CAG ने बताया TMC सरकार में बंगाल के स्कूल क्यों हुए बदहाल?

TMC सरकार के दौरान पश्चिम बंगाल की स्कूल व्यवस्था में कई स्तरों पर खामियां सामने आईं. CAG की रिपोर्ट में फंड के इस्तेमाल से लेकर शिक्षकों और बच्चों की पढ़ाई तक गंभीर सवाल उठाए गए हैं

CAG ने 2019-20 से 2023-24 के बीच ऑडिट किया है (फोटो : देबज्योति चक्रवर्ती)

पश्चिम बंगाल में केंद्र सरकार की तरफ से चलने वाली समग्र शिक्षा योजना के क्रियान्वयन में आवंटित फंड, उपलब्ध कराई जाने वाली बुनियादी सुविधाओं और बच्चों के शैक्षणिक नतीजों के बीच बड़ा अंतर सामने आया है. 

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने कमजोर योजना, फंड के खराब इस्तेमाल, शिक्षकों की भारी कमी, विशेष जरूरत वाले बच्चों के लिए अपर्याप्त सुविधाओं और कमजोर निगरानी को लेकर सवाल उठाए हैं.

यह ऑडिट 2019-20 से 2023-24 तक की अवधि को कवर करता है, जब राज्य में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सरकार थी. ऑडिट जुलाई 2024 से मार्च 2025 के बीच किया गया. इसमें राज्य, जिला और ब्लॉक स्तर के रिकॉर्ड की जांच की गई. 

इसके अलावा छह जिलों- बांकुड़ा, पुरुलिया, दक्षिण दिनाजपुर, उत्तर दिनाजपुर, पश्चिम मेदिनीपुर और मुर्शिदाबाद के रिकॉर्ड की विस्तृत जांच की गई. 18 ब्लॉक के 72 स्कूलों को भी रैंडम तरीके से जांच के लिए चुना गया.

यह रिपोर्ट इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि समग्र शिक्षा योजना में प्री-प्राइमरी से लेकर सीनियर सेकेंडरी तक लगभग पूरी स्कूल शिक्षा व्यवस्था शामिल है. इसका उद्देश्य बच्चों की स्कूल तक पहुंच, समान अवसर, बुनियादी सुविधाओं, शिक्षकों की गुणवत्ता, व्यावसायिक शिक्षा और सीखने के नतीजों में सुधार करना है.

मार्च 2024 तक पश्चिम बंगाल में 93,865 स्कूल और 1.76 करोड़ स्कूली बच्चे थे. इनमें 89 फीसदी स्कूल सरकार द्वारा संचालित थे और कुल छात्रों में इनकी हिस्सेदारी 93 फीसदी थी.

फंड खर्च नहीं हुआ

CAG की रिपोर्ट से पता चलता है कि समस्या सिर्फ संसाधनों की कमी की नहीं थी. कई क्षेत्रों में उपलब्ध फंड का इस्तेमाल ही नहीं किया गया या उसे उन जगहों पर खर्च नहीं किया गया, जहां इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी. 

2019-24 के दौरान राज्य ने समग्र शिक्षा के फंड का सिर्फ 46 से 65 फीसदी तक इस्तेमाल किया. इस अवधि में राज्य को केंद्र की ओर से 6,030.68 करोड़ रुपए और अपनी हिस्सेदारी के तौर पर 4,355.71 करोड़ रुपए मिले. इसके बावजूद लगातार कई वित्तीय वर्षों के अंत में बड़ी रकम खर्च नहीं हो पाई.

सरकार स्कूलों के लिए जारी फंड का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाई (सांकेतिक फोटो)

ऑडिट में पाया गया कि फंड जारी करने में कई स्तरों पर देरी हुई. राज्य ने केंद्र से मिले फंड को पश्चिम बंगाल समग्र शिक्षा मिशन (PBSSM) को जारी करने में 85 दिन तक लगाए. वहीं, राज्य की अपनी हिस्सेदारी जारी करने में 139 दिन तक की देरी हुई. केंद्र को उपयोगिता प्रमाणपत्र यानी यूटीलाइजेशन सर्टिफिकेट भी 9 से 11 महीने की देरी से भेजे गए.

इसका नतीजा एक नुकसानदेह चक्र के रूप में सामने आया. फंड का कम इस्तेमाल होने से बाद में मिलने वाली रकम भी कम हो गई. CAG के मुताबिक 2019-24 के दौरान केंद्र और राज्य की तय हिस्सेदारी और वास्तव में मिली रकम के बीच कुल 2,427.87 करोड़ रुपए का अंतर रहा. 

