किसी महिला को भी मिल सकती है राम मंदिर ट्रस्ट की कमान!
राम मंदिर ट्रस्ट में पहली बार CEO की नियुक्ति होने जा रही है और इस पद के लिए महिलाओं के सामने भी बराबर का अवसर है

अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे में गड़बड़ी का मामला सामने आने के बाद जांच के लिए गठित SIT की प्रारंभिक रिपोर्ट की सिफारिशों ने मंदिर के प्रशासनिक ढांचे को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं. इसी बीच राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र ने स्पष्ट किया है कि अब मंदिर के संचालन को अधिक पेशेवर, जवाबदेह और संस्थागत स्वरूप देने का समय आ गया है.
शायद यही वजह है कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट पहली बार एक पूर्णकालिक मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) नियुक्त करने जा रहा है. मंदिर निर्माण अपने अंतिम चरण में है, श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है और करोड़ों रुपए के चढ़ावे व विशाल व्यवस्थाओं के संचालन की चुनौती भी पहले से कहीं बड़ी हो चुकी है. ऐसे में यह नियुक्ति केवल एक प्रशासनिक पद भरने की कवायद नहीं, बल्कि राम मंदिर की भविष्य की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और संस्थागत प्रबंधन की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है.
ट्रस्ट ने छह जुलाई को CEO चयन के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था. समिति में सिक्किम हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) प्रमोद कोहली, भारतीय सेना के पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल विष्णुकांत चतुर्वेदी और उद्योगपति एवं प्रशासक सुरेश हवारे शामिल हैं. समिति ने चयन प्रक्रिया शुरू कर दी है और अगले 30 दिनों के भीतर नियुक्ति को अंतिम रूप दिए जाने की उम्मीद जताई है.
माना जा रहा है कि 22 जुलाई को होने वाली ट्रस्ट की बैठक में इस प्रक्रिया की प्रगति पर भी चर्चा हो सकती है. इस चयन प्रक्रिया की सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि ट्रस्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि यह पद पुरुषों और महिलाओं, दोनों के लिए समान रूप से खुला है. किसी विशेष पेशे या सेवा पृष्ठभूमि को प्राथमिकता नहीं दी जा रही. कॉरपोरेट जगत, प्रशासनिक सेवाओं, पुलिस, सशस्त्र बलों, अर्धसैनिक बलों या किसी अन्य क्षेत्र से योग्य व्यक्ति इस पद के लिए दावेदार हो सकते हैं. अंतिम फैसला केवल योग्यता, व्यक्तित्व और उपयुक्तता के आधार पर होगा.
अयोध्या के राजनीतिक विश्लेषक नीशेंद्र मोहन बताते हैं, “श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की मौजूदा संरचना में एक भी महिला सदस्य नहीं है. न ट्रस्ट के मूल बोर्ड में और न ही उसकी प्रमुख समितियों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व दिखाई देता है. ऐसे में यदि पहली CEO के रूप में किसी महिला की नियुक्ति होती है, तो यह ट्रस्ट के लिए केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक संदेश भी होगा. इससे महिला प्रतिनिधित्व को लेकर उठते सवालों का काफी हद तक जवाब दिया जा सकेगा और ट्रस्ट अपनी संस्थागत छवि को अधिक समावेशी दिखा सकेगा.” हालांकि अंतिम फैसला योग्यता और उपयुक्तता के आधार पर ही होगा, लेकिन महिला CEO की नियुक्ति ट्रस्ट के लिए प्रभावी छवि-संतुलन (डैमेज कंट्रोल) का अवसर भी बन सकती है.
