यूपी में एमएलसी चुनाव के लिए BJP ने ब्राह्मणों पर क्यों लगाया दांव?
11 शिक्षक और स्नातक सीटों के लिए BJP ने पांच ब्राह्मण चेहरों के साथ पुराने MLC और शिक्षक संगठनों से जुड़े उम्मीदवारों पर भी भरोसा जताया है

उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की 11 सीटों के लिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपने सभी प्रत्याशियों के नाम घोषित कर दिए हैं. 29 सितंबर को छह नामों की दूसरी सूची जारी होने के साथ ही तस्वीर साफ हो गई. पांच स्नातक और छह शिक्षक सीटों के इस चुनाव में BJP ने पांच ब्राह्मण चेहरों को मैदान में उतारा है.
बाकी उम्मीदवारों में राजपूत, ओबीसी, वैश्य और पंजाबी समाज के प्रतिनिधि शामिल हैं. उम्मीदवारों की सामाजिक पृष्ठभूमि को देखें तो BJP ने इस बार संगठन के पारंपरिक सामाजिक आधार और चुनावी अनुभव को साथ रखने की कोशिश की है.
इस चयन को केवल जातीय प्रतिनिधित्व के तौर पर देखना पूरी तस्वीर नहीं देता. शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों का मतदाता सामान्य विधानसभा चुनाव के मतदाता से अलग है. यहां पंजीकृत स्नातक और पात्र शिक्षक मतदान करते हैं.
ऐसे में उम्मीदवार का सामाजिक आधार जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही उसका शिक्षक संगठनों, विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और पेशेवर मतदाताओं के बीच व्यक्तिगत नेटवर्क भी मायने रखता है. यही वजह है कि BJP की सूची में पुराने एमएलसी, शिक्षक संगठन से जुड़े चेहरे और दूसरे संगठनों में सक्रिय रहे नेताओं का मिश्रण दिखाई देता है.
ब्राह्मण चेहरों से संदेश!
BJP की 11 उम्मीदवारों की सूची में पांच ब्राह्मण चेहरे हैं. वाराणसी शिक्षक सीट से डॉ. प्रमोद मिश्रा, आगरा शिक्षक सीट से इंजीनियर हरिकिशोर तिवारी और गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक सीट से ध्रुव त्रिपाठी, लखनऊ शिक्षक सीट से उमेश द्विवेदी और मेरठ शिक्षक सीट से श्रीचंद्र शर्मा ब्राह्मण समाज से आते हैं.
इसके अलावा दो ठाकुर और कुर्मी, सिख, तेली व वैश्य समाज से एक-एक प्रत्याशी हैं. इस तरह ब्राह्मण प्रतिनिधित्व सूची का सबसे बड़ा सामाजिक समूह बन गया है. यह चयन ऐसे समय हुआ है जब यूजीसी के इक्विटी नियमों को लेकर सवर्ण समाज के एक हिस्से में असंतोष की राजनीतिक चर्चा चल रही है.
अगस्त में केंद्र सरकार ने इन नियमों पर सुप्रीम कोर्ट में अपने रुख पर पुनर्विचार की बात कही थी. उत्तर प्रदेश में BJP के कुछ नेताओं ने भी इस मुद्दे को लेकर सवर्ण समाज में असहजता की बात कही थी. हालांकि BJP ने एमएलसी टिकटों को यूजीसी विवाद की सीधी प्रतिक्रिया के तौर पर पेश नहीं किया है. इसलिए पांच ब्राह्मण उम्मीदवारों को यूजीसी मुद्दे का सीधा परिणाम बताने के बजाय उस व्यापक राजनीतिक पृष्ठभूमि में देखना अधिक उचित होगा.
शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की प्रकृति भी इस समीकरण को महत्वपूर्ण बनाती है. इन सीटों पर सामान्य विधानसभा चुनाव की तरह पूरा मतदाता वर्ग मतदान नहीं करता. स्नातक सीटों पर निर्धारित शैक्षणिक योग्यता वाले पंजीकृत मतदाता और शिक्षक सीटों पर तय पात्रता पूरी करने वाले शिक्षक मतदान करते हैं. इसलिए उच्च शिक्षा, विश्वविद्यालय, शिक्षक हित, भर्ती, परीक्षा और यूजीसी से जुड़े सवाल इस मतदाता वर्ग के बीच सीधे राजनीतिक मुद्दे बन सकते हैं.
BJP के लिए यह चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2027 विधानसभा चुनाव से पहले शिक्षक और स्नातक मतदाताओं के बीच उसका सामाजिक और संगठनात्मक आधार परखा जाएगा. पार्टी ने एक तरफ ब्राह्मण प्रतिनिधित्व बढ़ाया है, दूसरी तरफ तीन ठाकुर और तीन अलग-अलग सामाजिक समूहों के एक-एक प्रत्याशी देकर सूची में व्यापक सामाजिक संतुलन भी रखा है. यानी सूची का संदेश सिर्फ ब्राह्मण प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं है.
