कश्मीरी पंडितों को धमकी के मामले में एक पंडित कार्यकर्ता गिरफ्तार, क्या है पूरा मामला?
जम्मू-कश्मीर पुलिस ने प्रवासी कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को धमकी देने वाले पोस्टर ऑनलाइन शेयर करने के आरोप में राकेश हांडू को गिरफ्तार किया है. हालांकि उनके वकील ने आरोपों को खारिज करते हुए इसे पंडित समुदाय के अलग-अलग गुटों के बीच 'सत्ता की खींचतान' का मामला बताया है

कश्मीर घाटी में काम कर रहे प्रवासी कश्मीरी पंडितों के खिलाफ धमकी भरे पोस्टर ऑनलाइन शेयर किए जाने के मामले की जांच के तहत एक कश्मीरी पंडित कार्यकर्ता राकेश हांडू को गिरफ्तार किया गया है.
जम्मू-कश्मीर पुलिस ने हांडू को 17 अक्टूबर को फरीदाबाद में उनके घर से गिरफ्तार किया. बारामूला में काम करने वाले प्रवासी कश्मीरी पंडित सरकारी कर्मचारी रोहित रैना की शिकायत पर पुलिस ने यह कार्रवाई की.
शुरुआती जांच के आधार पर पुलिस ने बारामूला में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66F (साइबर आतंकवाद) और धारा 84C के तहत मामला दर्ज किया. 27 अक्टूबर को बारामूला के एक विशेष मोबाइल मजिस्ट्रेट ने हांडू को पांच दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया.
हांडू अपने समुदाय के जाने-माने कार्यकर्ता हैं. वे पहली बार 2008 के जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में चर्चा में आए थे. उन्होंने श्रीनगर की हजरतबल सीट से नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला के खिलाफ चुनाव लड़ा था लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था. हांडू को सिर्फ 199 वोट मिले थे.
केंद्र सरकार की पुनर्वास योजना के तहत पिछले कुछ सालों में करीब 6,000 प्रवासी कश्मीरी पंडितों को प्रधानमंत्री के विशेष पुनर्वास और रोजगार पैकेज के तहत कश्मीर में सरकारी नौकरियां मिली हैं. इस योजना का मकसद विस्थापित पंडितों की कश्मीर वापसी को आसान बनाना है.
प्रवासी कश्मीरी पंडितों को धमकी देने वाले पोस्टर पहली बार अगस्त में सामने आए थे. इनमें ऑनलाइन जारी एक पत्र के जरिए उन्हें "अपना तरीका बदलने" की चेतावनी दी गई थी. धमकियां सामने आने के बाद मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने चिंता जताई और सुरक्षा एजेंसियों से कार्रवाई करने की अपील की.
तब अब्दुल्ला का कहना था, "पुलिस और हमारी खुफिया एजेंसियों समेत कानून-व्यवस्था और सुरक्षा से जुड़े विभागों को इन मामलों को हल्के में नहीं लेना चाहिए. उन्हें यह पता लगाना होगा कि ये धमकियां कहां से आ रही हैं." उन्होंने यह भी कहा था कि कानून-व्यवस्था और सुरक्षा की जिम्मेदारी उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा के पास है.
इसके बाद अधिकारियों ने विभागों को कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को छुट्टी पर भेजने का निर्देश दिया. समुदाय के लोगों को सतर्क रहने और सावधानी बरतने की सलाह दी गई. इसके बाद भी इस तरह की कई धमकी भरी पोस्ट ऑनलाइन सामने आईं. इनमें से कुछ पोस्ट में पंडित कर्मचारियों के नाम और फोन नंबर तक दिए गए थे. इनमें से कई कर्मचारी राजस्व विभाग में काम करते हैं.
