श्रावस्ती एनकाउंटर पर कोर्ट ने क्यों बिठाई CBI जांच?
उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती में मई 2025 के कथित पुलिस एनकाउंटर पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं. 23 पुलिसकर्मियों की मौजूदगी और 15 मीटर से दोनों पैरों में गोली लगने समेत कई सवालों की अब CBI जांच करेगी

श्रावस्ती एनकाउंटर मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर को होगी
उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती में मई 2025 में हुआ कथित पुलिस एनकाउंटर अब खुद पुलिस की कहानी के कटघरे में खड़ा है. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने मामले की परिस्थितियों, एफआईआर में दर्ज घटनाक्रम और पुलिस के दावों में ऐसे विरोधाभास पाए हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच जरूरी मानी गई.
कोर्ट ने कथित एनकाउंटर की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपते हुए तीन महीने में रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है. अदालत ने न केवल पुलिस की एफआईआर में दर्ज तथ्यों पर सवाल उठाए, बल्कि तत्कालीन एसएचओ अश्विनी कुमार दुबे की कथित निशानेबाजी की क्षमता की भी जांच करने को कहा है.
मामला 12 मई 2025 का है. इससे तीन दिन पहले, 9 मई को इकौना थाने में सात साल की बच्ची के अपहरण के आरोप में छोटकऊ उर्फ अलाउद्दीन के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी. 12 मई को तत्कालीन एसएचओ अश्विनी कुमार दुबे की ओर से दूसरी एफआईआर दर्ज कराई गई.
पुलिस का दावा था कि अलाउद्दीन नेपाल भागने की कोशिश कर रहा था और उसे पकड़ने के लिए पुलिस टीम ने घेराबंदी की. इसी दौरान आरोपी ने पुलिस पर फायरिंग की और जवाबी कार्रवाई में एसएचओ ने दो गोलियां चलाईं, जो उसके दोनों पैरों में लगीं.
यहीं से पुलिस की कहानी पर सवाल शुरू होते हैं. एसएचओ के मुताबिक रात के अंधेरे में उन्होंने हथियार लोड किए जाने की आवाज सुनी. इसके बाद करीब 15 मीटर की दूरी से अपनी 9 एमएम सर्विस पिस्टल से आत्मरक्षा में दो गोलियां चलाईं. दोनों गोलियां आरोपी के दोनों पैरों में लगीं.
पुलिस के इस दावे को कोर्ट ने जांच का विषय माना है. CBI को यह पता लगाने के लिए कहा गया है कि क्या वास्तव में एसएचओ रात के अंधेरे में केवल हथियार लोड होने की आवाज सुनकर 15 मीटर की दूरी से दो सटीक गोलियां चला सकते थे.
सवाल सिर्फ निशानेबाजी का नहीं है. पुलिस की एफआईआर में मौजूद घटनाक्रम भी अदालत की नजर में असामान्य है. याचिकाकर्ता के वकील नदीम मुर्तज़ा ने दलील दी कि एफआईआर के मुताबिक शुरुआत में 13 पुलिसकर्मी एक ही सरकारी वाहन में सवार थे. बाद में पुलिस टीम तीन हिस्सों में बंट गई और कथित तौर पर 10 सदस्यों वाली SWAT टीम भी वहां पहुंची.
इस तरह घटनास्थल पर पुलिसकर्मियों की संख्या 23 हो गई. अब सवाल यह है कि अगर घटनास्थल पर 23 हथियारबंद पुलिसकर्मी मौजूद थे तो ई-रिक्शा से जा रहे एक व्यक्ति को रोकने में इतनी मुश्किल क्यों हुई?
पुलिस का दावा है कि आरोपी ने पुलिस टीम पर गोली चलाई, लेकिन इस फायरिंग में किसी पुलिसकर्मी को चोट नहीं लगी. इसके उलट पुलिस की जवाबी कार्रवाई में आरोपी के दोनों पैरों में गोली लगी. अदालत ने इसी विरोधाभास को गंभीरता से देखा.
मामले में एक और महत्वपूर्ण सवाल कथित कबूलनामे को लेकर उठा है. सात साल की बच्ची के अपहरण की पहली एफआईआर घटना के 61 मिनट के भीतर दर्ज की गई थी. कोर्ट ने पाया कि इस मूल एफआईआर में रेप, ब्लीडिंग या बच्ची को चोट लगने जैसी बातों का उल्लेख नहीं था. लेकिन बाद में सामने आए कथित कबूलनामे में इन घटनाओं का जिक्र किया गया.
अदालत ने प्रथमदृष्टया आशंका जताई कि कहीं यह कबूलनामा बाद में तैयार तो नहीं कराया गया. यह बिंदु इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जिस अपराध के सिलसिले में कथित कबूलनामा हासिल किए जाने की बात सामने आई, उसमें अलाउद्दीन को बाद में बरी किया जा चुका है.
