संभल हिंसा पर आयोग की रिपोर्ट कैसे बदलेगी पश्चिमी यूपी का चुनावी समीकरण?

संभल हिंसा पर न्यायिक आयोग की रिपोर्ट अब सिर्फ एक जांच दस्तावेज नहीं रह गई बल्कि इसके निष्कर्ष विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ध्रुवीकरण, कानून-व्यवस्था और राजनीतिक जवाबदेही की बहस को नई धार दे सकते हैं

संभल हिंसा के दौरान का मंजर
संभल हिंसा के दौरान का मंजर

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव करीब आता जा रहा है और तेजी से चुनावी मुद्दों की बुनियाद भी रखी जा रही है. पांच अगस्त को विधानसभा में पेश की गई संभल हिंसा पर तीन सदस्यीय न्यायिक आयोग की रिपोर्ट केवल एक जांच रिपोर्ट नहीं है, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति का नया दस्तावेज बनती दिखाई दे रही है. 

जिस तरह आयोग ने 24 नवंबर 2024 की हिंसा को ‘पूर्व नियोजित साजिश’ करार देते हुए समाजवादी पार्टी के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क, विधायक नवाब इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल तथा मस्जिद प्रबंधन समिति के पदाधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं, उससे यह साफ है कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) आने वाले विधानसभा चुनाव में इसे अपने सबसे प्रभावी राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करेगी. 

इस रिपोर्ट का समय भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है. विधानसभा में रिपोर्ट पेश होने के बाद अब यह केवल सरकारी दस्तावेज नहीं रहेगी, बल्कि BJP के चुनावी भाषणों, प्रेस कॉन्फ्रेंसों और जनसभाओं का स्थाई हिस्सा बनने की पूरी संभावना है. 

न्यायिक आयोग की रिपोर्ट में सपा सांसद जिया उर रहमान की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं

दूसरी ओर समाजवादी पार्टी इस रिपोर्ट को राजनीतिक बदले की कार्रवाई और सरकार के प्रभाव में तैयार किया गया दस्तावेज बताकर जनता के बीच अपनी बात रखने की कोशिश करेगी. यानी आने वाले महीनों में संभल की हिंसा केवल कानून व्यवस्था का मामला नहीं रहेगी बल्कि राजनीतिक विमर्श का केंद्रीय विषय बन जाएगी.

संभल से पश्चिमी यूपी तक ध्रुवीकरण की नई पटकथा

न्यायिक आयोग ने अपनी रिपोर्ट में केवल 24 नवंबर 2024 की हिंसा का विश्लेषण नहीं किया है बल्कि संभल के सांप्रदायिक इतिहास, दंगों की पृष्ठभूमि और सामाजिक संरचना का भी विस्तार से उल्लेख किया है. 

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि शहर में लंबे समय से सांप्रदायिक तनाव का इतिहास रहा है और समय-समय पर हुई हिंसाओं ने सामाजिक विभाजन को गहरा किया. यही वह हिस्सा है जिसे BJP चुनावी अभियान में सबसे ज्यादा प्रमुखता दे सकती है. 

पार्टी पहले से ही कानून व्यवस्था, दंगा मुक्त शासन और बुलडोजर कार्रवाई को अपनी उपलब्धियों के रूप में पेश करती रही है. अब न्यायिक आयोग की रिपोर्ट उसके लिए यह कहने का आधार बन सकती है कि पूर्ववर्ती राजनीतिक संरक्षण के कारण संभल जैसे क्षेत्रों में कट्टरपंथ और हिंसा को बढ़ावा मिला. 

राजनीतिक विश्लेषक विवेक नौटि‍याल कहते हैं, "संभल रिपोर्ट का सबसे बड़ा असर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उन जिलों में दिखाई देगा जहां हिंदू-मुस्लिम आबादी का संतुलन चुनावी परिणाम तय करता है. BJP इस रिपोर्ट को सुरक्षा, कानून व्यवस्था और सांप्रदायिक हिंसा के मुद्दे से जोड़ेगी, जबकि सपा इसे राजनीतिक प्रतिशोध का उदाहरण बताएगी. इससे चुनावी ध्रुवीकरण तेज होना लगभग तय है." 

संभल हिंसा के कुछ दिनों बाद सरकार ने यहां कई घरों-दुकानों पर बुलडोजर चलवा दिया था (सांकेतिक तस्वीर)

मुरादाबाद, संभल, अमरोहा, रामपुर, बिजनौर और मेरठ मंडल की कई सीटों पर सांप्रदायिक मुद्दों का असर पहले भी देखा गया है. ऐसे में आयोग की रिपोर्ट चुनावी चर्चा को स्थानीय मुद्दों से हटाकर पहचान की राजनीति की ओर मोड़ सकती है. 

बर्क और इकबाल परिवार की राजनीति पर सबसे बड़ा दबाव

संभल की राजनीति में पिछले कई दशकों से दो परिवारों का प्रभाव रहा है. एक ओर बर्क परिवार है तो दूसरी ओर नवाब इकबाल महमूद का राजनीतिक कुनबा. दोनों के बीच राजनीतिक मतभेद रहे हैं, लेकिन मुस्लिम मतदाताओं के बड़े हिस्से का समर्थन लंबे समय तक समाजवादी पार्टी के पक्ष में जाता रहा है. 