चयन समिति के एक सदस्य के अनुसार, ईमानदारी और सत्यनिष्ठा इस नियुक्ति के सबसे महत्वपूर्ण मानदंड होंगे. उनके शब्दों में, ट्रस्ट ऐसे व्यक्ति की तलाश कर रहा है जो केवल कुशल प्रशासक ही न हो, बल्कि भगवान राम के प्रति गहरी आस्था भी रखता हो. समिति का मानना है कि राम मंदिर का CEO किसी कॉरपोरेट कंपनी का प्रबंध निदेशक नहीं होगा बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का संरक्षक भी होगा. इसलिए विनम्रता, समर्पण, निष्ठा और भक्तों के लिए अथक परिश्रम करने की भावना को चयन प्रक्रिया में विशेष महत्व दिया जाएगा. समिति ने यह भी संकेत दिया है कि चयन प्रक्रिया किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी की तरह औपचारिक 'हेड हंटिंग' मॉडल पर नहीं चलेगी.
संभावित नाम सिफारिशों, आवेदनों और सार्वजनिक प्रतिष्ठा के आधार पर सामने आएंगे. उम्मीदवार के व्यवहार, सामाजिक छवि, संगठनात्मक क्षमता और ईमानदार कार्यशैली को तकनीकी योग्यता जितना ही महत्व दिया जाएगा. दरअसल, राम मंदिर का संचालन अब केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है. प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु मंदिर पहुंच रहे हैं और विशेष अवसरों पर यह संख्या लाखों तक पहुंच जाती है.
आने वाले वर्षों में जब मंदिर परिसर की सभी परियोजनाएं पूरी हो जाएंगी, तब श्रद्धालुओं का दबाव और बढ़ेगा. ऐसे में CEO की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होगी कि दर्शन व्यवस्था सुचारू रहे, श्रद्धालुओं को पर्याप्त सुविधाएं मिलें और मंदिर परिसर का संचालन बिना किसी अव्यवस्था के चलता रहे. इसके लिए जिला प्रशासन, पुलिस, नगर निगम, स्वास्थ्य विभाग, परिवहन और अन्य सरकारी एजेंसियों के साथ लगातार समन्वय भी CEO की जिम्मेदारी होगी. ट्रस्ट का मानना है कि आधुनिक प्रबंधन प्रणाली और धार्मिक परंपराओं के बीच संतुलन बनाए रखने वाला अधिकारी ही इस भूमिका को प्रभावी ढंग से निभा सकेगा.
राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र ने भी इस पद की भूमिका को स्पष्ट करते हुए कहा है कि CEO की मुख्य जिम्मेदारी ट्रस्ट में श्रद्धालुओं की आस्था को बनाए रखना होगी. उनके मुताबिक ट्रस्ट के कामकाज को सुव्यवस्थित करने के साथ-साथ CEO वित्तीय मामलों की भी निगरानी करेगा. मिश्र ने स्पष्ट किया कि "एक तरह से CEO बिना सरकारी दखल के ट्रस्ट के सहायक के तौर पर काम करेंगे." उनके अनुसार, CEO के अधिकार और जिम्मेदारियां पूरी तरह ट्रस्ट तय करेगा. सरकार का ट्रस्ट अथवा उसके CEO के कामकाज में कोई दखल नहीं होगा.
नृपेंद्र मिश्रा यह भी कहते हैं कि CEO अपने स्टाफ की व्यवस्था भी स्वयं करेंगे हालांकि पूरा प्रशासनिक ढांचा ट्रस्ट के अधिकार क्षेत्र में ही रहेगा. यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि राम मंदिर देश के सबसे चर्चित धार्मिक संस्थानों में से एक है. ऐसे में अक्सर यह सवाल उठता रहा है कि इसके प्रशासन में सरकार की भूमिका कितनी होगी. नृपेंद्र मिश्र ने साफ कर दिया कि ट्रस्ट एक स्वतंत्र संस्था है और उसका संचालन भी उसी की व्यवस्था के अनुरूप होगा.
