फर्जी FIR पर राजस्थान पुलिस की सख्ती बन सकती है पूरे देश के लिए मिसाल

राजस्थान पुलिस अब झूठी शिकायत दर्ज कराने वालों पर भी मुकदमा चला रही है और कई मामलों में ऐसे लोगों को दोषी भी करार दिया जा चुका है

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर

दशकों से भारत की आपराधिक न्याय व्यवस्था की सबसे कम चर्चा होने वाली समस्याओं में से एक एफआईआर (FIR) के दुरुपयोग की रही है. कानून का झुकाव सही तरीके से शिकायत दर्ज करने के पक्ष में है ताकि असली पीड़ितों को न्याय से वंचित न होना पड़े. 

लेकिन इसी व्यवस्था का इस्तेमाल कई बार निजी दुश्मनी निकालने, संपत्ति विवादों को प्रभावित करने, विरोधियों को डराने या वैवाहिक और आर्थिक विवादों में दबाव बनाने के लिए भी किया गया है. ऐसे में फर्जी FIR दर्ज कराने वालों पर कार्रवाई के लिए राजस्थान पुलिस का हालिया अभियान एक महत्वपूर्ण बदलाव साबित हो सकता है.

इस अभियान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जांच एजेंसियों को गुमराह करने वाले शिकायतकर्ताओं पर भी मुकदमा चलाया जाए. सिर्फ जून महीने में राजस्थान की विभिन्न अदालतों ने 75 मामलों में शिकायतकर्ताओं को दोषी ठहराया. उन्हें जेल और जुर्माने दोनों की सजा सुनाई गई. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह रही कि 1,870 मामलों में अदालतों ने संज्ञान लिया, जहां पुलिस जांच में शिकायतें झूठी पाई गईं. इससे इन शिकायतकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने का रास्ता साफ हुआ.

आंकड़े बताते हैं कि यह अभियान पूरे राज्य में चलाया जा रहा है. जून में फर्जी शिकायतकर्ताओं के खिलाफ सबसे ज्यादा 292 मामलों में नागौर की अदालतों ने संज्ञान लिया. इसके बाद जयपुर ग्रामीण में 247 और अलवर में 212 मामले रहे. अन्य जिलों में जयपुर दक्षिण (139), कोटपूतली-बहरोड़ (120), हनुमानगढ़ (110), जयपुर पश्चिम (71) और जयपुर उत्तर (59) में भी बड़ी संख्या में कार्रवाई हुई.

अब आरोप भी साबित होने लगे हैं. हनुमानगढ़ पुलिस ने रिकॉर्ड 18 मामलों में आरोप साबित कराए, जबकि प्रतापगढ़ में 9 मामलों में ऐसा हुआ. जयपुर ग्रामीण में 6, कोटा शहर में 5 और अलवर, बांसवाड़ा तथा ब्यावर में 4-4 मामलों में शिकायतकर्ताओं को दोषी ठहराया गया. इसके अलावा सवाई माधोपुर (3), जयपुर दक्षिण, धौलपुर, झुंझुनूं, डूंगरपुर, सिरोही, झालावाड़ और भीलवाड़ा (2-2) तथा बीकानेर, चूरू और अजमेर सरकारी रेलवे पुलिस (1-1) में भी अदालतों ने शिकायतकर्ताओं को दोषी ठहराया.

इस अभियान का सबसे बड़ा महत्व संस्थागत सोच में आए बदलाव में है. वर्षों तक पुलिस जांच पूरी होने के बाद शिकायतों को झूठा बताते हुए अंतिम रिपोर्ट दाखिल कर देती थी. लेकिन बहुत कम जांच अधिकारी उन लोगों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई करते थे जिन्होंने झूठे आरोप लगाए थे. अदालतें भी शिकायत को दुर्भावनापूर्ण मानने के बावजूद शायद ही कभी आगे की कार्रवाई शुरू करती थीं.