न्यायिक आयोग की रिपोर्ट ने पहली बार इन दोनों प्रभावशाली राजनीतिक परिवारों को सीधे विवाद के केंद्र में ला दिया है. रिपोर्ट के अनुसार 24 नवंबर की हिंसा अचानक नहीं हुई बल्कि उससे पहले की घटनाएं, वॉट्सएप मैसेज, नेताओं के सार्वजनिक बयान, मस्जिद परिसर में हुई गतिविधियां और सर्वे से पहले हुई बातचीत एक सुनियोजित रणनीति की ओर संकेत करती हैं. 

आयोग ने यह भी जिक्र किया कि कुंदरकी उपचुनाव में समाजवादी पार्टी की हार के बाद सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए और माहौल को और अधिक तनावपूर्ण बनाया. तत्कालीन डीएम और एसपी के बयान भी आयोग के सामने इसी दिशा में गए कि सर्वेक्षण के दौरान जनप्रतिनिधियों और उनके समर्थकों ने व्यवधान उत्पन्न किया तथा भीड़ को प्रभावित किया. 

BJP निश्चित रूप से इन तथ्यों को राजनीतिक मंचों पर बार-बार दोहराएगी. दूसरी ओर सांसद जिया-उर-रहमान बर्क पहले ही संकेत दे चुके हैं कि अगर रिपोर्ट में उनके खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष हैं तो वे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे. इसलिए यह विवाद अब केवल राजनीतिक नहीं बल्कि कानूनी मोर्चे पर भी आगे बढ़ सकता है. 

BJP के एक वरिष्ठ नेता का कहना है, "यह रिपोर्ट साबित करती है कि हिंसा स्वतःस्फूर्त नहीं थी. जनता को यह जानने का अधिकार है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के खिलाफ किसने माहौल बनाया. BJP कानून व्यवस्था और न्याय के मुद्दे पर जनता के बीच जाएगी." 

वहीं समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता का कहना है, "रिपोर्ट का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा है. अंतिम सत्य अदालत तय करेगी, न कि राजनीतिक बयानबाजी. BJP जनता के असली मुद्दों से ध्यान भटकाना चाहती है."

राम मंदिर, जौहर विश्वविद्यालय और अब संभल

2027 के विधानसभा चुनाव में राजनी‍तिक पार्टियां जिन मुद्दों को लेकर मैदान में उतर सकती है, उनमें अयोध्या राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े विवाद, रामपुर की जौहर यूनिवर्सिटी और अब संभल हिंसा की न्यायिक रिपोर्ट प्रमुख मानी जा रही है. 

सपा राम मंदिर से जुड़े विवादों के जरिए BJP पर आस्था की राजनीति करने का आरोप लगाएगी, जबकि BJP जौहर विश्वविद्यालय के मामले में वह आजम खान और तत्कालीन सपा सरकार के फैसलों को निशाने पर रखेगी. अब संभल रिपोर्ट BJP को एक और बड़ा राजनीतिक मुद्दा मिलता दिखाई दे रहा है. 

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में BJP की कोशिश होगी कि वह इस रिपोर्ट को कानून व्यवस्था और राष्ट्र सुरक्षा के व्यापक मुद्दे से जोड़े. आयोग ने अपनी रिपोर्ट में हिंसा को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताया है तथा विदेशी निर्मित 12 बोर के कारतूस मिलने का भी जिक्र किया है. 

हालांकि इन निष्कर्षों की राजनीतिक और कानूनी व्याख्या अलग-अलग हो सकती है लेकिन चुनावी मंच पर इनका प्रभाव निश्चित रूप से दिखाई देगा. राजनीतिक विश्लेषक संदीप कुमार वर्मा कहते हैं, "BJP चुनावों में हमेशा ऐसे मुद्दों को प्राथमिकता देती है जिनसे भावनात्मक और सुरक्षा संबंधी संदेश एक साथ जाए. संभल रिपोर्ट उसके लिए ऐसा ही अवसर है. लेकिन यह भी सच है कि यदि विपक्ष इसे राजनीतिक उत्पीड़न के रूप में स्थापित करने में सफल रहा तो इसका उल्टा असर भी संभव है." 

यानी यह मुद्दा जितना BJP के लिए अवसर है, उतनी ही चुनौती भी है कि वह इसे केवल सांप्रदायिक बहस तक सीमित न रहने दे.

समाजवादी पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह इस रिपोर्ट के राजनीतिक असर को सीमित रखे. पार्टी पहले से ही यह तर्क देती रही है कि जांच एजेंसियों और आयोगों का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को घेरने के लिए किया जा रहा है. अब वह संभवतः न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने तक किसी निष्कर्ष पर न पहुंचने की दलील देगी. 

सपा यह भी कोशिश करेगी कि चुनावी बहस को बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की समस्याओं, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों की ओर मोड़ा जाए. लेकिन BJP यदि लगातार संभल रिपोर्ट, जौहर विश्वविद्यालय और कानून व्यवस्था को केंद्र में रखती है तो विपक्ष के लिए यह आसान नहीं होगा.

Read more!