यूपी विधानसभा चुनाव से पहले बगावत की आंच में झुलस रहा कमल!
उत्तर प्रदेश में राज्यसभा और विधान परिषद के टिकट से लेकर संगठन में पदों के बंटवारे तक, BJP के भीतर असंतोष के कई चेहरे सामने आ रहे हैं

2022 के चुनाव से पहले भी कई नेताओं ने BJP का साथ छोड़ा था (सांकेतिक तस्वीर)
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सामने विपक्ष की चुनौती तो है ही अपने नेताओं के असंतोष को संभालना भी कम मुश्किल नहीं दिख रहा. राज्यसभा के टिकट से नाराज आंवला के पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप ने पार्टी छोड़ने का ऐलान कर दिया है.
विधान परिषद के गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में टिकट नहीं मिलने पर BJP से बगावत करने वाले डॉ. संजयन त्रिपाठी समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी बन गए. पूर्व केंद्रीय मंत्री कौशल किशोर के परिवार की नाराजगी सामने आई है जबकि कैसरगंज के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह और पूर्व केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान के बयानों ने भी पार्टी के भीतर असहजता बढ़ाई है.
BJP की ताकत का एक बड़ा आधार उसका संगठन, बूथ स्तर तक फैला नेटवर्क और अलग-अलग जातियों व सामाजिक समूहों को साथ लाने की रणनीति रही है. ऐसे में जब चुनावी मैदान में उतरने से पहले ही कुछ प्रभावशाली नेता पार्टी के फैसलों पर सवाल उठाने लगें तो चुनौती केवल उनकी नाराजगी दूर करने की नहीं रह जाती. सवाल यह भी होता है कि क्या असंतोष दूसरे नेताओं और कार्यकर्ताओं तक पहुंचेगा और क्या इसका असर स्थानीय चुनावी समीकरणों पर पड़ेगा.
धर्मेंद्र कश्यप का मामला इसी लिहाज से महत्वपूर्ण है. आंवला लोकसभा सीट से 2014 और 2019 में BJP के टिकट पर सांसद चुने गए कश्यप 2024 का लोकसभा चुनाव हार गए थे. 5 अक्टूबर को BJP की राज्यसभा प्रत्याशियों की सूची जारी होने के बाद 6 अक्टूबर की शाम उन्होंने फेसबुक पर ‘टाटा बाय-बाय’ लिखा.
7 अक्टूबर को उन्होंने पार्टी छोड़ने की घोषणा कर दी. हालांकि उन्होंने किसी दूसरे दल में जाने का ऐलान नहीं किया और कहा कि समर्थकों के साथ बैठक के बाद अगला फैसला करेंगे. कश्यप ने अपनी नाराजगी का कारण बताते हुए कहा कि 2024 के लोकसभा चुनाव में जिन लोगों ने उनकी खुलकर खिलाफत की, वे आज पार्टी में बड़े पदों पर हैं.
कश्यप के मुताबिक ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होने से उनके जैसे नेताओं के लिए पार्टी छोड़ना स्वाभाविक है. उन्होंने किसी नेता का नाम नहीं लिया इसलिए उनकी नाराजगी को केवल राज्यसभा का टिकट नहीं मिलने से जोड़ना अधूरा होगा. उनके बयान का दूसरा पहलू यह है कि वे संगठन में पद और प्रतिष्ठा के बंटवारे को लेकर सवाल उठा रहे हैं.
कश्यप की राजनीतिक यात्रा भी इस घटनाक्रम को अहम बनाती है. वे 2002 में बहुजन समाज पार्टी (BSP) के टिकट पर बिथरी चैनपुर से विधायक बने और 2007 में सपा के टिकट पर विधानसभा पहुंचे. मुलायम सिंह यादव सरकार में दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री रहे कश्यप 2013 के आखिर में BJP में शामिल हो गए थे. इसके बाद दो बार लोकसभा चुनाव जीतकर उन्होंने आंवला में अपनी राजनीतिक जमीन बनाई.
अब उनका अगला कदम क्या होगा, यह स्पष्ट नहीं है. हालांकि 8 अक्टूबर की देर शाम बरेली में सपा के चिकित्सा प्रकोष्ठ के जिलाध्यक्ष डॉ. अनीस बेग के जन्मदिन समारोह में उनकी मौजूदगी ने सपा में जाने की अटकलें बढ़ा दी हैं. सपा नेताओं का कहना है कि यह निजी समारोह था, इसे राजनीतिक अर्थ नहीं दिया जाना चाहिए.
