पंचायतों के 'एक्सटेंशन मॉडल' से योगी सरकार बिछा रही 2027 की चुनावी बिसात?

ग्राम प्रधानों के बाद अब जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुखों को भी प्रशासक बनाए रखने की तैयारी है. सरकार इसे प्रशासनिक निरंतरता बता रही है, जबकि विपक्ष और विशेषज्ञ इसे 2027 की चुनावी रणनीति से जोड़कर देख रहे हैं

जल संरक्षण को जनआंदोलन बनाएं- मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (फाइल फोटो)

लखनऊ मंडल के एक जिला पंचायत अध्यक्ष पिछले पांच वर्षों से अपने जिले में सड़कों, पंचायत भवनों और विकास योजनाओं की बैठकों की अगुवाई करते रहे हैं. 11 जुलाई को उनका संवैधानिक कार्यकाल समाप्त हो जाएगा. सामान्य परिस्थितियों में अब उनकी कुर्सी पर प्रशासन का कब्जा होता और जिलाधिकारी अंतरिम प्रशासक बनकर जिला पंचायत का काम संभालते. लेकिन इस बार तस्वीर बदल सकती है.

प्रस्ताव है कि वही निर्वाचित अध्यक्ष अब 'प्रशासक' बनकर अपनी कुर्सी पर बने रहें. यही स्थिति प्रदेश के 75 जिला पंचायत अध्यक्षों और 800 से अधिक क्षेत्र पंचायत (ब्लॉक) प्रमुखों की हो सकती है; यहीं से उत्तर प्रदेश की पंचायत राजनीति का नया अध्याय शुरू होता है. यह केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि संविधान, न्यायपालिका और 2027 के विधानसभा चुनाव की रणनीति, तीनों के बीच खड़ी एक नई राजनीतिक बहस है.

मुख्यमंत्री के पास भेजे गए प्रस्ताव के अनुसार सरकार जिला पंचायत अध्यक्षों और ब्लॉक प्रमुखों को छह महीने के लिए प्रशासक नियुक्त करने जा रही है. पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर इसकी पुष्टि कर चुके हैं कि शासनादेश समय रहते जारी कर दिया जाएगा. इससे पहले मई में सरकार लगभग 57 हजार ग्राम प्रधानों को भी इसी व्यवस्था के तहत प्रशासक बना चुकी है.

यह बदलाव आखिर क्यों?

उत्तर प्रदेश में दशकों से परंपरा रही है कि अगर पंचायत चुनाव समय पर नहीं हो पाते तो निर्वाचित प्रतिनिधियों का कार्यकाल समाप्त होते ही प्रशासनिक अधिकारी अंतरिम जिम्मेदारी संभालते थे. जिला पंचायतों में जिलाधिकारी, क्षेत्र पंचायतों में उपजिलाधिकारी और ग्राम पंचायतों में खंड विकास अधिकारी प्रशासक बनाए जाते थे. लेकिन इस बार सरकार ने पूरी व्यवस्था बदल दी है.

पहले ग्राम प्रधानों और अब जिला पंचायत अध्यक्षों तथा ब्लॉक प्रमुखों को ही प्रशासक बनाने का फैसला इस बात का संकेत है कि सरकार स्थानीय निकायों में निर्वाचित नेतृत्व की निरंतरता बनाए रखना चाहती है. पंचायती राज विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, "अगर ग्राम पंचायत में निर्वाचित प्रतिनिधि को प्रशासक बनाया गया है तो जिला और क्षेत्र पंचायतों में अलग व्यवस्था अपनाने का कोई औचित्य नहीं था. त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था में एक समान नीति अपनाना अधिक तार्किक माना गया."

क्या यह केवल प्रशासनिक फैसला है? राजनीतिक विश्लेषक इस पर संदेह जताते हैं. जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुख ग्रामीण राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरे होते हैं. पंचायत चुनाव भले ही गैर-दलीय आधार पर होते हों लेकिन इनके पीछे राजनीतिक दलों की पूरी ताकत लगी होती है. जिला पंचायत अध्यक्ष अपने जिले के विधायकों, सांसदों और पार्टी संगठन के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं, जबकि ब्लॉक प्रमुख गांवों तक राजनीतिक पहुंच बनाए रखने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं.

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले BJP किसी भी स्थिति में इस स्थानीय नेटवर्क को निष्क्रिय नहीं होने देना चाहती. अगर चुनाव टलते हैं और प्रशासक के रूप में वही जनप्रतिनिधि काम करते रहते हैं तो सत्ता पक्ष का स्थानीय राजनीतिक ढांचा भी सक्रिय बना रहेगा. राजनीतिक विश्लेषक और लखनऊ के जय नारायण डिग्री कालेज में राजनीतिक शास्त्र विभाग के प्रोफेसर ब्रजेश मिश्र कहते हैं, "विधानसभा चुनाव केवल बड़े नेताओं के दम पर नहीं जीते जाते. बूथ और गांव स्तर पर सक्रिय स्थानीय नेतृत्व चुनावी मशीनरी की रीढ़ होता है. जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुख उसी संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं."

