IAS शिखर अग्रवाल पर कार्रवाई के बाद सीएम भजनलाल शर्मा के फैसले पर क्यों उठे सवाल?
राजस्थान सरकार ने IAS अधिकारी शिखर अग्रवाल और उनकी IPS पत्नी प्रशाखा माथुर को संपत्ति से जुड़े आरोपों के बाद पद से हटा दिया है

राजस्थान सरकार ने 1993 बैच के वरिष्ठ IAS अधिकारी शिखर अग्रवाल और उनकी पत्नी प्रशाखा माथुर को अगले आदेश तक APO (पोस्टिंग आदेश की प्रतीक्षा) में रखा गया है यानी उन्हें वर्तमान पद से हटा दिया गया है. प्रशाखा माथुर 1995 बैच की IPS अधिकारी हैं.
इन दोनों पर बड़े पैमाने पर अचल संपत्ति जमा करने के आरोप लगे हैं. यह मामला तब सामने आया जब पता चला कि सरकार को दी गई उनकी सालाना संपत्ति रिपोर्ट में अजाबगढ़ और उदयपुर के अनंता रिसॉर्ट्स में खरीदे गए 40 विला की पूरी जानकारी नहीं दी गई थी.
आरोप है कि इनमें से कुछ विला उनके दो बेटों और माता-पिता के नाम पर खरीदे गए थे. इन विला को कथित तौर पर बेहद कम कीमत पर खरीदा गया, जबकि इन्हें वापस उसी रिसॉर्ट कंपनी को लीज पर देने से हर साल भारी कमाई भी हो रही थी. इससे मनी लॉन्ड्रिंग और भ्रष्टाचार का शक पैदा हुआ है.
फिलहाल इस मामले में राज्य के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) ने शुरुआती जांच दर्ज की है. वहीं सोशल मीडिया पर भी इस मामले को लेकर बहस तेज हो गई है. लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या इसकी जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) को भी नहीं करनी चाहिए.
रिपोर्ट के मुताबिक, हर विला की खरीद कीमत 14 लाख रुपए से 16.5 लाख रुपए के बीच थी. रिसॉर्ट की ब्रांडिंग को देखते हुए ये कीमतें काफी कम लगती हैं. आरोप है कि अग्रवाल परिवार ने कुल 6.15 करोड़ रुपए का निवेश कर इन संपत्तियों को वापस कंपनी को लीज पर दे दिया. इसके बदले परिवार को हर साल 1.8 करोड़ रुपए का रिटर्न मिल रहा था. इसमें हर साल बढ़ोतरी का भी प्रावधान था.
उदयपुर की ज्यादातर संपत्तियों के समझौतों पर 2019 से 2023 के बीच हस्ताक्षर हुए थे. अग्रवाल का कहना है कि इन निवेशों की जानकारी उन्होंने आयकर रिटर्न और संपत्ति रिपोर्ट में दी थी. उनके करीबी अधिकारियों ने इन खबरों को 2030 में रिटायरमेंट से पहले मुख्य सचिव बनने की उनकी संभावनाओं को नुकसान पहुंचाने की साजिश बताया है. उनका दावा है कि संपत्तियों की कीमत सरकार की तय आरक्षित दरों के आसपास दिखाई गई थी. इन दरों को डिस्ट्रिक्ट लेवल कमेटी (DLC) रेट कहा जाता है.
अनंता का कारोबारी मॉडल यह है कि कंपनी अपने ब्रांड के तहत कॉटेज और विला बेचती है और फिर उन्हें खरीदारों से वापस लीज पर ले लेती है. हालांकि अग्रवाल परिवार को मिलने वाले कथित रिटर्न पर सवाल उठ रहे हैं. मार्च 2026 में अजाबगढ़ की 20 संपत्तियों की रजिस्ट्री हुई थी. इन्हें गोयल फैशन्स प्राइवेट लिमिटेड ने बेचा था जिसे कथित तौर पर अनंता की मूल कंपनी माना जाता है. इसी दौरान वित्त विभाग ने एक आदेश जारी कर बड़ी छूट दी थी.
28 अक्टूबर को APO में रखे जाने तक अग्रवाल उद्योग विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव और राजस्थान इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट एंड इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (RIICO) के चेयरपर्सन थे. उन्होंने दिसंबर 2024 में हुए राइजिंग राजस्थान समिट में निवेश के लिए किए गए वादों को लागू कराने में मदद की थी.
मार्च 2026 में दी गई छूट से पहले 14 फरवरी को बोर्ड ऑफ इन्वेस्टमेंट की बैठक हुई थी. इसकी अध्यक्षता मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने की थी. इस बैठक में अग्रवाल के अलावा उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़, मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास, मुख्यमंत्री के अतिरिक्त मुख्य सचिव अखिल अरोड़ा, वित्त विभाग के प्रमुख सचिव वैभव गालरिया और सुरेश ओला शामिल थे. सुरेश ओला अब RIICO के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं.
इस पूरे मामले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या अजबगढ़ को यह छूट दिलाने में सिर्फ अग्रवाल की भूमिका थी? क्या यह फैसला निष्पक्ष तरीके से लिया गया था? और क्या राइजिंग राजस्थान समिट के वादों और समझौता ज्ञापनों से जुड़े दूसरे प्रोजेक्ट्स को भी दी गई छूट की समीक्षा होनी चाहिए?
