सूरत के नासिरनगर में दिनदहाड़े घर ढहाए गए लेकिन जिम्मेदार कोई नहीं!

गुजरात हाई कोर्ट का सख्त रुख नासिरनगर के विस्थापित दिहाड़ी मजदूरों के लिए उम्मीद तो लेकर आया लेकिन घर ढहाने के मामले में अब तक कोई एफआईआर नहीं हुई है

ध्वस्तीकरण की कार्रवाई के बाद नासिरनगर

सूरत के नासिरनगर बस्ती में 117 झुग्गियों का ध्वस्तीकरण गुजरात के सबसे हैरान करने वाले शहरी प्रशासनिक विवादों में से एक बन गया है. इसे 'घोस्ट डेमोलिशन' का नाम दिया गया है क्योंकि साइट पर मौजूद हर सरकारी एजेंसी ने शुरुआत में जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया. मकानों को मई के अंत और जून की शुरुआत में गिराया गया, जिसे लोग एक आधिकारिक नगर कार्रवाई मान रहे थे.

लेकिन जब यह सवाल उठा कि इस कार्रवाई को किसने मंजूरी दी थी तो सूरत नगर निगम (SMC), पुलिस और अन्य अधिकारियों ने खुद को इससे अलग कर लिया. इससे एक बड़ा सवाल खड़ा हुआ कि दिनदहाड़े एक पूरी बस्ती को किसने गिराया. यह कार्रवाई कथित तौर पर कटरगाम में प्रस्तावित सड़क चौड़ीकरण परियोजना से जुड़ी थी.

उस समय सूरत नगर निगम (SMC) के अपने बयान के अनुसार, नागरिक अधिकारियों को केवल प्रस्तावित सड़क की अलाइनमेंट के सीमांकन का काम सौंपा गया था. स्थानीय BJP विधायक विनू मोर्डिया ने भी सार्वजनिक रूप से कहा था कि नगर निकाय को केवल माप लेने की अनुमति दी गई थी.

इसके बजाय बुलडोजरों ने 117 घरों को गिरा दिया और दशकों पुराने घर मलबे में बदल गए जबकि पुलिस बल मौके पर तैनात रहा.

निवासियों का आरोप है कि उन्हें न तो कोई ध्वस्तीकरण नोटिस मिला और न ही बेदखली का आदेश दिया गया. उन्हें अपनी कार्रवाई को चुनौती देने या अपना सामान बचाने का मौका भी नहीं दिया गया. कई लोगों का दावा है कि वे नासिरनगर में 30 वर्षों से अधिक समय से रह रहे थे. नोटिस, पुनर्वास उपायों और स्पष्ट रूप से तय जिम्मेदार ध्वस्तीकरण प्राधिकरण की अनुपस्थिति ने प्रक्रिया के पालन और बेदखली से जुड़े संवैधानिक संरक्षण पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए. माइनॉरिटी कोऑर्डिनेशन कमेटी के संयोजक मुजाहिद नफीस कहते हैं, “ज्यादातर विस्थापित लोग दिहाड़ी मजदूर हैं जो मुश्किल से अपना गुजारा कर पाते हैं. यह ध्वस्तीकरण पूरी तरह अवैध था.” वे पीड़ितों को पुनर्वास और कानूनी प्रक्रिया में न्याय दिलाने में मदद कर रहे हैं.

जून के तीसरे हफ्ते में 26 प्रभावित निवासियों ने गुजरात हाई कोर्ट में एक विशेष सिविल एप्लीकेशन दायर की थी और इस ध्वस्तीकरण को चुनौती दी थी. 30 जून को सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि ऐसा लगता है 'सूरत नगर निगम (SMC) ने घरों को रोड डिमार्केशन की आड़ में' गिराया है और साथ ही अदालत ने सवाल उठाया कि अगर कार्रवाई अवैध थी तो पुलिस ने दखल क्यों नहीं दिया.

बेंच ने कहा कि कानून व्यवस्था बनाए रखने वालों का कर्तव्य था कि वे अवैध कार्यों को रोकें, न कि मूक दर्शक बने रहें. सरकारी वकील ने अदालत में स्वीकार किया कि सूरत नगर निगम (SMC) को केवल सीमांकन की अनुमति थी और ध्वस्तीकरण अधिकृत नहीं था. अगली सुनवाई 6 जुलाई को निर्धारित है.

अदालत की सुनवाई के एक दिन बाद सूरत नगर निगम (SMC) के पांच अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया. हालांकि अभी तक कोई FIR दर्ज नहीं हुई है और न ही किसी अधिकारी ने इस ध्वस्तीकरण की जिम्मेदारी ली है.

नासिरनगर के विस्थापित निवासियों को सूरत नगर निगम (SMC) की तरफ से एक सामुदायिक हॉल में अस्थाई आश्रय दिया गया है. इन लोगों की सबसे बड़ी चिंता अपने पहचान दस्तावेजों को वापस पाने की है जो मलबे में दबे हैं.

माइनॉरिटी कोऑर्डिनेशन कमेटी ने आपराधिक कार्रवाई और उच्च स्तर पर जवाबदेही के साथ-साथ उसी स्थान पर ध्वस्त घरों के पुनर्निर्माण की मांग की है. नफीस का आरोप है कि यह ध्वस्तीकरण रियल एस्टेट को खाली कराने के लिए बिल्डरों, सूरत नगर निगम (SMC) और स्थानीय पुलिस द्वारा अपनाया जा रहा एक नया तरीका है. नफीस कहते हैं, “पहले स्थानीय गुंडों को गरीब लोगों को डराकर उनकी झुग्गियों से हटाने के लिए रखा जाता था ताकि रियल एस्टेट प्रोजेक्ट के लिए जमीन खाली हो सके. अब वही काम सरकारी अधिकारी तीन लंबे दिनों तक आराम से कर रहे हैं. यह ऑपरेशन इतना व्यवस्थित था कि मुख्यधारा की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने छह दिन तक इस खबर को नहीं दिखाया.”

फिलहाल अदालत के सख्त रुख ने पीड़ितों को कुछ उम्मीद दी है लेकिन छत होने, न होने के बीच उनकी दिहाड़ी मजदूरी पर जीवन की लड़ाई अब भी जारी है.

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