यूपी में सज रहे कथा के बड़े-बड़े पंडालों का क्या है चुनावी कनेक्शन?

उत्तर प्रदेश में कैबिनेट मंत्री मनोज पांडेय से बृजभूषण शरण सिंह और दयाशंकर सिंह तक, नेता धार्मिक कथाओं के जरिए आस्था, सामाजिक संपर्क, भीड़ और राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का नया मंच तैयार कर रहे हैं

रायबरेली की ऊँचाहार विधान सभा में कैबिनेट मंत्री मनोज पांडे द्वारा आयोजित शिवा कथा में भाग लेते मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ
रायबरेली की ऊँचाहार विधान सभा में कैबिनेट मंत्री मनोज पांडे द्वारा आयोजित शिवा कथा में भाग लेते मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

उत्तर प्रदेश में चुनावी राजनीति का एक नया दृश्य तेजी से उभर रहा है. मंच पर राजनीतिक भाषण नहीं है, सामने भगवा झंडों की कतार भी जरूरी नहीं है, लेकिन हजारों की भीड़ है, बड़े संत और कथावाचक हैं और उनके बीच इलाके का नेता बतौर यजमान मौजूद है. 

कथा चल रही है, भजन हो रहे हैं, कलश यात्राएं निकल रही हैं और इसी बीच मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री, सांसद और दूसरे प्रभावशाली नेता वहां पहुंच रहे हैं. धार्मिक आयोजन की इस तस्वीर में राजनीति प्रत्यक्ष रूप से भले दिखाई न दे, लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव से करीब पांच महीने पहले इसके राजनीतिक मायने तलाशे जा रहे हैं.

रायबरेली के ऊंचाहार में कैबिनेट मंत्री मनोज पांडेय की ओर से 11 से 17 सितंबर के बीच आयोजित शिव महापुराण कथा इसका सबसे ताजा उदाहरण है. पंडित प्रदीप मिश्रा की कथा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पहुंचे. राज्यपाल आनंदीबेन पटेल सहित कई मंत्री, विधायक और अन्य विशिष्ट लोग भी आयोजन में शामिल हुए. 

कथा से पहले निकली कलश यात्रा में बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हुईं. आयोजन की धार्मिक प्रकृति के बावजूद इसकी राजनीतिक चर्चा इसलिए तेज हुई क्योंकि ऊंचाहार रायबरेली का वह इलाका है जहां कांग्रेस और गांधी परिवार का प्रभाव लंबे समय से रहा है.

शिव महापुराण कथा में यजमान बने मंत्री मनोज पांडे

मनोज पांडेय का राजनीतिक सफर भी इस कथा को अलग संदर्भ देता है. वे सपा के टिकट पर ऊंचाहार से विधायक बने थे और बाद में BJP में शामिल होकर योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री बने. ऐसे में उनके अपने विधानसभा क्षेत्र में इतने बड़े धार्मिक आयोजन और उसमें मुख्यमंत्री की मौजूदगी को स्थानीय राजनीति में शक्ति प्रदर्शन और संगठनात्मक संपर्क के एक अवसर के तौर पर देखा जा रहा है. 

BJP की रायबरेली की सभी छह विधानसभा सीटों पर विस्तार की रणनीति में ऊंचाहार और मनोज पांडेय की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया जा रहा है. मनोज पांडेय ने आयोजन को राजनीति से अलग धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रम के रूप में पेश किया. इसे 2027 से पहले BJP के धार्मिक-सांस्कृतिक जनसंपर्क और रायबरेली में पहुंच बढ़ाने के संदर्भ में देखा जा रहा है. 

बृजभूषण की राष्ट्रकथा : कथा या शक्ति प्रदर्शन?

जनवरी 2026 में गोंडा में पूर्व BJP सांसद बृजभूषण शरण सिंह की आठ दिवसीय 'राष्ट्र कथा' ने कथा की राजनीति का दूसरा मॉडल सामने रखा. नंदिनी निकेतन में हुए इस आयोजन में धार्मिक मंच के साथ राजनीतिक और सामाजिक जगत के कई बड़े चेहरे पहुंचे थे.

