भर्ती पूरी, नियुक्ति अधर में! यूपी का सिस्टम कहां फेल हो रहा?

उत्तर प्रदेश में कई विभागों की भर्ती प्रक्रियाएं वर्षों से पूरी नहीं हो पा रही हैं. सरकार कानूनी और प्रक्रियागत कारण बता रही है, लेकिन बढ़ती देरी युवाओं के भविष्य और प्रशासनिक क्षमता, दोनों पर सवाल खड़े कर रही है

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सांकेतिक तस्वीर

अयोध्या के 24 वर्षीय रवि पांडे की सुबह अब निशानेबाजी के अभ्यास से कम और मोबाइल स्क्रीन पर ज्यादा गुजरती है. वे हर दिन उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UPSSSC) की वेबसाइट खोलते हैं, इस उम्मीद में कि ग्राम पंचायत अधिकारी (GPO) भर्ती का अंतिम परिणाम घोषित हो गया होगा. 

अप्रैल 2025 में मुख्य परीक्षा देने और मई 2026 में दस्तावेज सत्यापन पूरा कराने के बावजूद उन्हें अब तक नियुक्ति का इंतजार है. आर्थिक रूप से साधारण परिवार से आने वाले रवि बताते हैं कि वे शूटिंग में पिछले वर्ष प्री-स्टेट स्तर तक पहुंचे थे. स्टेट प्रतियोगिता के लिए उनका चयन भी हुआ, लेकिन दिल्ली जाकर प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे. 

उन्हें लगा कि सरकारी नौकरी मिलने के बाद न सिर्फ परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरेगी बल्कि वे अपने खेल को भी आगे बढ़ा सकेंगे. लेकिन आज उनकी सबसे बड़ी लड़ाई खेल के मैदान में नहीं बल्कि भर्ती प्रक्रिया के पूरा होने का इंतजार है.

रवि की कहानी किसी एक उम्मीदवार की कहानी नहीं है. उत्तर प्रदेश में हजारों अभ्यर्थी ऐसे हैं जिन्होंने परीक्षाएं पास कर लीं, दस्तावेज सत्यापन भी पूरा करा लिया, लेकिन नियुक्ति पत्र का इंतजार खत्म नहीं हो रहा. कहीं परिणाम अटका है, कहीं भर्ती नियमों को अंतिम मंजूरी नहीं मिली, कहीं मामला अदालत में लंबित है और कहीं भर्ती के लिए नया बोर्ड तो बना दिया गया, लेकिन वह छह महीने बाद भी काम शुरू नहीं कर पाया. 

शिक्षा, स्वास्थ्य, पंचायतीराज और उच्च शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभागों में हजारों पद खाली हैं. ऐसे समय में जब प्रदेश सरकार रोजगार सृजन और सुशासन को अपनी उपलब्धियों के केंद्र में रखती है, लंबित भर्तियों का बढ़ता दायरा एक गंभीर प्रशासनिक और राजनीतिक चुनौती बनकर उभर रहा है.

चार साल का इंतजार : GPO भर्ती बनी सबसे बड़ी मिसाल

उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायत अधिकारी भर्ती (GPO) लंबित भर्तियों की सबसे चर्चित मिसाल बन चुकी है. इसकी शुरुआत वर्ष 2022 में आयोजित प्रारंभिक पात्रता परीक्षा (PET) से हुई. वर्ष 2023 में 1,468 पदों के लिए विज्ञापन जारी हुआ. करीब 66,691 अभ्यर्थियों ने PET के माध्यम से इस भर्ती के लिए पात्रता हासिल की. इसके बाद मुख्य परीक्षा 27 अप्रैल 2025 को आयोजित हुई. 

लगभग एक साल बाद मई 2026 में दस्तावेज सत्यापन भी पूरा करा लिया गया. इसके बावजूद अंतिम परिणाम अब तक घोषित नहीं हो पाया है. मुख्य परीक्षा में सफल 6,113 उम्मीदवारों की उम्मीदें लगातार लंबी होती जा रही हैं. 

UPSSSC के अध्यक्ष एस.एन. साबत का कहना है कि आयोग सभी आरक्षित और क्षैतिज आरक्षण श्रेणियों में अधिकतम पद भरने का प्रयास कर रहा है. उनके अनुसार दस्तावेज सत्यापन पूरा हो चुका है और कुछ श्रेणियों में पात्र उम्मीदवारों की उपलब्धता की समीक्षा चल रही है. प्रक्रिया पूरी होते ही परिणाम घोषित कर दिया जाएगा. 

