गोवा चुनाव से पहले गौली-धनगरों का आदिवासी दर्जा बीजेपी के लिए क्यों बना बड़ा मुद्दा?

मतदाताओं की संख्या कम होने के कारण गौली-धनगर समुदाय गोवा विधानसभा चुनाव में अहम भूमिका निभाता है. समुदाय ने एसटी दर्जे की मांग दोहराते हुए सरकार को 15 अगस्त तक का अल्टीमेटम दिया है.

चुनाव से पहले गौली-धनगर समुदाय आदिवासी दर्जा मांग रहे हैं
चुनाव से पहले गौली-धनगर समुदाय आदिवासी दर्जा मांग रहे हैं

गोवा में विधानसभा चुनाव से पहले सत्तारूढ़ बीजेपी के लिए गौली-धनगर समुदाय की अनुसूचित जनजाति (एसटी) दर्जे की मांग एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गई है. इन समुदायों ने अपनी दशकों पुरानी मांग को लेकर आंदोलन तेज कर दिया है और डॉ. प्रमोद सावंत सरकार को 15 अगस्त तक का अल्टीमेटम दिया है.

गोवा विधानसभा चुनाव 2027 की शुरुआत में होने हैं लेकिन अटकलें लगाई जा रही हैं कि समय से पहले भी चुनाव कराए जा सकते हैं. भारत के रजिस्ट्रार जनरल और केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय पहले ही गौली-धनगरों को एसटी सूची में शामिल करने की मांग खारिज कर चुके हैं.

मार्च में रजिस्ट्रार जनरल के कार्यालय ने कहा कि यह समुदाय अभी भी केंद्र की अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) सूची में 'धनगर' के रूप में दर्ज है और दोबारा विचार करने के लिए कोई नया तथ्य या आंकड़ा प्रस्तुत नहीं किया गया.

गोवा में आदिवासी आबादी लगभग 1,49,275 है, जो राज्य की कुल आबादी का करीब 10.23 प्रतिशत है. इसमें रोमन कैथोलिक ईसाई भी शामिल हैं. आदिवासी समुदायों को गोवा का मूल निवासी माना जाता है. उत्तरी गोवा में लगभग 56,606 आदिवासी रहते हैं, जो वहां की आबादी का 6.9 प्रतिशत हैं. वहीं दक्षिण गोवा में 92,669 आदिवासी हैं, जो वहां की आबादी का 14.47 प्रतिशत हैं. राज्य में गौली-धनगर समुदाय की आबादी लगभग 25,000 मानी जाती है.

राजधानी पणजी और ओल्ड गोवा वाले तिसवाड़ी तालुका को छोड़कर यह समुदाय लगभग सभी तालुकाओं में मौजूद है. गोवा की विधानसभा सीटों में कुल मतदाताओं की संख्या अपेक्षाकृत कम होने के कारण यह समुदाय चुनावी नतीजों पर असर डाल सकता है. उदाहरण के लिए, 2022 के चुनाव में मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने सांकेलिम सीट पर कांग्रेस के धर्मेश सगलानी को केवल 666 वोटों से हराया था.

1980 के दशक में गौड़ा, वेलीप, कुंबी और धनगर समुदायों ने 'मुल गोयंकारांचो एकवोट' नाम से आंदोलन शुरू किया था और खुद को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग की थी. वर्ष 2003 में गौड़ा, वेलीप और कुंबी समुदायों को एसटी सूची में शामिल कर लिया गया लेकिन पारंपरिक पशुपालक और जंगलों में रहने वाले धनगर समुदाय को इससे बाहर रखा गया. एसटी सूची में डुबला, सिद्दी, नाइकड़ा, वरली और धोड़िया जैसे छोटे जनजातीय समुदाय शामिल हैं.

गोमांतक धनगर समाजोन्नति मंडल के एक नेता ने कहा, "हम पिछले 23 वर्षों से एसटी दर्जे की मांग कर रहे हैं. यह हमारे लिए अब या कभी नहीं वाली लड़ाई है." समुदाय के नेताओं ने गांव-गांव जाकर जनसंपर्क अभियान शुरू किया है और सरकार को 15 अगस्त तक मांग पूरी करने की समय-सीमा दी है.
यूनाइटेड ट्राइबल एसोसिएशंस अलायंस (यूटीएए) के उपाध्यक्ष रविंद्र वेलीप का कहना है, "गौली-धनगरों की मांग पूरी तरह जायज है और 1980 के दशक से उठाई जा रही है."

यूटीएए के संयोजक और आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता गोविंद शिरोडकर का मानना है कि बीजेपी इस मुद्दे पर इसलिए असमंजस में है क्योंकि बीजेपी शासित महाराष्ट्र में भी धनगर समुदाय एसटी दर्जे की मांग कर रहा है, जिसका वहां के आदिवासी समुदाय विरोध कर रहे हैं.

