जाट-मुस्लिम राजनीति छोड़ हिंदुत्व की तरफ झुक रहे जयंत?
राष्ट्रीय लोकदल (RLD) जाट-मुस्लिम गठजोड़ पर जोर देती रही है लेकिन पार्टी के नए संसदीय दल में एक भी मुसलमान न होने से सवाल उठ रहा है कि क्या अब पार्टी प्रमुख जयंत चौधरी हिंदुत्व की तरफ झुक रहे हैं

राष्ट्रीय लोकदल (RLD) की राजनीति का सबसे मजबूत आधार कभी जाट और मुस्लिम समुदाय का सामाजिक गठजोड़ हुआ करता था. चौधरी चरण सिंह की किसान राजनीति और चौधरी अजित सिंह की चुनावी रणनीति इसी समीकरण के इर्द-गिर्द घूमती थी.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बागपत, मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ, बिजनौर और अमरोहा जैसे जिलों में RLD की पहचान केवल जाटों की पार्टी के रूप में नहीं, बल्कि जाट-मुस्लिम एकता की राजनीतिक धुरी के रूप में रही. लेकिन पिछले दो वर्षों में पार्टी की दिशा तेजी से बदलती दिखाई दे रही है.
BJP के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में शामिल होने के बाद अब RLD की राजनीतिक भाषा, संगठन और प्राथमिकताओं में बदलाव साफ नजर आने लगा है. 30 जून को घोषित पार्टी के संसदीय दल ने इस बदलाव पर लगी मुहर को और गहरा कर दिया है.
RLD अध्यक्ष और केंद्रीय राज्यमंत्री जयंत चौधरी ने पहली बार संसदीय दल का गठन किया. हाल में जेडीयू छोड़कर RLD में आए पूर्व सांसद केसी त्यागी को संसदीय दल का अध्यक्ष बनाकर पश्चिम उप्र के त्यागी समाज के साथ पूर्वांचल के भूमिहार समाज को भी साधने का प्रयास किया गया है. महत्वपूर्ण बात है कि संसदीय दल में RLD अध्यक्ष एवं केंद्रीय राज्यमंत्री जयंत चौधरी सदस्य होंगे.
सिवालखास से विधायक गुलाम मोहम्मद, थानाभवन विधायक अशरफ अली, बागपत चेयरमैन राजुद्दीन एडवोकेट, बड़ौत से हाजी जमीरुद्दीन अब्बासी समेत तमाम नाम ऐसे हैं जो RLD के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं लेकिन किसी को भी संसदीय दल में जगह नहीं मिली. 15 सदस्यीय दल में जाट, गुर्जर, त्यागी, यादव, राजपूत, दलित और अन्य सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व मिला लेकिन उत्तर प्रदेश से एक भी मुस्लिम नेता को जगह नहीं दी गई. केवल राजस्थान के पूर्व विधायक अब्दुल सगीर खान को सदस्य बनाया गया. यह फैसला इसलिए चर्चा में है क्योंकि पार्टी का राजनीतिक आधार पश्चिमी उत्तर प्रदेश है, जहां मुस्लिम मतदाता कई विधानसभा क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं.
RLD का कहना है कि संसदीय दल अनुभव और संगठनात्मक क्षमता के आधार पर बनाया गया है लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे सामान्य संगठनात्मक फेरबदल नहीं मान रहे. उनके मुताबिक यह 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी की नई सामाजिक रणनीति का हिस्सा है. पार्टी अब केवल जाट-मुस्लिम समीकरण पर निर्भर रहने के बजाय व्यापक हिंदू सामाजिक गठबंधन बनाने की कोशिश कर रही है. इसकी झलक संसदीय दल की संरचना में भी दिखाई देती है. जाट नेतृत्व के साथ त्यागी समाज को साधने के लिए JDU से आए के.सी. त्यागी को अध्यक्ष बनाया गया. गुर्जर, राजपूत, दलित, यादव और अन्य पिछड़े वर्गों के नेताओं को शामिल कर पार्टी ने यह संदेश देने की कोशिश की कि वह अब केवल एक जाति या दो समुदायों की पार्टी नहीं रहना चाहती.
सबसे बड़ा सवाल मुस्लिम प्रतिनिधित्व को लेकर उठ रहा है. BJP से गठबंधन से पहले तक RLD के मंचों पर मुस्लिम नेताओं की मजबूत मौजूदगी रहती थी. चौधरी अजित सिंह ने 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद जाट-मुस्लिम भाईचारे को फिर से स्थापित करने के लिए लगातार प्रयास किए थे. जयंत चौधरी ने भी शुरुआती वर्षों में नागरिकता संशोधन कानून (CAA), सांप्रदायिक तनाव और अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों पर खुलकर बयान दिए थे. लेकिन 2024 में NDA में शामिल होने के बाद स्थिति बदल गई. पार्टी के प्रमुख मुस्लिम चेहरों में शामिल पूर्व राज्यसभा सांसद शाहिद सिद्दीकी ने गठबंधन का विरोध करते हुए पार्टी छोड़ दी. इसके बाद संगठन में भी मुस्लिम नेताओं की भूमिका लगातार सीमित होती गई.