पुलिस ने जांच की विस्तृत रिपोर्ट अदालत में पेश की है. इसमें कहा गया है कि हांडू ने कथित तौर पर 'सोल्जर ऑफ रेजिस्टेंस/यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल' की ओर से जारी धमकी से जुड़ी इलेक्ट्रॉनिक सामग्री को बार-बार शेयर किया. अभियोजन पक्ष ने मोबाइल मजिस्ट्रेट की अदालत में हांडू की पुलिस हिरासत मांगते करते हुए कहा, "इस सामग्री में बदलाव किया गया था. इसमें से मूल पहचान से जुड़ी जानकारी और मोबाइल नंबर हटा दिए गए थे. इसके बाद इसे इस तरह शेयर किया गया, जिससे शिकायतकर्ता रोहित रैना को उस व्यक्ति के रूप में दिखाया गया, जिसे धमकी दी गई थी. जांच में यह भी सामने आया है कि शिकायतकर्ता का नाम और तस्वीर ऐसी धमकी से जुड़ी सामग्री के साथ शेयर की गई और उनके बारे में बार-बार पोस्ट किए गए."
रिपोर्ट में कहा गया, "इस तरह के काम से पता चलता है कि कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक संसाधनों का जानबूझकर इस्तेमाल, उनमें बदलाव और मटेरियल को भेजने का काम किया गया. ऐसा करते समय इस बात की जानकारी थी कि शेयर की गई सामग्री के क्या नतीजे हो सकते हैं. इसमें यह धारणा पैदा करना भी शामिल है कि शिकायतकर्ता किसी आतंकी संगठन की धमकी का निशाना है. इससे उसकी सुरक्षा को लेकर गंभीर डर पैदा हो सकता है या ऐसा होने की आशंका रहती है."
अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि हांडू को जांच में शामिल होने के लिए दो बार नोटिस दिया गया था और उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका भी दिया गया था. इसके बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया.
हांडू के वकील आजिम पंडित ने इंडिया टुडे को बताया कि बारामूला की अदालत में उनके मुवक्किल की जमानत याचिका पर सुनवाई नहीं हो सकी, क्योंकि आईटी एक्ट की धारा 66F के तहत आने वाला अपराध तय मामलों की सूची में शामिल है और इसकी सुनवाई राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की अदालत में होनी है. उन्होंने कहा, "अब हम सोपोर की विशेष NIA अदालत में जमानत याचिका दाखिल कर रहे हैं." उन्होंने आगे कहा, "मेरे मुवक्किल ने आरोपों के मुताबिक किसी भी सामग्री को लिखने, उसमें बदलाव करने या उसके साथ छेड़छाड़ करने से इनकार किया है."
आजिम ने दावा किया कि यह मामला कश्मीरी पंडित समुदाय के भीतर अलग-अलग गुटों के बीच "सत्ता की खींचतान" का नतीजा है. उन्होंने कहा, "इसमें आतंकवाद का कोई पहलू या एंगल बिल्कुल नहीं है. याचिकाकर्ता एक जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता हैं और लंबे समय से लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए काम कर रहे हैं. यह शिकायत इन गुटों के बीच आपसी रंजिश का नतीजा है." उन्होंने यह भी कहा कि जांच अधिकारी की रिपोर्ट में भी यह "आरोप नहीं लगाया गया है" कि याचिकाकर्ता का "किसी आतंकी संगठन से कोई संबंध है" या धमकी से जुड़ी सामग्री तैयार करने में उनकी "कोई भूमिका थी".
आजिम ने दलील दी, "किसी समुदाय के आपस में लड़ रहे गुटों के बीच के विवाद को आईटी एक्ट की धारा 66F लगाकर साइबर आतंकवाद का रंग नहीं दिया जा सकता. आपराधिक प्रक्रिया का इस्तेमाल ऐसे विवाद को निपटाने के लिए नहीं होने दिया जा सकता. अभियोजन पक्ष का मामला सामग्री को शेयर करने की पूरी हो चुकी घटना से जुड़ा है और आईटी एक्ट की धारा 84C का इस्तेमाल बिना सोचे-समझे किया गया है."