यूपी के IAS अफसर बीच में ही क्यों छोड़ रहे नौकरी?

करीब 13 साल की सेवा के बाद दिव्या मित्तल का इस्तीफा कई सवाल खड़े करता है. यूपी में समय से पहले IAS छोड़ने वाले अफसरों के पीछे राजनीतिक दबाव के साथ-साथ काम से असंतुष्टि और निजी क्षेत्र के बेहतर विकल्प भी बड़ी वजहें हैं

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दिव्या मित्तल (फाइल फोटो)

भारतीय प्रशासनिक सेवा को देश की सबसे प्रतिष्ठित और ताकतवर नौकरियों में गिना जाता है. लेकिन उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों के घटनाक्रम इस चमकदार तस्वीर के पीछे की एक दूसरी कहानी भी सामने ला रहे हैं. सवाल उठ रहा है कि आखिर जिस सेवा में आने के लिए लाखों युवा सालों तैयारी करते हैं, उसी सेवा से कई अधिकारी समय से पहले बाहर क्यों निकल रहे हैं?

2013 बैच की IAS अधिकारी दिव्या मित्तल का 30 अगस्त को दिया गया इस्तीफा इसी सवाल को फिर सामने ले आया है. 42 वर्षीय मित्तल ने करीब 13 साल की सेवा के बाद स्वेच्छा से IAS से अलग होने का फैसला किया. 

उन्होंने अपने भावुक विदाई संदेश में इसे अपनी इच्छा से लिया गया फैसला बताया और कहा कि यह सफर उन्हें उन लोगों से ज्यादा सिखा गया, जिनकी उन्होंने सेवा की. मिर्जापुर की जिलाधिकारी रहते दूर-दराज के पहाड़ी गांव लहुरिया दह तक पाइप से पानी पहुंचाने की उनकी पहल ने उन्हें अलग पहचान दिलाई थी. 

बाद में देवरिया की डीएम रहते भी वे सक्रिय प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर चर्चा में रहीं. मई 2026 में देवरिया के डीएम पद से हटाकर उन्हें राजस्व विभाग में विशेष सचिव बनाया गया था. इसके बाद उनके सेवा छोड़ने के फैसले को लेकर कई तरह की चर्चाएं शुरू हुईं.

दिव्या मित्तल देवरिया का डीएम रहते काफी चर्चा रही थीं (फाइल फोटो)

हालांकि मित्तल ने अपने इस्तीफे की वजह के तौर पर किसी अधिकारी, सरकार या राजनीतिक दखल का सीधे तौर पर उल्लेख नहीं किया है. इसलिए उनके फैसले को किसी एक कारण से जोड़ना जल्दबाजी होगी. लेकिन उनकी कहानी उस बड़े सवाल को जरूर सामने लाती है कि यूपी जैसे विशाल राज्य में IAS अफसरों के लिए प्रशासनिक सेवा की बदलती भूमिका आखिर किस तरह की चुनौती पैदा कर रही है.

बेचैनी की वजह

दिव्या मित्तल के करियर को देखें तो उनकी पहचान मुख्य रूप से फील्ड में सक्रिय अधिकारी की रही. मेरठ से शुरू हुआ उनका प्रशासनिक सफर गोंडा, कानपुर नगर, बरेली, संतकबीरनगर, मिर्जापुर और देवरिया तक पहुंचा. वे मुख्य विकास अधिकारी, विकास प्राधिकरण की उपाध्यक्ष, जिला मजिस्ट्रेट और उत्तर प्रदेश ग्रामीण सड़क विकास एजेंसी की CEO जैसी जिम्मेदारियां संभाल चुकी थीं. 

मिर्जापुर में उन्होंने सरकारी योजनाओं को लोगों तक सीधे पहुंचाने और सोशल मीडिया के जरिए जनता की शिकायतों का जवाब देने का अलग अंदाज विकसित किया. यही वजह है कि उनके करीबी लोगों और IAS कैडर में उनके फैसले को लेकर एक चर्चा यह भी है कि फील्ड की सक्रिय भूमिका से हटकर शासन के अपेक्षाकृत कम प्रत्यक्ष प्रभाव वाले विभाग में काम करना उन्हें सहज नहीं लगा. 

उनके समकक्ष एक IAS अधिकारी के मुताबिक, फील्ड में जिलाधिकारी के पास आम लोगों की समस्याओं को सीधे देखने और तत्काल दखल की काफी गुंजाइश रहती है. इसके मुकाबले शासन में विशेष सचिव की भूमिका अधिक नीतिगत और फाइल आधारित होती है. जो अधिकारी जमीन पर जाकर बदलाव देखने के आदी हो चुके हों, उन्हें यह बदलाव स्वाभाविक रूप से कम संतोष दे सकता है.