इसके पीछे व्यावहारिक कारण थे. फर्जी शिकायतकर्ता के खिलाफ मुकदमा चलाने का मतलब एक और आपराधिक सुनवाई, अतिरिक्त कागजी कार्रवाई, बार-बार अदालत के चक्कर और पहले से ही काम के बोझ से दबे पुलिस अधिकारियों तथा सरकारी वकीलों पर अतिरिक्त जिम्मेदारी. ऐसे में जांच बंद कर देना ज्यादा आसान माना जाता था.

लेकिन इस हिचकिचाहट की एक कीमत भी थी. कानूनी तौर पर FIR केवल आपराधिक प्रक्रिया की शुरुआत करती है. यह किसी के दोषी होने का सबूत नहीं होती. लेकिन आम लोगों की नजर में FIR दर्ज होते ही आरोपों को विश्वसनीय मान लिया जाता है. विडंबना यह है कि यह समस्या आंशिक रूप से उन न्यायिक सुरक्षा उपायों का भी परिणाम है, जिन्हें असली पीड़ितों की सुरक्षा के लिए बनाया गया था. अदालतें बार-बार कह चुकी हैं कि संज्ञेय अपराधों में FIR दर्ज करना अनिवार्य है ताकि पुलिस मनमाने तरीके से शिकायत दर्ज करने से इनकार न कर सके. अगर पुलिस शिकायत दर्ज नहीं करती तो मजिस्ट्रेट भी FIR दर्ज करने का निर्देश दे सकते हैं.

ये सुरक्षा उपाय आज भी जरूरी हैं. लेकिन इन्होंने कुछ लोगों को आपराधिक कानून का इस्तेमाल दबाव बनाने के हथियार के रूप में करने का मौका भी दिया है. जमीन के विवाद, वित्तीय लेनदेन, कारोबारी प्रतिस्पर्धा, पारिवारिक झगड़े और स्थानीय राजनीतिक संघर्षों में झूठी आपराधिक शिकायतों के मामले लगातार सामने आते रहे हैं. भले ही जांच के बाद किसी की बेगुनाही साबित हो जाए लेकिन कई बार पूरी आपराधिक प्रक्रिया ही उसके लिए सजा बन जाती है.

अगर राजस्थान में यह अभियान लगातार इसी तरह लागू किया गया, तो इसके कई फायदे हो सकते हैं. इससे बेवजह के आपराधिक मुकदमों पर रोक लग सकती है. पुलिस और अदालतों पर अनावश्यक दबाव कम होगा. जांच एजेंसियों के संसाधन वास्तविक पीड़ितों के लिए उपलब्ध रहेंगे. साथ ही उन लोगों का भरोसा भी बढ़ेगा, जो अक्सर झूठे आपराधिक मामलों में फंस जाते हैं.

हालांकि इस पहल को सावधानी के साथ लागू करना जरूरी होगा. कोई शिकायत आखिर तक साबित न हो सके इसका मतलब यह नहीं कि वह झूठी थी. कई वास्तविक मामले सबूतों की कमी, गवाहों के मुकर जाने या संदेह से परे अपराध साबित न हो पाने के कारण कमजोर पड़ जाते हैं. इसलिए ऐसे मामलों और जानबूझकर गढ़े गए आरोपों के बीच का फर्क हमेशा स्पष्ट रहना चाहिए. वरना मुकदमे के डर से असली पीड़ित, खासकर महिलाएं और अन्य कमजोर वर्ग, पुलिस के पास जाने से हिचक सकते हैं.

राजस्थान की यह नई पहल इसी संतुलन को फिर से स्थापित करने की एक महत्वपूर्ण कोशिश है. अगर राज्य इस संतुलन को बनाए रखने में सफल रहता है तो फर्जी FIR पर उसकी यह कार्रवाई पूरे देश की पुलिस के लिए एक मॉडल बन सकती है.

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