CEO के सामने वित्तीय प्रबंधन भी एक बड़ी चुनौती होगी. राम मंदिर को देश-विदेश से लगातार दान प्राप्त हो रहा है. इन दानों का पारदर्शी प्रबंधन, लेखा व्यवस्था, ऑडिट और वित्तीय प्रक्रियाओं का पालन सुनिश्चित करना भी CEO की जिम्मेदारी होगी. ट्रस्ट चाहता है कि वित्तीय प्रशासन पूरी तरह स्थापित प्रक्रियाओं के अनुरूप चले ताकि श्रद्धालुओं का विश्वास लगातार मजबूत बना रहे. चयन समिति के सदस्य ने यह भी स्पष्ट किया कि फिलहाल ट्रस्ट के उपनियमों में किसी संशोधन का प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है. अगर भविष्य में आवश्यकता महसूस हुई तो कानूनी प्रावधानों के अनुसार बदलाव किए जाएंगे. फिलहाल नियुक्ति मौजूदा व्यवस्था के तहत ही होगी.
दिलचस्प बात यह है कि अभी तक CEO के लिए न तो कोई आयु सीमा तय की गई है और न ही वेतन. हालांकि समिति ने संकेत दिया है कि ट्रस्ट अपेक्षाकृत वरिष्ठ और अनुभवी व्यक्ति की तलाश में है. चयनित अधिकारी को पारिश्रमिक दिया जाएगा, लेकिन उसकी राशि बाद में तय होगी. चयन समिति की संरचना भी इस नियुक्ति के महत्व को दर्शाती है.
न्यायमूर्ति प्रमोद कोहली न्यायिक और प्रशासनिक अनुभव के लिए जाने जाते हैं. एक मार्च 1951 को जम्मू-कश्मीर के राजौरी में जन्मे कोहली सिक्किम हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) के अध्यक्ष भी रहे हैं. उनका लंबा न्यायिक अनुभव चयन प्रक्रिया को संस्थागत विश्वसनीयता प्रदान करता है. समिति के दूसरे सदस्य लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) विष्णुकांत चतुर्वेदी भारतीय सेना में चार दशक से अधिक समय तक सेवा दे चुके हैं. परिचालन और प्रशासनिक नेतृत्व दोनों क्षेत्रों में उनका अनुभव रहा है. सेना से सेवानिवृत्ति के बाद वे सामाजिक और वैचारिक गतिविधियों से भी जुड़े रहे हैं. अनुशासन, संगठन और नेतृत्व उनकी प्रमुख पहचान मानी जाती है.
समिति के तीसरे सदस्य सुरेश हवारे महाराष्ट्र के प्रतिष्ठित उद्योगपति हैं. हावरे ग्रुप ऑफ कंपनीज़ के प्रमुख के रूप में उन्होंने बड़े व्यावसायिक संगठनों का संचालन किया है और उन्हें कुशल प्रशासक माना जाता है. प्रबंधन और संगठन निर्माण का उनका अनुभव चयन प्रक्रिया में व्यावहारिक दृष्टिकोण जोड़ता है. यानी चयन समिति में न्यायपालिका, सेना और उद्योग जगत, तीनों क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व है. इससे संकेत मिलता है कि ट्रस्ट केवल धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि प्रशासनिक दक्षता और संस्थागत क्षमता के आधार पर भी CEO का चयन करना चाहता है.
22 जुलाई को अयोध्या में ट्रस्ट की अगली बैठक प्रस्तावित है. इसी बैठक में ट्रस्ट के तीन रिक्त पदों पर नए ट्रस्टियों के नामों को भी अंतिम रूप दिए जाने की संभावना है. ऐसे में ट्रस्ट का नया संगठनात्मक ढांचा आकार लेता दिखाई दे रहा है. मंदिर निर्माण से आगे बढ़कर अब ट्रस्ट स्थाई प्रशासनिक व्यवस्था विकसित करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है. ट्रस्ट ऐसे CEO की तलाश में है जो प्रबंधन की कठोरता और श्रद्धा की संवेदनशीलता, दोनों के बीच संतुलन स्थापित कर सके. आने वाले कुछ सप्ताह में जब इस पद पर पहली नियुक्ति होगी, तब यह केवल किसी अधिकारी का चयन नहीं होगा, बल्कि राम मंदिर की भविष्य की प्रशासनिक संस्कृति की भी पहली नींव रखी जाएगी. यही वजह है कि अयोध्या से लेकर देशभर के धार्मिक और प्रशासनिक हलकों की नजर इस नियुक्ति पर टिकी हुई है.