सावन सूखा, सितंबर धुआंधार! यूपी के मौसम में क्या बदल रहा?

सावन में कम बारिश के बाद सितंबर के आखिरी दिनों में उत्तर प्रदेश में कुछ ही घंटों में कई गुना ज्यादा पानी बरसा. 75 में से 63 जिलों में सामान्य से अधिक बारिश ने प्रदेश में बदलते बारिश पैटर्न की ओर ध्यान खींचा है

UP rain
उत्तर प्रदेश में कई जगहों पर जलभराव देखने को मिल रहा है (सांकेतिक तस्वीर)

उत्तर प्रदेश में इस बार मानसून ने अजीब करवट ली है. सावन में कई इलाकों में बारिश कम हुई. लंबे समय तक बादल आए, लेकिन उम्मीद के मुताबिक पानी नहीं बरसा. अगस्त में भी बारिश का यही उतार-चढ़ाव जारी रहा. 

लेकिन सितंबर के आखिरी सप्ताह में मौसम ने अचानक पलटी मारी. 25 से 27 सितंबर के बीच प्रदेश के कई हिस्सों में ऐसी बारिश हुई कि सामान्य से कई गुना ज्यादा पानी कुछ ही घंटों में बरस गया. 

27 सितंबर तक की तस्वीर बताती है कि प्रदेश के 63 जिलों में सामान्य से अधिक बारिश दर्ज की गई. 25 और 26 सितंबर के दौरान भारी बारिश और उससे जुड़ी घटनाओं में 56 लोगों की मौत और 46 लोगों के घायल होने की सूचना सामने आई. एक हजार से ज्यादा मकानों को नुकसान पहुंचा. 

यहीं से सवाल उठता है : क्या यूपी में बारिश की मात्रा से ज्यादा उसका समय और तरीका बदल रहा है? वैज्ञानिक तौर पर अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि प्रदेश का बारिश चक्र पूरी तरह बदल गया है. लेकिन इस साल का मौसम और पिछले कई दशकों के आंकड़ों पर हुए अध्ययन इस सवाल को गंभीर जरूर बनाते हैं.

सावन से उलटा रहा सितंबर 

25 और 26 सितंबर की बारिश ने प्रदेश के बारिश के आंकड़ों को तेजी से बदल दिया. 26 सितंबर को समाप्त 24 घंटे में उत्तर प्रदेश में सामान्य से करीब 19 गुना ज्यादा बारिश दर्ज की गई. 63 जिलों में सामान्य से अधिक बारिश हुई. 

लखनऊ में भी बारिश का असर बेहद तेज रहा. अमौसी मौसम केंद्र पर 24 घंटे में 135.8 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जबकि हनुमान सेतु क्षेत्र में यह आंकड़ा 201.2 मिलीमीटर तक पहुंच गया. 

प्रदेश के कई हिस्सों में 200 मिलीमीटर से ज्यादा बारिश हुई. फतेहगढ़ में सामान्य से करीब 200 गुना, कानपुर नगर में 160 गुना और कन्नौज, कानपुर देहात तथा हरदोई में करीब 130 गुना तक अधिक बारिश दर्ज होने की रिपोर्ट सामने आई. यहां सबसे महत्वपूर्ण बात बारिश की कुल मात्रा नहीं, बल्कि उसकी रफ्तार है. 

प्रदेश के कई हिस्सों में 200 मिलीमीटर से ज्यादा बारिश हुई (सांकेतिक तस्वीर)

मौसम वैज्ञानिक और कृषि‍ मौसम विज्ञान केंद्र के पूर्व अध‍ि‍कारी रमेश चंद्र बताते हैं, “100 मिलीमीटर बारिश अगर 10-15 दिनों में थोड़ी-थोड़ी करके हो तो जमीन उसे सोख सकती है और खेतों को उसका लाभ मिलता है. लेकिन यही पानी कुछ घंटों में बरस जाए तो नालियां और नाले भर जाते हैं, पानी सड़कों और खेतों में जमा होता है और बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है. इस बार सितंबर में कई जगह यही हुआ.”

लौटते मॉनसून में सक्रिय हुए बादल

सितंबर के आखिरी सप्ताह की बारिश इसलिए भी असामान्य रही क्योंकि यह वह समय है जब उत्तर प्रदेश से मानसून की वापसी शुरू हो जाती है. मौसम विभाग के अनुसार पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मानसून की सामान्य वापसी 27 सितंबर के आसपास शुरू होती है. 