यह सिर्फ दिव्या मित्तल की कहानी नहीं है. IAS सेवा में आने वाले कई अधिकारी अपने करियर की शुरुआत इस उम्मीद के साथ करते हैं कि उन्हें प्रशासनिक अधिकारों के जरिए समाज में ठोस बदलाव करने का मौका मिलेगा. 

कुछ IAS अफसर अपने लिए प्राइवेट सेक्टर में बेहतर मौके देखते हैं (सांकेतिक फोटो)

जिलाधिकारी की पोस्टिंग इस लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव मानी जाती है. कानून-व्यवस्था, विकास योजनाएं, राजस्व, स्वास्थ्य, शिक्षा और जन शिकायतों से जुड़े फैसलों में डीएम की भूमिका सीधे दिखाई देती है. लेकिन जैसे-जैसे अधिकारी वरिष्ठ होते जाते हैं, उनकी पोस्टिंग का बड़ा हिस्सा सचिवालय, विभागों और नीति निर्माण से जुड़ जाता है.

यूपी के एक पूर्व मुख्य सचिव का मानना है कि लंबे समय से पहले ही सेवा छोड़ने या स्वैच्छ‍िक सेवानिवृत्त‍ि (VRS) लेने के पीछे एक ही कारण नहीं होता. कुछ मामलों में पारिवारिक परिस्थितियां महत्वपूर्ण होती हैं तो कुछ अधिकारी निजी क्षेत्र में बेहतर अवसर मिलने के कारण विकल्प तलाशते हैं. 

उनके मुताबिक अगर कोई अधिकारी नौकरी के अंतिम चरण में VRS लेता है तो उसके पीछे व्यक्तिगत कारण अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं लेकिन अगर लंबी सेवा बाकी रहते अधिकारी बाहर निकलता है तो उसके फैसले को व्यापक नजरिए से देखने की जरूरत है.

दिव्या मित्तल के मामले में भी यही महत्वपूर्ण है. उनके सामने अभी लंबा प्रशासनिक करियर बाकी था. ऐसे में उनका इस्तीफा यह संकेत जरूर देता है कि आज IAS अधिकारियों के लिए सिर्फ नौकरी की सुरक्षा और प्रतिष्ठा ही पर्याप्त प्रेरणा नहीं रह गई है. काम से मिलने वाली संतुष्टि, निर्णय लेने की स्वतंत्रता और अपने तरीके से काम करने की गुंजाइश भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है.

राजनीतिक दबाव की भी चर्चा

IAS अधिकारियों के समय से पहले सेवा छोड़ने की चर्चा में राजनीतिक दखल का मुद्दा सबसे ज्यादा उठता है. दिव्या मित्तल के इस्तीफे के बाद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी BJP सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि ईमानदार अधिकारियों पर अनैतिक और गैर-कानूनी काम करने का दबाव डाला जाता है. 

सपा नेता ने तबादलों और पोस्टिंग को कारोबार बनाने, टेंडरों में हेरफेर, राजनीतिक कार्यकर्ताओं को फायदा पहुंचाने और विपक्षी नेताओं के खिलाफ कार्रवाई जैसे गंभीर आरोप लगाए. हालांकि ये राजनीतिक आरोप हैं और इनके आधार पर दिव्या मित्तल के इस्तीफे की वजह तय नहीं की जा सकती. 

खुद मित्तल ने अपने सार्वजनिक विदाई संदेश में सरकार या राजनीतिक दबाव का आरोप नहीं लगाया. इसलिए इस पहलू को उनके व्यक्तिगत फैसले से अलग रखकर देखना जरूरी है. लेकिन IAS कैडर में लंबे समय से यह चर्चा जरूर रही है कि फील्ड में काम करने वाले अधिकारियों के सामने राजनीतिक और प्रशासनिक अपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाना लगातार चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है.

दिव्या मित्तल का देवरिया कार्यकाल इस बहस को एक उदाहरण जरूर देता है. जुलाई 2025 में जिला विकास समन्वय और निगरानी समिति की बैठक में बरहज विधायक दीपक मिश्र के साथ उनकी तीखी बहस हुई थी. बैठक में सड़क निर्माण में देरी और एक शिक्षिका के वेतन भुगतान से जुड़े मुद्दे पर विवाद बढ़ा था. विधायक बैठक छोड़कर चले गए थे. 

बाद में देवरिया विधायक शलभ मणि त्रिपाठी और तत्कालीन कृषि मंत्री सूर्यप्रताप शाही ने भी इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया दी थी. ऐसी घटनाएं यह दिखाती हैं कि जिलाधिकारी की भूमिका सिर्फ प्रशासनिक आदेश जारी करने तक सीमित नहीं है. उन्हें निर्वाचित जनप्रतिनिधियों, स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व, सरकारी अधिकारियों और जनता के बीच लगातार संतुलन बनाना पड़ता है. 

