BJP के साथ लेकिन सपा नेता से भी बात! संजय निषाद किस रणनीति पर चल रहे?
संजय निषाद के हालिया कदमों ने BJP और सपा, दोनों के बीच उनके अगले सियासी दांव को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं

संजय निषाद सपा नेता माता प्रसाद पांडेय के साथ
निषाद पार्टी या ‘निर्बल भारतीय शोषित हमारा आम दल’ के अध्यक्ष और योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री संजय निषाद ने 15 सितंबर को समाजवादी पार्टी (सपा) के वरिष्ठ नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय से मुलाकात की थी. अगले ही दिन उन्होंने सपा पर तीखा हमला बोला.
संजय निषाद की मौजूदा राजनीति को समझने के लिए ये दोनों घटनाएं साथ-साथ देखनी होंगी. माता प्रसाद पांडेय से उनके आवास पर मुलाकात के बाद संजय निषाद ने इसे शिष्टाचार भेंट बताया. उन्होंने कहा कि पांडेय उनके पुराने परिचित और मार्गदर्शक रहे हैं और उनकी तबीयत जानने गए थे.
लेकिन अगले ही दिन संजय निषाद ने सपा को जिस अंदाज में घेरा, उससे साफ हो गया कि मुलाकात को तत्काल किसी नए राजनीतिक समीकरण का संकेत मानना जल्दबाजी होगी.
उन्होंने 'शीशे के घर में रहने वालों' को पत्थर नहीं फेंकने की सलाह देते हुए सपा नेताओं से कहा कि वे निषाद पार्टी को कितनी सीटें मिलेंगी, इसकी चिंता करने के बजाय पहले कांग्रेस के साथ अपना सीट बंटवारा तय करें.
दरअसल संजय निषाद की मौजूदा राजनीति का केंद्र पाला बदलना नहीं बल्कि 2027 के चुनाव से पहले अपनी राजनीतिक सौदेबाजी की ताकत बढ़ाना है. BJP के साथ गठबंधन में रहते हुए भी वे सीटों की ज्यादा हिस्सेदारी और निषाद समुदाय की लंबित मांगों पर दबाव बना रहे हैं. उनका ताजा बयान इसी रणनीति का अगला चरण है.
मुलाकात से दबाव की राजनीति तक
15 सितंबर की मुलाकात का समय महत्वपूर्ण था. इससे कुछ दिन पहले ही गोंडा के निषाद समुदाय से आने वाले व्यापारी विनोद साहनी की हत्या को लेकर संजय निषाद अपनी ही सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरे थे. पहले उन्होंने लखनऊ के KGMU में धरना दिया और फिर गोंडा में प्रदर्शन किया.
उन्होंने आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की थी. गोंडा मामले में पुलिस ने तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया और लापरवाही के आरोप में तीन पुलिसकर्मियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की.
इस प्रकरण ने संजय निषाद को एक असहज स्थिति में खड़ा किया. वे योगी सरकार में मत्स्य पालन मंत्री हैं और उनकी पार्टी BJP की सहयोगी है, लेकिन मामला उनके अपने सामाजिक आधार से जुड़े व्यक्ति की हत्या का था. ऐसे में सरकार के भीतर रहते हुए समुदाय के आक्रोश को आवाज देना उनके लिए राजनीतिक रूप से जरूरी था.
उन्होंने खुद भी स्पष्ट किया था कि उनका धरना BJP सरकार से मतभेद का संकेत नहीं है और समुदाय की मदद सरकार में रहते हुए ही की जा सकती है. इसी दौरान सपा के OBC प्रकोष्ठ के प्रमुख राजपाल कश्यप समेत विपक्षी नेताओं की धरने में मौजूदगी ने राजनीतिक तस्वीर को और जटिल बना दिया.
सपा ने भी साहनी के मामले को लेकर सरकार को घेरा. अखिलेश यादव की ओर से परिवार के पक्ष में आवाज उठाई गई. इस तरह एक स्थानीय आपराधिक घटना निषाद समुदाय तक राजनीतिक पहुंच की कोशिश में बदल गई.
माता प्रसाद पांडेय से मुलाकात ने इसी पृष्ठभूमि में अटकलों को जन्म दिया. इसी दौरान संजय निषाद ने BJP को लेकर अपना संदेश और स्पष्ट कर दिया. उन्होंने कहा कि जब सपा ने उनके लिए दरवाजे बंद किए थे तब वे BJP में गए थे. अगर BJP भी ऐसा करती है तो दूसरे विकल्पों पर विचार करना पड़ेगा.
साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जो पक्ष निषाद समुदाय की चिंताओं को गंभीरता से लेगा और उनकी लंबित मांगों को हल करने की दिशा में काम करेगा, निषाद पार्टी उसके साथ खड़ी होगी.
यह भाषा सीधे तौर पर गठबंधन तोड़ने की घोषणा नहीं है. बल्कि BJP के सामने यह संकेत है कि 2027 में सीटों के बंटवारे और समुदाय की मांगों को लेकर बातचीत में निषाद पार्टी अपनी स्थिति कमजोर नहीं मानती.
सीटों की हिस्सेदारी सबसे बड़ा सवाल
2027 के लिए संजय निषाद की प्रमुख मांग ज्यादा विधानसभा सीटों की है. 2022 में निषाद पार्टी ने 16 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे. अब वे खासकर उन सीटों पर बड़ी भूमिका चाहती है जहां पिछली बार BJP को हार मिली थी.
संजय निषाद का तर्क है कि निषाद पार्टी अपने सामाजिक आधार और संगठन के जरिए ऐसी सीटों पर BJP को वापस जीत दिलाने में मदद कर सकती है. यह मांग भी अचानक सामने नहीं आई है. 2021 में 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले संजय निषाद BJP से बड़ी संख्या में सीटें मांग चुके थे.
उस समय उन्होंने उपमुख्यमंत्री पद की दावेदारी तक सामने रखी थी. यानी चुनाव से पहले सीटों और सत्ता में हिस्सेदारी बढ़ाने की उनकी रणनीति पुरानी है. निषाद समुदाय के प्रभाव को लेकर पार्टी की ओर से बड़े दावे किए जाते रहे हैं. संजय निषाद और पार्टी के नेता दावा करते हैं कि समुदाय लगभग 80 विधानसभा सीटों पर नतीजे तय करने की स्थिति में है और 160 से अधिक सीटों पर असर डाल सकता है.
अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक आकलनों में संख्या अलग हो सकती है लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश और नदियों के किनारे बसे क्षेत्रों में निषाद मतदाताओं की भूमिका को राजनीतिक दल महत्वपूर्ण मानते हैं. समुदाय की आबादी को लेकर भी अलग-अलग अनुमान हैं जिनमें उत्तर प्रदेश की कुल आबादी में 5 से 9 प्रतिशत तक के आंकड़े सामने आते हैं.
निषाद समुदाय केवल एक जाति तक सीमित सामाजिक समूह नहीं है. इसमें मल्लाह, बिंद, मांझी, केवट, कश्यप, तुरहा, मझवा, बाथम, बेलदार, चाई और तियार जैसी उपजातियों का उल्लेख किया जाता है. इन समूहों की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति क्षेत्र के हिसाब से बदलती है.
यही वजह है कि निषाद पार्टी अपने राजनीतिक प्रभाव को सिर्फ एक जाति के वोट के रूप में नहीं बल्कि व्यापक नदी-आधारित अति पिछड़ा सामाजिक आधार के रूप में पेश करती है.
आरक्षण का सवाल अब भी कायम
सीटों के बाद दूसरा बड़ा मुद्दा निषाद समुदाय की आरक्षण संबंधी मांग है. निषाद पार्टी की लंबे समय से मांग है कि OBC श्रेणी में शामिल कई निषाद उपसमूहों को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल किया जाए. संजय निषाद इस मुद्दे को लगातार राजनीतिक एजेंडे में बनाए हुए हैं.
उन्होंने हाल में निषादों के लिए 9 फीसदी आरक्षण की मांग भी उठाई है. यही वह मुद्दा है जिस पर संजय निषाद की राजनीति की सबसे कठिन परीक्षा है. BJP के साथ गठबंधन और सरकार में मंत्री पद मिलने के बावजूद समुदाय की यह मूल मांग पूरी नहीं हुई है.
सपा इसी को आधार बनाकर BJP और संजय निषाद दोनों पर निशाना साध रही है. सपा का कहना है कि 2022 के चुनाव से पहले आरक्षण को लेकर आश्वासन दिए गए थे लेकिन मांग पूरी नहीं हुई.