पूर्व सांसद धनंजय सिंह, पूर्वांचल के प्रभावशाली नेता बृजेश सिंह और सुशील सिंह समेत कई राजनीतिक हस्तियों की मौजूदगी ने इसे सामान्य धार्मिक आयोजन से अलग चर्चा में ला दिया था. इस आयोजन में देश के अलग-अलग हिस्सों के नेताओं, मंत्रियों, संतों, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र के लोगों की मौजूदगी दर्ज हुई. 

गोंडा के राजनीतिक विश्लेषक अजय प्रकाश के मुताबिक बृजभूषण ने राष्ट्रकथा के जरिए खुद को अवध के बड़े नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश की. 

बृजभूषण सिंह के साथ धनंजय सिंह (फाइल फोटो)

इस आयोजन का एक दिलचस्प पहलू यह भी था कि BJP के शीर्ष स्तर के कई प्रमुख नेता वहां नहीं पहुंचे थे. यही अनुपस्थिति भी राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बनी. यानी कथा का मंच केवल यह बताने का माध्यम नहीं था कि कौन आया, बल्कि यह भी चर्चा हुई कि कौन नहीं आया. 

बृजभूषण की राष्ट्रकथा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह केवल धार्मिक आयोजन नहीं था. अजय प्रकाश बताते हैं, “आयोजन के दौरान उनकी राजनीतिक सक्रियता, 2029 में चुनाव लड़ने के संकेत और अलग-अलग दलों के नेताओं के साथ उनके सार्वजनिक संवाद ने कथा को राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का मंच बना दिया था. कथा में सियासत खुलकर भाषण के रूप में नहीं थी लेकिन मंच पर मौजूदगी, रिश्तों और बयानों के जरिए राजनीतिक संदेश पढ़े गए थे.” 

बलिया में दयाशंकर सिंह और बांदा में प्रकाश द्विवेदी

कथा की राजनीति केवल अवध तक सीमित नहीं है. पूर्वांचल में परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह भी धार्मिक आयोजनों के जरिए अपने क्षेत्र में सामाजिक संपर्क का बड़ा मंच तैयार करते रहे हैं. जून 2026 में बलिया के बाबा बालखंडी नाथ मंदिर परिसर में उनके संकल्प से शिव महापुराण कथा आयोजित हुई. 

आयोजन से पहले स्थानीय स्तर पर व्यापक तैयारियां की गईं और श्रद्धालुओं के जुटने की बात सामने आई. दयाशंकर सिंह के मामले में कथा का महत्व इस बात में है कि बलिया जैसे जिले में धार्मिक आयोजन स्थानीय सामाजिक नेटवर्क को जोड़ने का माध्यम था. 

राजनीति‍क विश्लेषक आशुतोष गौतम बताते हैं, “ऐसे कार्यक्रमों में पार्टी कार्यकर्ताओं के अलावा व्यापारियों, सामाजिक संगठनों, स्थानीय प्रभावशाली लोगों और अलग-अलग समुदायों की भागीदारी होती है. राजनीतिक नेता के लिए यह एक ऐसी सार्वजनिक जगह बन जाती है जहां सीधे चुनावी भाषण दिए बिना बड़े वर्ग से संपर्क हो सकता है.” 

शिव महापुराण कथा में दयाशंकर सिंह (बाएं) मनोज पांडे के साथ

बुंदेलखंड में बांदा सदर विधायक प्रकाश द्विवेदी से जुड़ा जनवरी 2026 का घटनाक्रम भी इसी प्रवृत्ति की ओर संकेत करता है. पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की हनुमंत कथा बांदा में हुई, जिसमें बड़ी संख्या में लोग पहुंचे. इसके कुछ ही समय बाद धीरेंद्र शास्त्री के विधायक के निजी आवास पर संत दरबार और कथा में शामिल होने का कार्यक्रम सामने आया. 

