राम मंदिर चढ़ावा चोरी केस में चंपत राय और अनिल मिश्रा आरोपी क्यों नहीं?

चार्जशीट में 105 कथित चोरी की घटनाओं और हजारों मैसेजों का जिक्र है फिर भी चंपत राय और अनिल मिश्रा को आरोपी नहीं बनाया गया

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चंपत राय (बाएं) और अनिल मिश्रा

अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी और हेराफेरी के मामले में जांच पूरी होने के बाद तस्वीर काफी हद तक साफ हो गई है. पुलिस ने 23 सितंबर को अदालत में करीब 73,480 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की, जिसमें आठ लोगों को आरोपी बनाया गया है.

हालांकि इसमें श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय, पूर्व ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्रा और व्यवस्था प्रमुख रहे गोपाल राव को आरोपी बनाने के बजाय सरकारी गवाह बनाया गया है. पुलिस के मुताबिक इनके खिलाफ आपराधिक संलिप्तता साबित करने लायक पर्याप्त सबूत नहीं मिले. 

चार्जशीट में सीसीटीवी फुटेज की 105 घटनाएं, करीब 3,300 संदेश, बैंक और वित्तीय लेन-देन, बरामद नकदी तथा 173 गवाहों के बयान जांच का आधार बने हैं.

SIT जांच में कितने मोड़ आए

इस पूरे मामले में चंपत राय और अनिल मिश्रा को मिली राहत को समझने के लिए जांच के अलग-अलग चरणों को देखना जरूरी है. 25 जून 2026 को राम जन्मभूमि थाने में आठ लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था. आरोपों में आपराधिक न्यासभंग, चोरी की संपत्ति रखने, आपराधिक साजिश और सामूहिक जिम्मेदारी से जुड़ी धाराएं शामिल थीं.

इसके बाद पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार किया और बड़ी मात्रा में नकदी बरामद की. जांच का दायरा मंदिर में चढ़ावे के संग्रह, गिनती, सुरक्षा, बैंक तक पहुंचने और बीच के चरणों में होने वाली कथित अनियमितताओं तक फैल गया. जांच के दौरान चंपत राय और डॉ. अनिल मिश्रा से भी पूछताछ हुई. 

शुरुआती जांच में दोनों की प्रशासनिक भूमिका और मंदिर में चढ़ावे की व्यवस्था पर सवाल उठे थे. जुलाई में सामने आई SIT की प्रारंभिक रिपोर्ट में खास तौर पर अनिल मिश्रा की निगरानी और प्रशासनिक स्तर पर कथित चूक का उल्लेख किया गया था. रिपोर्ट के मुताबिक उन्हें सुरक्षा व्यवस्था में पर्याप्त सावधानी नहीं बरतने के लिए जिम्मेदार माना गया था. 

SIT शुरुआती जांच में चढ़ावे की निगरानी व्यवस्था में चूक का जिक्र था (फाइल फोटो)

इसी दौरान चंपत राय और अनिल मिश्रा ने अपने पदों से इस्तीफा दिया और ट्रस्ट ने उनके इस्तीफे स्वीकार कर लिए. अयोध्या के एक वरिष्ठ एडवोकेट बताते हैं, “प्रशासनिक चूक और आपराधिक संलिप्तता जांच की दृष्टि से एक ही बात नहीं है. यही अंतर अंतिम जांच में निर्णायक रहा.” 

अगस्त में SIT की अंतिम रिपोर्ट सामने आने पर चंपत राय के खिलाफ कथित चोरी में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संलिप्तता का साक्ष्य नहीं मिलने की बात सामने आई. उस समय उपलब्ध रिपोर्टों में अनिल मिश्रा को लेकर जांच जारी रहने की बात भी कही गई थी.

इसके बाद जांच आगे बढ़ी और अदालत में दाखिल चार्जशीट ने दोनों की कानूनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट कर दी. पुलिस ने न तो चंपत राय को आरोपी बनाया और न ही अनिल मिश्रा को. दोनों को मामले में गवाह बनाया गया है. 

यानी जांच एजेंसी के मौजूदा निष्कर्ष के अनुसार दोनों के खिलाफ चोरी या आपराधिक साजिश में केस चलाने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिला. यह क्लीन चिट किसी राजनीतिक या प्रशासनिक घोषणा के रूप में नहीं, बल्कि जांच में आरोपी न बनाए जाने और उन्हें गवाह बनाए जाने के रूप में सामने आई है. अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अभी अदालत की प्रक्रिया के बाद ही आएगा.

