राम मंदिर ट्रस्ट में ‘राम’ से ज्यादा रार

राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के बाद ट्रस्ट और निर्माण समिति के बीच बढ़ी दूरी ने अधिकारों और फैसलों को लेकर नई बहस छेड़ दी है. 2 सितंबर की बैठक पर सबकी नजर है

ayodhya ram mandir trust meeting
राम मंदिर ट्रस्ट की एक बैठक (फाइल फोटो/मयंक शुक्ला)

राम मंदिर निर्माण के साथ अयोध्या में एक ऐसा विवाद भी आकार ले रहा है, जिसने अब श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट और राम मंदिर निर्माण समिति के बीच बढ़ती दूरी को सार्वजनिक बहस का विषय बना दिया है. 

छह जून को सामने आए चढ़ावा चोरी मामले के बाद शुरू हुआ यह विवाद अब धीरे-धीरे अधिकार, निर्णय प्रक्रिया और मंदिर परिसर के संचालन से जुड़े सवालों में बदलता दिख रहा है. इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय और मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र दिखाई दे रहे हैं. 

2 सितंबर को ट्रस्ट की अहम बैठक होने वाली है और उससे पहले अयोध्या में दोनों खेमों की सक्रियता ने इस सवाल को और बड़ा कर दिया है कि क्या मंदिर निर्माण पूरा होने के साथ ट्रस्ट और निर्माण समिति के बीच शक्ति संतुलन का नया दौर शुरू हो गया है? 

चंपत राय की बढ़ी गतिविधियां, उनके नाम से सामने आया नौ पन्नों का दस्तावेज, नृपेंद्र मिश्र की उस पर तीखी प्रतिक्रिया, ट्रस्ट और निर्माण समिति की लगातार बैठकों में एक-दूसरे के प्रतिनिधियों की गैरमौजूदगी और अब ट्रस्ट के पूर्व ऑडिटर महिपाल सिंह का पत्र, इन सबने विवाद को एक नए मोड़ पर पहुंचा दिया है.

चढ़ावा चोरी के बाद शुरू हुई दूरी

राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का मामला सामने आने के बाद ट्रस्ट और निर्माण समिति के बीच संबंधों को लेकर सवाल पहली बार इतने खुले तौर पर उठे. छह जून को मामला सामने आया तो निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र ने सार्वजनिक रूप से बेहद तीखी प्रतिक्रिया दी. 

18 जून से दिल्ली में अलग-अलग टीवी चैनलों को दिए इंटरव्यू में उन्होंने घटना को चोरी के बजाय डकैती तक बताया. हालांकि उस समय उनका यह भी कहना था कि उनकी जिम्मेदारी मुख्य रूप से मंदिर निर्माण तक सीमित है. इसके बावजूद चढ़ावे और मंदिर की व्यवस्थाओं से जुड़े सवालों पर उनकी मुखर प्रतिक्रिया सामने आई. 

18 जून को नृपेंद्र मिश्र ने कुछ टीवी चैनलों को इंटरव्यू दिया था

23 जून के बाद मिश्र ने इस मुद्दे पर सार्वजनिक बयान देने से दूरी बना ली. इसके बाद छह जुलाई को ट्रस्ट की बैठक हुई लेकिन पहले की बैठकों में नियमित रूप से शामिल रहने वाले नृपेंद्र मिश्र उसमें मौजूद नहीं थे. दूसरी ओर जुलाई में हुई निर्माण समिति की बैठक में ट्रस्ट की ओर से कोई पदाधिकारी मौजूद नहीं रहा. 19 से 21 अगस्त तक हुई निर्माण समिति की बैठक में भी यही स्थिति बनी रही. 

यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पहले निर्माण समिति की बैठकों में ट्रस्ट की ओर से पूर्व महासचिव चंपत राय, ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्र और निर्माण प्रभारी गोपाल राव की मौजूदगी नियमित मानी जाती थी. अब चंपत राय और डॉ. अनिल मिश्र दोनों अपने पदों पर नहीं हैं और निर्माण समिति की बैठकों में ट्रस्ट की ओर से किसी पदाधिकारी की मौजूदगी दिखाई नहीं दे रही है. 

दूसरी तरफ ट्रस्ट की बैठकों में भी निर्माण समिति के अध्यक्ष की गैरमौजूदगी ने सवाल खड़े किए हैं. ट्रस्ट से जुड़े सूत्रों का दावा है कि करीब छह महीने पहले से ही नृपेंद्र मिश्र ने मंदिर की व्यवस्थाओं से खुद को अलग करना शुरू कर दिया था. उनका फोकस धीरे-धीरे सिर्फ निर्माण कार्यों तक सीमित होता गया. 

जानकारी के मुताबिक पहले निर्माण और व्यवस्थाओं से जुड़े छोटे-बड़े मुद्दों पर एक साथ चर्चा होती थी, लेकिन बाद में मिश्र ने व्यवस्थाओं से जुड़े मामलों को ट्रस्ट के अधिकार क्षेत्र का विषय बताते हुए उनसे दूरी बनानी शुरू कर दी. 