इसमें केंद्र की हिस्सेदारी का 1,657.88 करोड़ रुपए और राज्य की हिस्सेदारी का 769.99 करोड़ रुपए का अंतर शामिल है. ऑडिट के मुताबिक इसकी बड़ी वजह तय समय के भीतर केंद्र से मिलने वाले नियमित अनुदान का इस्तेमाल नहीं किया जाना था.

समस्या बुनियादी ढांचे में भी दिखी. 2004-05 से 2009-10 के बीच मंजूर किए गए 4,034 निर्माण कार्य मार्च 2019 तक शुरू ही नहीं हुए थे. इनमें क्लासरूम, शौचालय और रैंप जैसे काम शामिल थे. इसके बाद राज्य ने इन कामों के लिए आवंटित 395.34 करोड़ रुपए सरेंडर कर दिए.

ऑडिट में समग्र शिक्षा के तहत ऐसे खर्च के मामले भी मिले जिनकी अनुमति योजना में नहीं थी. PBSSM और जिला स्तर के समग्र शिक्षा अधिकारियों ने ऐसी गतिविधियों पर कुल 6.13 करोड़ रुपए खर्च किए जिन्हें योजना के तहत मंजूरी नहीं मिली थी. इसमें टैबलेट वितरण, टॉपर्स के सम्मान और छात्र कार्यक्रमों से जुड़े विज्ञापनों पर 3.78 करोड़ रुपए खर्च किए गए. 

इसके अलावा चार जिलों में ‘तरुणेर स्वप्न’ नाम की राज्य सरकार की अलग योजना पर 2.35 करोड़ रुपए खर्च किए गए. इस योजना के तहत कक्षा 12 के छात्रों को डिजिटल डिवाइस खरीदने के लिए आर्थिक सहायता दी जाती है.

CAG ने राज्य की यह दलील खारिज कर दी कि ये खर्च शिक्षा से जुड़े हुए थे. ऑडिट में कहा गया कि विज्ञापनों पर खर्च की गई रकम का समग्र शिक्षा योजना के तहत किसी भी गतिविधि या प्रावधान से कोई संबंध नहीं था.

वित्तीय नियंत्रण को लेकर भी सवाल उठे. 2023-24 तक राज्य और जिला स्तर पर 682 करोड़ रुपए का हिसाब नहीं हो पाया था. इसमें ऑडिट के लिए चुने गए छह जिलों की 95.14 करोड़ रुपए की रकम भी शामिल थी. 

29 फीसदी प्राथमिक स्कूलों में छात्र-शिक्षक अनुपात नियमानुसार नहीं था (सांकेतिक फोटो)

उपयोगिता प्रमाणपत्र और एडवांस रजिस्टर नहीं होने के कारण यह पता लगाना मुश्किल था कि दी गई अग्रिम रकम का इस्तेमाल कैसे हुआ. CAG ने कहा कि इससे फंड के गलत इस्तेमाल या गबन का खतरा पैदा हुआ.

पुरुलिया के एक पुराने मामले में जांच में सामने आया था कि निर्माण कार्यों के लिए निकाली गई 44.54 लाख रुपए की रकम में से सिर्फ 21.63 लाख रुपए का हिसाब मिला. बाकी 22.91 लाख रुपए का कोई हिसाब नहीं था. इसके बावजूद जिला अधिकारियों ने संबंधित एजेंसियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की.

शिक्षकों की कमी 

प्राथमिक शिक्षा में शिक्षकों का असमान वितरण प्रशासनिक नाकामी का सबसे साफ उदाहरण है. 19,165 स्कूलों यानी प्राथमिक स्कूलों के 29 फीसदी में छात्र-शिक्षक अनुपात (PTR) तय मानक के मुताबिक नहीं था. 

इन स्कूलों में मानक पूरा करने के लिए 31,684 और शिक्षकों की जरूरत थी. वहीं 21,679 प्राथमिक स्कूलों यानी 32 फीसदी स्कूलों में मानक से 32,840 ज्यादा शिक्षक थे.

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 5,152 प्राथमिक स्कूलों में सिर्फ एक शिक्षक था. इससे करीब 1.76 लाख छात्र प्रभावित हुए. वहीं 520 स्कूल ऐसे थे, जहां एक भी शिक्षक नहीं था. इन स्कूलों में 8,596 बच्चे पढ़ रहे थे. मुर्शिदाबाद के कुछ स्कूलों में छात्र-शिक्षक अनुपात 432:1 तक पाया गया.