कश्यप अपनी बेटी कीर्ति कश्यप को भी राजनीति में लाने की तैयारी कर रहे हैं. उन्होंने दावा किया है कि वे जहां से चाहेंगे वहां से उनकी बेटी को टिकट मिलेगा, हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि किस दल से! ओबीसी समुदाय से आने वाले कश्यप के अगले कदम पर इसलिए भी नजर में रहेगी क्योंकि रुहेलखंड की राजनीति में पिछड़े वर्गों के मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण है.
संजयन त्रिपाठी ने भी दिखाए तेवर
BJP के भीतर असंतोष का दूसरा उदाहरण विधान परिषद के गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से सामने आया. यहां मौजूदा एमएलसी ध्रुव कुमार त्रिपाठी को BJP का समर्थन मिलने से नाराज डॉ. संजयन त्रिपाठी ने पहले निर्दलीय नामांकन किया और फिर समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी बन गए. एक अक्टूबर को नामांकन के बाद उन्होंने अपनी गाड़ी से BJP का झंडा उतारकर पार्टी से दूरी का संकेत दिया.
तीन अक्टूबर को लखनऊ में अखिलेश यादव की प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनके बगल में बैठने के साथ ही यह साफ हो गया था कि उनकी राजनीतिक राह अब सपा के साथ होगी. इस घटनाक्रम ने BJP के असंतुष्ट नेता को अपने पाले में लाने की सपा की रणनीति भी सामने रखी.
चर्चा है कि पूर्व विधायक विनय शंकर तिवारी ने संजयन त्रिपाठी की अखिलेश यादव से मुलाकात कराने और उन्हें टिकट दिलाने में अहम भूमिका निभाई. सपा ने अपने पहले घोषित प्रत्याशी कमलेश यादव की जगह संजयन को उम्मीदवार बनाया. यानी BJP से टिकट नहीं मिलने पर शुरू हुई नाराजगी को सपा ने अपने चुनावी अवसर में बदलने की कोशिश की.
संजयन त्रिपाठी ने कहा कि जिस पार्टी में उन्होंने वर्षों तक काम किया, उसने उनका तिरस्कार किया, जबकि सपा ने उन्हें अपनाने के साथ प्रत्याशी भी बनाया. उनके समर्थकों ने ‘घायल हूं, इसलिए घातक हूं’ जैसे नारों के जरिए उनकी राजनीतिक ताकत दिखाने की कोशिश की.
BJP के लिए इस घटनाक्रम का महत्व इसलिए भी है कि विधान परिषद चुनाव में टिकट वितरण को लेकर असंतोष खुलकर सामने आया और विपक्ष को संगठन के भीतर की नाराजगी को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने का मौका मिला. हालांकि पार्टी ने संजयन के आरोपों को नहीं माना है.
पार्टी के क्षेत्रीय अध्यक्ष विनोद राय ने कहा कि टिकट मांगने वाले कई लोग होते हैं लेकिन प्रत्याशी एक ही बन सकता है. उनके मुताबिक संजयन को पार्टी के उम्मीदवार का साथ देना चाहिए था और उनका पार्टी छोड़ना साबित करता है कि वे स्वार्थ के लिए BJP में थे.
राय ने दावा किया कि BJP का प्रत्याशी मजबूती से चुनाव लड़ रहा है और परिणाम आने पर सपा प्रत्याशी का कहीं पता नहीं चलेगा. यह प्रतिक्रिया BJP की उस दलील को सामने रखती है कि संगठन में हर दावेदार को टिकट देना संभव नहीं है और पार्टी का निर्णय व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर होना चाहिए.
लेकिन चुनौती यह है कि टिकट से वंचित नेता को संगठन में बनाए रखने और उसके समर्थकों को साथ रखने के लिए क्या व्यवस्था की जाती है. संजयन के मामले में नाराजगी के बाद सपा का टिकट मिलना बताता है कि विपक्ष ऐसे अवसरों को हाथ से जाने देने के मूड में नहीं है.
2022 की बगावत की याद
BJP के लिए विधानसभा चुनाव से पहले नेताओं की नाराजगी कोई नई स्थिति नहीं है. 2022 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भी पार्टी को इसी तरह के विद्रोह का सामना करना पड़ा था. तब योगी आदित्यनाथ सरकार के मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने 11 जनवरी, 2022 को मंत्रिमंडल और BJP से इस्तीफा दे दिया था.
मौर्य ने पिछड़े वर्गों और वंचितों की उपेक्षा का आरोप लगाया. अगले दिन वन एवं पर्यावरण मंत्री दारा सिंह चौहान ने भी इस्तीफा दे दिया. इसके बाद धर्म सिंह सैनी समेत कई विधायकों ने पार्टी छोड़ी और समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए. सपा ने इसे पिछड़े वर्गों की उपेक्षा का मुद्दा बनाकर पेश किया था और BJP से आए नेताओं के जरिए गैर-यादव ओबीसी मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश की थी.
