जेन-ज़ी के आक्रोश पर सवार होकर ठाकरे बंधु राजनीतिक वापसी कर पाएंगे?
2024 के बाद लगातार चुनावी झटकों और नगर निकाय चुनावों में कमजोर पड़ते मराठी आधार के बीच शिवसेना (UBT) और MNS के सामने अब अस्तित्व बचाने की लड़ाई है

‘विराट गर्जना मोर्चा’ में राज और उद्धव ठाकरे
2024 के बाद लगातार चुनावी झटकों, हार और नेताओं के पाला बदलने के बीच ठाकरे बंधु महाराष्ट्र में जमीनी स्तर पर अपना समर्थन मजबूत करने के लिए Gen Z के गुस्से पर भरोसा कर रहे हैं.
4 अक्टूबर को शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के अध्यक्ष उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के अध्यक्ष राज ठाकरे ने निर्वाचन आयोग (EC) के खिलाफ मुंबई में मोर्चा निकालकर पार्टी कार्यकर्ताओं को जुटाया.
मेट्रो सिनेमा से आजाद मैदान तक करीब आधा किलोमीटर के रास्ते पर निकाले गए ‘विराट गर्जना मोर्चा’ में ठाकरे बंधुओं ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की.
यह मोर्चा ज्ञानेश कुमार और दो अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सामने आए कथित मतभेदों की पृष्ठभूमि में निकाला गया. SIR के चलते देशभर में मतदाता सूचियों से लाखों नाम हटाए गए हैं.
इस मोर्चे में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) यानी NCP (SCP) के नेता भी शामिल हुए. दोनों दल महा विकास अघाड़ी (MVA) में शिवसेना (UBT) के सहयोगी हैं.
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) पहले ही 2 अक्टूबर यानी गांधी जयंती के दिन मुंबई के शिवाजी पार्क में प्रदर्शन कर CEC के इस्तीफे की मांग कर चुकी है.
राज ठाकरे ने महाराष्ट्र में SIR को खत्म करने और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) की जगह बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग की. इससे पहले भी MNS प्रमुख यह सवाल उठा चुके हैं कि जब भी निर्वाचन आयोग के कामकाज पर सवाल उठते हैं तो सत्तारूढ़ BJP के नेता आयोग के बचाव में इतनी जल्दी क्यों उतर आते हैं.
राज ने इस दावे का भी जिक्र किया कि SIR का एक प्रमुख मकसद मतदाता सूचियों से बांग्लादेशी घुसपैठियों को हटाना है. उन्होंने पूछा कि अब तक इनमें से कितने अवैध प्रवासियों का पता चला है.
यह विरोध शिवसेना (UBT) और MNS के सामने आए लगातार झटकों के बाद हुआ है. 2024 के लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र की 48 में से 31 सीटों पर MVA ने जीत हासिल की थी. लेकिन इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में गठबंधन को करारी हार का सामना करना पड़ा.
महायुति यानी BJP, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना और NCP के गठबंधन ने 288 में से 237 विधानसभा सीटें जीतीं. MNS को भी बड़ा झटका लगा जब राज ठाकरे के बेटे अमित ठाकरे माहिम सीट से शिवसेना (UBT) के उम्मीदवार से हार गए.
राजनीतिक मजबूरी ने दोनों राजनीतिक रूप से दूर हो चुके चचेरे भाइयों को पिछले जुलाई में मतभेद भुलाकर साथ आने के लिए मजबूर किया. इसके लिए महायुति सरकार के उस फैसले को मुद्दा बनाया गया जिसमें राज्य के सरकारी स्कूलों में पहली कक्षा से हिंदी को तीसरी भाषा बनाने की योजना थी. भाषा कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों ने इस फैसले पर सवाल उठाए थे.
हालांकि इस साल हुए बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) चुनाव में दोनों दल BJP-शिंदे सेना से हार गए. इसे दोनों ठाकरे-नेतृत्व वाली पार्टियों के लिए करो या मरो की लड़ाई के तौर पर देखा गया था.