चंपत राय का नौ पन्नों का दस्तावेज

इसी पृष्ठभूमि में 18 अगस्त को चंपत राय के नाम से सामने आया नौ पन्नों का दस्तावेज पूरे विवाद का सबसे बड़ा केंद्र बन गया. दस्तावेज में राम मंदिर निर्माण के दौरान नृपेंद्र मिश्र की भूमिका का विस्तार से उल्लेख किया गया है. इसमें मिश्र को मंदिर परियोजना के निर्माण और उसके प्रबंधन में बेहद प्रभावशाली भूमिका निभाने वाले व्यक्ति के तौर पर पेश किया गया है. 

18 अगस्त को चंपत राय के नाम से आए दस्तावेज के बाद विवाद बढ़ गया (फाइल फोटो)

दस्तावेज में कहा गया है कि निर्माण समिति के अध्यक्ष के रूप में मिश्र ने अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों को साथ लाकर निर्माण कार्य को गति देने के लिए अहम निर्णय लिए. लार्सन एंड टुब्रो यानी एलएंडटी और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स जैसी बड़ी कंपनियों के चयन में उनकी भूमिका का उल्लेख किया गया है. 

मंदिर के मूल वास्तुकार चंद्रकांत सोमपुरा को परियोजना के साथ बनाए रखने और परिसर की दूसरी संरचनाओं के लिए अलग एजेंसियों को लगाने का भी जिक्र है. राय के दस्तावेज के मुताबिक मिश्र ने निर्माण के दौरान विशेषज्ञों, इंजीनियरों और सलाहकारों के साथ तालमेल बैठाया तथा तकनीकी चुनौतियों पर लगातार सलाह ली. इसमें उन्हें 2020 में शुरू हुए बड़े पैमाने के पत्थर के मंदिर निर्माण को कोविड महामारी जैसे कठिन दौर में आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला बताया गया है. 

दस्तावेज सिर्फ मुख्य मंदिर तक सीमित नहीं है. इसमें 70 एकड़ के पूरे मंदिर परिसर के विकास में भी मिश्र की भूमिका का उल्लेख किया गया है. राय के मुताबिक मिश्र ने उत्तर प्रदेश सरकार से बातचीत शुरू की, जिसके बाद ट्रस्ट को रामकथा म्यूजियम की इमारत को फिर से विकसित करने के लिए हासिल करने में मदद मिली. 

लेकिन इसी दस्तावेज को लेकर विवाद का दूसरा पहलू सामने आया. इसमें कथित तौर पर यह आरोप भी लगाया गया कि नृपेंद्र मिश्र मंदिर निर्माण समिति में अपने फायदे के कुछ लोगों को लेकर आए थे और कई अहम फैसले उनके स्तर से ही लिए जाते थे. 

21 अगस्त को अयोध्या के सर्किट हाउस में जब नृपेंद्र मिश्र से इस दस्तावेज के बारे में पूछा गया तो उन्होंने साफ कहा कि उन्हें ऐसा कोई पत्र मिला ही नहीं. उनका कहना था, "कौन सा लेटर? मैंने ऐसा कोई लेटर नहीं देखा है." उन्होंने कहा कि जब तक वे पत्र नहीं देख लेते, तब तक इसे मनगढ़ंत कहानी ही मानेंगे. 

मिश्र ने यह भी कहा कि नौ पन्नों के पत्र में ऐसी कोई आलोचना नहीं होगी. यानी उन्होंने दस्तावेज में लगाए गए आरोपों को सीधे तौर पर स्वीकार करने के बजाय उसकी प्रामाणिकता पर ही सवाल खड़ा कर दिया.

राम मंदिर निर्माण समिति और ट्रस्ट के बीच अधिकारों को लेकर कथिततौर पर विवाद है

इसी बीच रामकथा संग्रहालय के निदेशक डॉ. संजीव सिंह ने एक अलग तस्वीर पेश की. उनका कहना था कि मीडिया में जिस दस्तावेज को पत्र बताया जा रहा है वह वास्तव में कोई आलोचनात्मक पत्र नहीं बल्कि चंपत राय की प्रकाशित पुस्तक 'जस का तस' और आगामी पुस्तक से संबंधित प्रकाशित और परिमार्जित किए जा रहे बिंदु हैं. इससे दस्तावेज को लेकर विवाद और उलझ गया है.

अधिकारों की लड़ाई

विवाद के बीच नृपेंद्र मिश्र की भूमिका का दूसरा पक्ष भी सामने है. 19 से 21 अगस्त तक हुई निर्माण समिति की बैठक के बाद उन्होंने मंदिर निर्माण की प्रगति की जानकारी दी. उनके मुताबिक करीब 70 निर्माण कार्यों की योजना बनाई गई थी, जिनमें लगभग 60 पूरे हो चुके हैं. पूरे किए गए काम ट्रस्ट को सौंपे जा चुके हैं और उनके रखरखाव की जिम्मेदारी अब ट्रस्ट की होगी. 