BJP के सामने तब भी दोहरी चुनौती थी. एक ओर पार्टी को नेताओं के आरोपों का जवाब देना था, दूसरी ओर यह सुनिश्चित करना था कि इन नेताओं के जाने से उनके समर्थकों का बड़ा हिस्सा भी विपक्ष के साथ न चला जाए. पार्टी के भीतर से यह तर्क भी दिया गया कि कुछ नेताओं की नाराजगी का संबंध टिकट मिलने की संभावना और परिवार के सदस्यों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा से था.
यानी नेताओं ने जहां सामाजिक न्याय और सम्मान की बात उठाई वहीं BJP के कुछ नेताओं ने उनके फैसलों को व्यक्तिगत हितों से जोड़कर देखा. राजनीतिक विश्लेषक सुशील पांडेय बताते हैं, “2022 का अनुभव यह भी बताता है कि बगावत और चुनावी नतीजों के बीच सीधा संबंध मान लेना सही नहीं है. BJP ने उस चुनाव में सत्ता बरकरार रखी थी. इसलिए मौजूदा घटनाक्रमों को भी केवल नेताओं के पार्टी छोड़ने की संख्या से नहीं बल्कि उनके सामाजिक प्रभाव, स्थानीय संगठन पर पकड़ और मतदाताओं के बीच स्वीकार्यता से परखना होगा.”
बागी सुर और भी हैं
BJP के भीतर असंतोष की चर्चा धर्मेंद्र कश्यप और संजयन त्रिपाठी तक सीमित नहीं है. पूर्व केंद्रीय मंत्री और मोहनलालगंज के पूर्व सांसद कौशल किशोर के परिवार की नाराजगी भी सामने आई है. राज्यसभा में जगह नहीं मिलने के बाद उनके बेटे विकास किशोर ने सोशल मीडिया पर लिखा कि जहां मां-बाप का सम्मान न हो, वहां नहीं रहना चाहिए.
इस टिप्पणी को कौशल किशोर की राजनीतिक उपेक्षा से जोड़कर देखा गया, हालांकि इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वे या उनका परिवार BJP छोड़ने जा रहा है. दलित समुदाय से आने वाले कौशल किशोर का राजनीतिक महत्व उनके संसदीय क्षेत्र और सामाजिक संपर्कों से जुड़ा है.
कैसरगंज के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह भी कई अवसरों पर अपने बयानों से चर्चा में रहे हैं. वे पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की तारीफ कर चुके हैं और उनके कुछ बयानों को BJP के प्रति असहजता के संकेत के रूप में देखा गया है.
इसी तरह पूर्व केंद्रीय मंत्री और मुजफ्फरनगर के पूर्व सांसद संजीव बालियान अधिकारियों के व्यवहार और प्रदेश सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठा चुके हैं. बालियान का यह कहना कि विधानसभा चुनाव में BJP और सपा के बीच कड़ा मुकाबला होगा, पार्टी के भीतर चुनावी चुनौतियों को लेकर उनकी राय को सामने लाता है.
बालियान मुख्यमंत्री योगी और जयंत चौधरी की बढ़ती नजदीकियों से खुद को असहज पा रहे हैं. सुशील पांडेय कहते हैं, “इन नेताओं के मामलों में एक समानता जरूर दिखती है. अलग-अलग कारणों से संगठन, सरकार या टिकट वितरण को लेकर असंतोष सार्वजनिक मंच पर आ रहा है. लेकिन सभी मामलों को एक ही तराजू पर तौलना ठीक नहीं होगा.”
अब BJP के सामने असली परीक्षा यह है कि वह इन अलग-अलग असंतोषों को एक साझा राजनीतिक मुद्दा बनने से कैसे रोकती है. अगर टिकट और पदों को लेकर नाराजगी अलग-अलग क्षेत्रों में सीमित रहती है तो उसका चुनावी असर सीमित हो सकता है. लेकिन यदि इन मामलों को विपक्ष पिछड़े, दलित और दूसरे सामाजिक समूहों के प्रतिनिधित्व से जोड़ने में सफल रहा तो पार्टी के लिए चुनौती बढ़ सकती है.
इन घटनाक्रमों की अहमियत इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि 2027 का चुनाव केवल सरकार के कामकाज ही नहीं, बल्कि स्थानीय नेतृत्व, उम्मीदवारों की स्वीकार्यता और जातीय समीकरणों की भी परीक्षा होगा.