हायर सेकेंडरी स्तर पर भी यही असंतुलन रहा. राज्य के 20 फीसदी स्कूलों में हेडमास्टर या प्रिंसिपल नहीं था. 1,562 स्कूलों में वर्क एजुकेशन शिक्षक और 2,061 स्कूलों में फिजिकल एजुकेशन शिक्षक नहीं थे. 

वहीं कुछ दूसरे स्कूलों में ऐसे एक से ज्यादा शिक्षक मौजूद थे. जांच किए गए 34 हायर सेकेंडरी स्कूलों में से 32 में छात्र-शिक्षक अनुपात 30:1 से ज्यादा था. यह अनुपात 233:1 तक पहुंच गया.

शिक्षकों की ट्रेनिंग भी बड़े पैमाने पर नहीं हो सकी. ऑडिट के लिए चुने गए छह जिलों में इन-सर्विस शिक्षकों और हेड टीचर्स की ट्रेनिंग के लिए 56.26 लाख रुपए रखे गए थे लेकिन सिर्फ 0.67 लाख रुपए यानी 1.19 फीसदी ही खर्च हुए.

शिक्षकों की कमी शिशु शिक्षा केंद्रों (SSK) और माध्यमिक शिक्षा केंद्रों (MSK) में भी गंभीर थी. इनके प्रशासनिक नियंत्रण को स्कूल शिक्षा विभाग के अधीन करने से शिक्षकों की भर्ती की बुनियादी समस्या दूर नहीं हुई.

स्कूलों की बदहाली से बच्चों की पढ़ने-लिखने की क्षमता भी प्रभावित हुई (सांकेतिक फोटो)

2023-24 में 3,879 SSK यानी 25 फीसदी में सिर्फ एक शिक्षक था. वहीं 765 MSK यानी 40 फीसदी में चार से कम शिक्षक थे. राज्य में 520 SSK/MSK ऐसे थे, जहां छात्र-शिक्षक अनुपात 40:1 के तय मानक से भी खराब था. विभाग ने खुद माना कि इन संस्थानों में 2010 के बाद शिक्षकों की भर्ती नहीं हुई थी और शिक्षकों की कमी के कारण कई केंद्र बंद हो गए.

बाल मजदूरी से जुड़े बच्चों के पुनर्वास की व्यवस्था भी कमजोर मिली. बांकुड़ा में 2019-20 के एक सर्वे में 1,477 बाल मजदूरों की पहचान हुई थी. इनमें से 1,070 कभी स्कूल में दाखिल ही नहीं हुए थे, जबकि 354 बच्चे स्कूल छोड़ चुके थे. 

इन 1,424 बच्चों को उनकी उम्र के मुताबिक कक्षा में दाखिला दिलाने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की गई. मुर्शिदाबाद में अप्रैल 2015 के बाद बाल मजदूरों का कोई सर्वे ही नहीं हुआ.

समावेशी शिक्षा की स्थिति भी चिंता बढ़ाने वाली थी. पांच जांच किए गए जिलों में 2019-24 के दौरान विशेष जरूरत वाले 17,008 पात्र बच्चों को ट्रांसपोर्ट अलाउंस नहीं मिला. वहीं 24,919 बच्चों को एस्कॉर्ट अलाउंस नहीं दिया गया. 

अलग-अलग जिलों में 30-56 फीसदी पात्र बच्चे ट्रांसपोर्ट सहायता से और 35-49 फीसदी एस्कॉर्ट सहायता से वंचित रहे.

विशेष जरूरत वाले बच्चों में 72,267 पात्र लड़कियों में से 15,593 यानी 22 फीसदी को तय स्टाइपेंड नहीं मिला. दक्षिण दिनाजपुर में यह अनुपात 61 फीसदी था.

बुनियादी सुविधाओं की स्थिति भी बेहतर नहीं थी. मार्च 2024 तक सरकार द्वारा संचालित 83,373 स्कूलों में से 12,503 में रैंप नहीं था. वहीं 60,084 यानी 72 फीसदी स्कूलों में विशेष जरूरत वाले बच्चों के लिए अनुकूल शौचालय नहीं था. ऑडिट के दौरान जिन तीन रिसोर्स रूम का निरीक्षण किया गया, उनका इस्तेमाल गोदाम के तौर पर हो रहा था.

सबसे गंभीर स्थिति विशेष जरूरत वाले बच्चों के लिए शिक्षकों की थी. राज्य में 35,557 स्कूलों में 3,15,411 ऐसे बच्चे पढ़ रहे थे, लेकिन उनके लिए सिर्फ 1,722 स्पेशल एजुकेटर थे. यानी 33,835 स्पेशल एजुकेटर की कमी थी.