शिरोडकर कहते हैं कि यदि गोवा के गौली-धनगरों को एसटी दर्जा मिलता है तो महाराष्ट्र में भी ऐसी मांग और तेज होगी. हालांकि उनका कहना है कि यदि गौली-धनगर एसटी के सभी मानकों पर खरे उतरते हैं तो उन्हें यह दर्जा मिलना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि एसटी का दर्जा क्षेत्र विशेष के आधार पर दिया जाता है, इसलिए गोवा का फैसला महाराष्ट्र पर लागू नहीं होगा.

गोवा के आदिवासी समुदाय पहले से ही राजनीतिक आरक्षण लागू होने में हो रही देरी से नाराज हैं. यदि राजनीतिक आरक्षण लागू होता है तो 40 सदस्यीय विधानसभा की चार सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हो सकती हैं.

माना जाता है कि आदिवासी समुदाय की नाराजगी का असर 2024 के लोकसभा चुनाव में दक्षिण गोवा सीट पर देखने को मिला, जहां बीजेपी की पल्लवी डेम्पो को कांग्रेस के कैप्टन विरियातो फर्नांडिस (सेवानिवृत्त) ने हराया था.

प्रियोल, नुवेम, केपेम, सांगेम और वेलिम विधानसभा क्षेत्रों में आदिवासी मतदाताओं की संख्या काफी है. हालांकि नौकरियों और शिक्षा में अनुसूचित जनजातियों को 12.5 प्रतिशत तथा अनुसूचित जातियों को 2 प्रतिशत आरक्षण मिलता है, लेकिन विधानसभा में अभी तक एसटी समुदाय को राजनीतिक आरक्षण नहीं मिला है. अनुसूचित जाति के लिए केवल एक सीट पेरनेम आरक्षित है, जहां बीजेपी के प्रवीण आर्लेकर विधायक हैं.

गोवा में अनुसूचित जनजातियों को राजनीतिक आरक्षण देने वाला विधेयक अगस्त 2025 में संसद से पारित हो गया था. लेकिन एक साल बाद भी केंद्र सरकार ने इसे लागू करने के लिए अधिसूचना जारी करने जैसे जरूरी कदम नहीं उठाए हैं.

इस बीच राज्य सरकार ने नुकसान की भरपाई की कोशिशें तेज कर दी हैं. जनजातीय विकास मंत्री रमेश तवडकर ने कहा कि आदिवासी समुदायों ने कभी भी धनगरों को एसटी सूची में शामिल करने का विरोध नहीं किया. उन्होंने कहा कि धनगर समुदाय को इस आरक्षण की अधिक जरूरत है.

मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने जून में केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री जुएल ओराम को पत्र लिखकर रजिस्ट्रार जनरल के फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की थी. उन्होंने लिखा, "हम समुदाय की विशिष्ट सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए इस निर्णय की समीक्षा का आग्रह करते हैं. जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा गोवा सरकार के प्रस्ताव को खारिज करना इस समुदाय के लिए बड़ा झटका है. यह बेहद निराशाजनक है कि आदिवासी समुदायों के संरक्षण और विकास के लिए बनाई गई संस्था ने दशकों पुरानी इस मांग को बिना पर्याप्त विचार के खारिज कर दिया, जिससे समुदाय का न्याय पाने का संघर्ष अधर में लटक गया है."

अपने पत्र में सावंत ने यह भी लिखा कि "1963 में गोवा सरकार ने सबसे पहले गौली-धनगर समुदाय को एसटी सूची में शामिल करने की सिफारिश की थी. वर्ष 1992 में भी गोवा सरकार ने केवल गौली-धनगर समुदाय को एसटी घोषित करने की मांग की थी. इसके बाद 1993 में गौड़ा, कुंबी और वेलीप समुदायों के लिए अलग प्रस्ताव भेजा गया."

सावंत ने कहा कि गौली-धनगर समुदाय में आदिम जीवन शैली, विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक अलगाव, अलग-थलग बस्तियां, बाहरी समाज से सीमित संपर्क और सामान्य सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन जैसी विशेषताएं मौजूद हैं. उन्होंने कहा, "रजिस्ट्रार जनरल ने इन ठोस और शोध आधारित तथ्यों को नजरअंदाज कर दिया. इस फैसले से समुदाय के साथ ऐतिहासिक अन्याय जारी है और उन्हें एसटी दर्जे के साथ मिलने वाले संवैधानिक अधिकारों और संरक्षण से वंचित रखा जा रहा है."

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