जिताऊ चेहरों पर जोर
उम्मीदवारों के चयन में दूसरा बड़ा संकेत अनुभव और व्यक्तिगत प्रभाव का है. वाराणसी स्नातक से केदारनाथ सिंह को फिर मौका दिया गया है. वे पहले इस सीट से एमएलसी रह चुके हैं और 2020 में सपा के आशुतोष सिन्हा से चुनाव हारे थे. मेरठ स्नातक से मौजूदा एमएलसी दिनेश गोयल को दोबारा टिकट मिला है.
गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक सीट से ध्रुव कुमार त्रिपाठी भी मौजूदा एमएलसी हैं और उन्हें फिर उम्मीदवार बनाया गया है. पहले घोषित पांच उम्मीदवारों में भी पार्टी ने मौजूदा एमएलसी को ही दोबारा मौका दिया था. इनमें लखनऊ स्नातक से अवनीश कुमार सिंह, आगरा स्नातक से डॉ. मानवेंद्र प्रताप सिंह, बरेली-मुरादाबाद शिक्षक से डॉ. हरि सिंह ढिल्लों, लखनऊ शिक्षक से उमेश द्विवेदी और मेरठ शिक्षक से श्रीचंद शर्मा शामिल हैं. इस तरह 11 में से कई सीटों पर BJP ने नए प्रयोग के बजाय मौजूदा प्रतिनिधियों के अनुभव को प्राथमिकता दी है.
दूसरी तरफ छह नए घोषित चेहरों में पार्टी संगठन से बाहर के सामाजिक और शिक्षक संगठनों से जुड़े लोगों को भी जगह मिली है. इलाहाबाद-झांसी स्नातक से अशोक कुमार राठौर शिक्षक संगठन से जुड़े रहे हैं. आगरा शिक्षक सीट से हरि किशोर तिवारी कर्मचारी राजनीति से जुड़े रहे हैं.
वाराणसी शिक्षक सीट से डॉ. प्रमोद मिश्रा का भी शिक्षक राजनीति में लंबा अनुभव है. इससे साफ है कि BJP ने सिर्फ संगठन के पारंपरिक कैडर पर निर्भर रहने के बजाय उन चेहरों को भी टिकट दिया है जिनका संबंधित मतदाता वर्ग में अपना नेटवर्क है.
लखनऊ में केकेसी कालेज में राजनीतिक शास्त्र विभाग के प्रमुख ब्रजेश मिश्र कहते हैं, “BJP के इस चयन को लेकर दो पहलू सामने आ रहे हैं. पहली बात यह कि पार्टी अपने परंपरागत सवर्ण आधार के साथ संवाद बनाए रखना चाहती है. इसके अलावा शिक्षक और स्नातक सीटों की स्थानीय प्रकृति को देखते हुए ऐसे उम्मीदवारों को आगे किया गया है जिनका व्यक्तिगत संगठन और मतदाता संपर्क मजबूत है.”
BJP के लिए यह चुनाव सिर्फ विधान परिषद की 11 सीटों का चुनाव नहीं है. पार्टी इसे 2027 से पहले संगठन की तैयारियों और शिक्षित मतदाता वर्ग के बीच अपनी पकड़ की परीक्षा के तौर पर भी देख रही है.
अब BJP के सामने चुनौती टिकटों से बने सामाजिक संदेश को स्थानीय संगठन और उम्मीदवारों के व्यक्तिगत संपर्क में बदलने की होगी. शिक्षक और स्नातक मतदाताओं के बीच रोजगार, भर्ती, शिक्षा व्यवस्था, विश्वविद्यालयों के सवाल और यूजीसी से जुड़े मुद्दे भी महत्वपूर्ण हैं. इसलिए पांच ब्राह्मण उम्मीदवारों का आंकड़ा अपने आप में पूरी कहानी नहीं है. उम्मीदवारों की व्यक्तिगत पकड़, संगठन की सक्रियता और स्थानीय मुद्दों पर पार्टी का संवाद भी चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.
उत्तर प्रदेश की इन 11 सीटों पर 23 अक्टूबर को मतदान होगा और 27 अक्टूबर को मतगणना होगी. मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल 6 दिसंबर 2026 को समाप्त हो रहा है. इस लिहाज से एमएलसी चुनाव BJP के लिए 2027 से पहले सामाजिक समीकरण, स्थानीय संगठन और शिक्षित मतदाता वर्ग के साथ उसके संवाद की एक अहम राजनीतिक परीक्षा है.