इसके बाद धीरे-धीरे मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश से मानसून लौटता है. इस बार भी वापसी के संकेत मिले लेकिन इसी बीच नया मौसम तंत्र सक्रिय हो गया. 

रमेश चंद्र के अनुसार मध्य प्रदेश और उससे लगे छत्तीसगढ़ के ऊपर बना गहरा निम्न दबाव क्षेत्र उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़ा. इससे उत्तर प्रदेश में भारी से बहुत भारी बारिश के लिए परिस्थितियां बनीं. 

इसके साथ उत्तर-पश्चिम भारत में मौजूद दूसरी मौसम प्रणाली का भी असर रहा. रमेश चंद्र कहते हैं, “सरल शब्दों में कहें तो बंगाल की खाड़ी से नमी लेकर आया मौसम तंत्र मध्य भारत से होता हुआ यूपी तक पहुंचा. वातावरण में पहले से मौजूद नमी और हवा की स्थिति ने बारिश को और ताकत दी.” 

यानी सितंबर की यह बारिश अचानक स्थानीय स्तर पर नहीं बनी थी. इसके पीछे बड़े क्षेत्र में सक्रिय मौसम प्रणालियों की भूमिका थी.

पहले कम और अब तेज बारिश का कनेक्शन

यह सबसे अहम सवाल है, लेकिन इसका जवाब अभी सीधा नहीं है. एक साल के आंकड़ों से यह साबित नहीं किया जा सकता कि जलवायु परिवर्तन के कारण सावन में कम और सितंबर में ज्यादा बारिश हुई. 

मानसून स्वाभाविक रूप से भी कभी कमजोर और कभी मजबूत होता है. बंगाल की खाड़ी में बनने वाले निम्न दबाव क्षेत्र, मानसून की धुरी की स्थिति, समुद्र से आने वाली नमी और हवा की दिशा बारिश को लगातार प्रभावित करती है. 

बारिश का असमान वितरण यूपी के लिए चुनौती बन रहा (सांकेतिक तस्वीर)

फिर भी लंबे समय के वैज्ञानिक अध्ययन एक महत्वपूर्ण बदलाव की ओर इशारा करते हैं. 2025 में ‘इंटरनेशनल जर्नल ऑफ क्लाइमेटोलॉजी’ में प्रकाशित एक अध्ययन ने 1951 से 2023 तक भारत के मौसम विज्ञान संबंधी उपखंडों में मानसूनी सूखे दौर का अध्ययन किया. 

इसमें पाया गया कि 65 प्रतिशत मौसम विज्ञान उपखंडों में मानसून के दौरान 60 से अधिक सूखे दिन होते हैं. अध्ययन के अनुसार 44 प्रतिशत उपखंडों में अगस्त के सूखे दिन बढ़ने की प्रवृत्ति मिली, जबकि 29 प्रतिशत में पूरे मानसून के सूखे दिनों में वृद्धि का संकेत मिला. शोधकर्ताओं ने इसे मानसून की परिवर्तनशीलता और तीव्रता में बदलाव से जोड़कर देखा.

2025 में ‘जर्नल ऑफ जियोग्राफिकल रिसर्च : एटमॉस्फियर्स’ में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन ने 1951-2024 के दौरान भारत में मिट्टी की नमी के तेजी से सूखे से अत्यधिक गीले और गीले से सूखे चरण में बदलने का अध्ययन किया.

शोध में पाया गया कि ऐसे तेज बदलाव मुख्यतः मानसून के दौरान होते हैं. निष्कर्ष में यह पाया गया कि सूखे से अचानक बहुत गीली स्थिति में पहुंचने वाली घटनाओं की तीव्रता बढ़ने का संकेत है. इसका अर्थ यह नहीं कि हर साल यूपी में सावन सूखा और सितंबर में बाढ़ आएगी. लेकिन यह जरूर बताता है कि मानसून को अब केवल कुल बारिश से समझना पर्याप्त नहीं है.

बारिश का बंटवारा बड़ा सवाल

मेरठ में भौतिक शास्त्र विभाग के सहायक प्रोफेसर विवेक नौटियाल के मुताबिक बारिश के बदलते मिजाज को समझने के लिए सबसे जरूरी शब्द है 'वितरण'. किसी जिले में पूरे मानसून में 800 मिलीमीटर बारिश हो सकती है. 

