यूपी में 2027 का चुनाव, नेताओं की अगली पीढ़ी के लिए किस्मत आजमाने का मौका?

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले BJP और समाजवादी पार्टी समेत विभिन्न दलों के वरिष्ठ नेताओं के बेटे-बेटियां अपने-अपने पारिवारिक असर वाले क्षेत्रों में सक्रियता बढ़ा रहे हैं

Dynastic Politics
यूपी में वंशवादी राजनीति कोई नया ट्रेंड नहीं है (इलस्ट्रेशन : इंडिया टुडे))

पिछले दिनों राज्यसभा चुनाव के दौरान बरेली की राजनीति में दो घटनाओं ने सबका ध्यान खींचा. पहली, भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने झारखंड के राज्यपाल और बरेली से आठ बार लोकसभा सांसद रहे संतोष गंगवार की बेटी श्रुति गंगवार को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया. वे निर्विरोध निर्वाचित भी हो गईं. 

श्रुति गंगवार पिछले कुछ समय से बरेली और नवाबगंज क्षेत्र में सामाजिक और सार्वजनिक कार्यक्रमों में सक्रिय रही हैं. अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक की अध्यक्ष होने के साथ महिला सशक्तीकरण, स्वास्थ्य जागरूकता और धार्मिक आयोजनों में उनकी भागीदारी दिखती रही है. राज्यसभा का टिकट मिलने से उनकी राजनीतिक सक्रियता को अब एक औपचारिक पहचान मिल गई है. 

यह उदाहरण बताता है कि स्थापित नेताओं के परिवारों के लिए राजनीति में प्रवेश का रास्ता केवल विधानसभा चुनाव तक सीमित नहीं है. संगठन, सामाजिक गतिविधियों और अन्य निर्वाचित संस्थाओं के जरिए भी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया जा सकता है.

दूसरी, राज्यसभा का टिकट नहीं मिलने से नाराज आंवला के पूर्व BJP सांसद धर्मेंद्र कश्यप ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया और अपनी बेटी कीर्ति कश्यप के राजनीतिक भविष्य के लिए समाजवादी पार्टी (सपा) का रुख किया. धर्मेंद्र कश्यप ने 11 अक्टूबर को अपनी बेटी कीर्ति कश्यप के साथ सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव से मुलाकात की. 

अखिलेश यादव के साथ धर्मेंद्र कश्यप और उनकी बेटी कीर्ति

अखिलेश ने कीर्ति को बरेली की बिथरी चैनपुर विधानसभा सीट का प्रभारी बनाया. इसे 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए उनकी संभावित दावेदारी की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है. हालांकि प्रभारी बनाए जाने का अर्थ उम्मीदवार घोषित होना नहीं है, लेकिन इससे इतना स्पष्ट है कि चुनाव से पहले राजनीतिक परिवार अपने उत्तराधिकारियों के लिए जमीन तैयार करने में जुट गए हैं.

बरेली में BJP की ओर से भी ऐसी ही सक्रियता दिखाई दे रही है. बहेड़ी से दो बार विधायक और एक बार मंत्री रहे, वर्तमान में बरेली के सांसद छत्रपाल सिंह गंगवार के भतीजे दुष्यंत गंगवार आगामी विधानसभा चुनाव में दावेदारी की तैयारी कर रहे हैं. दमखोदा के ब्लॉक प्रमुख रह चुके दुष्यंत सांसद प्रतिनिधि के तौर पर क्षेत्र में जनसंपर्क, जनसुनवाई और पार्टी के कार्यक्रमों में शामिल होते हैं. उनकी पत्नी स्नेहलता गंगवार भी इसी क्षेत्र से ब्लॉक प्रमुख रह चुकी हैं. इससे परिवार की स्थानीय राजनीतिक मौजूदगी का अंदाजा लगाया जा सकता है.

