सपा के बागियों को BJP में जगह, पुराने दावेदारों का क्या होगा?

सपा के तीन विधायकों के BJP में आने से 2027 की चुनावी तैयारी में नए समीकरण बनेंगे. गौरीगंज, गोसाईगंज और कालपी में पुराने दावेदारों की दावेदारी के साथ जातीय संतुलन साधना भी पार्टी के लिए बड़ी परीक्षा होगी

BJP की सदस्यता लेने के बाद सपा के तीन बागी विधायक

समाजवादी पार्टी (सपा) के बागी विधायकों को अपने पाले में लाकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाने की कोशिश की है. लेकिन इस विस्तार ने पार्टी के सामने नई चुनौतियां भी खड़ी कर दी हैं. 14 अक्टूबर को गौरीगंज के विधायक राकेश प्रताप सिंह, गोसाईगंज के विधायक अभय सिंह और कालपी के विधायक विनोद चतुर्वेदी BJP में शामिल हो गए.

गौरीगंज में आयोजित कार्यक्रम में BJP प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और राष्ट्रीय महामंत्री स्मृति ईरानी ने तीनों नेताओं को पार्टी की सदस्यता दिलाई. इन तीनों विधायकों के आने से BJP को ऐसे चेहरे मिले हैं जिनका अपने-अपने क्षेत्रों में राजनीतिक अनुभव और व्यक्तिगत प्रभाव है. लेकिन सवाल यह है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में पार्टी इन नेताओं को कहां और कैसे समायोजित करेगी? 

गौरीगंज में राकेश प्रताप सिंह के सामने BJP के पुराने दावेदार चंद्रप्रकाश मिश्रा मटियारी की चुनौती है, तो गोसाईगंज में अभय सिंह और पूर्व विधायक इंद्र प्रताप तिवारी उर्फ खब्बू तिवारी के बीच पुरानी अदावत पार्टी के लिए सिरदर्द बन सकती है. कालपी में विनोद चतुर्वेदी के आने से उन कार्यकर्ताओं की उम्मीदों पर असर पड़ना तय है जो लंबे समय से BJP के टिकट की दावेदारी कर रहे हैं. 

पुराने दावेदारों के सामने चुनौती

गौरीगंज सीट पर राकेश प्रताप सिंह और BJP के पुराने उम्मीदवार चंद्रप्रकाश मिश्रा मटियारी के बीच टिकट को लेकर संभावित प्रतिस्पर्धा इस चुनौती की सबसे बड़ी मिसाल है. वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा के टिकट पर मैदान में उतरे राकेश प्रताप सिंह ने BJP के मटियारी को हराया था. मटियारी इससे पहले 2007 में बहुजन समाज पार्टी (BSP) के टिकट पर विधायक चुने गए थे. BJP ने 2022 में उन्हें उम्मीदवार बनाया था और उन्होंने राकेश प्रताप सिंह को कड़ी टक्कर दी थी. अब राकेश प्रताप सिंह BJP में आ चुके हैं. 

राकेश प्रताप सिंह (बाएं) और चंद्र प्रकाश मिश्रा मटियारी (दाएं)

ऐसे में पार्टी के सामने अपने पुराने उम्मीदवार और नए नेता के बीच संतुलन बनाने का सवाल है. राकेश की क्षेत्र में राजनीतिक पकड़ का लाभ उठाने के लिए उन्हें टिकट देने पर विचार हो सकता है लेकिन इससे मटियारी और उनके समर्थकों की दावेदारी प्रभावित होगी. मटियारी ने भी साफ किया है कि किसी नेता के BJP में शामिल होने मात्र से उसका टिकट तय नहीं हो जाता और उम्मीदवार का फैसला पार्टी नेतृत्व करेगा. 

गौरीगंज अमेठी संसदीय क्षेत्र का हिस्सा है इसलिए इस सीट का महत्व स्थानीय विधानसभा की सीमाओं से आगे तक जाता है. BJP के सामने यहां संगठन की पुरानी मेहनत और नए नेता के व्यक्तिगत प्रभाव के बीच तालमेल बैठाने की चुनौती होगी. अमेठी राजघराने के प्रमुख चेहरे संजय सिंह का सदस्यता कार्यक्रम में मौजूद नहीं होना भी स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं का विषय बना. हालांकि उनकी अनुपस्थिति को नाराजगी का निश्चित प्रमाण नहीं माना जा सकता. 

