राजस्थान में UCC से शादी, लिव-इन और विरासत के नियमों में क्या बदलेगा?
राजस्थान के प्रस्तावित UCC में शादी का रजिस्ट्रेशन जरूरी करने, जीवनसाथी के जिंदा रहते दूसरी शादी पर रोक और बेटियों को बराबर विरासत देने का प्रावधान है. इसके जरिए लिव-इन रिश्तों को भी कानूनी दायरे में लाने की तैयारी है

UCC पर राजस्थान विधानसभा के अगले सत्र में बहस होगी
‘राजस्थान यूनिफॉर्म सिविल कोड बिल 2026’ 21 अगस्त को विधानसभा में पेश किया गया. इसमें शादी, तलाक, विरासत, भरण-पोषण और यहां तक कि लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता और उनके नियमन का तरीका तय करने की कोशिश की गई है.
यह बिल अभी कानून नहीं बना है. विधानसभा में इस पर विस्तार से चर्चा नहीं हो पाई और सदन स्थगित हो गया. अब इसके नवंबर में अगले विधानसभा सत्र के दौरान फिर से पेश किए जाने की संभावना है.
पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय समिति की सलाह के बाद तैयार किए गए इस प्रस्तावित कानून के जरिए भजनलाल शर्मा सरकार धर्म से परे एक समान सिविल व्यवस्था बनाने की कोशिश कर रही है. लेकिन इसका सबसे बड़ा असर आम लोगों के पारिवारिक रिश्तों पर पड़ सकता है.
शादी : रस्में वही, लेकिन शर्तें नई
प्रस्तावित UCC में धार्मिक तरीके से होने वाली शादी की रस्मों को खत्म नहीं किया गया है. हिंदू सप्तपदी जैसी रस्मों के साथ शादी कर सकेंगे, मुस्लिम निकाह कर सकेंगे, सिख आनंद कारज और ईसाई अपने पारंपरिक तरीके से शादी कर सकेंगे. बदलाव शादी से जुड़े कानूनी नियमों में होगा.
शादी का 60 दिनों के भीतर रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी होगा. ऐसा नहीं करने पर जुर्माना लगाया जा सकेगा. हालांकि, सिर्फ रजिस्ट्रेशन न कराने से शादी अमान्य नहीं होगी. UCC बिल में वैध शादी के लिए कुछ समान शर्तें भी तय की गई हैं. इनमें पुरुषों के लिए 21 साल और महिलाओं के लिए 18 साल की मौजूदा न्यूनतम उम्र शामिल है.
सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अगर किसी व्यक्ति का जीवनसाथी जिंदा है तो वह दोबारा शादी नहीं कर सकेगा. दूसरी शादी प्रतिबंधित होगी और उसे अमान्य माना जाएगा. इस तरह अलग-अलग समुदायों में बहुविवाह पर एक समान रोक लगाने की कोशिश की गई है. इसमें वे पर्सनल लॉ भी शामिल हैं, जिनके तहत ऐतिहासिक रूप से दूसरी शादी की अनुमति रही है.
तलाक के लिए समान आधार
बिल में अलग-अलग समुदायों के तलाक से जुड़े नियमों की जगह समान आधार तय करने का प्रस्ताव है. इनमें व्यभिचार, क्रूरता, दो साल तक छोड़ देना, धर्म परिवर्तन, कुछ खास मानसिक या शारीरिक स्थितियां, संन्यास लेना, सात साल तक लापता रहना और भरण-पोषण से जुड़े आदेशों का पालन न करना शामिल हैं.
इसमें आपसी सहमति से तलाक का भी प्रावधान है. इसके लिए पति-पत्नी का कम से कम एक साल से अलग रहना और दोनों का शादी खत्म करने पर सहमत होना जरूरी होगा. असाधारण परेशानी या गंभीर परिस्थितियों में अदालत इस इंतजार की शर्त में छूट दे सकती है. तलाक और शादी को रद्द करने से जुड़े आदेशों का भी रजिस्ट्रेशन कराना होगा.