बरेली के महापौर डॉ. उमेश गौतम के बेटे पार्थ गौतम भी सामाजिक गतिविधियों के माध्यम से अपनी पहचान बनाने में जुटे हैं. इनवर्टिस यूनिवर्सिटी में कार्यकारी निदेशक पार्थ स्वास्थ्य सहायता, जरूरतमंदों की मदद और सर्दियों में चाय सेवा जैसे कार्यक्रमों में भागीदारी करते रहे हैं. 'युवा सेवक संघ' के माध्यम से युवाओं को समाजसेवा से जोड़ने की पहल भी उनकी गतिविधियों का हिस्सा है. 

फरीदपुर के पूर्व विधायक दिवंगत श्याम बिहारी लाल के बेटे ईशान ग्वाल की सक्रियता भी इसी कड़ी का हिस्सा है. बीटेक की पढ़ाई के बाद दिल्ली में सिविल सेवा की तैयारी कर रहे ईशान पिता के निधन के बाद बरेली लौटे. वे अब फरीदपुर क्षेत्र में सामाजिक, धार्मिक और सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल होते हैं. पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने की संभावना के बीच उनकी यह सक्रियता महत्वपूर्ण मानी जा रही है.

सपा में उत्तराधिकार की लंबी कतार

समाजवादी पार्टी (सपा) में नेताओं की अगली पीढ़ी को आगे बढ़ाने की कोशिशें कई जिलों में दिखाई दे रही हैं. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बेटे-बेटियां अपने संभावित निर्वाचन क्षेत्रों में सक्रिय हैं. कई नेताओं ने अखिलेश यादव से मुलाकात कर अपने बच्चों की राजनीतिक दावेदारी के लिए जमीन तैयार करने की कोशिश की है. उनके समर्थक स्थानीय स्तर पर संपर्क बढ़ा रहे हैं ताकि टिकट वितरण से पहले इन नामों को मजबूत दावेदार के रूप में स्थापित किया जा सके. 

सपा सांसद अवधेश प्रसाद मिल्कीपुर से अपने बेटे अजीत को आगे बढ़ा रहे हैं (फाइल फोटो)

बाराबंकी में पूर्व केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा के परिवार की राजनीतिक विरासत आगे बढ़ाने की कोशिश जारी है. उनके बेटे राकेश वर्मा अपनी बेटी श्रेया वर्मा के लिए कुर्सी विधानसभा सीट से टिकट की दावेदारी मजबूत करना चाहते हैं. श्रेया ने 2024 का लोकसभा चुनाव गोंडा से लड़ा था. चुनाव हारने के बावजूद उन्होंने चार लाख से अधिक वोट हासिल किए थे. अब श्रेया को 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए संभावित उम्मीदवार के तौर पर पेश करने की कोशिश की जा रही है. 

अंबेडकर नगर में सांसद लालजी वर्मा अपनी बेटी छाया वर्मा को कटेहरी विधानसभा सीट से आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. पेशे से नेत्र रोग विशेषज्ञ छाया स्थानीय लोगों से संपर्क कर रही हैं. कटेहरी को पार्टी की पारंपरिक राजनीतिक जमीन माना जाता है. ऐसे में परिवार की पुरानी पकड़ और स्थानीय स्तर पर छाया की स्वीकार्यता उनकी संभावित दावेदारी में अहम होगी. 

अयोध्या में सांसद अवधेश प्रसाद अपने बेटे अजीत प्रसाद को मिल्कीपुर विधानसभा सीट से आगे बढ़ाने में जुटे हैं. अजीत 2025 के उपचुनाव में BJP के चंद्रभानु पासवान से 61 हजार से अधिक वोटों के अंतर से हार गए थे. इसके बावजूद उनके पिता ने क्षेत्र में उनकी सक्रियता बढ़ाई है. यह मामला इस सवाल को भी सामने लाता है कि क्या राजनीतिक परिवारों की पकड़ हार के बाद भी अपने उत्तराधिकारियों के लिए चुनावी संभावनाएं बनाए रख सकती है. 

