यूपी BJP में किस बात से नाराज हैं कार्यकर्ता, अमित शाह को क्यों करनी पड़ी अपील?
2024 के लोकसभा चुनाव में लगे झटके के बाद BJP के सामने 2027 से पहले पुराने कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करने, संगठन और सरकार के बीच तालमेल बनाने और पार्टी में एकजुटता बहाल करने की चुनौती है

योगी आदित्यनाथ और अमित शाह (फोटो : AI))
लखनऊ में 30 अक्टूबर को भारतीय जनता पार्टी (BJP) की प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का एक बयान पार्टी के भीतर चल रही खींचतान और असंतोष की गहराई को सामने ले आया. शाह ने पार्टी कार्यकर्ताओं और क्षेत्रीय नेताओं से साफ कहा कि वे अपने मन की निराशा और नाराजगी को गोमती नदी में बहाकर जाएं.
इस दौरान अमित शाह का कहना था, "आप लोगों के मन में जो भी निराशा या नाराजगी है, उसे यहां से जाते समय गोमती नदी में डालकर जाइए. हमें एकजुट रहना है. कई बार हम जो सोचते हैं, वह हमें नहीं मिल पाता है." शाह का यह संदेश केवल कार्यकर्ताओं को चुनावी तैयारी में जुटाने की अपील नहीं था बल्कि इसके पीछे BJP के संगठन में लंबे समय से पनप रहे असंतोष को दूर करने की जरूरत भी दिखाई दी.
शाह ने कार्यकर्ताओं को यह समझाने की कोशिश भी की कि पार्टी ने उनके राजनीतिक समायोजन के लिए अधिकतम प्रयास किए हैं. उन्होंने कहा कि भले ही कई लोगों को उनके काम के बदले कोई पद या इनाम नहीं मिला हो लेकिन BJP ने सरकारी निकायों और संगठनों में उन्हें जगह देने के लिए अधिकतम समायोजन करने की कोशिश की है.
दरअसल पार्टी के भीतर यह शिकायत लगातार उठ रही है कि वर्षों तक संगठन के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं की जगह दूसरे दलों से आए नेताओं और प्रभावशाली लोगों को तरजीह दी जा रही है. सत्ता में आने के बाद संगठन और सरकार के बीच बढ़ी दूरी ने भी इस असंतोष को हवा दी है.
कार्यकर्ताओं का एक वर्ग मानता है कि चुनाव के समय उनसे मेहनत कराई जाती है लेकिन सरकार और संगठन में महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियों के समय उनकी उपेक्षा होती है. यही वजह है कि BJP के शीर्ष नेतृत्व को अब चुनावी तैयारियों के साथ कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करने के लिए भी अलग से मशक्कत करनी पड़ रही है.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी कार्यकारिणी की बैठक में कार्यकर्ताओं को व्यक्तिगत मान-सम्मान से ऊपर उठकर पार्टी की विचारधारा के लिए काम करने का संदेश दिया. उन्होंने पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी का उल्लेख करते हुए कहा, "आडवाणी जी अक्सर कहते थे कि राजनीतिक प्राथमिकताएं बदल सकती हैं लेकिन पार्टी के मूल्य, आदर्श और विचारधारा कभी नहीं बदल सकते."
वहीं प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने कार्यकर्ताओं की भूमिका को पार्टी की सबसे बड़ी पूंजी बताते हुए कहा कि BJP की असली पूंजी उसके कार्यकर्ता हैं, न कि सत्ता. उन्होंने नेतृत्व से उन कार्यकर्ताओं का सम्मान करने की जरूरत बताई जो मुश्किल समय में भी पार्टी के साथ खड़े रहे हैं. चौधरी ने सांसदों, विधायकों और एमएलसी से संगठन के साथ संवाद बनाए रखने और कार्यकर्ताओं की बातें अधिक सुनने की अपील की.
डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने भी राजनीतिक प्रस्ताव पेश करते हुए कार्यकर्ताओं से व्यक्तिगत आकांक्षाओं और मतभेदों से ऊपर उठने को कहा. उनका संदेश था, "जाइए सब कुछ भूल, हर विधानसभा में खिलाइए कमल का फूल."
हालांकि शीर्ष नेताओं की इन अपीलों के पीछे संगठन के सामने खड़ी चुनौतियां बताती हैं कि केवल एकजुटता का संदेश देना पर्याप्त नहीं होगा.
संगठन में बेचैनी
BJP के भीतर कार्यकर्ताओं की नाराजगी का एक बड़ा कारण संगठनात्मक पदों के बंटवारे को लेकर उठते सवाल हैं. अक्टूबर में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और राष्ट्रीय तथा प्रदेश स्तर के अन्य नेताओं ने उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में बैठकें कर संगठन का फीडबैक लिया था. इन बैठकों में कार्यकर्ताओं और क्षेत्रीय नेताओं ने खुलकर अपनी शिकायतें रखीं.
