राम मंदिर ट्रस्ट के तीन पदों पर कई दावेदार, अयोध्या से दिल्ली तक चल रही लॉबिंग
श्रीरामजन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की 22 जुलाई की बैठक से पहले तीन खाली पदों को लेकर संत समाज, स्थानीय प्रतिनिधियों और विश्व हिंदू परिषद की सक्रियता बढ़ गई है

राम मंदिर निर्माण पूरा होने के बाद श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट पहली बार ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां उसके सामने सिर्फ खाली पद भरने का सवाल नहीं है बल्कि अपनी विश्वसनीयता, प्रशासनिक ढांचे और शक्ति संतुलन को नए सिरे से परिभाषित करने की चुनौती भी है.
22 जुलाई को प्रस्तावित ट्रस्ट की बैठक इसी वजह से असाधारण महत्व रखती है. इस बैठक में ट्रस्ट के तीन खाली पदों को भरने पर फैसला होने की संभावना है. लेकिन इन नियुक्तियों को लेकर अयोध्या से लेकर दिल्ली तक जिस तरह की सक्रियता, लॉबिंग और बैठकों का दौर शुरू हुआ है, उसने साफ कर दिया है कि यह महज नियुक्तियों का मामला नहीं, बल्कि राम मंदिर की भावी प्रशासनिक और वैचारिक दिशा तय करने वाला फैसला होगा.
तीनों पद अलग-अलग परिस्थितियों में खाली हुए हैं. पूर्व महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा ने चढ़ावा चोरी प्रकरण के बाद इस्तीफा दिया जबकि ट्रस्ट के वरिष्ठ सदस्य और अयोध्या राजपरिवार से जुड़े विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र का अगस्त 2025 में निधन हो गया था. अब इन तीनों स्थानों पर कौन आएगा, इससे ट्रस्ट के भीतर स्थानीय प्रतिनिधित्व, संत समाज की भूमिका और विश्व हिंदू परिषद की भविष्य की रणनीति तीनों प्रभावित होंगी.
स्थानीय संतों ने खोला मोर्चा
चढ़ावा चोरी प्रकरण के बाद ट्रस्ट की पहली बड़ी कवायद 8 जुलाई को दिखाई दी, जब ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरि ने अयोध्या के प्रमुख संतों के साथ लगभग डेढ़ घंटे तक बंद कमरे में बैठक की. यह बैठक सामान्य शिष्टाचार मुलाकात नहीं मानी जा रही. इसमें नई प्रशासनिक व्यवस्था, ट्रस्ट के रिक्त पदों और संत समाज की भागीदारी पर विस्तार से चर्चा हुई.
जानकी महल मंदिर के पीठाधीश्वर महंत जन्मेजय शरण के नेतृत्व में पहुंचे संतों के प्रतिनिधिमंडल ने स्पष्ट रूप से यह मांग रखी कि राम मंदिर ट्रस्ट और मंदिर प्रबंधन में स्थानीय संतों को अधिक प्रतिनिधित्व दिया जाए. महंत जन्मेजय शरण का कहना था कि राम मंदिर आंदोलन में दशकों तक संघर्ष करने वाले अनेक संतों को आज तक न ट्रस्ट में स्थान मिला और न ही मंदिर के संचालन में कोई जिम्मेदारी. बैठक में महंत अवधेश दास, महंत रामजी शरण, महंत राजकुमार दास समेत कई प्रमुख संत मौजूद रहे.
जानकारी के अनुसार अनुसार ट्रस्ट ने भी संतों से संभावित नामों पर राय मांगी. इससे यह संकेत मिलता है कि ट्रस्ट इस बार नियुक्तियों को लेकर स्थानीय संत समाज की भावनाओं की अनदेखी नहीं करना चाहता. दरअसल चढ़ावा चोरी प्रकरण के बाद ट्रस्ट की कार्यप्रणाली पर कई सवाल उठे थे. ऐसे में संत समाज का भरोसा फिर से मजबूत करना ट्रस्ट की प्राथमिकता माना जा रहा है. यही वजह है कि पहली बार निर्णय प्रक्रिया में संतों से व्यापक संवाद का प्रयास दिखाई दे रहा है.
दावेदार कई, समीकरण और भी ज्यादा
तीन खाली पदों ने अयोध्या में संभावित दावेदारों की लंबी सूची तैयार कर दी है. सबसे ज्यादा चर्चा दिवंगत ट्रस्टी विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र के बेटे और प्रसिद्ध साहित्यकार यतींद्र मिश्र को लेकर है. वे भी 8 जुलाई को स्वामी गोविंद देव गिरि से मिले. हालांकि उन्होंने इसे पूरी तरह शिष्टाचार मुलाकात बताया और कहा कि न तो किसी ने उनसे संपर्क किया और न उन्होंने किसी से कोई आग्रह किया. फिर भी जानकारी के मुताबिक छह जुलाई की ट्रस्ट बैठक में उनके नाम पर चर्चा हुई थी.
ट्रस्ट सदस्य महंत दिनेन्द्र दास ने भी कार्यकारिणी बैठक में उनका नाम प्रस्तावित किया था, हालांकि उस दिन इस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया. यतींद्र मिश्र के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह दिया जा रहा है कि वे दिवंगत विमलेंद्र मिश्र की विरासत को आगे बढ़ा सकते हैं. पिछले दो वर्षों से वह राम मंदिर के अनेक सांस्कृतिक आयोजनों से जुड़े रहे हैं और अयोध्या की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने में उनकी भूमिका रही है.
