रहा है.

सितंबर में मेरठ जेल के बाहर युवकों की रील का मामला भी सामने आया. जेल की दीवार के सामने वीडियो बनाकर उसे सोशल मीडिया पर डाला गया. पुलिस ने इसे गंभीरता से लेते हुए मुकदमा दर्ज किया और वीडियो में दिखाई देने वाले युवकों की पहचान शुरू की. संवेदनशील सरकारी प्रतिष्ठानों के आसपास इस तरह की गतिविधियां सुरक्षा के लिहाज से भी चिंता पैदा करती हैं.

पुलिस की वर्दी भी बनी कंटेंट का हिस्सा

रीलबाजी की चुनौती का एक दूसरा पहलू यह है कि सरकारी तंत्र के कर्मचारी भी इससे अछूते नहीं हैं. पुलिस विभाग को अपने ही कर्मचारियों के सोशल मीडिया इस्तेमाल के लिए नियमों को सख्ती से लागू करना पड़ रहा है.

मई 2026 में यूपी पुलिस मुख्यालय ने सोशल मीडिया पॉलिसी-2023 को सख्ती से लागू करने का आदेश दिया. अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वर्दी में आपत्तिजनक या अनधिकृत रील बनाने वाले पुलिसकर्मियों की पहचान की जाए और उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाए.

वायरल पोस्ट का URL और पूरा रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के निर्देश भी दिए गए. आगरा में इसी अभियान के तहत आठ पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर किया गया. कानपुर में एक दरोगा का वर्दी में 'सिंघम' स्टाइल रील बनाते वीडियो वायरल हुआ.

शाहजहांपुर में ड्यूटी के दौरान थाने और कार्यालय परिसर में वर्दी पहनकर रील बनाने वाले चार महिला और दो पुरुष पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की गई. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जून में पुलिसकर्मियों को ड्यूटी के दौरान रील बनाने को घोर अनुशासनहीनता बताया.

पुलिसकर्मी की वर्दी सिर्फ कपड़ा नहीं, राज्य की संस्थागत पहचान है. जब कोई पुलिसकर्मी वर्दी में मनोरंजन या निजी प्रचार के लिए वीडियो बनाता है, तो मामला व्यक्तिगत सोशल मीडिया इस्तेमाल से आगे बढ़ जाता है. यही वजह है कि पुलिस मुख्यालय को सोशल मीडिया नीति लागू करने और वायरल कंटेंट की निगरानी पर जोर देना पड़ा है.

सोशल मीडिया की गति प्रशासनिक कार्रवाई से कहीं ज्यादा तेज है. एक वीडियो कुछ मिनट में हजारों लोगों तक पहुंच सकता है, जबकि पुलिस को उसकी लोकेशन, व्यक्ति, वाहन और घटना की सत्यता पता करने में समय लगता है. इस दौरान वीडियो का स्क्रीनशॉट, क्लिप और अलग-अलग संस्करण अलग-अलग दावों के साथ फैल सकते हैं.

यही वजह है कि अब प्रशासन के लिए चुनौती सिर्फ रील बनाने वालों पर कार्रवाई करना नहीं है. चुनौती यह भी है कि वायरल कंटेंट की निगरानी कैसे हो, वास्तविक और फर्जी वीडियो की पहचान कितनी जल्दी हो, खतरनाक स्टंट को समय रहते कैसे रोका जाए और सरकारी संस्थानों को अनधिकृत शूटिंग से कैसे सुरक्षित रखा जाए. यह अब यूपी की कानून-व्यवस्था के सामने उभरता हुआ ऐसा मोर्चा है, जहां कैमरा छोटा है, लेकिन उसका असर बहुत बड़ा हो सकता है.

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