खुदाई में मिला महाराष्ट्र का 2,000 साल पुराना रोम कनेक्शन
अहिल्यानगर जिले में हुई खुदाई से करीब 2,000 साल पहले महाराष्ट्र क्षेत्र में रहने वाले लोगों के खानपान की आदतों के बारे में पता चला है

पुणे के दक्कन कॉलेज पोस्ट ग्रेजुएट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट के पुरातत्वविदों ने सातवाहन राजवंश के समय की एक बड़ी व्यापारिक बस्ती (सेटलमेंट) की खोज की है. इस खोज से भारत के प्राचीन रोम के साथ व्यापारिक संबंधों के प्रमाण मिले हैं. साथ ही, करीब 2,000 साल पहले महाराष्ट्र क्षेत्र में रहने वाले लोगों के खानपान की आदतों की भी जानकारी मिली है.
उत्तरी महाराष्ट्र के कोतुल गांव में हुई खुदाई से पता चला है कि उस समय के लोग मांस और चावल के अलावा काकुन, सामक, उड़द, मूंग और कुल्थी जैसे अनाज भी खाते थे. कोतुल गांव अहिल्यानगर जिले के अकोले तालुका में स्थित है. यह सह्याद्रि पर्वतमाला में कालसूबाई, हरिश्चंद्रगढ़ और रतनगढ़ जैसी चोटियों की तलहटी में बसा है.
'कोतुल' नाम कोतुलेश्वर के मंदिर से लिया गया है जो मूला नदी के किनारे स्थित भगवान शिव का मंदिर है. पुरातत्वविदों का नेतृत्व दक्कन कॉलेज पोस्ट-ग्रेजुएट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट में पुरातत्व विभाग के प्रोफेसर पांडुरंग साबले ने किया था.
उन्होंने इस स्थल पर खुदाई की, जिसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह सातवाहन काल के व्यापारिक मार्ग पर स्थित था और जुन्नार और नासिक के दो प्राचीन व्यापारिक केंद्रों को जोड़ता था.
साबले ने कहा कि कोतुल, कोंकण से कोल्हापुर, कराड, शिरवल, लोनावला, जुन्नार, ओतूर, कोथुल, सिन्नर और नासिक तक जाने वाले व्यापारिक मार्ग का भी हिस्सा रहा होगा. इस मार्ग पर भाजा जैसी गुफाएं हैं, जिनका इस्तेमाल यात्री ठहरने के लिए करते थे. यहां से नासिक से भरूच बंदरगाह तक पहुंचा जा सकता था.
कोतुल में हुई खुदाई में रोमन एम्फोरा (बड़े मिट्टी के बर्तन) के टुकड़े मिले हैं, जिनका इस्तेमाल आमतौर पर शराब, मिट्टी के बर्तन और अन्य सामग्री को रखने के लिए किया जाता था. इससे रोम के साथ इसके व्यापारिक संबंधों का पता चलता है. साबले जानकारी देते हैं, "वहां आयातित शराब का सेवन किया जाता था या फिर उसे इस मार्ग से ले जाया जाता था." सातवाहन काल में इस क्षेत्र के कपड़े, मसाले, हाथीदांत और कलाकृतियों की रोम और अन्य देशों में काफी मांग थी.
खुदाई में मिट्टी के बर्तन, टेराकोटा की मूर्तियां, पूरी तरह तैयार और अधूरी टेराकोटा की गेंदें, पहिए, चूड़ियों के टुकड़े, शंख से बनी वस्तुएं, कार्नेलियन और अगेट जैसे अर्ध-कीमती पत्थरों से बनी वस्तुएं, हड्डी से बनी वस्तुएं, एक सिक्का, धातु की वस्तुएं और समुद्री शंख भी मिले हैं.
इस खुदाई से वहां रहने वाले लोगों के खानपान की आदतों के बारे में भी रोचक जानकारी मिली है. 2021-22 में साबले ने गुरुदास शेटे, सतीश नाइक, सचिन जोशी, पंकज गोयल, प्रतीक चक्रवर्ती, निलेश जाधव, शांतनु वैद्य, अमित पेंडम, सुमित जाधव, विनय के. और अभिलाषा मिश्रा के साथ मिलकर यह खुदाई की थी. खुदाई की शुरुआती रिपोर्ट में कहा गया है, "कोतुल के प्राचीन निवासी स्टार्च से भरपूर अनाज जैसे चावल, बाजरा की विभिन्न किस्में जैसे हरा/पीला फॉक्सटेल बाजरा, कोदो, कुटकी और सांवा तथा प्रोटीन से भरपूर दालें जैसे उड़द, मूंग, मटर और कुल्थी खाते थे." इसके अलावा बेर के बीज भी इस स्थल से मिले हैं.