बलिया में दिवंगत राम गोविंद चौधरी के बेटे रंजीत चौधरी चुनावी राजनीति में उतरने की तैयारी में हैं. राम गोविंद चौधरी बांसडीह से आठ बार विधायक रहे थे और विपक्ष के नेता भी रह चुके थे. जौनपुर में केराकत के विधायक और पूर्व सांसद तूफानी सरोज अपनी बेटी प्रिया सरोज को संसद तक पहुंचाने के बाद बेटे धनंजय के लिए राजनीतिक जमीन तैयार कर रहे हैं. पेशे से वकील धनंजय ने क्षेत्र में पार्टी कार्यकर्ताओं से मुलाकातें शुरू कर दी हैं. 

बाराबंकी में पूर्व मंत्री फरीद महफूज किदवई अपने बेटे फैजान किदवई के लिए प्रचार कर रहे हैं. फैजान की बॉलीवुड अभिनेता के रूप में पहचान का लाभ राजनीतिक लोकप्रियता बढ़ाने के लिए उठाने की कोशिश की जा रही है. लखनऊ की बख्शी का तालाब सीट पर राजेंद्र यादव अपने बेटे शिवेंद्र यादव को आगे बढ़ा रहे हैं. बलिया में वरिष्ठ नेता अंबिका चौधरी के बेटे आनंद चौधरी की राजनीतिक तैयारी की चर्चा है. 

आजमगढ़ में दुर्गा प्रसाद यादव अपनी पारंपरिक सीट बेटे विजय यादव को सौंप सकते हैं. संभल में विधायक नवाब इकबाल महमूद ने बेटे सुहेल इकबाल महमूद को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाने के संकेत दिए हैं. अमरोहा में पूर्व मंत्री महबूब अली के बेटे परवेज अली की दावेदारी की तैयारी है. संत कबीर नगर में सुबोध यादव अपने दिवंगत पिता भालचंद्र यादव की राजनीतिक विरासत को फिर हासिल करने के लिए सपा में वापसी की कोशिश कर रहे हैं. 

इन नामों से स्पष्ट है कि सपा में राजनीतिक उत्तराधिकार की कोशिशें किसी एक क्षेत्र या परिवार तक सीमित नहीं हैं. हालांकि इन सभी नेताओं के बच्चों को टिकट मिलना तय नहीं है. अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व को करना है, जिसे स्थानीय समीकरणों, कार्यकर्ताओं की पसंद और उम्मीदवार की जीतने की क्षमता का आकलन करना होगा.

BJP में भी सक्रिय नेता पुत्र

परिवारवाद को लेकर सपा पर हमला करने वाली BJP में भी वरिष्ठ नेताओं के बेटे और रिश्तेदार राजनीतिक गतिविधियों में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं. इनकी सक्रियता का केंद्र केवल सार्वजनिक मंच नहीं है. पार्टी कार्यालयों में उपस्थिति, युवाओं के बीच संपर्क, सामाजिक संस्थाओं के कार्यक्रम, इंटरनेट मीडिया पर प्रचार और बड़े आयोजनों में व्यवस्थाएं संभालना भी इनके राजनीतिक परिचय का हिस्सा बन रहा है.

सतीश महाना के बेटे करन महाना के भी राजनीति में सक्रिय होने के संकेत मिल रहे हैं (फाइल फोटो)

कानपुर में विधानसभा अध्यक्ष और महाराजपुर के विधायक सतीश महाना के बेटे करन महाना की गतिविधियां चर्चा में हैं. पिछले कुछ महीनों में कैंट विधानसभा क्षेत्र के कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी बढ़ी है. BJP कार्यालय और युवाओं के बीच उनकी सक्रियता दिखाई देती है. इंटरनेट मीडिया पर उन्हें युवा जनसेवक के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश भी हो रही है. हालांकि इस सक्रियता को विधानसभा चुनाव की औपचारिक दावेदारी मानने से पहले पार्टी की ओर से किसी निर्णय का इंतजार करना होगा. 