अग्रवाल ने अमेरिका से इंडिया टुडे से खास बातचीत में सफाई देते हुए कहा, "हमारे नाम पर जितनी भी संपत्तियां हैं, उन सभी की जानकारी अचल संपत्ति रिपोर्ट (IPR) में सही तरीके से दी गई है. मेरे ससुराल वालों और बेटों ने जो संपत्तियां खरीदी हैं, उनका भुगतान उन्होंने अपने बैंक खातों से किया है."
उन्होंने आगे कहा, "राज्य में कई दूसरे होटलों को भी प्रोत्साहन पैकेज दिए गए हैं. सालों से खरीदी जा रही संपत्तियों और इस प्रोत्साहन पैकेज को देने के बीच कोई संबंध नहीं है."
जांच करने वाले अधिकारी इस बात की भी पड़ताल कर सकते हैं कि क्या इस मामले में किसी को फायदा पहुंचाने के बदले कोई लाभ लिया गया था या निवेश में ऐसे पैसे का इस्तेमाल हुआ था, जो कहीं और से मिला था. गोयल फैशन्स के मैनेजिंग डायरेक्टर संजय गोयल ने कहा कि छूट देने का फैसला हालिया सेल डीड से पहले ही लिया गया था. उनके मुताबिक, संपत्तियां बाजार भाव पर बेची गई थीं और लीज का भुगतान कंपनी के मुनाफे और नुकसान पर निर्भर करता था. उन्होंने यह भी कहा कि अग्रवाल और उनके परिवार के लोग पहले भी विला और कॉटेज खरीद चुके हैं.
अग्रवाल को पद से हटाने का आदेश मुख्यमंत्री शर्मा ने दिया था. इससे पहले 2016 में भी अग्रवाल सुर्खियों में आए थे. उस समय वे जयपुर विकास आयुक्त के पद पर थे. उन्होंने जयपुर के पूर्व राजपरिवार की संपत्ति राजमहल पैलेस के गेट बंद करने का आदेश दिया था. उस समय BJP विधायक रहीं राजकुमारी दिया कुमारी भी इस विवाद में शामिल थीं. इसके बाद अग्रवाल को इस पद से हटा दिया गया था और पैलेस के गेट खोल दिए गए थे.
इसके बाद अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के दौरान अग्रवाल तीन साल से ज्यादा समय तक कम चर्चित पदों पर रहे. बाद में उन्हें वन विभाग की जिम्मेदारी दी गई. फरवरी 2024 में शर्मा के नेतृत्व में BJP सरकार बनने के बाद उन्हें मुख्यमंत्री का अतिरिक्त मुख्य सचिव नियुक्त किया गया.
अग्रवाल की इस नियुक्ति से उस समय कई लोग हैरान थे. वे उनके काम करने के तरीके को जानते थे. उन्हें काफी आक्रामक अधिकारी माना जाता था. दिया कुमारी के करीबी लोग पहले आरोप लगा चुके हैं कि अग्रवाल ने उनके और मुख्यमंत्री शर्मा के बीच, साथ ही उनके और वसुंधरा राजे के बीच मतभेद पैदा करने की कोशिश की थी.
अग्रवाल एक ताकतवर अधिकारी बन गए थे. कई मौकों पर उनका मुख्य सचिव सुधांश पंत से टकराव भी हुआ. सुधांश पंत को केंद्र सरकार ने नियुक्त किया था और बाद में वे वापस केंद्र में चले गए.
अग्रवाल के खिलाफ शर्मा सरकार की कार्रवाई ऐसे समय में हुई है, जब वरिष्ठ नौकरशाहों पर भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर खबरें आ रही हैं और सोशल मीडिया पर भी नाराजगी देखने को मिल रही है. इस कार्रवाई को लेकर मुख्यमंत्री ने इंडिया टुडे से कहा, "मैं गलत काम करने वाले किसी भी व्यक्ति को नहीं बख्शूंगा."
अब सोशल मीडिया पर लोग IAS और IPS अधिकारियों के साथ-साथ नेताओं के नाम भी खुलकर ले रहे हैं. उन पर आय के ज्ञात स्रोतों से ज्यादा संपत्ति जमा करने के आरोप लगाए जा रहे हैं. इस मामले में आगे कोई कार्रवाई होती है या नहीं, यह मुख्यमंत्री और केंद्रीय एजेंसियों पर निर्भर करेगा.
हाल के वर्षों में अशोक सिंघवी और सुबोध अग्रवाल जैसे अधिकारी भी भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल जा चुके हैं. अशोक सिंघवी वसुंधरा राजे सरकार के दौरान खनन विभाग के प्रमुख थे. वहीं सुबोध अग्रवाल हाल ही में अतिरिक्त मुख्य सचिव के पद से रिटायर हुए थे. इससे पहले वे जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (PHED) के प्रमुख थे और जल जीवन मिशन की जिम्मेदारी भी संभाल रहे थे. इस बीच शिखर अग्रवाल का मामला नौकरशाही के काले पक्ष को लेकर लंबे समय से बनी आम लोगों की राय को और मजबूत करता दिख रहा है.