सपा-कांग्रेस में सीटों की लड़ाई का पहला दौर शुरू?
यूपी में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सीट बंटवारे पर दबाव की राजनीति तेज, सार्वजनिक बयानों से बढ़ी अटकलें लेकिन राहुल गांधी और अखिलेश यादव अब भी विपक्षी एकता का संदेश दे रहे हैं

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कुछ ही महीने बचे हैं लेकिन समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे की लड़ाई का पहला दौर सार्वजनिक बयानों के जरिए शुरू होता दिखाई दे रहा है. एक ओर राहुल गांधी और अखिलेश यादव लगातार विपक्षी एकता का संदेश दे रहे हैं, दूसरी ओर कांग्रेस के कुछ नेताओं के बयान बार-बार यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या गठबंधन के भीतर सब कुछ सामान्य है.
पिछले तीन महीनों में कांग्रेस नेताओं के कई ऐसे बयान सामने आए हैं, जिन्होंने सपा-कांग्रेस रिश्तों को लेकर राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल बयानबाजी नहीं, बल्कि सीटों की सौदेबाजी से पहले अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने की रणनीति भी हो सकती है. गठबंधन की राजनीति में अक्सर बातचीत शुरू होने से पहले दोनों दल अपने-अपने समर्थकों को यह संदेश देने की कोशिश करते हैं कि वे कमजोर स्थिति में नहीं हैं. उत्तर प्रदेश में भी कुछ ऐसा ही होता दिखाई दे रहा है.
हालांकि इस पूरे घटनाक्रम के बीच दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व ने गठबंधन पर कोई नकारात्मक संकेत नहीं दिया है. राहुल गांधी कई बार सार्वजनिक मंचों से विपक्षी एकता की बात दोहरा चुके हैं, जबकि अखिलेश यादव भी BJP को हराने के लिए व्यापक विपक्षी एकजुटता की जरूरत बताते रहे हैं. ऐसे में सवाल यह है कि क्या राज्य स्तर पर दिए जा रहे बयान महज दबाव बनाने की रणनीति हैं या गठबंधन के भीतर वास्तविक असहजता की झलक?
लोकसभा की सफलता के बाद बदल गया राजनीतिक समीकरण
2024 के लोकसभा चुनाव ने उत्तर प्रदेश की राजनीति का समीकरण बदल दिया. सपा और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा और INDIA गठबंधन ने राज्य में 43 सीटें जीतकर BJP के नेतृत्व वाले NDA को 36 सीटों पर रोक दिया. इस प्रदर्शन ने दोनों दलों को यह भरोसा दिया कि साथ रहने पर BJP को चुनौती दी जा सकती है. इसी सफलता के बाद अब विधानसभा चुनाव के लिए सीट बंटवारे का सवाल सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है.
कांग्रेस का तर्क है कि लोकसभा चुनाव में उसके साथ आने से विपक्षी मतों का बेहतर ध्रुवीकरण हुआ और सपा को भी इसका लाभ मिला. इसलिए विधानसभा चुनाव में उसे सम्मानजनक हिस्सेदारी मिलनी चाहिए. दूसरी ओर सपा का कहना है कि विधानसभा और लोकसभा चुनाव का गणित अलग होता है. विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार की स्थानीय पकड़, संगठन और जीतने की क्षमता सबसे बड़ा पैमाना होना चाहिए. इसलिए सीटों का बंटवारा भी इसी आधार पर होना चाहिए, न कि केवल राजनीतिक दावों के आधार पर. राजनीतिक विश्लेषक और अवध गर्ल्स डिग्री कालेज, लखनऊ की प्राचार्य प्रो. बीना राय के अनुसार दोनों दल अभी अपने शुरुआती दांव खेल रहे हैं. कांग्रेस अधिक सीटों की सार्वजनिक मांग करके बातचीत की शुरुआती सीमा ऊंची रखना चाहती है, जबकि सपा सीटों की संख्या बताने से बचकर अपने विकल्प खुले रखना चाहती है;
बयानों से बढ़ी तल्खी लेकिन शीर्ष नेतृत्व का संदेश अलग
पिछले कुछ महीनों में कांग्रेस नेताओं के बयानों ने गठबंधन को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा पैदा की है. 13 जुलाई को सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कहा कि भविष्य में कोई भी गठबंधन 50-50 की साझेदारी के आधार पर होना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ आने से सपा को अधिक लाभ मिला. इसके पहले जून में भी मसूद ने सपा की संगठनात्मक संरचना, मुस्लिम प्रतिनिधित्व और भविष्य की सीट साझेदारी पर सवाल उठाए थे. उनके बयानों के बाद सपा नेताओं ने कांग्रेस हाईकमान से सार्वजनिक बयानबाजी पर नियंत्रण रखने की मांग की थी.