8 अक्टूबर को वाराणसी में पार्टी अध्यक्ष ने काशी क्षेत्र के BJP के पूर्व पदाधिकारियों के साथ बैठक की थी. इस बैठक में एक नेता ने पार्टी में पद और पुरस्कार देने के मानदंडों पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि दिल्ली और लखनऊ में पार्टी के ‘शीर्ष नेताओं से फूलों के गुलदस्ते के साथ मुलाकात करने वाले लोगों’ को संगठन में पद मिल जाते हैं जबकि जमीन पर वर्षों से काम करने वाले कार्यकर्ताओं की अनदेखी होती है.
बैठक में एक नेता ने यह भी कहा कि विधानसभा चुनाव में टिकट और मंत्री पद बाहरी लोगों को देना शायद स्वीकार किया जा सकता है लेकिन ऐसे लोगों को संगठन में वरिष्ठ पदों पर बैठा देने से समर्पित कार्यकर्ताओं के लिए उनके साथ काम करना मुश्किल हो जाता है. यह शिकायत BJP के उस संगठनात्मक ढांचे के लिए अहम है, जिसकी ताकत लंबे समय से कैडर आधारित कार्यकर्ता माने जाते रहे हैं.
पार्टी में दूसरे दलों से आए नेताओं को चुनावी सफलता के लिए समायोजित करने की रणनीति ने कई जगह पुराने कार्यकर्ताओं और नए नेताओं के बीच असहजता पैदा की है. वाराणसी क्षेत्र में मौजूदा विधायकों की जगह नए चेहरों को लाने का सुझाव भी इसी बैठक में दिया गया. इससे साफ है कि असंतोष केवल पदों तक सीमित नहीं है बल्कि स्थानीय नेतृत्व की स्वीकार्यता और चुनावी प्रतिनिधित्व को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं.
BJP के एक वरिष्ठ पदाधिकारी के मुताबिक इन बैठकों का मकसद कार्यकर्ताओं को अपनी बात रखने का मौका देना और उनकी नाराजगी को दूर करना था. पार्टी नेतृत्व और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी इन शिकायतों पर ध्यान देने का भरोसा दिया है. राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के साथ हुई बैठक में प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और यूपी के सह-प्रभारी जगदीश पटेल भी मौजूद थे.
बाद में 14 और 15 अक्टूबर को जगदीश पटेल तथा प्रदीप कुमार वर्मा ने काशी और गोरखपुर क्षेत्र के विस्तारकों तथा विधानसभा प्रभारियों की दो दिवसीय कार्यशाला की अध्यक्षता की. इसमें काशी क्षेत्र की 71 और गोरखपुर क्षेत्र की 62 विधानसभा सीटों के प्रभारी शामिल हुए. इन बैठकों में सामने आए फीडबैक ने पार्टी के सामने एक दूसरी चुनौती भी उजागर की. नेताओं की शिकायत थी कि कार्यकर्ता और पदाधिकारी सरकार के खिलाफ विपक्ष के हमलों का जवाब देने में सक्रिय नहीं हैं.
नौकरशाही का रवैया
BJP के भीतर असंतोष का दूसरा बड़ा कारण सरकार और नौकरशाही के साथ कार्यकर्ताओं के रिश्ते हैं. पार्टी नेताओं की शिकायत है कि स्थानीय स्तर पर सरकारी अधिकारियों और पुलिस प्रशासन के सामने उनकी सुनवाई नहीं होती. 5 अक्टूबर को सुल्तानपुर में संघ के सह-सरकार्यवाह अरुण कुमार की अध्यक्षता में संगठन की बैठक हुई थी.
इसमें अमेठी के BJP नेता और संघ से जुड़े संगठन विद्या भारती के काशी क्षेत्र प्रमुख गोविंद सिंह चौहान ने सवाल उठाया कि अगर स्थानीय नेता पुलिस थानों और सरकारी दफ्तरों में लोगों को न्याय नहीं दिला सकते तो कार्यकर्ता उन पर भरोसा कैसे करेंगे? उन्होंने यह भी सवाल किया कि इलाके में दल-बदलकर BJP में आए नेताओं का इतना प्रभाव क्यों है और सरकारी दफ्तरों में विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं को BJP कार्यकर्ताओं की तुलना में ज्यादा सम्मान क्यों मिल रहा है?
इस बैठक में सामने आए सवाल बताते हैं कि BJP के लिए संगठन और सरकार के बीच तालमेल केवल राजनीतिक नारा नहीं बल्कि जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता से जुड़ा मुद्दा है. अगर कार्यकर्ता अपने समर्थकों और आम लोगों के काम सरकारी कार्यालयों में नहीं करा पा रहे हैं तो चुनाव के समय उनके सामने जवाबदेही का सवाल खड़ा हो सकता है.