इसके बाद जून में शिवसेना (UBT) के नौ सदस्यीय लोकसभा दल के छह सांसद पार्टी से अलग होकर शिंदे की शिवसेना में शामिल हो गए. इनमें संजय उर्फ बंडू जाधव (परभणी), संजय देशमुख (यवतमाल-वाशिम), नागेश पाटील आष्टिकर (हिंगोली), भाऊसाहेब वाकचौरे (शिरडी), ओमराजे निंबालकर (उस्मानाबाद) और संजय दीना पाटील (मुंबई उत्तर पूर्व) शामिल हैं.
अब इस बात को लेकर अटकलें हैं कि क्या शिंदे महाराष्ट्र विधानसभा में शिवसेना (UBT) के 21 सदस्यों वाले विधायक दल को भी इसी तरह तोड़ पाएंगे. इसके अलावा BMC में उसके पार्षदों के दल को लेकर भी ऐसी ही अटकलें हैं.
BMC देश का सबसे अमीर नगर निकाय है. माना जाता है कि शिंदे की नजर मुंबई के मेयर पद पर अपने उम्मीदवार को बैठाने पर है. मौजूदा मेयर ऋतु तावड़े का कार्यकाल 2028 के मध्य में खत्म होगा.
पहले से ही विधान परिषद सदस्य और पूर्व मंत्री सचिन अहीर, जिन्हें उद्धव के बेटे आदित्य ठाकरे के करीबी माना जाता है, शिंदे के साथ जा चुके हैं. अब वे राज्य विधान परिषद के उपसभापति हैं.
सेना (UBT) के नेता मानते हैं कि उनकी पार्टी और MVA अभी तक विधानसभा चुनाव में मिले हार की झटके से उबर नहीं पाए हैं. इस साल हुए स्थानीय निकाय चुनावों में सेना (UBT) के नेतृत्व ने अपना पूरा ध्यान सिर्फ मुंबई पर रखा. इससे पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता दूसरे बेहतर विकल्प तलाशने लगे.
अविभाजित शिवसेना की छात्र इकाई भारतीय विद्यार्थी सेना के एक पूर्व कार्यकर्ता, जिसका बाद में युवा सेना में विलय हो गया, ने कहा कि शिवसेना (UBT) के कमजोर पड़ने की बड़ी वजह संगठन के तौर पर उसकी धार का खत्म होना है. उनके मुताबिक पार्टी अब एक सामान्य राजनीतिक दल जैसी हो गई है.
ठाकरे बंधुओं के सामने मुंबई की बदलती जनसांख्यिकी भी चुनौती है. 1960 में जब महाराष्ट्र का गठन हुआ था तब मुंबई की आबादी में मराठी लोगों की हिस्सेदारी करीब 45 फीसदी थी. अब यह करीब 35 फीसदी रह गई है.
अनुमान है कि शहर में महंगे होते रियल एस्टेट और तेजी से बदलता सामाजिक ढांचा मराठी कामकाजी वर्ग को हाशिये की ओर धकेल रहा है. यही वर्ग शिवसेना का मुख्य समर्थन आधार रहा है. राजनीतिक हिंदुत्व के उभार ने भी कुछ मराठी मतदाताओं को BJP और शिंदे की शिवसेना की ओर जाने के लिए प्रेरित किया है.
हालांकि शिवसेना (UBT) और MNS का नेतृत्व अब CJP की ओर से CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ शुरू किए गए आंदोलन के जरिए अपना जमीनी समर्थन मजबूत करने की कोशिश कर रहा है. उद्धव ने कहा है कि वे 2 अक्टूबर से मुंबई में शुरू हुए CJP के प्रदर्शन का समर्थन करेंगे.
जुलाई में ठाकरे बंधुओं ने राष्ट्रीय चिकित्सा प्रवेश परीक्षा (NEET) पेपर लीक के मुद्दे पर दादर में संयुक्त प्रदर्शन किया था. दिल्ली में CJP के नेतृत्व में जंतर-मंतर पर हुए आंदोलन के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद इस प्रदर्शन को ‘विजय मार्च’ में बदल दिया गया था.