गोसाईगंज में भी स्थिति कम जटिल नहीं है. अभय सिंह वर्ष 2022 में सपा के टिकट पर विधायक चुने गए थे. उन्होंने BJP  के पूर्व विधायक इंद्र प्रताप तिवारी उर्फ खब्बू तिवारी की पत्नी आरती तिवारी को हराया था. अब दोनों नेताओं का राजनीतिक भविष्य BJP  के फैसलों से जुड़ सकता है. 

अभय सिंह के BJP  में आने से खब्बू तिवारी और उनके समर्थकों के सामने भी अपनी राजनीतिक भूमिका को लेकर सवाल खड़े होंगे. इस तरह BJP को नए नेताओं के जरिए सीटों पर अपनी स्थिति मजबूत करने का अवसर मिला है लेकिन टिकट वितरण में असंतोष पैदा हुआ तो यही कदम पुराने कार्यकर्ताओं के मनोबल को प्रभावित कर सकता है. चुनाव से पहले पार्टी को यह सुनिश्चित करना होगा कि नए नेताओं के स्वागत में पुराने कार्यकर्ताओं की राजनीतिक हिस्सेदारी कमजोर न पड़े.

अभय सिंह की दावेदारी

अभय सिंह के BJP में आने के बाद अयोध्या जिले की राजनीति में भी नए समीकरण बनने की चर्चा है. गोसाईगंज में उनकी पुरानी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता खब्बू तिवारी से रही है. दोनों के बीच राजनीतिक मुकाबला कई चुनावी चक्रों से जारी है. वर्ष 2017 में BJP  के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए खब्बू तिवारी ने अभय सिंह को हराया था. 

अभय सिंह (फाइल फोटो)

वर्ष 2022 में अभय सिंह ने सपा के उम्मीदवार के रूप में खब्बू तिवारी की पत्नी आरती तिवारी को पराजित कर पिछली हार का बदला लिया. अब दोनों BJP में हैं. ऐसे में पार्टी के सामने यह तय करने की चुनौती होगी कि गोसाईगंज में किस नेता को प्राथमिकता दी जाए और दूसरे को किस तरह समायोजित किया जाए. 

खब्बू तिवारी का स्थानीय राजनीति में प्रभाव रहा है. हालांकि वे चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं हैं क्योंकि 2021 में फर्जी मार्कशीट मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद उनके चुनाव लड़ने पर बाधा है. अब वे अपनी पत्नी आरती तिवारी के लिए टिकट की दावेदारी कर सकते हैं. इसके साथ उन्होंने निचली अदालत की सजा बरकरार रखने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील भी दायर कर रखी है.

दूसरी तरफ, अभय सिंह के अयोध्या सदर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की संभावनाओं को लेकर भी चर्चा है. इस सीट पर BJP के मौजूदा विधायक वेद प्रकाश गुप्त की उम्र और 2027 के चुनाव में उनकी संभावित उम्मीदवारी को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं. अभय सिंह के लिए अयोध्या सदर एक वैकल्पिक राजनीतिक मैदान हो सकता है लेकिन उनकी दावेदारी का अंतिम फैसला BJP  नेतृत्व को करना है. 

उनके गोसाईगंज से चुनाव नहीं लड़ने की इच्छा जताने की बात भी सामने आई है हालांकि इसकी स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है. अयोध्या सदर में वैश्य, ब्राह्मण, ठाकुर और अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं का मिश्रण है. ऐसे में BJP  को उम्मीदवार चुनते समय जातीय समीकरणों के साथ शहरी मतदाताओं की अपेक्षाओं और स्थानीय संगठन की भूमिका को भी ध्यान में रखना होगा. 

गोसाईगंज में अभय सिंह की जगह किसी अन्य उम्मीदवार को उतारने और अयोध्या सदर में उन्हें मौका देने का विकल्प पार्टी के सामने हो सकता है. लेकिन ऐसा कोई भी निर्णय खब्बू तिवारी और उनके समर्थकों की प्रतिक्रिया से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता. अभय सिंह और राकेश प्रताप सिंह दोनों ठाकुर समुदाय से आते हैं. गौरीगंज और गोसाईगंज में पहले BJP के ब्राह्मण उम्मीदवारों को भी सफलता मिली है. ऐसे में इन दोनों सीटों पर नए नेताओं को समायोजित करते समय ब्राह्मण नेताओं और मतदाताओं की अपेक्षाओं को संतुलित रखना भी पार्टी के लिए अहम होगा.