जांच में डिजिटल और भौतिक साक्ष्यों का बड़ा नेटवर्क सामने आया. CCTV फुटेज की जांच में 105 ऐसी घटनाओं का उल्लेख है जिन्हें पुलिस ने चोरी से जुड़ा माना. करीब 3,300 मैसेजों को भी जांच का हिस्सा बनाया गया. 

इसके अलावा बैंक खातों, वित्तीय रिकॉर्ड, मोबाइल डेटा, कॉल डिटेल रिकॉर्ड, फोरेंसिक जांच, तलाशी और बरामदगी को साक्ष्य के रूप में देखा गया. सुप्रीम कोर्ट में दाखिल SIT की स्थिति रिपोर्ट के अनुसार कीमती चढ़ावे से जुड़े अलग-अलग आरोपों की भी जांच की गई और 200 किलो तथा 38.288 किलो चांदी की ईंटों सहित अन्य मूल्यवान वस्तुओं के संबंध में कोई विसंगति नहीं मिली. 

ट्रस्ट की व्यवस्था पर सवाल बरकरार

चार्जशीट में आठ लोगों को आरोपी बनाया गया है. इनमें अनुकल्प मिश्रा, रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू, लवकुश मिश्रा, रमाशंकर मिश्रा, मनीष यादव, अविनाश शुक्ला, करुणेश पांडेय और सेवानिवृत्त बैंककर्मी सुभाष श्रीवास्तव शामिल हैं.

पुलिस ने अनुकल्प मिश्रा को कथित मुख्य साजिशकर्ता बताया है (फाइल फोटो)

चार्जशीट के अनुसार चोरी की रकम के बंटवारे के लिए जनौरा के पास हाईवे के निकट एक बाग का इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई है. अनुकल्प के घर से करीब 16.82 लाख रुपए और अन्य आरोपियों के यहां से भी लाखों रुपए की बरामदगी का उल्लेख किया गया है.

चंपत राय के पूर्व चालक रहे रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू को लेकर भी चार्जशीट में कई गंभीर तथ्य दर्ज हैं. उसके पास बिना आदेश दानपात्रों की चाबियां होने और श्रद्धालुओं को दर्शन कराने के नाम पर पैसे लेने का उल्लेख है. चार्जशीट के मुताबिक टिन्नू वाहनों को किराये पर भी चलवाता था और इससे करीब 90 हजार रुपए प्रतिमाह आय होती थी. 

इन तथ्यों के सामने आने से मंदिर में चढ़ावे और श्रद्धालु सेवाओं से जुड़ी आंतरिक व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं लेकिन पुलिस ने इन तथ्यों के आधार पर चंपत राय को आरोपी नहीं बनाया है. यही इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है. 

जांच एजेंसी ने कथित चोरी के लिए जिन लोगों के खिलाफ प्रत्यक्ष साक्ष्य जुटाए, उन्हें आरोपी बनाया, जबकि जिन पदाधिकारियों की प्रशासनिक भूमिका थी लेकिन उनके खिलाफ आपराधिक संलिप्तता का पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिला, उन्हें गवाह बनाया. 

इससे एक तरफ चंपत राय और अनिल मिश्रा के खिलाफ आपराधिक मुकदमे की आशंका फिलहाल खत्म होती दिखती है दूसरी तरफ मंदिर की प्रशासनिक व्यवस्था में निगरानी और जवाबदेही के सवाल पूरी तरह खत्म नहीं होते.

सुप्रीम कोर्ट भी इस मामले की निगरानी के संदर्भ में SIT की रिपोर्ट देख चुका है. 21 सितंबर को शीर्ष अदालत को बताया गया था कि CCTV विश्लेषण में 105 कथित चोरी की घटनाएं मिली हैं और 90 दिन की अवधि समाप्त होने से पहले चार्जशीट दाखिल की जाएगी. 