इसी तरह अयोध्या के वरिष्ठ शिक्षाविद विशंभर नाथ अरोड़ा का नाम भी सामने आया है. व्यवसायी शरद कपूर ने उनके पक्ष में खुलकर समर्थन जताया है. उनका तर्क है कि चार दशक से अधिक समय तक शिक्षा क्षेत्र में काम करने वाले अरोड़ा स्थानीय समाज का सम्मानित चेहरा हैं.
संत समाज के भीतर भी कई नाम चर्चा में हैं. हनुमत निवास के प्रमुख आचार्य मिथिलेश नंदनी शरण महाराज और राम वल्लभ कुंज के महंत राजकुमार दास के नाम भी स्थानीय स्तर पर आगे बढ़ाए जा रहे हैं. इधर महासचिव पद को लेकर अलग तरह की चर्चा है. अंतरिम रूप से कृष्ण मोहन यह जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, लेकिन स्थाई नियुक्ति को लेकर विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय महामंत्री बजरंग लाल बांगड़ा का नाम सबसे प्रमुख दावेदार के रूप में लिया जा रहा है. हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है. यानी ट्रस्ट के तीन पदों के लिए संत, स्थानीय प्रतिष्ठित चेहरे, संघ परिवार और विश्व हिंदू परिषद, सभी अपने-अपने स्तर पर सक्रिय हैं.
स्थानीय प्रतिनिधित्व बनाम संगठनात्मक नियंत्रण
इस बार की नियुक्तियों का सबसे बड़ा राजनीतिक और सामाजिक पहलू स्थानीय प्रतिनिधित्व का सवाल है. ट्रस्ट के 11 स्थाई सदस्यों में पहले अयोध्या के चार प्रतिनिधि थे. इनमें विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र के निधन और अनिल मिश्रा के इस्तीफे के बाद स्थानीय प्रतिनिधित्व काफी कमजोर हो गया है. महंत नृत्य गोपाल दास उम्र और स्वास्थ्य संबंधी कारणों से नियमित रूप से बैठकों में शामिल नहीं हो पाते, जबकि महंत दिनेन्द्र दास अकेले सक्रिय स्थानीय संत सदस्य हैं. यही वजह है कि अयोध्या के संत और सामाजिक संगठन लगातार यह मांग उठा रहे हैं कि इस बार रिक्त पदों पर स्थानीय लोगों को प्राथमिकता मिले.
दूसरी ओर संघ और विश्व हिंदू परिषद भी चाहते हैं कि ट्रस्ट की प्रशासनिक क्षमता मजबूत हो और संगठनात्मक समन्वय पहले से बेहतर बने. जानकारी के मुताबिक संघ परिवार के भीतर भी इस बात पर मंथन चल रहा है कि ट्रस्ट में ऐसे लोगों को जिम्मेदारी मिले जो प्रशासनिक दक्षता और वैचारिक प्रतिबद्धता, दोनों रखते हों. इस पूरी कवायद में निर्मोही अखाड़े की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है.
राम मंदिर निर्माण से पहले रामलला की सेवा-पूजा की जिम्मेदारी निर्मोही अखाड़े के पास थी. ट्रस्ट सदस्य महंत दिनेन्द्र दास लगातार पूजा-पद्धति और मंदिर संचालन से जुड़े कुछ विषयों पर सुझाव देते रहे हैं. बताया जा रहा है कि ट्रस्ट अब इन सुझावों पर गंभीरता से विचार करने को तैयार है. इससे संकेत मिलते हैं कि आने वाले समय में केवल ट्रस्ट के सदस्य ही नहीं बदलेंगे बल्कि मंदिर प्रबंधन की कार्यप्रणाली में भी कुछ महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई दे सकते हैं.
दिल्ली में होगी रणनीति, अयोध्या में होगा फैसला
22 जुलाई की ट्रस्ट बैठक से पहले 19 और 20 जुलाई को दिल्ली में विश्व हिंदू परिषद की केंद्रीय प्रबंध समिति की बैठक प्रस्तावित है. इस बैठक का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि चढ़ावा चोरी प्रकरण के बाद यह पहला बड़ा संगठनात्मक मंथन होगा. जानकारी के अनुसार बैठक में ट्रस्ट की प्रशासनिक व्यवस्था, संगठनात्मक बदलाव, महासचिव पद और भविष्य की रणनीति पर विस्तार से चर्चा होगी. पहले यह बैठक अयोध्या में प्रस्तावित थी लेकिन बाद में इसे दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया.
प्रतिनिधियों की संख्या भी घटाकर लगभग 150 कर दी गई है, जिससे माना जा रहा है कि इस बार चर्चा ज्यादा केंद्रित और निर्णयात्मक होगी. हालांकि ट्रस्ट कानूनी रूप से स्वतंत्र संस्था है और नियुक्तियों का अंतिम अधिकार ट्रस्ट सदस्यों के पास है फिर भी विश्व हिंदू परिषद और संघ परिवार की राय को पूरी तरह अलग करके नहीं देखा जा सकता. यही कारण है कि दिल्ली की बैठक और 22 जुलाई की अयोध्या बैठक को एक-दूसरे से जुड़ी कड़ियों के रूप में देखा जा रहा है.
दरअसल राम मंदिर अब निर्माण के चरण से आगे बढ़कर संस्थागत संचालन के दौर में प्रवेश कर चुका है. शुरुआती वर्षों में ट्रस्ट की प्राथमिकता मंदिर निर्माण थी. अब फोकस मंदिर के सुचारु संचालन, श्रद्धालुओं के प्रबंधन, वित्तीय पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही पर है. चढ़ावा चोरी प्रकरण ने इस आवश्यकता को और अधिक स्पष्ट कर दिया है.