कई बार प्रशासनिक नियम और राजनीतिक अपेक्षाएं आमने-सामने आ जाती हैं. यही वह बिंदु है जहां किसी अधिकारी की व्यक्तिगत कार्यशैली और शासन की राजनीतिक प्राथमिकताओं के बीच तनाव पैदा हो सकता है. 

लेकिन विशेषज्ञों का एक दूसरा पक्ष भी है. हर अधिकारी जो VRS लेता है या इस्तीफा देता है, वह राजनीतिक दबाव से परेशान होकर ही ऐसा करे, यह मान लेना भी सही नहीं होगा. IAS अधिकारियों का प्रोफाइल पहले की तुलना में बदल रहा है. 

आज सेवा में आने वाले अधिकारी निजी क्षेत्र, अंतरराष्ट्रीय संस्थानों और कॉर्पोरेट दुनिया की कार्यप्रणाली से परिचित हैं. इसलिए वे अपने करियर की तुलना सिर्फ सरकारी सेवा के भीतर नहीं, बल्कि बाहर उपलब्ध विकल्पों से भी करते हैं. यानी समस्या को केवल 'राजनीतिक दबाव बनाम ईमानदार अधिकारी' के चश्मे से देखने के बजाय प्रशासनिक सेवा के बदलते चरित्र के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा.

प्राइवेट सेक्टर का आकर्षण

दिव्या मित्तल की कहानी इस बदलाव को सबसे दिलचस्प तरीके से सामने रखती है. IIT दिल्ली से पढ़ाई करने के बाद उन्होंने IIM बेंगलुरु से मैनेजमेंट की पढ़ाई की और लंदन में एक्सॉटिक डेरिवेटिव्स ट्रेडर के तौर पर काम किया. यानी उनके पास सरकारी सेवा के बाहर एक बेहद आकर्षक करियर का विकल्प पहले से मौजूद था. लेकिन उन्होंने भारत लौटकर IAS को चुना. 

अपने विदाई संदेश में उन्होंने लिखा कि विदेश में रहते हुए उन्हें लगा कि कुछ अधूरा है. अपनी शिक्षा, आत्मविश्वास और दुनिया में कहीं भी सिर उठाकर चलने की हिम्मत को उन्होंने इसी मिट्टी का कर्ज बताया और उसे चुकाने के लिए भारत लौटने की बात कही. यह बात महत्वपूर्ण है क्योंकि आज की IAS पीढ़ी पिछली पीढ़ियों से काफी अलग है. 

नई पीढ़ी के अफसर बेहतर शिक्षित हैं, निजी क्षेत्र और वैश्विक संस्थानों की कार्यप्रणाली समझते हैं और उनके पास नौकरी छोड़ने के बाद भी कई पेशेवर विकल्प मौजूद हैं. इसलिए सरकारी नौकरी अब उनके लिए जीवनभर का एकमात्र करियर विकल्प नहीं है. यूपी में पिछले कुछ वर्षों में जिन अधिकारियों ने VRS या इस्तीफा लिया है, उनकी सूची इस बदलाव की ओर इशारा करती है. 

मोहम्मद मुस्तफा और आमोद कुमार, रिग्जियान सैंफिल, रेणुका कुमार, जूथिका पाटणकर, विकास गोठलवाल और अनामिका सिंह समेत कई अधिकारियों ने VRS लिया. दूसरी तरफ विद्या भूषण, अभिषेक सिंह, एस मुथु शालिनी और अब दिव्या मित्तल के इस्तीफे ने बहस को और तेज किया है. 

इन सभी मामलों के कारण अलग-अलग हैं. इसलिए इन्हें एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा. लेकिन एक पैटर्न जरूर दिखाई देता है कि IAS अधिकारियों के लिए सेवा के बाहर के विकल्प पहले से ज्यादा आकर्षक हो गए हैं.

दिव्या मित्तल ने अपने विदाई संदेश में लिखा कि उन्होंने अपने लिए जो सपने देखे थे, वे पूरे हो चुके हैं और अब उन सपनों को जीने का समय है, जो उन्होंने अपने लोगों के लिए देखे थे. इस एक वाक्य में IAS की ताकत और उसकी मौजूदा चुनौती दोनों छिपी हैं. 

सवाल यह है कि ऐसे सपनों को पूरा करने के लिए अफसरों को सेवा के भीतर पर्याप्त जगह मिल रही है या फिर उन्हें अपने सपनों के लिए सेवा से बाहर निकलना ज्यादा आसान लगने लगा है? यूपी की नौकरशाही के सामने आने वाले वर्षों में शायद यही सबसे बड़ा सवाल होगा.

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