निजी आवास पर कथा के आयोजन को लेकर स्थानीय राजनीतिक हलकों में सवाल उठे कि यह केवल धार्मिक कार्यक्रम है या इसके पीछे 2027 की राजनीति का भी कोई संदेश है. आशुतोष गौतम बताते हैं, “यहां कथा का एक नया मॉडल दिखाई देता है. पहले नेता कथा में जाते थे, अब नेता कथा को अपने क्षेत्र में बुला रहे हैं और कई बार अपने घर तक ले जा रहे हैं. इससे आयोजन का सामाजिक दायरा और नेता की व्यक्तिगत दृश्यता दोनों बढ़ते हैं.” 

अब राजा भैया की बारी

प्रतापगढ़ के कुंडा में जनसत्ता दल के अध्यक्ष और विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया की ओर से प्रस्तावित रामकथा इस सिलसिले की अगली बड़ी कड़ी है. जानकारी के अनुसार नवंबर में पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की रामकथा कराने की तैयारी है और आयोजन में करीब दो लाख लोगों के पहुंचने का अनुमान जताया गया है. 

राजा भैया के मामले में यह आयोजन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कुंडा उनकी लंबे समय से मजबूत राजनीतिक जमीन रहा है. ऐसे में इतनी बड़ी धार्मिक कथा का आयोजन उनके क्षेत्र में सामाजिक संपर्क और राजनीतिक दृश्यता का बड़ा अवसर बन सकता है. 

हालांकि, कथा में जुटने वाली भीड़ को सीधे चुनावी समर्थन मानना उचित नहीं होगा. धार्मिक आयोजनों में आने वाले लोग अलग-अलग राजनीतिक पसंद रखते हैं और किसी कथा की लोकप्रियता को किसी नेता के वोट बैंक का सीधा पैमाना नहीं माना जा सकता. फिर भी इन आयोजनों में एक समानता है. नेता अपने क्षेत्र में ऐसा मंच तैयार कर रहे हैं जहां धर्म, संस्कृति, समाज और राजनीति एक-दूसरे के बेहद करीब दिखाई देते हैं.

कथा की राजनीति का गणित क्या है?

आशुतोष गौतम बताते हैं, “राजनीतिक सभाओं की अपनी सीमाएं हैं. वहां आने वाला व्यक्ति जानता है कि यह चुनावी कार्यक्रम है. कथा में स्थिति अलग होती है. श्रद्धालु धार्मिक आस्था के कारण आता है. परिवार के लोग आते हैं. महिलाओं की बड़ी भागीदारी होती है. स्थानीय व्यापारी, सामाजिक कार्यकर्ता और धार्मिक संस्थाओं से जुड़े लोग भी जुड़ते हैं. नेता को यहां किसी पार्टी के झंडे के बिना व्यापक सामाजिक संपर्क मिलता है.” 

रायबरेली में प्रदीप मिश्रा की कथा में महिलाओं की कलश यात्रा इसी पहलू को सामने लाती है. हालिया चुनावों में महिला मतदाताओं की भूमिका बढ़ी है और धार्मिक आयोजनों में महिलाओं की बड़ी भागीदारी नेताओं को परिवार और समाज के स्तर तक पहुंच बनाने का अवसर देती है. रायबरेली के आयोजन में भी इसे 'मातृशक्ति आउटरीच' से जोड़ा गया है. 

लेकिन कथा की राजनीति को केवल BJP की रणनीति मानना भी अधूरा होगा. उत्तर प्रदेश में धार्मिक आयोजनों और संतों से जुड़ाव की राजनीति अलग-अलग दलों और नेताओं के स्तर पर दिखाई देती रही है. फर्क इतना है कि BJP ने हिंदुत्व, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और धार्मिक स्थलों के विकास को अपनी व्यापक राजनीतिक भाषा का हिस्सा बना दिया है. 

लेकिन एक पैटर्न भी साफ दिखाई देता है. विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ते उत्तर प्रदेश में कथा अब केवल कथा नहीं रह गई है. वह जनसंपर्क, सामाजिक नेटवर्किंग, धार्मिक प्रतिष्ठा और राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के लिए इस्तेमाल होने वाला एक प्रभावी सार्वजनिक मंच बनती जा रही है. 

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