शिवराज सिंह ने मध्य प्रदेश में अपनी ही सरकार के फैसले पर क्यों उठाए सवाल?

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मध्य प्रदेश के अपने संसदीय क्षेत्र में आदिवासियों को वन भूमि से हटाने के मामले में दखल दिया है और राज्य सरकार से नाराजगी जताई है

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान (फाइल फोटो)

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक बार फिर BJP शासित मध्य प्रदेश में वन विभाग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. पूर्व मुख्यमंत्री का यह रुख तब सामने आया जब सीहोर जिले के कोसमी गांव में बरेला आदिवासी समुदाय के लोगों की 12 झोपड़ियां ढहा दी गईं.

कोसमी गांव बुधनी विधानसभा क्षेत्र में आता है. चौहान मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए इसी सीट का प्रतिनिधित्व करते थे. बुधनी, चौहान के विदिशा लोकसभा क्षेत्र में भी आता है.

बरेला मध्य प्रदेश में अधिसूचित आदिवासी समुदाय है. पिछले साल जून में भी चौहान ने खिवनी वन्यजीव अभयारण्य में वन विभाग की अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई का विरोध किया था. उस दौरान वन भूमि से आदिवासी लोगों के करीब 50 घर हटाए गए थे. इस कार्रवाई के बाद सीहोर के संभागीय वन अधिकारी का तबादला कर दिया गया था.

11 अक्टूबर को वन विभाग और स्थानीय प्रशासन ने कोसमी में झोपड़ियां ढहा दीं, कुओं को बंद कर दिया और खड़ी फसल नष्ट कर दी. अधिकारियों का दावा था कि ये सभी वन भूमि पर बने थे.

राज्य वन विकास निगम के प्रबंधक तरुण कौरव के मुताबिक, "12 परिवारों ने 31.48 हेक्टेयर वन भूमि पर अतिक्रमण किया था. उन्हें पहले ही जमीन खाली करने के नोटिस दिए जा चुके थे और 2025 से कार्रवाई की जा रही थी. वन भूमि खाली करने के लिए 15 दिन का समय दिया गया था लेकिन अतिक्रमण करने वालों ने ऐसा नहीं किया. इसके बाद उन्हें वहां से हटा दिया गया."

विस्थापित आदिवासी परिवारों के साथ शिवराज सिंह चौहान

संबंधित जमीन वन विभाग ने वन विकास निगम को हस्तांतरित की थी. यह राज्य सरकार के अधीन एक निकाय है, जो लकड़ी के उत्पादन और बिक्री से जुड़ा है.

कार्रवाई की जानकारी मिलने पर चौहान गांव पहुंचे और विरोध प्रदर्शन में शामिल हो गए. उन्होंने मीडिया से कहा, "मैंने राज्य के मुख्य सचिव से बात की है और अपनी नाराजगी जताई है. मैंने स्थानीय प्रशासन से कहा था कि वहां रहने वाले लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई न की जाए क्योंकि वे लंबे समय से वहां रह रहे हैं."

उन्होंने अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की. साथ ही आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री मोहन यादव को बदनाम करने के लिए साजिश रची गई है.

बाद में चौहान ने प्रदेश BJP अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल से भी बात की. उन्होंने कहा कि वे इस मामले पर मुख्यमंत्री से भी चर्चा करेंगे. चौहान ने कहा, "मेरे निर्वाचन क्षेत्र में जो हुआ, वह अन्याय की पराकाष्ठा है. सुबह तक जिन घरों में लोग रह रहे थे वे अब उजड़ चुके हैं. खड़ी फसल भी नष्ट कर दी गई है. ऐसा करने वालों में संवेदनशीलता नहीं है. भगवान उन्हें माफ नहीं करेगा."

दूसरी तरफ मुख्यमंत्री यादव ने कहा, "यह मामला मेरे संज्ञान में लाया गया है. हम इसकी जांच करवाएंगे." उन्होंने कहा कि विस्थापित लोगों को अस्थाई आवास और भोजन उपलब्ध कराया जाएगा. दिलचस्प बात यह है कि चौहान ने दावा किया कि जिन आदिवासी लोगों को हटाया गया वे BJP के मतदाता थे और उन्होंने विधानसभा तथा लोकसभा चुनावों में पार्टी का समर्थन किया था. उन्होंने कहा, "इन्हीं वोटों की बदौलत मोहन जी (मोहन यादव) मुख्यमंत्री बने हैं."

हालांकि उनके इस बयान से यह सवाल भी उठता है कि क्या BJP को वोट देने से किसी को कानून से छूट मिल जाती है.

राजनीतिक जानकार इस घटना को चौहान और यादव के बीच चल रहे व्यापक मतभेदों के संदर्भ में देख रहे हैं. दिसंबर 2023 में यादव ने चौहान की जगह मुख्यमंत्री का पद संभाला था. दोनों के बीच तनाव की वजहों में आदिवासी समुदायों को प्रभावित करने वाली प्रशासनिक कार्रवाई, चौहान के कार्यकाल में शुरू की गई कल्याणकारी नीतियों में बदलाव और यादव सरकार की कृषि नीति शामिल हैं.

जुलाई में मूंग की खरीद में देरी से नाराज किसानों ने भोपाल में चौहान के आवास पर पहुंचकर प्रदर्शन किया था. यह घटनाक्रम भी चौहान को रास नहीं आया था.

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