खुदाई में जानवरों के कंकाल के अवशेष भी मिले हैं. रिपोर्ट में कहा गया है, "अधिकांश हड्डियां गाय और भैंस की हैं, जबकि कुछ बकरी और भेड़ की भी हैं. जानवरों के अवशेषों में घोड़े की प्रजाति से जुड़ी कुछ हड्डियां भी मिली हैं. इसके अलावा पालतू सूअर और कुत्ते की हड्डियां भी हैं.
स्थल पर बहुत कम जंगली जानवरों के अवशेष मिले. नीलगाय और भारतीय खरगोश जैसे कुछ जंगली स्तनधारी जानवरों के प्रमाण भी मिले हैं. पक्षियों, मछलियों की हड्डियां भी मिली है. मीठे पानी के शंख, शंख की चूड़ियां और आंशिक रूप से तराशा गया एक शंख भी मिला जो शायद कच्चे माल के रूप में उपयोग किया जाता था."
साबले ने कहा, "खुदाई में हमें मिट्टी के बर्तनों की तुलना में जानवरों की हड्डियां अधिक मिलीं. इससे पता चलता है कि वे गाय, भैंस जैसे पालतू और दूध देने वाले पशु पालते थे तथा कुत्ते और घोड़े भी रखते थे." उन्होंने कहा कि वहां के लोगों का भोजन शाकाहारी और मांसाहारी दोनों तरह का था. वे शिकार और पालतू जानवरों से मांस प्राप्त करते थे. वे हरी पत्तेदार सब्जियां भी खाते थे.
साबले ने कहा, "आज भी इस गांव में बड़ी संख्या में दूध देने वाले पशु और मवेशी हैं और पूरे तालुका में सबसे ज्यादा दूध संग्रह यहीं होता है." उन्होंने कहा, "हमने केवल एक हिस्से की खुदाई की है. यदि बड़े क्षेत्र में खुदाई की जाए तो और भी कई पुरावशेष मिल सकते हैं."
पुरातात्विक लिहाज से अहिल्यानगर जिला महत्वपूर्ण माना जाता है और इस पर कई पुरातत्वविदों तथा शोधकर्ताओं ने अध्ययन किया है. भारतीय पुरातत्व के प्रमुख विद्वान एच. डी. सांकलिया ने 1950-51 में संगमनेर तालुका के जोरवे में खुदाई की और एक विशिष्ट ताम्रपाषाण संस्कृति की खोज की, जिसे 'जोरवे संस्कृति' कहा जाता है.
वहीं प्रवरा नदी के किनारे बसे दायमाबाद पर शंकरराव साली सहित कई पुरातत्वविदों ने अध्ययन कर खुदाई की. यह जगह 45 सेंटीमीटर लंबे कांस्य रथ के लिए प्रसिद्ध है, जिसमें दो बैल जुड़े हुए हैं और एक व्यक्ति खड़े होकर रथ चला रहा है. यह रथ 1974 में एक किसान को खेत के टीले में अन्य वस्तुओं के साथ मिला था.
शुरुआत में इसे हड़प्पा काल का माना गया लेकिन इसकी तिथि को लेकर सहमति नहीं बनने पर 1978 में दोबारा खुदाई की गई. इसमें 1900 ईसा पूर्व से 1700 ईसा पूर्व तक के तीन चरण मिले. पुरातत्वविद शांताराम भालचंद्र देव ने अपनी किताब 'महाराष्ट्राचा इतिहास : प्रागैतिहासिक महाराष्ट्र-खंड पहला, भाग 1' में लिखा है कि इन खुदाइयों से तापी-गोदावरी क्षेत्र में दायमाबाद और विकसित हड़प्पा संस्कृति के बीच संबंधों का पता चलता है.
दायमाबाद को सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे दक्षिणी सीमा माना जाता है. बी. पी. बोपर्डीकर ने 1954-55 में जिले के मुला बेसिन के घारगांव और पालशी तथा हंगा नदी बेसिन के सुल्तानपुर और हंगा जैसी जगहों पर मुख्य रूप से खुरचने वाले पत्थर के औजारों की खोज की.