जानकारी के मुताबिक विशेष रूप से कुशल खिलाड़ी और दिव्यांग जैसी क्षैतिज आरक्षण श्रेणियों में पर्याप्त पात्र उम्मीदवार नहीं मिलने के कारण अंतिम चयन सूची तैयार करने में समय लग रहा है. हालांकि अभ्यर्थियों का तर्क है कि दस्तावेज सत्यापन पूरा होने के कई महीने बाद भी परिणाम न आना सामान्य प्रशासनिक देरी नहीं माना जा सकता. उनका कहना है कि भर्ती प्रक्रिया के लिए कोई निश्चित समय सीमा न होने के कारण युवाओं का पूरा करियर प्रभावित हो रहा है.

शिक्षा विभाग की भर्तियां भी फैसलों के इंतजार में

यदि केवल GPO भर्ती ही लंबित होती तो इसे एक अलग मामला माना जा सकता था, लेकिन शिक्षा विभाग की तस्वीर भी कम चिंताजनक नहीं है. उत्तर प्रदेश के सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में प्रधानाचार्य और हेडमास्टर के 2,647 पद वर्षों से खाली हैं. इनमें 1,475 इंटर कॉलेजों के प्रधानाचार्य और 1,172 हाईस्कूलों के हेडमास्टर शामिल हैं. 

इन पदों पर पिछली भर्ती वर्ष 2013 में हुई थी. यानी 13 वर्ष बाद नई भर्ती का अवसर आया, लेकिन प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही नियमावली के सवाल में उलझ गई. शिक्षकों के संगठनों की मांग पर सरकार ने तय किया कि भविष्य में भर्ती केवल इंटरव्यू से नहीं बल्कि लिखित परीक्षा और इंटरव्यू दोनों के आधार पर होगी. इसी बीच पुराने माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड का विलय नए उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग (UPESSC) में कर दिया गया. 

आयोग ने नई चयन प्रक्रिया के अनुरूप पात्रता नियम तैयार कर सरकार को भेज दिए. प्रस्तावित नियमों के अनुसार प्रधानाचार्य बनने के लिए स्नातकोत्तर डिग्री, बीएड, न्यूनतम 30 वर्ष आयु और कम से कम चार वर्ष का शिक्षण या प्रशासनिक अनुभव अनिवार्य किया गया है. 

इसी प्रकार हेडमास्टर पद के लिए भी स्नातकोत्तर, बीएड या बीपीएड और चार वर्ष का अनुभव प्रस्तावित है. साथ ही आयोग ने यह भी सुझाव दिया कि केवल वही शिक्षक पात्र हों जिनका वेतन सरकारी कोष या सरकारी अनुदान से मिलता हो.

लेकिन शिक्षा निदेशालय ने इन प्रस्तावों पर अलग राय देते हुए कुछ बदलाव सुझाए. निदेशालय ने हेडमास्टर भर्ती में लेक्चररों को बाहर रखने और जूनियर हाईस्कूल के हेडमास्टरों को पात्र बनाने की सिफारिश की. साथ ही ऐसे शिक्षकों को भी पात्रता में शामिल करने का सुझाव दिया जिनका वेतन सीधे सरकारी कोष से नहीं मिलता. दोनों पक्षों के सुझावों के बीच सरकार अभी तक अंतिम निर्णय नहीं ले सकी है. 

UPESSC के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि आयोग ने अपना प्रस्ताव सरकार को भेज दिया है और मंजूरी मिलते ही भर्ती प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी. लेकिन सवाल यह है कि हजारों विद्यालय कब तक नियमित प्रधानाचार्य और हेडमास्टर के बिना काम चलाते रहेंगे. 

उधर सहायता प्राप्त महाविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसर के 910 पदों की भर्ती भी चार वर्षों से विवादों में उलझी हुई है. वर्ष 2022 में विज्ञापन जारी हुआ. भर्ती प्रक्रिया के दौरान अनियमितताओं के आरोप लगे. एक बार परीक्षा निरस्त हुई. हाईकोर्ट ने केवल पांच विषयों में पुनर्परीक्षा कराने का आदेश दिया, लेकिन आयोग सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. 

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाई जिसके बाद आयोग ने दोबारा परीक्षा कराई और परिणाम घोषित कर दिया. 22 जुलाई 2026 से साक्षात्कार शुरू भी हो गए लेकिन उसी दिन शीर्ष अदालत के यथास्थिति बनाए रखने के आदेश के बाद पूरी प्रक्रिया तत्काल रोकनी पड़ी. सैकड़ों अभ्यर्थी साक्षात्कार देने आयोग पहुंच चुके थे, लेकिन उन्हें वापस लौटना पड़ा. 

अब अगली सुनवाई का इंतजार है. इसका अर्थ यह है कि चार वर्षों की तैयारी, दो-दो परीक्षाएं और परिणाम आने के बाद भी नियुक्ति का रास्ता साफ नहीं हो पाया.