हाल ही में सपा के राज्यसभा सांसद रामजी लाल सुमन ने बिना नाम लिए कहा कि कुछ लोग बेवजह बयान देकर गठबंधन की मर्यादा तोड़ रहे हैं. अगर गठबंधन को मजबूत रखना है तो सार्वजनिक संयम जरूरी है. इसी बीच उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम का बयान भी चर्चा में रहा. उन्होंने स्पष्ट कहा कि कांग्रेस इस बार सम्मान और बराबरी के आधार पर चुनाव लड़ना चाहती है. राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे इस संकेत के रूप में देखा कि कांग्रेस अब 'छोटे भाई' की भूमिका स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है. कांग्रेस के भीतर यह तर्क भी दिया जा रहा है कि अगर पार्टी अपनी राजनीतिक जमीन दोबारा तैयार करना चाहती है तो उसे पर्याप्त सीटों पर चुनाव लड़ना ही होगा. दूसरी तरफ सपा नेताओं का कहना है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 107 सीटें मिली थीं, लेकिन वह केवल सात सीटें जीत सकी थी। इसलिए केवल दावों के आधार पर सीटें तय नहीं हो सकतीं.
पुराने घटनाक्रम भी बने नए विवाद की पृष्ठभूमि
यह पहला अवसर नहीं है जब दोनों दलों के बीच सार्वजनिक मतभेद सामने आए हों. 2024 लोकसभा चुनाव से पहले भी सीट बंटवारे के दौरान कांग्रेस ने श्रावस्ती सीट की अतिरिक्त मांग की थी. हालांकि बाद में कांग्रेस नेतृत्व ने 17 सीटों के फॉर्मूले को अंतिम मानते हुए विवाद समाप्त कर दिया था. इसी वर्ष मई में कांग्रेस सांसद तनुज पुनिया और पार्टी के अनुसूचित जाति विभाग के तत्कालीन अध्यक्ष राजेंद्र पाल गौतम की BSP प्रमुख मायावती से मुलाकात की कोशिश ने भी राजनीतिक चर्चाओं को हवा दी. यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ जब राहुल गांधी उत्तर प्रदेश दौरे पर थे.
बाद में पार्टी नेतृत्व ने दोनों नेताओं से स्पष्टीकरण मांगा था लेकिन इसके कुछ सप्ताह बाद राजेंद्र पाल गौतम को उत्तर प्रदेश का प्रभारी नियुक्त कर दिया गया. कांग्रेस के कुछ नेताओं की ओर से समय-समय पर BSP के साथ संभावित राजनीतिक समझ की चर्चा भी होती रही है. हालांकि BSP ने कभी ऐसे संकेतों को गंभीरता से नहीं लिया. प्रो. बीना राय का कहना है कि कांग्रेस इन संकेतों के जरिए सपा पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश कर सकती है, ताकि सीट बंटवारे की बातचीत में उसकी स्थिति मजबूत रहे. हालांकि यह रणनीति उलटी भी पड़ सकती है क्योंकि इससे विपक्षी एकता पर सवाल खड़े होते हैं.
दबाव की राजनीति या गठबंधन की वास्तविक चुनौती?
सपा नेताओं का दावा है कि कांग्रेस के कुछ नेता मीडिया की सुर्खियां बटोरने के लिए ऐसे बयान दे रहे हैं, जबकि शीर्ष नेतृत्व की सोच इससे अलग है. उनका कहना है कि राहुल गांधी लगातार विपक्षी एकता की बात कर रहे हैं और अखिलेश यादव भी अपने नेताओं को गठबंधन पर गैर-जरूरी बयान देने से बचने की सलाह दे चुके हैं. 1 जुलाई को राहुल गांधी ने अखिलेश यादव को जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हुए सोशल मीडिया पर लिखा था कि "पीडीए की भागीदारी से हम मिलकर सामाजिक न्याय के संकल्प को पूरा करेंगे." इस संदेश को दोनों दलों के रिश्तों में भरोसे के संकेत के रूप में देखा गया.
सपा नेताओं का यह भी तर्क है कि गठबंधन का विचार खुद राहुल गांधी ने आगे बढ़ाया था और बाद में व्यापक विपक्षी एकता बनी. उनका कहना है कि अगर विपक्ष को BJP के खिलाफ प्रभावी चुनौती पेश करनी है तो सार्वजनिक बयानबाजी से बचना होगा. हालांकि जानकारों का मानना है कि अंतिम फैसला राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच होने वाली बातचीत से ही निकलेगा. राज्य स्तर के नेता चाहे जितने बयान दें, गठबंधन का भविष्य दोनों शीर्ष नेताओं की राजनीतिक प्राथमिकताओं पर निर्भर करेगा.