शुभेंदु अधिकारी कैसे खत्म कर रहे ममता के शहीद दिवस की सियासी ताकत?

1993 की पुलिस फायरिंग पर बने जांच आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक कर शुभेंदु अधिकारी ने TMC की सबसे बड़ी राजनीतिक विरासत को चुनौती दी है

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी

21 जुलाई को हर साल होने वाली शहीद दिवस रैली से एक दिन पहले 20 जुलाई को पश्चिम बंगाल की राजनीति ने एक नया मोड़ ले लिया. मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने विधानसभा में 1993 की पुलिस फायरिंग पर लंबे समय से लंबित न्यायिक आयोग की रिपोर्ट पेश की. वहीं, ममता बनर्जी के कभी करीबी रहे फिरहाद हकीम ने सवाल उठाया कि सत्ता में रहने के दौरान TMC ने इस दिन को जिस तरह मनाया, वह सही नहीं था.

इन दोनों घटनाओं ने उस आंदोलन की ऐतिहासिक और भावनात्मक नींव को चुनौती दी, जिसने ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल की सत्ता तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई थी. 2011 में ममता सरकार बनने के बाद गठित जस्टिस सुषांत कुमार चट्टोपाध्याय आयोग की रिपोर्ट पेश करते हुए अधिकारी ने आरोप लगाया कि पिछली सरकार ने इस त्रासदी का राजनीतिक फायदा उठाया लेकिन पुलिस फायरिंग की सच्चाई सामने लाने में नाकाम रही.

विधानसभा में सीएम अधिकारी ने कहा, "21 जुलाई का इस्तेमाल करके कई लोगों ने राजनीतिक लाभ लिया. किसी को राजनीतिक पद मिला, किसी ने सत्ता का सुख भोगा, कोई आंखों के इलाज के लिए अमेरिका के जॉन्स हॉपकिन्स गया, चार्टर्ड विमान से यात्रा की या हरीश चटर्जी स्ट्रीट और हरीश मुखर्जी रोड पर 38 प्लॉट हासिल किए. हालांकि, पश्चिम बंगाल के 11 करोड़ लोग आज भी नहीं जानते कि 21 जुलाई को आखिर हुआ क्या था, पुलिस ने गोली क्यों चलाई और इसके लिए जिम्मेदार कौन था?"

करीब तीन दशक से 21 जुलाई 1993 की घटना TMC की पहचान बनी हुई है. उस समय ममता बनर्जी कांग्रेस में थीं और पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा की सरकार थी. हर साल ममता अपने हजारों कार्यकर्ताओं के साथ उन 13 युवा कांग्रेस समर्थकों को श्रद्धांजलि देती रही हैं, जो कोलकाता में राइटर्स बिल्डिंग (राज्य सचिवालय) तक मार्च के दौरान पुलिस फायरिंग में मारे गए थे. समय के साथ यह कार्यक्रम TMC की सबसे बड़ी वार्षिक राजनीतिक रैली बन गया.

हालांकि इस साल 21 जुलाई का राजनीतिक महत्व विधानसभा चुनाव में हार के बाद TMC में हुए विभाजन की वजह से बदल गया है. पार्टी के अलग-अलग गुट अब इस आंदोलन की विरासत और 1993 की घटना की अपनी-अपनी व्याख्या पेश कर रहे हैं.

अधिकारी ने आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए ममता सरकार के कामकाज पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि आयोग ने पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, पूर्व गृह सचिव मनीष गुप्ता, पूर्व कोलकाता पुलिस आयुक्त तुषार तालुकदार, वाम नेता बिमान बोस और पूर्व कांग्रेस नेता सोमन मित्रा समेत 44 गवाहों से पूछताछ की लेकिन ममता बनर्जी को कभी तलब नहीं किया.

उन्होंने आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि राइटर्स बिल्डिंग पर हमले की आशंका को 'काल्पनिक' बताया गया है, जबकि मेयो रोड, डोरिना क्रॉसिंग और एस्प्लेनेड पर पुलिस फायरिंग को 'अनावश्यक, बिना उकसावे के और अनुचित' माना गया है. उन्होंने आरोप लगाया कि राइटर्स बिल्डिंग से कई अहम दस्तावेज गायब हो गए और पिछली TMC सरकार ने जरूरी दस्तावेज न देकर आयोग के साथ पूरा सहयोग नहीं किया.