लिव-इन रिलेशनशिप पर भी नियम
प्रस्तावित कानून की एक अहम बात लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी ढांचे के तहत लाना है. शादी जैसे रिश्ते में साथ रह रहे जोड़े को रजिस्ट्रेशन के लिए एक साझा बयान देना होगा. रिश्ता खत्म होने पर भी इसकी औपचारिक जानकारी देनी होगी.
खास बात यह है कि अगर दोनों में से किसी एक का जीवनसाथी जिंदा है तो उस लिव-इन रिश्ते का रजिस्ट्रेशन नहीं किया जा सकेगा. रिश्ते की कुछ ऐसी श्रेणियां भी होंगी, जिन्हें कानून के तहत प्रतिबंधित माना गया है.
सरकार का कहना है कि इसका मकसद पार्टनर और बच्चों की सुरक्षा करना है. लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चों को कानूनी मान्यता मिलेगी. उन्हें भरण-पोषण और विरासत से जुड़े अधिकार भी मिलेंगे. लेकिन इससे एक बड़ा सवाल भी उठता है: सहमति से साथ रह रहे वयस्कों की निजी जिंदगी के बारे में सरकार को कितनी जानकारी होनी चाहिए? यह प्रस्तावित कानून का सबसे विवादित मुद्दा बन सकता है.
बेटियों को बराबर अधिकार
बिल में विरासत के लिए समान नियम और बेटों व बेटियों को बराबर अधिकार देने का प्रस्ताव है. इसमें बिना वसीयत के विरासत और वसीयत के जरिए मिलने वाली विरासत, दोनों शामिल हैं.
अगर किसी व्यक्ति ने वसीयत नहीं की है तो उसकी संपत्ति कानूनी वारिसों की तय श्रेणियों के मुताबिक बांटी जाएगी. इसमें सबसे पहले जीवित जीवनसाथी, बच्चे और माता-पिता शामिल होंगे. कानून गर्भ में पल रहे बच्चे के विरासत के अधिकार को भी मान्यता देता है, बशर्ते वह बाद में जीवित पैदा हो.
महिलाओं के लिए यह सबसे अहम बदलावों में से एक हो सकता है. खासकर उन मामलों में, जहां अब तक विरासत का फैसला अलग-अलग समुदायों के पर्सनल लॉ या पारिवारिक परंपराओं के आधार पर होता रहा है.
हालांकि प्रस्तावित राजस्थान UCC पूरी तरह समान नहीं है. इसमें एक बड़ा अपवाद है. अनुसूचित जनजातियों और उन समुदायों को इस प्रस्तावित कानून से बाहर रखा गया है, जिनके पारंपरिक अधिकारों को संविधान के तहत संरक्षण मिला हुआ है. सरकार ने इसका कारण जनजातीय रीति-रिवाजों और परंपराओं की रक्षा करना बताया है.
इसलिए प्रस्तावित UCC का मकसद शादी की रस्मों को बदलना कम और पारिवारिक रिश्तों से जुड़े कानूनी अधिकारों और नियमों को एक जैसा करना ज्यादा है. इसके तहत शादी, तलाक, विरासत और लिव-इन रिश्तों को एक ही कानूनी ढांचे में लाने की कोशिश की गई है. साथ ही धार्मिक रस्मों और जनजातीय परंपराओं को बनाए रखने की कोशिश भी की गई है.
हालांकि इस बिल की असली परीक्षा विधानसभा में होने वाली राजनीतिक बहस के बाद होगी. सवाल यह होगा कि क्या अनिवार्य रजिस्ट्रेशन को बिना अतिरिक्त सरकारी झंझट के लागू किया जा सकता है. क्या लिव-इन रिश्तों का नियमन संवैधानिक जांच में टिक पाएगा? और क्या शादी और विरासत के समान नियम लैंगिक समानता के साथ धार्मिक और पारंपरिक अधिकारों के बीच संतुलन बना पाएंगे?
फिलहाल राजस्थान ने इसकी रूपरेखा पेश कर दी है. लेकिन एकरूपता के नाम पर राज्य निजी जिंदगी को किस हद तक नियंत्रित कर सकता है, इस पर असली बहस अभी शुरू हुई है.