भर्ती के लिए डॉक्टरों से लेकर पैरामेडिकल छात्रों तक इंतजार

स्वास्थ्य विभाग में स्थिति और अधिक गंभीर दिखाई देती है क्योंकि यहां लंबित भर्ती का असर सीधे स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ता है. प्रदेश सरकार ने विशेषज्ञ चिकित्सकों और मेडिकल कॉलेजों में चिकित्सा शिक्षकों की भर्ती को तेज करने के उद्देश्य से जनवरी 2026 में विशेषज्ञ चिकित्सक एवं चिकित्सा शिक्षक भर्ती बोर्ड का गठन किया. उद्देश्य यह था कि पहले की तुलना में भर्ती तेजी से हो सके क्योंकि लोक सेवा आयोग के माध्यम से प्रक्रिया लंबी हो जाती थी. 


लेकिन बोर्ड के गठन के छह महीने बाद भी सदस्य नियुक्त नहीं हो सके हैं. कार्यालय के लिए भवन तय हो चुका है, लेकिन भर्ती प्रक्रिया शुरू नहीं हुई. प्रांतीय चिकित्सा सेवा संघ के अनुसार प्रदेश में लेवल-1 डॉक्टरों के लगभग 7,000 पद और लेवल-2 के लगभग 3,000 पद खाली हैं. 

विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी पहले से ही सरकारी अस्पतालों के सामने बड़ी चुनौती बनी हुई है. अपर मुख्य सचिव अमित घोष का कहना है कि बोर्ड का गठन हो चुका है और सदस्यों की नियुक्ति जल्द की जाएगी. उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री ब्रजेश पाठक का कहना है कि भर्ती बोर्ड की नियमावली अंतिम चरण में है और उसके बाद भर्ती प्रक्रिया शुरू होगी. 

इसी बीच आयुष विभाग से संबद्ध पैरामेडिकल कॉलेजों में पढ़ने वाले लगभग 40,000 छात्र भी अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं. जनरल नर्सिंग ऐंड मिडवाइफरी (GNM) और डी-फार्मा पाठ्यक्रमों में पिछले दो वर्षों से प्रवेश तो हो रहे हैं लेकिन पूरक और वार्षिक परीक्षाएं नहीं हो सकीं. परिणामस्वरूप छात्र अगली कक्षा में नहीं जा पा रहे, छात्रवृत्तियां अटक गई हैं और कई छात्र अपनी फीस वापस मांगने लगे हैं. 

समस्या की जड़ आयुर्वेदिक तथा यूनानी तिब्बति चिकित्सा पद्धति बोर्ड के कार्यकाल और प्रशासनिक निर्णयों में देरी है. वर्ष 2025 में बोर्ड का कार्यकाल समाप्त होने के बाद नए चुनाव या कार्यकाल विस्तार पर समय से निर्णय नहीं हुआ. इस कारण परीक्षा कैलेंडर पूरी तरह प्रभावित हो गया. 

हाईकोर्ट के निर्देशों के बावजूद परीक्षा समय पर आयोजित नहीं हो सकी. हालात इतने बिगड़े कि छात्रों और कॉलेज प्रबंधकों को बोर्ड कार्यालय के बाहर प्रदर्शन करना पड़ा. बोर्ड उपाध्यक्ष शैलेश कुमार राय ने समाधान का आश्वासन दिया है, लेकिन छात्र अभी भी परीक्षा तिथि का इंतजार कर रहे हैं. 

इन सभी मामलों का अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि हर भर्ती की समस्या अलग है, लेकिन प्रशासनिक ढांचे की कमजोरियां लगभग समान हैं. सरकारी अधिकारियों का यह भी कहना है कि नई चयन प्रणालियों, डिजिटल सत्यापन और आरक्षण संबंधी कानूनी जटिलताओं के कारण भर्ती प्रक्रियाएं पहले की तुलना में अधिक विस्तृत हो गई हैं. इसलिए समय अधिक लग रहा है. 

प्रयागराज में प्रतियोगी छात्र समिति के प्रवक्ता अवनीश पांडेय कहते हैं, “यदि प्रक्रियाएं लंबी हैं तो सरकार को प्रत्येक चरण के लिए समय सीमा तय करनी चाहिए. परीक्षा, परिणाम, दस्तावेज सत्यापन और नियुक्ति के बीच महीनों या वर्षों का अंतर युवाओं के जीवन पर गहरा असर डालता है. कई उम्मीदवार आयु सीमा पार कर जाते हैं, कई आर्थिक दबाव के कारण तैयारी छोड़ देते हैं और कुछ मानसिक तनाव का सामना करते हैं.” 

उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा युवा राज्य है. हर वर्ष लाखों अभ्यर्थी सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन करते हैं. यही वजह है कि उत्तर प्रदेश में लंबित भर्तियों का मुद्दा अब केवल रोजगार का विषय नहीं रह गया है. यह सुशासन, प्रशासनिक क्षमता और युवाओं के भरोसे की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुका है.

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