यानी पुलिस ने जिस उपलब्धि को अपने ‘गुड वर्क’ के तौर पर पेश किया, उसकी बुनियाद ही अदालत के फैसले के बाद सवालों में आ गई. सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि कथित एनकाउंटर में शामिल सभी 23 पुलिसकर्मियों को अच्छे काम के लिए पुरस्कृत किया गया था.
इनमें उस अपराध का कबूलनामा हासिल करना भी उपलब्धि के रूप में शामिल था, जिसमें आरोपी बाद में बरी हो गया. इससे जांच की निष्पक्षता और पुलिस की कार्रवाई के बाद तैयार किए गए रिकॉर्ड की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होते हैं.
कोर्ट ने एफआईआर में मौजूद इन विसंगतियों को महज तकनीकी कमी मानने के बजाय मामले की तह तक जाने की जरूरत महसूस की. पीठ ने प्रथमदृष्टया माना कि एसएचओ ने घटना का गलत विवरण प्रस्तुत किया प्रतीत होता है. यही वजह है कि जांच किसी स्थानीय पुलिस एजेंसी के बजाय CBI को सौंपने का फैसला किया गया.
अदालत ने CBI को इकौना थाने में भारतीय न्याय संहिता की धारा 109 और आर्म्स एक्ट की धारा 3/25 के तहत दर्ज एफआईआर में लगाए गए आरोपों की सच्चाई की जांच करने को कहा है. जांच का दायरा सिर्फ गोली चलने की घटना तक सीमित नहीं रहेगा.
पुलिस टीम की मौजूदगी, घटनास्थल की परिस्थितियां, हथियारों का इस्तेमाल, फायरिंग का तरीका, एसएचओ की शूटिंग क्षमता और आरोपी के कथित कबूलनामे की परिस्थितियां भी जांच के दायरे में हैं.
इस मामले में 9 मई की पहली एफआईआर और 12 मई की एनकाउंटर वाली एफआईआर के बीच का अंतर भी जांच का अहम हिस्सा बन सकता है. पहली एफआईआर में जिन गंभीर तथ्यों का उल्लेख नहीं था, उनका बाद के कथित कबूलनामे में आना पुलिस की जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाता है.
यह देखना जरूरी होगा कि इन तथ्यों का स्रोत क्या था और उन्हें रिकॉर्ड में कब तथा किस आधार पर शामिल किया गया. एनकाउंटर के बाद आरोपी के दोनों पैरों में गोली लगना भी मामले का महत्वपूर्ण पहलू है.
पुलिस के अनुसार फायरिंग आत्मरक्षा में की गई थी. लेकिन यदि पुलिस का दावा सही है तो 23 हथियारबंद पुलिसकर्मियों के बीच आरोपी ने फायरिंग कैसे की, पुलिस ने उसे पहले क्यों नहीं काबू किया और जवाबी फायरिंग में केवल उसके दोनों पैरों को ही गोली क्यों लगी, ये सवाल जांच के केंद्र में हैं.
कोर्ट ने 9 एमएम गोली के आकार और आरोपी के पैरों में आए घावों के विवरण में कथित अंतर को भी नोट किया है. अब CBI के सामने यह पता लगाने की चुनौती होगी कि घटनास्थल के भौतिक साक्ष्य, मेडिकल रिकॉर्ड और पुलिस के बयान एक-दूसरे से मेल खाते हैं या नहीं.
इस आदेश का एक दूसरा असर भी महत्वपूर्ण है. हाईकोर्ट ने श्रावस्ती की सत्र अदालत में अलाउद्दीन के खिलाफ चल रही कार्यवाही पर रोक लगा दी है. यानी अब आगे की न्यायिक प्रक्रिया CBI की जांच के निष्कर्षों से प्रभावित होगी.
मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर को होगी और तब तक CBI से तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट दाखिल करने की अपेक्षा की गई है. हालांकि पूरे मामले में अभी यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि पुलिस एनकाउंटर फर्जी था.
हाईकोर्ट ने भी अंतिम रूप से ऐसा निष्कर्ष नहीं दिया है. लेकिन अदालत ने जिन सवालों को उठाया है, वे इतने गंभीर हैं कि पुलिस की पूरी कार्रवाई की स्वतंत्र जांच जरूरी हो गई है. खासकर तब, जब एक ही घटनाक्रम में पुलिसकर्मियों की संख्या, आरोपी की कथित फायरिंग, एसएचओ की सटीक निशानेबाजी, मेडिकल चोटों, कथित कबूलनामे और पुलिसकर्मियों को दिए गए पुरस्कार तक कई सवाल एक साथ सामने आ रहे हैं.