सत्यजीत रे के संस्थान में विवाद पर नसीर बोले लेकिन बंगाल के कलाकार चुप क्यों?

SRFTI विवाद पर पश्चिम बंगाल के कला जगत की ओर से मजबूत प्रतिक्रिया नहीं दिखी है जबकि राज्य को राजनीतिक रूप से मुखर सिनेमा और मुद्दों पर खुलकर बोलने वाले कलाकारों की अपनी विरासत पर गर्व रहा है

Naseeruddin Shah
नसीरुद्दीन शाह (फाइल फोटो)

कई बार चुप्पी भी अन्याय के बराबर हो जाती है. पिछले कुछ दिनों में दिग्गज अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने कोलकाता के सत्यजीत रे फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (SRFTI) के प्रदर्शनकारी छात्रों के समर्थन में आवाज उठाई है. 

वहीं कर्नाटक संगीत के गायक टी.एम. कृष्णा ने ओडिशा में आदिवासी समुदायों के बीच काम करने वाले एक डॉक्टर की गिरफ्तारी की निंदा की है. इन दोनों हस्तक्षेपों से एक असहज सवाल उठता है: भारत के बाकी सांस्कृतिक जगत की आवाजें कहां हैं, खासकर पश्चिम बंगाल के फिल्म उद्योग की?

SRFTI के छात्रों के समर्थन में नसीरुद्दीन शाह का वीडियो संदेश स्पष्ट था. उन्होंने बंगाल की BJP सरकार पर अपने आलोचकों से बदला लेने का आरोप लगाते हुए कहा, "BJP वह खूनी झूठी पार्टी, बंगाल चुनाव में जोड़-तोड़ से जीत हासिल करने के बाद अब उन सभी से बदला लेने पर आमादा दिख रही है जो उसकी विचारधारा और नीतियों से सहमत नहीं हैं."

उन्होंने आरोप लगाया कि छात्रों को कारण बताओ नोटिस, निगरानी, धमकियों और हॉस्टल खाली करने के आदेशों के जरिए निशाना बनाया जा रहा है. शाह ने कहा, "जो BJP अपने पक्ष में बेशर्मी से किए जा रहे दुष्प्रचार को बढ़ावा देने और उसका समर्थन करने से भी संतुष्ट नहीं है, वह अब इस देश के भावी फिल्मकारों का ब्रेनवॉश करने या उन्हें डराने की उम्मीद कर रही है. मैं आपको भरोसा दिला सकता हूं कि ऐसा नहीं होने वाला." उन्होंने "सही सोच रखने वाले सभी नागरिकों" से छात्रों का समर्थन करने की अपील की.

SRFTI में विरोध प्रदर्शन

यह विवाद 27 सितंबर और 4 अक्टूबर को हुई झड़पों के बाद सामने आया. इसके बाद SRFTI के छात्रों ने प्रशासन की जवाबदेही तय करने और संस्थान के कुलपति संतोष अजमेरा के इस्तीफे की मांग की. वहीं संस्थान ने अनुशासन के उल्लंघन का हवाला दिया है. इस टकराव को लेकर दोनों पक्षों की ओर से अलग-अलग आरोप लगाए गए हैं. ऐसे में निष्पक्ष जांच और छात्रों के अधिकारों की रक्षा जरूरी है.

बंगाल का फिल्म उद्योग कहां है?

यह विवाद एक बड़ा सवाल भी खड़ा करता है: अगर छात्रों को असहमति जताने के परिणाम भुगतने का डर हो तो क्या कोई प्रमुख फिल्म संस्थान रचनात्मक स्वतंत्रता की जगह बना रह सकता है?

बंगाल के लिए इस सवाल में खास विडंबना है. राज्य को अपनी बौद्धिक परंपराओं, राजनीतिक रूप से मुखर सिनेमा और उस सांस्कृतिक इतिहास पर गर्व है जिसे सत्ता को चुनौती देने वाले कलाकारों ने आकार दिया. सत्यजीत रे की विरासत आज भी बंगाल की इसी पहचान का अहम हिस्सा है.

इसके बावजूद जब रे के नाम पर बने संस्थान के छात्र हिंसा के आरोपों और अनुशासनात्मक कार्रवाई से जुड़े विवाद में उलझे हों तो बंगाली फिल्म उद्योग की ओर से व्यापक प्रतिक्रिया नजर नहीं आती.

यह कहना गलत होगा कि किसी ने भी आवाज नहीं उठाई है. फिल्मकार पायल कपाड़िया ने छात्रों के साथ एकजुटता जताई है. उन्होंने संस्थान में हुए घटनाक्रम पर कहा कि वे इससे "बेहद भयभीत" हैं. निर्देशक और SRFTI के पूर्व छात्र कानू बहल ने भी हिंसा की निंदा की है और छात्रों की सुरक्षा की मांग की है.

इसके बावजूद सवाल है कि बंगाल के ज्यादा चर्चित अभिनेता, निर्देशक और सांस्कृतिक हस्तियां SRFTI में जवाबदेही तय करने और सुरक्षित परिसर सुनिश्चित करने की मांग में सार्वजनिक रूप से शामिल क्यों नहीं हुई हैं?

चुप्पी का मतलब मौन समर्थन नहीं होता. लेकिन राजनीतिक गणनाएं और विचारों में मतभेद यह तय कर सकते हैं कि कोई व्यक्ति खुलकर बोलना चाहता है या नहीं. फिर भी, सार्वजनिक रूप से आवाज उठाने वालों की सीमित संख्या सवाल खड़े करती है. क्या अपनी प्रगतिशील विरासत का जश्न मनाने वाला यह उद्योग राजनीतिक हालात असहज होने पर भी असहमति की रक्षा करने को उतना ही तैयार है?