मुख्यमंत्री ने पीड़ित परिवारों को दिए गए मुआवजे को लेकर भी TMC सरकार पर निशाना साधा. उन्होंने कहा, "आयोग ने मृतकों के परिवारों को 25 लाख रुपए और घायलों को 5 लाख रुपए देने की सिफारिश की थी लेकिन आपने मृतकों के परिवारों को सिर्फ 2 लाख रुपए और घायलों को केवल 15 हजार रुपए दिए. क्या आपको शर्म नहीं आती?"

अधिकारी ने घोषणा की कि इस घटना में मारे गए और घायल लोगों के परिवार नए सिरे से FIR दर्ज करा सकते हैं. राज्य सरकार उन्हें पूरी कानूनी मदद देगी. उन्होंने यह भी कहा कि आयोग द्वारा सुझाई गई बाकी मुआवजा राशि मुख्यमंत्री राहत कोष से दी जाएगी.

अधिकारी ने संकेत दिया कि TMC सरकार से जुड़े अन्य मामलों की रिपोर्ट भी सार्वजनिक की जा सकती है. उन्होंने कहा, "अम्फान चक्रवात राहत से जुड़ी CAG रिपोर्ट से लेकर कोविड महामारी के दौरान मेडिकल उपकरणों की खरीद से संबंधित रिपोर्ट तक, भ्रष्टाचार से जुड़े सभी दस्तावेज इस सदन और जनता के सामने रखे जाएंगे."

इसी दौरान, TMC के पुराने नेताओं में शामिल फिरहाद हकीम ने भी शहीद दिवस मनाने के तरीके पर सवाल उठाए. ममता बनर्जी के कभी करीबी रहे हकीम, जो अब TMC में ऋतुब्रत बनर्जी गुट के साथ हैं. उन्होंने कहा कि उन्हें लंबे समय से इस कार्यक्रम के आयोजन के तरीके पर आपत्ति थी.

उन्होंने कहा कि जो कार्यक्रम शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए शुरू हुआ था, वह धीरे-धीरे एक उत्सव में बदल गया. हकीम ने कहा, "हममें से कई लोगों को इस पर आपत्ति थी लेकिन कोई खुलकर कह नहीं सका. राजनीतिक हालात ऐसे थे कि विरोध जताने की हिम्मत नहीं थी."

हकीम ने उस समय युवा TMC अध्यक्ष रहे शुभेंदु अधिकारी की भूमिका का भी जिक्र किया. उन्होंने ब्रिगेड परेड ग्राउंड की एक रैली का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हें याद है, एक बार उनके हाथ से माइक छीन लिया गया था, जिससे कई नेता नाराज हो गए थे.

पूर्व कोलकाता मेयर ने 21 जुलाई 1993 की हिंसा के अपने अनुभव को भी याद किया. उन्होंने कहा कि वे उस दिन बाल-बाल बचे थे. उन्होंने बताया कि वह मेयो रोड के प्रवेश द्वार के पास खड़े थे, तभी उनकी आंखों के सामने दो-तीन लोगों को गोली मार दी गई. हकीम के मुताबिक, एक अनजान व्यक्ति ने उन्हें गोलीबारी से बचाया. उन्होंने कहा, "उस व्यक्ति की सूझबूझ और भगवान की कृपा से ही आज मैं जिंदा हूं."

विधानसभा में हुई इन दोनों घटनाओं ने 2026 के शहीद दिवस की राजनीति का स्वरूप बदल दिया है. एक ओर BJP सरकार ने आयोग की रिपोर्ट और नए कानूनी कदमों के जरिए 1993 की पुलिस फायरिंग से जुड़े सवाल फिर उठाए हैं, वहीं दूसरी ओर ममता बनर्जी के पूर्व करीबी नेता ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि TMC के भीतर भी कई लोग वर्षों से शहीद दिवस मनाने के तरीके को लेकर असहज थे. इन दोनों घटनाओं ने 21 जुलाई 1993 की विरासत को लेकर राजनीतिक संघर्ष और तेज कर दिया है.

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