कानपुर के भाजपा सांसद रमेश अवस्थी के बेटे सचिन अवस्थी भी राजनीतिक गतिविधियों में भूमिका निभा रहे हैं. बड़े कार्यक्रमों की रणनीति बनाने से लेकर वरिष्ठ नेताओं के आगमन की व्यवस्थाएं संभालने तक उनकी भागीदारी दिखाई देती है. दो स्वयंसेवी संगठनों के माध्यम से विभिन्न कार्यक्रम आयोजित कर वे अपनी सार्वजनिक मौजूदगी बढ़ा रहे हैं. किदवई नगर से भाजपा विधायक महेश त्रिवेदी के बेटे शिवम त्रिवेदी भी पिता के साथ राजनीतिक और सार्वजनिक गतिविधियों में सक्रिय हैं. 

कानपुर की महापौर प्रमिला पांडे के बेटे अमित पांडे उर्फ बंटी सीसामऊ और आर्यनगर क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाने में जुटे हैं. पार्षद वेलफेयर एसोसिएशन के माध्यम से जनहित के मुद्दे उठाने और सामाजिक कार्यक्रमों में भागीदारी की उनकी कोशिशें जारी हैं. हालांकि उनकी संस्था को लेकर नगर निगम के निष्कासित पार्षद सवाल उठा चुके हैं. इससे स्पष्ट होता है कि सामाजिक गतिविधियों के जरिए पहचान बनाना एक बात है और सार्वजनिक जीवन में विश्वसनीयता कायम करना दूसरी. 

अकबरपुर के सांसद देवेंद्र सिंह भोले के बेटे विकास सिंह भी स्वामी विवेकानंद जयंती जैसे आयोजनों में भीड़ जुटाकर अपनी संगठनात्मक क्षमता दिखाने की कोशिश करते हैं. इस तरह की गतिविधियां नेताओं के बच्चों को कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों के बीच परिचित चेहरा बनाने में मदद करती हैं. लेकिन राजनीतिक पहचान को चुनावी स्वीकार्यता में बदलना अलग चुनौती है.

परिवारवाद बनाम राजनीतिक योग्यता

उत्तर प्रदेश की राजनीति में नेताओं की अगली पीढ़ी को आगे बढ़ाने की कोशिश नई नहीं है. सपा में मुलायम सिंह यादव के परिवार से लेकर विभिन्न क्षेत्रीय राजनीतिक परिवारों तक, राजनीतिक विरासत लंबे समय से चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा रही है. 2024 के लोकसभा चुनाव में भी यादव परिवार के पांच  सदस्य मैदान में थे. अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दूसरे परिवारों में भी उत्तराधिकार की तैयारी तेज होती दिख रही है. इस प्रवृत्ति के पीछे कई कारण हैं. 

मेरठ विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग के सहायक प्रोफेसर देवकीनंदन भट्ट बताते हैं, “वरिष्ठ नेताओं के पास वर्षों से तैयार स्थानीय नेटवर्क, कार्यकर्ताओं से संपर्क, चुनावी संसाधन और क्षेत्र में स्थापित पहचान होती है. उनके बच्चों को इनका लाभ मिलता है. कई मामलों में पिता या परिवार के दूसरे सदस्य की मृत्यु के बाद उत्तराधिकारी सार्वजनिक जीवन में सक्रिय होते हैं. कुछ अन्य मामलों में वरिष्ठ नेता अपने सक्रिय राजनीतिक जीवन के दौरान ही अगली पीढ़ी के लिए जगह बनाने लगते हैं.” 

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक 2027 के लिए बढ़ती सक्रियता को पीढ़ीगत बदलाव और सुरक्षित चुनावी जमीन तलाशने की कोशिश दोनों के रूप में देखा जा सकता है. राजनीतिक परिवारों के बच्चों के लिए परिचित नाम और मजबूत नेटवर्क शुरुआती लाभ हैं लेकिन मतदाताओं का समर्थन अपने आप नहीं मिलता. स्थानीय मुद्दों की समझ, जनता के बीच नियमित उपस्थिति, संगठन के साथ तालमेल और सामाजिक समीकरणों से सामंजस्य ही उनकी दावेदारी की वास्तविक परीक्षा होंगे.

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