लेकिन अगर इसमें से 300 मिलीमीटर पानी दो-तीन दिनों में बरस जाए और बाकी समय सूखा रहे तो खेती और जनजीवन पर उसका असर उस स्थिति से बिल्कुल अलग होगा जब यही पानी पूरे चार महीने में समान रूप से बरसे.

यूपी के लिए यह अंतर बेहद महत्वपूर्ण है. नौट‍ियाल बताते हैं, “किसान को फसल के अलग-अलग चरणों में समय पर बारिश चाहिए. बहुत लंबे सूखे के बाद अचानक भारी बारिश खेत में खड़ी फसल को नुकसान पहुंचा सकती है. दूसरी तरफ शहरों में कुछ घंटों की तेज बारिश नालियों और जल निकासी व्यवस्था पर अचानक बहुत ज्यादा दबाव डालती है. यही वजह है कि इस बार बारिश का सामान्य से अधिक होना अपने आप में राहत की खबर नहीं माना जा सकता.”

जलवायु परिवर्तन का कितना हाथ?

विवेक नौट‍ियाल बताते हैं वैज्ञानिक अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि गर्म होती दुनिया में वातावरण अधिक नमी धारण कर सकता है. अनुकूल परिस्थितियां मिलने पर यह अतिरिक्त नमी बहुत तेज बारिश के रूप में गिर सकती है. 

मध्य भारत में 1971 से 2020 के आंकड़ों पर किए गए अध्ययन में बहुत भारी और अत्यधिक भारी बारिश की घटनाओं में बढ़ोतरी का संकेत मिला है. भारत के मानसून पर हुए दूसरे अध्ययनों में भी लंबे सूखे दौर और अचानक तेज बारिश के बीच बढ़ते अंतर को समझने की कोशिश की गई है. 

लेकिन वैज्ञानिक सावधानी जरूरी है. मौसम वैज्ञानिक मानते हैं कि हर भारी बारिश को जलवायु परिवर्तन से जोड़ना सही नहीं होगा. एक खास घटना के पीछे स्थानीय मौसम, समुद्र की स्थिति, हवा की दिशा और मानसून की प्राकृतिक उठापटक भी जिम्मेदार हो सकती है. 

इसलिए सितंबर की बारिश को जलवायु परिवर्तन का सीधा परिणाम कहना अभी जल्दबाजी होगी. इसके लिए लंबे समय के क्षेत्रीय आंकड़ों का अध्ययन जरूरी है.

यूपी के लिए आगे की चुनौती 

इस साल की बारिश ने एक बात साफ कर दी है कि यूपी को केवल 'कितनी बारिश होगी' के सवाल से आगे बढ़ना होगा. पूर्वी यूपी में नदियों और निचले इलाकों के कारण अचानक भारी बारिश से बाढ़ का खतरा बढ़ता है. 

बुंदेलखंड में लंबे सूखे के बाद तेज बारिश से पानी तेजी से बह सकता है और मिट्टी का कटाव बढ़ सकता है. बड़े शहरों में कुछ घंटों की बारिश जलभराव की समस्या पैदा कर सकती है.

इसलिए भविष्य की तैयारी में बारिश के औसत के साथ-साथ तेज बारिश की घटनाओं पर भी ध्यान देना होगा. 27 सितंबर तक उपलब्ध आंकड़े यह साबित नहीं करते कि यूपी का बारिश चक्र पूरी तरह बदल चुका है. लेकिन वे यह जरूर दिखाते हैं कि बारिश का वितरण और उसकी तीव्रता अब मौसम की कहानी का बड़ा हिस्सा बनते जा रहे हैं. 

सावन में बादल कम बरसें और सितंबर में अचानक आसमान खुल जाए तो पूरे मानसून की बारिश का आंकड़ा भले सामान्य हो जाए जमीन पर उसका असर सामान्य नहीं होता. 

यूपी के लिए आने वाले वर्षों का बड़ा सवाल इसलिए यह नहीं होगा कि मानसून में कितना पानी बरसा बल्कि यह होगा कि वह पानी कब, कितने समय में और किस इलाके में बरसा. यही अंतर सूखे और बाढ़, राहत और नुकसान के बीच की तस्वीर तय कर सकता है.

Read more!