एक डॉक्टर, गिरफ्तारी और एकजुटता की राजनीति

कृष्णा की प्रतिक्रिया तुलना का एक और आधार देती है. इस संगीतकार ने ओडिशा के कालाहांडी जिले में डॉ. रैंडल सिक्वेरा और दलित कार्यकर्ता लक्ष्मण नायक की गिरफ्तारी की आलोचना की है.

डॉ. रैंडल सिक्वेरा (बाएं) और लक्ष्मण नायक (दाएं)

सिक्वेरा आदिवासी समुदायों के बीच काम करने के लिए इस इलाके में आए थे. वे आदिवासी जमीन और आजीविका को प्रभावित करने वाली खनन परियोजनाओं का विरोध करते रहे हैं. उन्हें और नायक को 16 अक्टूबर को एक ऐसे मामले में गिरफ्तार किया गया जो सिजिमाली बॉक्साइट खनन परियोजना से जुड़े काम का विरोध कर रहे ग्रामीणों और पुलिस के बीच हुई झड़प के बाद दर्ज किया गया था.

सिक्वेरा और नायक पर हत्या के प्रयास और दंगा करने समेत गंभीर आरोप लगाए गए हैं. पुलिस का आरोप है कि दोनों ने टकराव के दौरान ग्रामीणों को उकसाया. लेकिन उनके समर्थकों का कहना है कि ये गिरफ्तारियां खनन और आदिवासी जमीन के नुकसान के खिलाफ हो रहे विरोध को अपराध बनाने की कोशिश का हिस्सा हैं.

कृष्णा ने कहा, "मैं यह भी समझता हूं कि इस पूरे मामले में जिस तरह से कार्रवाई की गई है, उसमें प्रक्रिया से जुड़ी गंभीर समस्याएं हैं. उन पर हर तरह के आपराधिक आरोप लगा दिए गए हैं." उन्होंने दावा किया कि जमीन के अधिकारों के लिए प्रदर्शन करने वाले आम आदिवासियों और दलितों को भी प्रताड़ित किया जा रहा है.

कृष्णा का वीडियो इस विवाद को व्यापक नैतिक संदर्भ में रखता है. आदिवासी समुदायों की जमीन पर कब्जे के खतरे की ओर ध्यान दिलाते हुए उन्होंने कहा, "इसे रोका जाना चाहिए." उनकी टिप्पणी गिरफ्तारी से आगे बढ़कर उन समुदायों के भविष्य पर ध्यान केंद्रित करती है जिनकी जमीन, जंगलों और संसाधनों तक पहुंच खतरे में है. साथ ही, उन लोगों के हालात पर भी जो इन समुदायों के साथ खड़े हैं.

आवाज उठाने या चुप रहने की कीमत

शाह और कृष्णा की कलात्मक परंपराएं अलग-अलग हैं लेकिन उनकी प्रतिक्रियाओं में एक साझा सिद्धांत है: राजनीतिक मुद्दों पर बोलना और कला के क्षेत्र में सक्रिय रहना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं. भारत का सांस्कृतिक इतिहास ऐसे कलाकारों से भरा है जिन्होंने सरकारों को चुनौती दी, सामाजिक ऊंच-नीच का विरोध किया और हाशिये पर पड़े समुदायों की ओर ध्यान दिलाया. हालांकि, एकजुटता हमेशा समान रूप से नहीं दिखाई गई है. आवाज उठाने की इच्छा मुद्दे, राजनीतिक माहौल और उसके संभावित नतीजों के हिसाब से बदल सकती है.

हालांकि सार्वजनिक चुप्पी मिलीभगत का सबूत नहीं है. ज्यादा अहम सवाल यह है कि क्या सांस्कृतिक जगत बुनियादी सिद्धांतों की लगातार रक्षा कर सकता है: असहमति जताने का अधिकार, हिंसा से सुरक्षा, संस्थागत जवाबदेही और निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया. और यह सब सत्ता में बैठे लोगों की राजनीतिक पहचान से परे होना चाहिए.

बंगाल के फिल्म उद्योग के लिए SRFTI विवाद एक तात्कालिक परीक्षा है. यह विवाद कोलकाता के एक फिल्म संस्थान और वहां पढ़ रहे उन छात्रों से जुड़ा है, जो आगे चलकर फिल्मकार बनेंगे. यह भी अहम है कि उन्हें किस माहौल में दुनिया को समझने और उसे पर्दे पर दिखाने की सीख मिलती है.

शाह ने आवाज उठाई है. कपाड़िया और बहल ने भी अपनी बात रखी है. कृष्णा ने ओडिशा में आदिवासी अधिकारों, विकास और असहमति से जुड़े संघर्ष की ओर ध्यान दिलाया है. इन हस्तक्षेपों की जगह निष्पक्ष जांच या न्यायसंगत कानूनी प्रक्रिया नहीं ले सकती. लेकिन ये जरूर दिखाते हैं कि राजनीतिक रूप से असुविधाजनक होने पर भी आवाज उठाना संभव है.

बंगाल के सांस्कृतिक जगत के सामने सवाल यह नहीं है कि हर अभिनेता को कार्यकर्ता बन जाना चाहिए. सवाल यह है कि अपनी बौद्धिक विरासत पर इतना गर्व करने वाला उद्योग तब अपनी आवाज उठा सकता है या नहीं जब भावी फिल्मकारों की स्वतंत्रता और सुरक्षा दांव पर लगी हो.

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