सख्त नियमों के बावजूद यूपी के मेडिकल कॉलेजों में क्यों नहीं थम रही रैगिंग?

उरई में रैगिंग से जुड़े मामले में 17 छात्रों पर कार्रवाई की गई है और इसी तरह गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में भी 18 छात्र जांच के घेरे में हैं

नियमों के बाद भी मेडिकल कॉलेज रैगिंग नहीं रोक पा रहे (सांकेतिक तस्वीर)

उरई के सरकारी मेडिकल कॉलेज में 17 एमबीबीएस छात्रों को तीन महीने के लिए निलंबित करने और हर एक पर 25 हजार रुपए का जुर्माना लगाने की कार्रवाई ने मेडिकल शिक्षा संस्थानों में रैगिंग की समस्या को फिर चर्चा में ला दिया है. 

वहीं गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में 18 सीनियर छात्रों पर चेहरा छिपाकर जूनियर छात्रों के हॉस्टल में घुसने के आरोपों की भी जांच चल रही है. दोनों मामले उत्तर प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में अनुशासन, सीनियर-जूनियर संबंधों और एंटी-रैगिंग व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करते हैं.

उरई स्थित सरकारी मेडिकल कॉलेज में 2025 बैच के जूनियर छात्रों के साथ रैगिंग का वीडियो सामने आने के बाद कॉलेज प्रशासन ने कार्रवाई की. शुरुआत में सात सीनियर छात्र दोषी पाए गए थे. इसके बाद विरोध और जांच का दायरा बढ़ने पर दस अन्य छात्र भी दोषी पाए गए. इस तरह कुल 17 छात्रों पर कार्रवाई हुई. प्राचार्य डॉ. अरविंद त्रिवेदी के मुताबिक निलंबन की अवधि में संबंधित छात्र न तो कक्षाओं में शामिल हो सकेंगे, न हॉस्टल में रह सकेंगे और न ही क्लिनिकल ड्यूटी कर सकेंगे. कॉलेज प्रशासन ने इसे रैगिंग के खिलाफ अपनी अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई बताया है.

इसके उलट, गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में मामला अभी जांच के स्तर पर है. राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (एनएमसी) में शिकायत मिलने के बाद प्रशासन ने एंटी-रैगिंग स्क्वायड को सीसीटीवी फुटेज के आधार पर छात्रों की पहचान करने की जिम्मेदारी दी है. आरोप है कि 2025 बैच के 16 छात्र और इंटर्नशिप कर रहे दो छात्र अक्टूबर में दो बार देर रात प्रथम वर्ष के छात्रों के राजेंद्र हॉस्टल में पहुंचे. 

29 अक्टूबर को सामने आई जानकारी के मुताबिक, कॉलेज प्रशासन ने 18 छात्रों पर 25-25 हजार रुपए का जुर्माना लगाया. एमबीबीएस छात्रों को एक सप्ताह के लिए निलंबित किया गया, जबकि दो इंटर्न को एक महीने के लिए निलंबित कर अतिरिक्त प्रशिक्षण करने का निर्देश दिया गया. हॉस्टल के सीसीटीवी कैमरे तोड़ने वाले दो छात्रों पर 25-25 हजार रुपए का अतिरिक्त जुर्माना भी लगाया गया.

कई बार जूनियरों के हॉस्टलों में दबदबा कायम करने के लिए भी रैगिंग की जाती है (सांकेतिक तस्वीर)

बताया गया है कि उन्होंने चेहरे ढंक रखे थे और हॉस्टल में प्रवेश के लिए छत तथा पीछे स्थित मेस के आपातकालीन निकास द्वार का इस्तेमाल किया. इस हॉस्टल में सीनियर छात्रों का प्रवेश प्रतिबंधित है. कॉलेज प्रशासन के अनुसार, अधिकांश छात्रों की पहचान हो चुकी है और दो अन्य की पहचान की प्रक्रिया जारी है.

इन घटनाओं से सवाल उठता है कि रैगिंग पर प्रतिबंध, एंटी-रैगिंग समितियों और दंडात्मक प्रावधानों के बावजूद मेडिकल कॉलेजों में इस तरह की घटनाएं क्यों सामने आ रही हैं. क्या रैगिंग को सीनियर-जूनियर के बीच परिचय बढ़ाने की परंपरा मानने वाली सोच अब भी कायम है, क्या हॉस्टल में निगरानी की व्यवस्था पर्याप्त नहीं है और क्या शिकायत करने वाले जूनियर छात्रों को पर्याप्त सुरक्षा मिलती है?