इसी तरह 14-15 अक्टूबर की कार्यशाला में BJP के केंद्रीय नेताओं ने विधायकों और जिला पदाधिकारियों की राजनीतिक सक्रियता पर सवाल उठाए. नेताओं का कहना था कि समाजवादी पार्टी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और राज्य सरकार के खिलाफ लगातार हमलावर है लेकिन BJP के विधायक और संगठन के पदाधिकारी उसका प्रभावी जवाब नहीं दे रहे हैं.
पार्टी के एक अंदरूनी सूत्र के मुताबिक बैठक में चर्चा हुई कि सपा कार्यकर्ता अखिलेश यादव की सोशल मीडिया पोस्ट को फैलाने में काफी उत्साहित और आक्रामक दिखते हैं जबकि BJP के नेता मुख्यमंत्री और पार्टी का बचाव करने में अपेक्षाकृत कम सक्रिय हैं. यहां तक कि विधायकों की ओर से अपने करीबियों को जन्मदिन की बधाई देने के लिए सोशल मीडिया पोस्ट तो की जाती हैं लेकिन सरकार और मुख्यमंत्री के खिलाफ विपक्ष के आरोपों का जवाब देने में वे दिलचस्पी नहीं दिखाते. AI से तैयार वीडियो और सोशल मीडिया पर विपक्ष के हमलों को लेकर भी नेताओं की निष्क्रियता पर चिंता जताई गई.
यह स्थिति BJP के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि 2027 का विधानसभा चुनाव केवल सरकार के कामकाज के आधार पर नहीं लड़ा जाएगा. सोशल मीडिया और राजनीतिक नैरेटिव में विपक्ष के आरोपों का जवाब देने के लिए संगठन के हर स्तर पर सक्रियता जरूरी होगी.
पार्टी के सामने चुनौती यह है कि एक ओर कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं दूसरी ओर उनसे सरकार के पक्ष में आक्रामक राजनीतिक अभियान चलाने की अपेक्षा की जा रही है. ऐसे में संगठनात्मक असंतोष और राजनीतिक निष्क्रियता एक-दूसरे को प्रभावित कर सकते हैं.
2024 जैसे झटके का डर!
BJP के लिए उत्तर प्रदेश में संगठनात्मक असंतोष की चिंता की एक बड़ी वजह 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजे भी हैं. प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में BJP की संख्या 2019 के 62 से घटकर 2024 में 33 रह गई थी, जबकि समाजवादी पार्टी ने 37 सीटें जीतकर राज्य में अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया. लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी के भीतर खराब प्रदर्शन के कारणों की समीक्षा में कार्यकर्ताओं की नाराजगी और प्रशासनिक उपेक्षा को प्रमुख वजहों में गिना गया था.
कई नेताओं ने माना था कि सरकारी अधिकारियों के रवैये से नाराज कार्यकर्ताओं ने चुनाव में अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखाई. अब विधानसभा चुनाव से पहले फिर इसी तरह की शिकायतों का सामने आना पार्टी नेतृत्व के लिए चिंता का विषय है.
हाल में हुए विधान परिषद चुनावों के नतीजों ने भी संगठन की बेचैनी बढ़ाई है. 11 सीटों में से पांच पर समाजवादी पार्टी की जीत के बाद BJP के भीतर यह चर्चा तेज हुई कि कार्यकर्ताओं की निराशा और संगठनात्मक कमजोरियां भी पार्टी के प्रदर्शन पर असर डाल रही हैं. पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि अगर कार्यकर्ताओं को समय रहते सम्मान और जिम्मेदारी नहीं मिली तो विधानसभा चुनाव में भी इसका असर दिख सकता है.
हालांकि BJP नेतृत्व ने इस चुनौती से निपटने के लिए संगठनात्मक स्तर पर सक्रियता बढ़ाने का फैसला किया है. पार्टी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी के मुताबिक, अगले कुछ हफ्तों में कार्यकर्ताओं तक पहुंचने और उनकी नाराजगी दूर करने के लिए हर संभव कदम उठाए जाएंगे. यह प्रक्रिया चुनाव की घोषणा से पहले पूरी करने की कोशिश होगी.
पंकज चौधरी ने प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक में कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के सामने चार सवाल रखकर संगठन की कमजोरियों पर आत्ममंथन करने को कहा. क्या हर बूथ पर पार्टी सक्रिय है? क्या बूथ समितियां नियमित रूप से काम कर रही हैं? क्या पदाधिकारी अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं? क्या मंडल, क्षेत्रीय और जिला स्तर के नेता जनता के बीच मौजूद हैं?
उन्होंने विधायकों, सांसदों और एमएलसी से कार्यकर्ताओं के साथ संवाद बढ़ाने और उनकी बात सुनने की अपील भी की. इन सवालों के जरिए पार्टी नेतृत्व ने संकेत दिया कि चुनावी तैयारी का आकलन केवल बैठकों और संगठनात्मक ढांचे की मौजूदगी से नहीं, बल्कि बूथ स्तर पर वास्तविक सक्रियता से किया जाएगा.