संजय निषाद का जवाब भी राजनीतिक है. उनका कहना है कि अगर सपा वास्तव में निषादों की हितैषी है तो वह भी इस मांग को पूरा करने के लिए कदम उठाए. गोंडा प्रकरण के दौरान उन्होंने सपा पर यह कहते हुए हमला किया था कि निषाद समुदाय को OBC श्रेणी में रखने का फैसला उसी के शासन में हुआ था.
इस तरह आरक्षण का मुद्दा सिर्फ सामाजिक अधिकार का सवाल नहीं रह गया है. यह 2027 के चुनाव में राजनीतिक प्रतिनिधित्व और गठबंधन की सौदेबाजी का भी हिस्सा बन चुका है.
BJP के साथ तालमेल
संजय निषाद की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उनके बयानों में BJP से दूरी और गठबंधन की पुष्टि दोनों साथ-साथ दिखाई देती हैं. सितंबर की शुरुआत में गोंडा प्रकरण पर उनके प्रदर्शन के बाद भी उन्होंने कहा था कि इससे BJP से उनके मतभेद नहीं माने जाने चाहिए.
BJP की तरफ से भी उनके ताजा बयान को गठबंधन संकट के रूप में नहीं लिया गया. पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता दिनेश प्रताप सिंह ने कहा कि संजय निषाद BJP के सहयोगी और मंत्री हैं तथा उन्हें किसी से मिलने की स्वतंत्रता है.
उन्होंने यह भी कहा कि निषाद NDA का हिस्सा बने रहेंगे. यानी दोनों तरफ से दरवाजा बंद नहीं किया गया है.
2019 से 2027 तक बदलता समीकरण
निषाद पार्टी 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले BJP नेतृत्व वाले NDA में शामिल हुई थी. संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद ने BJP के टिकट पर संतकबीर नगर से चुनाव जीता. 2022 के विधानसभा चुनाव में गठबंधन कायम रहा और चुनाव के बाद संजय निषाद योगी आदित्यनाथ मंत्रिमंडल में शामिल हुए.
इस गठबंधन ने संजय निषाद को सत्ता में प्रतिनिधित्व दिया लेकिन उनके सामने अपने समुदाय के बीच यह साबित करने की चुनौती भी बनी रही कि गठबंधन से निषाद समाज को वास्तविक राजनीतिक लाभ मिल रहा है. 2027 से पहले यही सवाल फिर सामने है.
दूसरी ओर सपा भी निषाद-कश्यप-बिंद जैसे समूहों को अपने PDA सामाजिक गठजोड़ में अधिक मजबूती से जोड़ने की कोशिश कर रही है. हाल के महीनों में दोनों प्रमुख खेमों की ओर से समुदाय तक पहुंच बढ़ी है.
ऐसे में संजय निषाद के लिए अपने सामाजिक आधार पर पकड़ बनाए रखना उतना ही जरूरी है जितना BJP के साथ सीटों की बातचीत करना. इसलिए माता प्रसाद पांडेय से मुलाकात और अगले दिन सपा पर हमला, दोनों घटनाएं एक ही रणनीति के दो हिस्से दिखाई देती हैं.
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार 2027 से पहले संजय निषाद के सामने तीन स्पष्ट मोर्चे हैं: BJP से ज्यादा सीटों की हिस्सेदारी हासिल करना, निषादों की आरक्षण और अन्य लंबित मांगों पर सरकार से ठोस आश्वासन लेना और सपा की उस कोशिश को रोकना जिसमें निषाद-कश्यप-बिंद जैसे सामाजिक समूहों को PDA के साथ जोड़ा जा रहा है.
इस पूरी कवायद में उनका सबसे बड़ा हथियार निषाद वोट का दावा है. BJP के लिए यह वोट पूर्वांचल और कई नदी किनारे के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण है जबकि सपा इसे अपने व्यापक पिछड़ा सामाजिक गठजोड़ का हिस्सा बनाना चाहती है.
संजय निषाद इसी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच अपनी जगह और कीमत दोनों बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. 2027 के चुनाव तक यह दबाव की राजनीति कितनी सीटों, कितनी हिस्सेदारी और समुदाय की कितनी मांगों में बदलती है, यही उनके मौजूदा राजनीतिक दांव की असली परीक्षा होगी.