विपक्ष इसे लोकतंत्र बनाम सत्ता का मुद्दा बना रहा है

समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पहले ही ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने का विरोध कर चुकी हैं. अब जिला पंचायत अध्यक्षों और ब्लॉक प्रमुखों पर भी यही व्यवस्था लागू होती है तो विपक्ष का आरोप और तेज होगा कि सरकार चुनाव कराने से बच रही है. विपक्ष का तर्क है कि संविधान ने पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष तय किया है. अगर चुनाव समय पर नहीं कराए जा सकते तो अंतरिम व्यवस्था नौकरशाही के माध्यम से होनी चाहिए, न कि उन्हीं निर्वाचित प्रतिनिधियों को दूसरे नाम से पद पर बनाए रखा जाए. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष इस मुद्दे को 'लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता' बनाम 'सत्ता का विस्तार' के रूप में पेश करने की कोशिश करेगा.

सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती इलाहाबाद हाईकोर्ट है. ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने के फैसले को अदालत में चुनौती दी गई है. प्रारंभिक सुनवाई में अदालत ने यह सवाल उठाया कि क्या पांच वर्ष का संवैधानिक कार्यकाल समाप्त होने के बाद उसी निर्वाचित प्रतिनिधि को उसी पद पर बनाए रखा जा सकता है? मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई को होनी है.

अगर अदालत सरकार के फैसले पर प्रतिकूल टिप्पणी करती है तो उसका असर जिला पंचायत अध्यक्षों और ब्लॉक प्रमुखों की प्रस्तावित नियुक्तियों पर भी पड़ सकता है. संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ प्रो. राकेश द्विवेदी कहते हैं, "अनुच्छेद 243E स्पष्ट रूप से पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष निर्धारित करता है. सरकार यह कह रही है कि कार्यकाल नहीं बढ़ाया जा रहा, केवल प्रशासकीय व्यवस्था बनाई जा रही है. अदालत को तय करना होगा कि व्यवहार में इन दोनों स्थितियों में वास्तविक अंतर कितना है."

संविधान के अनुच्छेद 243E के अनुसार प्रत्येक पंचायत का कार्यकाल पांच वर्ष होगा. अगर कार्यकाल समाप्त होता है तो छह महीने के भीतर नए चुनाव कराना अनिवार्य है. सरकार 'उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत एवं जिला पंचायत अधिनियम, 1961' के उन प्रावधानों का सहारा ले रही है जिनमें अंतरिम व्यवस्था के लिए प्रशासक नियुक्त करने की व्यवस्था है. लेकिन कानून यह नहीं बताता कि प्रशासक वही निर्वाचित व्यक्ति होगा या कोई सरकारी अधिकारी. यही कानूनी व्याख्या आगे सबसे बड़ा विवाद बनने जा रही है.

सरकारी स्तर पर इस पर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं है लेकिन प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि पंचायत चुनाव विधानसभा चुनाव के बाद कराए जा सकते हैं. अगर ऐसा होता है तो छह महीने की अंतरिम व्यवस्था पर्याप्त नहीं होगी. तब सरकार को या तो चुनाव कराने होंगे या फिर प्रशासकों की अवधि बढ़ाने का रास्ता तलाशना होगा. दोनों ही स्थितियों में न्यायिक चुनौती लगभग तय मानी जा रही है.

किसके हाथ में रहेगा गांवों का राजनीतिक नियंत्रण?

उत्तर प्रदेश में जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुख केवल विकास योजनाओं की निगरानी नहीं करते. वे स्थानीय ठेके, पंचायत योजनाओं, सरकारी कार्यक्रमों और ग्रामीण नेतृत्व के सबसे प्रभावशाली केंद्र होते हैं. उनके माध्यम से हजारों ग्राम पंचायतों तक राजनीतिक संदेश पहुंचता है. अगर ये पद छह महीने या उससे अधिक समय तक सक्रिय रहते हैं तो सत्तारूढ़ दल का ग्रामीण संगठन भी उसी अनुपात में मजबूत बना रहेगा. यही कारण है कि राजनीतिक जानकार इस फैसले को प्रशासनिक कम और चुनावी रणनीति अधिक मान रहे हैं.

सरकार का कहना है कि पंचायत चुनाव कराने से पहले आरक्षण निर्धारण, मतदाता सूची का पुनरीक्षण और अन्य कानूनी प्रक्रियाएं पूरी करनी हैं. ऐसे में अगर पूरी व्यवस्था नौकरशाही के हवाले कर दी जाती है तो विकास कार्यों की गति प्रभावित हो सकती है. एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, "निर्वाचित प्रतिनिधियों को स्थानीय जरूरतों की बेहतर जानकारी होती है. अंतरिम अवधि में वही योजनाओं की निगरानी करेंगे तो विकास कार्यों में निरंतरता बनी रहेगी."

अगले कुछ दिन निर्णायक हैं. मुख्यमंत्री की मंजूरी, शासनादेश, हाईकोर्ट की सुनवाई और पंचायत चुनावों की समय-सारिणी, चारों मिलकर तय करेंगे कि उत्तर प्रदेश की पंचायती राजनीति किस दिशा में जाएगी. लेकिन इतना तय है कि यह केवल छह महीने का प्रशासनिक फैसला नहीं है. यह निर्णय संविधान की व्याख्या, स्थानीय लोकतंत्र की संरचना और 2027 की चुनावी रणनीति, तीनों के बीच संतुलन बनाने की सबसे कठिन राजनीतिक परीक्षा बन चुका है. 

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