कालपी में नई परीक्षा

जालौन जिले की कालपी विधानसभा सीट पर विनोद चतुर्वेदी के BJP में शामिल होने से चुनावी मुकाबले का स्वरूप बदल सकता है. वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए विनोद चतुर्वेदी को 69,782 वोट मिले थे. उन्होंने निषाद पार्टी के छोटे सिंह को 2,816 मतों से हराया था. छोटे सिंह को 66,966 और बसपा के श्याम पाल उर्फ छुन्ना पाल को 64,683 वोट मिले थे. दोनों के बीच भी केवल 2,283 मतों का अंतर था. 

विनोद चतुर्वेदी (फाइल फोटो)

कांग्रेस उम्मीदवार उमाकांति को 15,195 वोट मिले थे. ये आंकड़े बताते हैं कि कालपी में मुकाबला बहुकोणीय और करीबी रहा था. विनोद चतुर्वेदी के BJP में आने से पार्टी को चुनावी अनुभव वाला नेता मिला है. ब्राह्मण समुदाय से आने वाले विनोद का व्यक्तिगत प्रभाव भी BJP के लिए उपयोगी हो सकता है. हालांकि, 2022 में उन्हें मिले सभी वोट BJP के खाते में चले जाएंगे, ऐसा मानना जल्दबाजी होगी. 

मतदाताओं का रुख स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवार की स्वीकार्यता और चुनाव के समय बनने वाले राजनीतिक समीकरणों पर निर्भर करेगा. BJP के लिए यहां भी टिकट का सवाल अहम रहेगा. पार्टी के भीतर पहले से सक्रिय नेताओं और लंबे समय से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे कार्यकर्ताओं को विनोद चतुर्वेदी की मौजूदगी में अपनी रणनीति बदलनी पड़ सकती है. अगर पार्टी उन्हें टिकट देती है तो पुराने दावेदारों को मनाना होगा. अगर किसी अन्य नेता को उम्मीदवार बनाया जाता है तो विनोद के समर्थकों को संतुष्ट रखना चुनौती होगी. 

नाराजगी रोकने की चुनौती

तीनों विधायकों का BJP में आना फरवरी 2024 के राज्यसभा चुनाव के दौरान शुरू हुई सपा की बगावत की कड़ी का अगला चरण है. उस समय सपा के सात विधायकों ने BJP समर्थित उम्मीदवारों के पक्ष में क्रॉस-वोटिंग की थी. इनमें मनोज कुमार पांडेय, राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह, विनोद चतुर्वेदी, राकेश पांडेय, पूजा पाल और आशुतोष मौर्य शामिल थे. इस क्रॉस-वोटिंग के कारण सपा के तीसरे उम्मीदवार आलोक रंजन को हार का सामना करना पड़ा था.

इन सात विधायकों में मनोज पांडेय पहले ही BJP में शामिल हो चुके हैं और मई 2026 में योगी आदित्यनाथ सरकार में मंत्री बने. पूजा पाल को जून 2026 में BJP का प्रदेश उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया. 14 अक्टूबर को राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह और विनोद चतुर्वेदी के पार्टी में आने के बाद राज्यसभा चुनाव में क्रॉस-वोटिंग करने वाले सात विधायकों में से पांच BJP में शामिल हो चुके हैं. यह घटनाक्रम सपा के लिए राजनीतिक झटका है लेकिन BJP के लिए इसे सीधे चुनावी लाभ में बदलना आसान नहीं होगा. 

अब पार्टी को नए नेताओं की स्थानीय स्वीकार्यता, उनके समर्थकों की सक्रियता और अपने पुराने संगठन के साथ उनके तालमेल का आकलन करना होगा. जिन सीटों पर वह पहले से मजबूत सामाजिक आधार का दावा करती रही है, वहां नए नेताओं की उम्मीदवारी पुराने जातीय और राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकती है. 

राजनीतिक विश्लेषक और लखनऊ के कान्यकुब्ज कालेज में राजनीतिक शास्त्र विभाग के प्रोफेसर ब्रजेश मिश्र कहते हैं, “सपा और कांग्रेस के लिए BJP के असंतुष्ट नेताओं से संपर्क बढ़ाने का अवसर भी पैदा हो सकता है. टिकट की दौड़ में पीछे छूटने वाले नेता यदि दूसरे दलों की ओर रुख करते हैं तो BJP को अपने ही विस्तार की राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है. हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि असंतुष्ट नेता वास्तव में पार्टी छोड़ेंगे या दूसरे दलों में जाएंगे.” 

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