बच्चों के लिए सीखना चुनौती

रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी सामने आया है कि पश्चिम बंगाल में स्कूलों में दाखिले से जुड़े कई आंकड़े राष्ट्रीय औसत से बेहतर थे. 2023-24 में ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो (GER) प्राथमिक स्तर पर 109.6 फीसदी, अपर प्राइमरी में 102.2 फीसदी, सेकेंडरी में 101.3 फीसदी और हायर सेकेंडरी में 66.1 फीसदी था.

लेकिन शिक्षा के अगले स्तर पर पहुंचने के साथ स्थिति काफी कमजोर होती गई. ऑडिट में अपर प्राइमरी से हायर सेकेंडरी स्तर तक 28-42 फीसदी बच्चों के पढ़ाई छोड़ने या अगले स्तर पर नहीं पहुंचने की बात सामने आई. 2019 से 2023 के बीच कक्षा 7 में छात्रों की संख्या 11.5 लाख से घटकर कक्षा 9 में 6.66 लाख रह गई. यानी 42 फीसदी की गिरावट आई.

स्कूल छोड़ चुके 581 बच्चों के सर्वे में 53 फीसदी ने गरीबी या आर्थिक परेशानी को इसकी वजह बताया. 13 फीसदी लड़के कमाने के लिए दूसरी जगह चले गए थे. 12 फीसदी ने शादी के कारण पढ़ाई छोड़ दी और 4 फीसदी ने परिवार की मदद के लिए काम शुरू कर दिया था. इनमें ज्यादातर मजदूरी कर रहे थे.

राज्य के 60 मॉडल स्कूल भी उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे. इनमें से किसी भी स्कूल में 640 छात्रों के तय लक्ष्य के मुताबिक दाखिला नहीं हुआ. इन स्कूलों में कुल 7,092 छात्र थे. यानी प्रति स्कूल औसतन 118 छात्र, जो तय लक्ष्य का सिर्फ 18 फीसदी था. एक स्कूल में तो एक भी छात्र नहीं था.

शिक्षकों की तैनाती की स्थिति भी खराब थी. इन 60 स्कूलों में कुल 299 शिक्षकों में से 170 गेस्ट टीचर थे. उत्तर दिनाजपुर और दक्षिण दिनाजपुर के पांच स्कूलों में एक भी नियमित शिक्षक नहीं था. जिन स्कूलों की जांच की गई वहां 2019 से 2024 के बीच गंभीर शिक्षक कमी के बीच छात्रों की संख्या 56-93 फीसदी तक घट गई.

कई स्तरों पर कक्षाओं में भीड़भाड़ मिली. तय छात्र-क्लासरूम अनुपात 40:1 था. इसके बावजूद 12 फीसदी प्राथमिक और अपर प्राइमरी स्कूलों में यह अनुपात मानक से खराब था. सेकेंडरी स्तर पर ऐसे स्कूलों की हिस्सेदारी 33 फीसदी और हायर सेकेंडरी में 66 फीसदी थी. 

ऑडिट के दौरान एक स्कूल में कक्षा 6 और 7 के अलग-अलग सेक्शन के बच्चों को क्लासरूम और शिक्षकों की कमी के कारण एक दिन छोड़कर स्कूल आना पड़ रहा था.

डिजिटल शिक्षा की स्थिति भी अभी काफी दूर थी. 16,570 अपर प्राइमरी, सेकेंडरी और हायर सेकेंडरी स्कूलों में से 42 फीसदी में ICT यानी सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी की सुविधाएं नहीं थीं. 47 फीसदी में कंप्यूटर लैब नहीं थी और 70 फीसदी स्कूलों में ICT शिक्षक नहीं था.

आखिरकार, ऑडिट में यह भी सामने आया कि इन कमियों का असर बच्चों की पढ़ाई के नतीजों पर पड़ रहा था. 2019 से 2024 के बीच कक्षा 10 की परीक्षा में 5.06 लाख छात्र फेल हुए. हर साल फेल होने की दर 10-13 फीसदी रही. 2021 में कोविड-19 के कारण पारंपरिक परीक्षा नहीं हुई थी.

कक्षा 12 में जांच किए गए वर्षों में 12-17 फीसदी छात्र फेल हुए. पास होने वाले छात्रों में से सिर्फ 16-38 फीसदी को फर्स्ट डिविजन मिला.

