राजीव कुमार: बंगाल के पूर्व डीजीपी, जिनके लिए ममता बनर्जी धरने पर बैठ गई थीं
18 मार्च को केंद्रीय चुनाव आयोग (ईसीआई) ने पश्चिम बंगाल के डीजीपी राजीव कुमार को हटाने का निर्देश जारी किया था. वे सीएम ममता बनर्जी के बहुत करीबी माने जाते हैं

केंद्रीय चुनाव आयोग ने 19 मार्च को एक बार फिर पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक को बदल दिया. विवेक सहाय की जगह संजय मुखर्जी अब राज्य के नए डीजीपी होंगे. सहाय के डीजीपी बनने के 24 घंटे के भीतर ये निर्देश जारी हुआ है.
18 मार्च को चुनाव आयोग ने बंगाल के डीजीपी पद पर आसीन राजीव कुमार को हटाने का निर्देश जारी किया था. इसके अलावा आयोग ने छह राज्यों के गृह सचिवों और कई राज्यों के शीर्ष अधिकारियों को भी पद से हटाने के लिए कहा था.
जिन छह राज्यों के गृह सचिवों को हटाने का निर्देश जारी हुआ उनमें गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड शामिल हैं. निर्देश के तहत हिमाचल प्रदेश और मिजोरम में सामान्य प्रशासनिक विभाग के सचिव भी हटाए गए. इसके अलावा आयोग ने अतिरिक्त आयुक्तों और उपायुक्तों के साथ-साथ बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) आयुक्त इकबाल सिंह चहल को भी हटाने का आदेश दिया.
राजीव कुमार के डीजीपी पद से हटने के घंटे भर बाद ही विवेक सहाय को बंगाल का नया पुलिस महानिदेशक बनाया गया. ऐसा उनकी वरीयता को देखते हुए किया गया. लेकिन इसी वरीयता के चलते अब वे पद से हट भी गए हैं. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, चूंकि सहाय लोकसभा चुनाव खत्म होने से पहले ही मई महीने के आखिर में पद से रिटायर हो जाएंगे. इसलिए संजय मुखर्जी को राज्य का नया डीजीपी बनाया गया है.
मुखर्जी 1989 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं. वे बंगाल के सुरक्षा निदेशक के तौर पर अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (एडीजी) रह चुके हैं. साल 2017 में उन्हें आपराधिक जांच विभाग यानी सीआईडी का मुखिया भी बनाया गया था. वहीं, राजीव कुमार को अब राज्य के सूचना और प्रौद्योगिकी विभाग में सचिव के तौर पर तैनात किया गया है. यहां अब सवाल उठ सकता है कि चुनाव आयोग ने आखिर ऐसा क्यों किया?
चुनाव आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, आयोग ने सभी राज्य सरकारों को ये निर्देश दिया था कि वे चुनाव से जुड़े उन सभी अधिकारियों का तबादला सुनिश्चित करें जो लगातार तीन साल तक अपने पद पर एक ही जगह पर जमे रहे हैं या अपने गृह जिलों में तैनात रहे हैं. चुनाव आयोग की इन कार्रवाईयों को निष्पक्ष ढंग से चुनाव कराने की दिशा में उसके प्रयासों के रूप में देखा जा रहा है.
बंगाल के पूर्व डीजीपी राजीव कुमार की बात करें तो उनके बारे में कहा जाता है कि वे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बहुत करीबी हैं. ये वही अधिकारी हैं जिनके लिए सीएम ममता कभी धरने पर बैठ गई थीं. सोमवार को जब चुनाव आयोग के निर्देश के बाद उन्हें डीजीपी पद से हटना पड़ा तो तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के नेताओं ने विरोध जाहिर किया. आइए जानते हैं कि राजीव कुमार का अब तक का करियर कैसा रहा है.
1989 बैच के आईपीएस अधिकारी राजीव जनवरी 2012 में पश्चिम बंगाल के बिधाननगर के पुलिस कमिश्नर बने. 2013 में जब शारदा चिट फंड घोटाला सामने आया तो मामले की जांच के लिए उन्हें एक विशेष टास्क फोर्स का प्रमुख बनाया गया. अप्रैल 2013 में, कुमार और उनकी टीम ने इस मामले में सुदीप्तो सेन और उनके दो सहयोगियों को जम्मू-कश्मीर से गिरफ्तार भी किया. लेकिन इसके ठीक एक महीने बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को सीबीआई के हवाले कर दिया.
इसके बाद राजीव 2016 में कोलकाता के पुलिस कमिश्नर बने. इसी साल राज्य में विधानसभा चुनाव होने थे. लेकिन चुनाव से पहले विवाद तब शुरू हो गया जब राज्य के कई विपक्षी नेता ये कहने लगे कि राजीव की सत्ताधारी पार्टी टीएमसी से मिलीभगत है. यही नहीं, विपक्षी नेताओं ने राजीव कुमार पर उनके फोन को टैप करने के आरोप लगाए और कहा कि वे टीएमसी के इशारों पर काम कर रहे हैं. चुनाव आयोग के निर्देश पर राजीव को पद से हटना पड़ा. हालांकि जब चुनाव खत्म हो गए तो वे फिर से कोलकाता पुलिस कमिश्नर के पद पर काम करने लगे.
इस घटना के तीन सालों के बाद विपक्ष ने एक बार फिर से राजीव पर वही आरोप लगाना शुरू कर दिया. 03 फरवरी, 2019 की बात है. केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई शारदा चिट फंड घोटाला मामले की जांच के सिलसिले में राजीव के घर उनसे पूछताछ करने पहुंची. लेकिन सीबीआई और कोलकाता पुलिस अधिकारियों के बीच गतिरोध की स्थिति बन गई. इस छापे के विरोध में अभूतपूर्व कदम उठाते हुए सीएम ममता धरने पर जा बैठीं.
करीब 70 घंटों तक ममता धरने पर ही बैठी रही थीं, जब तक सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश जारी कर नहीं कहा कि राजीव कुमार के खिलाफ गिरफ्तारी सहित कोई भी कठोर कदम नहीं उठाया जाना चाहिए. साथ ही, अदालत ने राजीव को जांच एजेंसी के साथ "ईमानदारी से सहयोग" करने का भी निर्देश दिया था.
दिसंबर 2023 तक राजीव राज्य के आईटी विभाग के सचिव के तौर पर काम कर रहे थे. इसी महीने उन्हें बंगाल का डीजीपी बनाया गया. इस फैसले के बाद विपक्षियों की निगाहें एक बार फिर सरकार के साथ उनके कथित गठजोड़ की ओर घूमीं. अब जबकि उन्हें पद से हटा दिया गया है तो एक बार फिर से राजनीतिक बहस शुरू हो गई है.
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राज्यसभा सांसद समिक भट्टाचार्य कहते हैं, "राजीव को हटाया जाना चुनाव आयोग के स्वतंत्र और निष्पक्ष माहौल में चुनाव कराने के कर्तव्य के अनुरूप है." वहीं, टीएमसी नेता कुणाल घोष की दलील है, "भाजपा ने दूसरी अन्य केंद्रीय जांच एजेंसियों की तरह चुनाव आयोग को भी नियंत्रित कर लिया है. यह फैसला (राजीव कुमार को हटाने का) उसी को दर्शाता है."