फिलहाल उत्तर प्रदेश विधानसभा में RLD के जिन मुस्लिम विधायकों की पहचान प्रमुख रूप से होती है, उनमें गुलाम मोहम्मद (सिवालखास, मेरठ) और अशरफ अली खान (थानाभवन, शामली) शामिल हैं. दोनों विधायक 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी-RLD गठबंधन के तहत जीते थे और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी के अहम मुस्लिम चेहरे माने जाते हैं. इसके अलावा बागपत नगर पालिका के पूर्व चेयरमैन राजुद्दीन एडवोकेट और बड़ौत के वरिष्ठ नेता हाजी जमीरुद्दीन अब्बासी लंबे समय से पार्टी से जुड़े रहे हैं. इसके बावजूद इनमें से किसी को संसदीय दल में जगह नहीं मिली. राजनीतिक संदेश साफ है. पार्टी फिलहाल मुस्लिम नेतृत्व को सामने रखकर अपनी नई राजनीति नहीं गढ़ना चाहती.
राजनीतिक विश्लेषक और मेरठ विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर विवेक नौटियाल बताते हैं, “जयंत चौधरी के सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी बदलाव दिखाई देता है. पिछले एक वर्ष में उन्होंने कई धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में भाग लिया. मंदिर दर्शन, सनातन संस्कृति, भारतीय विरासत और राष्ट्रवाद से जुड़े विषयों पर उनके बयान पहले की तुलना में अधिक दिखाई देने लगे हैं. मुख्यमंत्री योगी के साथ साझा मंचों पर भी उन्होंने विकास और सांस्कृतिक पहचान दोनों को समान महत्व दिया.” हालांकि उन्होंने कभी आक्रामक हिंदुत्व की भाषा नहीं अपनाई, लेकिन उनकी राजनीतिक शैली पहले की अपेक्षा BJP के वैचारिक फ्रेमवर्क के अधिक करीब दिखाई देती है.
उधर BJP लंबे समय से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों के साथ गैर-यादव ओबीसी, गुर्जर, त्यागी और दलित मतदाताओं का व्यापक गठबंधन बनाने में सफल रही है. RLD यदि इसी सामाजिक आधार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना चाहती है तो उसे अपनी पुरानी 'जाट-मुस्लिम पार्टी' वाली छवि बदलनी होगी. राजनीतिक विश्लेषक विवेक नौटियाल कहते हैं, "जयंत चौधरी जानते हैं कि BJP के साथ रहते हुए मुस्लिम तुष्टीकरण की छवि उन्हें राजनीतिक नुकसान पहुंचा सकती है इसलिए पार्टी अपनी सामाजिक पहचान बदल रही है." यह वैचारिक बदलाव कम और चुनावी सोशल इंजीनियरिंग ज्यादा है. RLD अपने पारंपरिक जाट आधार को बचाते हुए हिंदू पिछड़े वर्गों में विस्तार चाहती है.
समाजवादी पार्टी इस बदलाव को मुद्दा बना रही है. सपा नेता सुधीर पंवार का कहना है कि सत्ता में हिस्सेदारी के लिए RLD ने चौधरी चरण सिंह की समावेशी राजनीति छोड़ दी है. उनका आरोप है कि BJP के साथ गठबंधन के बाद पार्टी ने अपने सबसे भरोसेमंद मुस्लिम समर्थकों को हाशिये पर धकेल दिया है. कांग्रेस भी यही सवाल उठा रही है कि जिस पार्टी ने वर्षों तक जाट-मुस्लिम भाईचारे की राजनीति की, वही आज मुस्लिम नेतृत्व को संगठन से बाहर क्यों कर रही है.
RLD इन आरोपों को खारिज करती है. RLD के संसदीय दल में शामिल हुए पूर्वांचल के ब्राह्मण नेता अनिल दुबे का कहना है कि संसदीय दल किसी जातीय या धार्मिक आधार पर नहीं बनाया गया. उनका दावा है कि संगठन में सभी वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व दिया गया है और मुस्लिम कार्यकर्ता आज भी पार्टी की ताकत हैं. पार्टी यह भी कहती है कि उसकी प्राथमिकता किसान, नौजवान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के मुद्दे हैं, न कि सांप्रदायिक राजनीति. पार्टी के नेताओं का तर्क है कि BJP के साथ गठबंधन का अर्थ यह नहीं कि RLD ने अपनी मूल विचारधारा छोड़ दी है. उनके अनुसार, चौधरी चरण सिंह की किसान राजनीति आज भी पार्टी की आधारशिला है.
इस बदलाव की असल परीक्षा 2027 के विधानसभा चुनाव में होगी. पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कई सीटों पर मुस्लिम मतदाता 20 से 45 प्रतिशत तक हैं. यदि मुस्लिम मतदाता पूरी तरह समाजवादी पार्टी या कांग्रेस की ओर चले जाते हैं तो RLD को कुछ क्षेत्रों में नुकसान हो सकता है. वहीं यदि पार्टी जाटों के साथ गुर्जर, त्यागी, राजपूत, दलित और गैर-यादव ओबीसी मतदाताओं के बीच मजबूत आधार बना लेती है तो उसका राजनीतिक दायरा पहले से कहीं बड़ा हो सकता है. यही वजह है कि संसदीय दल के गठन को सामान्य संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि 2027 की चुनावी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है. यह रणनीति BJP के साथ तालमेल बनाए रखते हुए RLD की अलग पहचान गढ़ने का प्रयास भी है.