राम मंदिर की व्यस्थाओं में खामियों को लेकर चंपत राय, अनिल मिश्रा की जवाबदेही का सवाल अब भी कायम है

अदालत ने SIT की 16 सितंबर की स्थिति रिपोर्ट पर भी गौर किया. इसका अर्थ यह है कि मामला केवल आठ आरोपियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे तक सीमित नहीं रहेगा. लखनऊ में हाइकोर्ट के वरिष्ठ एडवोकेट शैलेंद्र कुमार सिंह कहते हैं, “अदालत अब चार्जशीट में पेश साक्ष्यों, गवाहों और बरामदगी की जांच करेगी. आरोपियों पर आरोप तय होते हैं या नहीं, यह न्यायिक प्रक्रिया में आगे तय होगा. इसी तरह बचाव पक्ष को भी चार्जशीट में दर्ज साक्ष्यों को चुनौती देने का अधिकार रहेगा. इसलिए पुलिस की क्लीन चिट को अंतिम न्यायिक बरी होना मानना सही नहीं होगा. फिलहाल इसका अर्थ इतना है कि जांच एजेंसी ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर इन दोनों को आरोपी बनाने लायक आधार नहीं पाया है.”

क्लीन चिट के बाद तीन बड़े नतीजे

चंपत राय और अनिल मिश्रा को आरोपी नहीं बनाए जाने का पहला सीधा परिणाम उनकी व्यक्तिगत कानूनी स्थिति पर पड़ेगा. दोनों अब इस मामले में अभियुक्त नहीं बल्कि अभियोजन के गवाह हैं. इससे उन पर आपराधिक आरोपों में मुकदमा चलने का तत्काल खतरा नहीं रहेगा. 

जांच एजेंसी उनके बयानों का इस्तेमाल आरोपियों के खिलाफ साक्ष्य के रूप में कर सकती है. यही कारण है कि सरकारी गवाह के रूप में उनकी भूमिका अब महत्वपूर्ण हो जाती है. अदालत में उनके बयान, दस्तावेज और उनके कार्यकाल में मंदिर की व्यवस्था से संबंधित जानकारी मामले की सुनवाई का हिस्सा बन सकती है. 

दूसरा परिणाम राम मंदिर ट्रस्ट की प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा है. जांच ने कथित चोरी की 105 घटनाओं और हजारों डिजिटल संदेशों के जरिए यह दिखाया है कि मंदिर के चढ़ावे की सुरक्षा और प्रबंधन में कई स्तरों पर कमजोरियां थीं. 

भले ही ट्रस्ट के पदाधिकारियों को आपराधिक मामले में आरोपी नहीं बनाया गया हो लेकिन इस प्रकरण ने यह सवाल जरूर खड़ा किया है कि दानपात्रों की चाबियां किसके पास हों, नकदी की गिनती और जमा करने की प्रक्रिया कितनी सुरक्षित हो और कर्मचारियों की निगरानी किस स्तर पर हो. इस दृष्टि से इस्तीफे और पदों में बदलाव से आगे अब संस्थागत सुधार की परीक्षा होगी.

तीसरा और सबसे बड़ा परिणाम राम मंदिर से जुड़े चढ़ावे और दान की पारदर्शिता को लेकर होगा. राम मंदिर को मिलने वाला दान केवल सामान्य धार्मिक चढ़ावा नहीं है. मंदिर की बढ़ती लोकप्रियता और बड़ी संख्या में आने वाले श्रद्धालुओं के कारण यहां प्रतिदिन बड़ी मात्रा में नकदी और अन्य मूल्यवान वस्तुएं पहुंचती हैं. 

ऐसे में एक ओर पुलिस की जांच से वास्तविक चोरी के आरोपों पर कार्रवाई का रास्ता खुला है, वहीं दूसरी ओर कीमती वस्तुओं के सुरक्षित और व्यवस्थित होने की SIT रिपोर्ट ट्रस्ट के लिए राहत का विषय है. 

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष SIT ने चांदी की ईंटों और अन्य मूल्यवान चढ़ावों के संबंध में कोई विसंगति नहीं मिलने की जानकारी दी है. फिर भी पूरे मामले का अंतिम असर अदालत की कार्यवाही और ट्रस्ट की आगे की व्यवस्था पर निर्भर करेगा. 73,480 पन्नों की चार्जशीट में 105 घटनाओं, सैकड़ों गवाहों, डिजिटल संदेशों और वित्तीय साक्ष्यों को शामिल किया गया है. 

अब सवाल यह नहीं है कि जांच किस दिशा में जा रही है बल्कि यह है कि अदालत में इन साक्ष्यों का क्या परीक्षण होता है और आरोपियों के खिलाफ क्या साबित होता है. चंपत राय और अनिल मिश्रा का आरोपी से गवाह बन जाना जांच का एक महत्वपूर्ण मोड़ जरूर है लेकिन इस पूरे प्रकरण का वास्तविक निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगा.

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