72 चयनित स्कूलों के 1,145 छात्रों का CAG ने खुद आकलन किया. इनमें करीब 404 छात्रों ने जिन विषयों की जांच हुई, उनमें 40 फीसदी से कम अंक हासिल किए. गणित में स्थिति खास तौर पर कमजोर रही. कक्षा 3 के 57 फीसदी, कक्षा 5 के 36 फीसदी, कक्षा 8 के 35 फीसदी और कक्षा 10 के 62 फीसदी छात्रों ने गणित में 40 फीसदी से कम अंक हासिल किए.

वहीं व्यावसायिक शिक्षा सिर्फ 7.92 फीसदी स्कूलों तक पहुंच पाई थी जबकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में इसका लक्ष्य 50 फीसदी स्कूलों तक पहुंचना है. व्यावसायिक शिक्षा देने वाले 1,452 स्कूलों में से 345 में काम करने लायक लैब नहीं थी. 

इनका ITI और पॉलिटेक्निक संस्थानों के साथ भी कोई संपर्क नहीं था. इसे ट्रैक करने की राज्य में कोई व्यवस्था नहीं थी कि व्यावसायिक कोर्स पूरा करने के बाद छात्रों को नौकरी मिली या वे रोजगार के योग्य बने.

इन कमियों के पीछे कमजोर संस्थागत निगरानी भी एक बड़ी वजह थी. गवर्निंग काउंसिल को नीति की दिशा तय करने और केंद्र-राज्य के बीच तालमेल के लिए बनाया गया था लेकिन 2019-24 की पूरी ऑडिट अवधि में उसकी एक भी बैठक नहीं हुई. 

CAG के मुताबिक PBSSM अप्रैल 2005 के बाद हुई किसी बैठक का रिकॉर्ड भी उपलब्ध नहीं करा सका. जिला स्तर की निगरानी समितियां भी गठित नहीं की गई थीं.

स्कूल मैनेजमेंट कमेटियों को स्कूल विकास की योजनाएं तैयार करने और स्कूल के कामकाज में भाग लेने की जिम्मेदारी थी. लेकिन जांच किए गए जिलों में 35-84 फीसदी स्कूलों में ऐसी समितियां मौजूद नहीं थीं. 

72 चयनित स्कूलों में से किसी ने भी 2019-24 के दौरान स्कूल डेवलपमेंट प्लान तैयार नहीं किया. माइक्रो-प्लानिंग के लिए सालाना घरेलू सर्वे भी नहीं किए गए जबकि दिशानिर्देशों में इसकी जरूरत बताई गई थी.

शायद यही रिपोर्ट के सबसे अहम निष्कर्षों में से एक है. राज्य ने हर साल योजनाएं तो बनाईं, लेकिन स्कूल स्तर की जानकारी और समुदाय की भागीदारी के बिना. जबकि इन्हीं के आधार पर यह तय होना था कि स्कूलों को वास्तव में किस चीज की जरूरत है.

इसे कैसे सुधारा जाए

CAG की सिफारिशों में नई योजनाएं शुरू करने के बजाय मौजूदा व्यवस्था के क्रियान्वयन को बेहतर बनाने पर ज्यादा जोर दिया गया है. इनमें लंबे समय की और निचले स्तर से शुरू होने वाली योजना बनाना, समय पर फंड का इस्तेमाल, कमजोर प्रदर्शन वाले जिलों में जरूरी दखल, शिक्षकों की भर्ती और तर्कसंगत तैनाती, विशेष जरूरत वाले बच्चों के लिए अनुकूल बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना, व्यावसायिक शिक्षा को मजबूत करना और जिला व स्कूल स्तर पर निगरानी समितियों का गठन शामिल है.

पश्चिम बंगाल में स्कूलों का बड़ा नेटवर्क है और दाखिले से जुड़े कई प्रमुख आंकड़ों में उसका प्रदर्शन राष्ट्रीय औसत से बेहतर है. लेकिन इन आंकड़ों के पीछे फंड का इस्तेमाल न होना, अधूरे या खराब बुनियादी ढांचे, शिक्षकों की भारी असमानता, समावेशी शिक्षा की कमजोर स्थिति, सेकेंडरी स्तर पर बड़ी संख्या में बच्चों का पढ़ाई छोड़ना और बुनियादी सीखने का कमजोर स्तर जैसी समस्याएं छिपी हैं.

CAG की रिपोर्ट से साफ है कि चुनौती सिर्फ बच्चों को स्कूल तक पहुंचाने की नहीं है. असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि पैसा क्लासरूम तक पहुंचे, शिक्षक बच्चे तक पहुंचे और बच्चा वास्तव में सीख भी पाए.

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