उन्होंने मानसून के दौरान परिसर में पानी भरने की समस्या का समाधान करने के लिए सीवेज और ड्रेनेज सिस्टम को मुख्य नाले से जोड़ने की योजना की जानकारी दी. साथ ही म्यूजियम, ऑडिटोरियम और ट्रस्ट कार्यालय के निर्माण को अगला फोकस बताया. 

म्यूजियम की गैलरी नंबर सात पर करीब पांच करोड़ रुपए खर्च किए जाने की बात भी उन्होंने कही. प्रवेश शुल्क लिया जाएगा या नहीं, इसका फैसला ट्रस्ट करेगा, ऐसा उन्होंने स्पष्ट किया. यहीं से विवाद की मूल प्रकृति को समझने में मदद मिलती है. 

मंदिर निर्माण समिति का फोकस निर्माण, तकनीकी काम और इंफ्रास्ट्रक्चर पर है जबकि मंदिर परिसर के संचालन, श्रद्धालुओं की सुविधाओं और व्यवस्थाओं की अंतिम जिम्मेदारी ट्रस्ट के हिस्से आती है. निर्माण पूरा होने की दिशा में आगे बढ़ने के साथ दोनों संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र का सवाल स्वाभाविक रूप से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है. 

चंपत राय का नौ पन्नों का दस्तावेज इसी बदलाव के बीच आया. राय ने मंदिर आंदोलन से लेकर जमीन पर निर्माण शुरू होने तक अपने लंबे सफर का उल्लेख किया है. उन्होंने चंदा विवाद के दौरान अपने पद से इस्तीफा दिया था. अब उनकी अयोध्या में बढ़ी सक्रियता को भी इसी पृष्ठभूमि में देखा जा रहा है. 

राम मंदिर से जुड़े लोगों के मुताबिक राय पिछले कुछ दिनों से ट्रस्ट के सदस्यों, स्थानीय साधुओं, RSS और VHP नेताओं तथा आम लोगों से लगातार मिल रहे हैं. 

एक RSS नेता के हवाले से दावा किया गया कि वे साधुओं की बंद कमरे में होने वाली बैठकों में भी शामिल हो रहे हैं और हर दिन कई RSS तथा VHP नेता उनसे मुलाकात कर रहे हैं. वे अयोध्या के स्थानीय लोगों के पारिवारिक कार्यक्रमों में भी हिस्सा ले रहे हैं. 

2 सितंबर की बैठक में खुलेगा अगला अध्याय 

विवाद को नया आयाम ट्रस्ट के पूर्व ऑडिटर महिपाल सिंह के पत्र ने दिया है. सिंह ने ट्रस्ट के चेयरमैन नृत्य गोपाल दास को लिखे पत्र में कथित तौर पर चंपत राय को फिर से महासचिव बनाए जाने की कोशिशों पर आपत्ति जताई है. 

पत्र में कहा गया है कि ऐसा उस समय नहीं किया जाना चाहिए जब SIT की जांच में मंदिर में चढ़ावे की चोरी से जुड़े गंभीर सवाल सामने आए हैं. सिंह ने 2 सितंबर की बैठक में ट्रस्ट के सदस्यों के सामने अपना पत्र रखने की मांग की है. 

मणिराम छावनी से जुड़े एक सूत्र के मुताबिक सिंह का मानना है कि चंदे और चढ़ावे से जुड़े विवाद की पृष्ठभूमि में राय की संभावित वापसी पर सवाल उठना स्वाभाविक है. हालांकि सिंह से इस पत्र पर टिप्पणी के लिए संपर्क नहीं हो सका. 

महिपाल सिंह को नृपेंद्र मिश्र के करीबी लोगों में माना जाता है. दूसरी ओर मणिराम छावनी से जुड़े लोगों ने आरोप लगाया कि सिंह कुछ पूर्व और मौजूदा नौकरशाहों के इशारे पर काम कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें ट्रस्ट के ऑडिटर पद से हटा दिया गया था. इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है. 

यहीं से विवाद का राजनीतिक और संस्थागत अर्थ भी निकलता है. अयोध्या में चर्चा है कि RSS इस समय नृपेंद्र मिश्र को इस विवाद का पूरा लाभ उठाने देने के बजाय चंपत राय के जरिए ट्रस्ट पर अपना प्रभाव बनाए रखना चाहता है. हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है लेकिन राय की हालिया सक्रियता और 2 सितंबर की बैठक से पहले सामने आए पत्र ने इस चर्चा को जरूर तेज कर दिया है. 

फिलहाल अयोध्या में विवाद का चेहरा दो नामों तक सिमटता दिख रहा है: चंपत राय और नृपेंद्र मिश्र. आने वाले दिनों में यह टकराव व्यक्तिगत मतभेद से आगे जाकर ट्रस्ट की भविष्य की कार्यप्रणाली और राम मंदिर परिसर के संचालन की दिशा तय करता है या नहीं, इसकी पहली बड़ी झलक 2 सितंबर की बैठक में मिल सकती है.

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