जूनियर छात्रों पर दबाव

मेडिकल कॉलेजों में रैगिंग की समस्या केवल अनुशासनहीनता तक सीमित नहीं है. इसके पीछे सीनियर छात्रों का दबदबा कायम करने, जूनियर छात्रों को अपने हिसाब से चलाने और हॉस्टल के भीतर अनौपचारिक सत्ता स्थापित करने की प्रवृत्ति भी एक वजह हो सकती है. 

नए छात्र जब कॉलेज और हॉस्टल के माहौल में खुद को स्थापित करने की कोशिश कर रहे होते हैं, तब सीनियर छात्रों के व्यवहार का उन पर गहरा प्रभाव पड़ता है. परिचय के नाम पर सवाल पूछना, आदेश देना, व्यक्तिगत जानकारी मांगना या देर रात हॉस्टल में बुलाना यदि दबाव और अपमान का रूप ले ले तो वह रैगिंग के दायरे में आ सकता है.

उरई मेडिकल कॉलेज में प्राचार्य डॉ. अरविंद त्रिवेदी ने स्पष्ट किया है कि सीनियर छात्रों द्वारा जूनियर से मोबाइल नंबर मांगना भी दंडनीय माना जाएगा. कॉलेज प्रशासन ने अनधिकृत संपर्क और दबाव की गुंजाइश खत्म करने के लिए सख्त रुख अपनाया है. यह कदम बताता है कि रैगिंग की रोकथाम के लिए केवल शारीरिक प्रताड़ना पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं है बल्कि उन गतिविधियों पर भी नजर रखनी होगी जो धीरे-धीरे जूनियर छात्रों पर दबाव बनाने का माध्यम बनती हैं.

निगरानी और जवाबदेही की परीक्षा

रैगिंग रोकने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर नियम पहले से मौजूद हैं. राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग यानी एनएमसी ने मेडिकल कॉलेजों में रैगिंग की रोकथाम के लिए विस्तृत प्रावधान किए हैं. इनके तहत संस्थानों में एंटी-रैगिंग कमेटी और स्क्वायड, शिकायतों की जांच तथा दोषी पाए जाने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की व्यवस्था है. नियमों में अपराध की गंभीरता के अनुसार दंड देने और कार्रवाई को भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए प्रभावी बनाने पर जोर दिया गया है. शिकायतकर्ता छात्र की पहचान गोपनीय रखने तथा संबंधित अधिकारियों तक शिकायत पहुंचाने के प्रावधान भी हैं.  

इसके बावजूद कॉलेजों में ऐसी घटनाओं का सामने आना बताता है कि नियम बना देना और उन्हें जमीन पर लागू करना दो अलग बातें हैं. एंटी-रैगिंग कमेटी की बैठक, नोटिस जारी करना और दोषी छात्रों पर जुर्माना लगाना जरूरी कदम हैं, लेकिन इनका असर तभी होगा जब शिकायत मिलने से पहले रोकथाम की व्यवस्था भी सक्रिय हो. नए छात्रों के प्रवेश के साथ नियमित जागरूकता कार्यक्रम, हॉस्टल में अनधिकृत प्रवेश पर रोक, वार्डन और सुरक्षा कर्मियों की जवाबदेही तथा शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई को संस्थागत व्यवस्था का हिस्सा बनाना होगा.

उरई में शुरुआती कार्रवाई के बाद जांच का दायरा बढ़ाकर 17 छात्रों तक पहुंचना भी इस सवाल को सामने लाता है कि पहली जांच में सभी संबंधित छात्रों की भूमिका सामने क्यों नहीं आई थी. दूसरी ओर, बीआरडी मेडिकल कॉलेज में शिकायत के बाद सीसीटीवी फुटेज खंगालने और संबंधित छात्रों की पहचान करने की प्रक्रिया शुरू हुई. दोनों घटनाएं इस बात की जरूरत रेखांकित करती हैं कि शिकायत मिलने पर कार्रवाई के साथ-साथ संस्थान अपने निगरानी तंत्र की भी समीक्षा करें.

पूर्वांचल के एक मेडिकल कालेज से सेवानिवृत्त प्रोफेसर रजनीश दास कहते हैं, “सरकार और नियामक संस्थाओं के सामने चुनौती केवल दोषी छात्रों को दंडित करने की नहीं, बल्कि ऐसे वातावरण का निर्माण करने की है जिसमें नए छात्र बिना भय के पढ़ाई कर सकें. एनएमसी के नियम मेडिकल कॉलेजों को रैगिंग रोकने और शिकायतों पर कार्रवाई करने की जिम्मेदारी देते हैं. इसलिए संस्थान की जवाबदेही का आकलन इस आधार पर भी होना चाहिए कि उसने रैगिंग रोकने के लिए क्या इंतजाम किए, शिकायतों पर कितनी तेजी से प्रतिक्रिया दी और पीड़ित छात्रों को कितना सुरक्षित महसूस कराया.”  

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