राजस्थान में ग्रीन टैक्स के पैसे के इस्तेमाल पर क्यों उठे सवाल?

प्रदूषण फैलाने वाले पुराने वाहनों से वसूले गए ग्रीन टैक्स से राजस्थान को 10 साल में 2,283.97 करोड़ रुपए मिले. NGT ने पाया कि इस रकम का हिस्सा बस सेवाओं के घाटे और बकाया भुगतान में लगाया गया जबकि नियमों में ऐसे खर्च की अनुमति नहीं है

राजस्थान में ग्रीन टैक्स पुराने और प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर लगाया जाता है

राजस्थान में ग्रीन टैक्स पुराने और प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर लगाया जाता है और इसका मकसद पर्यावरण और इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार के लिए पैसे जुटाना है. अब यह टैक्स राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के सामने जवाबदेही के सवाल में फंस गया है.

सवाल यह है कि अगर वाहन चालकों से प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर टैक्स लिया जाता है तो क्या उस पैसे का इस्तेमाल घाटे में चल रही सरकारी परिवहन सेवाओं को चलाने के लिए किया जा सकता है?

भोपाल में NGT की सेंट्रल जोन बेंच ने इस मामले में साफ चेतावनी दी है. NGT के पिछले महीने के आदेश में राजस्थान सरकार की ओर से ग्रीन टैक्स के पैसों के इस्तेमाल के तरीके को “हैरान और चौंकाने वाला” बताया गया. साथ ही राज्य के परिवहन विभाग को राजस्थान ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड (RTIDF) नियम 2012 का सख्ती से पालन करने का निर्देश दिया गया.

बाबूलाल जाजू बनाम भारत सरकार और अन्य से जुड़े इस मामले में राजस्थान में वाहनों से होने वाले प्रदूषण और उससे निपटने के लिए ग्रीन टैक्स के इस्तेमाल का मुद्दा उठाया गया था.

इस विवाद के केंद्र में काफी बड़ी रकम है. NGT के सामने रखी गई संयुक्त समिति की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 10 साल में राजस्थान के परिवहन और सड़क सुरक्षा विभाग को ग्रीन टैक्स से 2,283.97 करोड़ रुपए मिले हैं.

NGT की सुनवाई के दौरान बनाई गई संयुक्त समिति में राज्य और रेगुलेटरी संस्थाओं के प्रमुख विभागों के प्रतिनिधि शामिल थे. समिति ने पाया कि इस पैसे का एक हिस्सा नगर निगमों को बस सेवाएं चलाने और उनके संचालन में हुए घाटे को पूरा करने के लिए दिया गया था. यह पैसा राज्य की एक संस्था जयपुर सिटी ट्रांसपोर्ट सर्विसेज लिमिटेड' (JCTSL) को भी दिया गया था जिसका इस्तेमाल बकाये वेतन और ठेकेदारों के भुगतानों के लिए किया गया.

सर्दियों के दौरान जयपुर में भी वायु प्रदूषण बढ़ जाता है (सांकेतिक तस्वीर)

NGT ने कहा कि संयुक्त समिति ने साफ तौर पर दर्ज किया था कि RTIDF के नियमों के तहत इस तरह का खर्च करना मना है. इसी वजह से उसने ग्रीन टैक्स के इस तरह के इस्तेमाल को “हैरान और चौंकाने वाला” बताया.

राजस्थान मोटर व्हीकल्स टैक्सेशन एक्ट की धारा 4D के तहत ग्रीन टैक्स लगाया जाता है. इसके साथ ही परिवहन विभाग अलग-अलग तरह के वाहनों के लिए लागू ग्रीन टैक्स की दरें भी जारी करता है.

RTIDF की शुरुआत 2011-12 में “सुव्यवस्थित, सुरक्षित, प्रदूषण मुक्त और बेहतर परिवहन व्यवस्था” विकसित करने के लिए की गई थी. राज्य सरकार के ताजा आर्थिक समीक्षा के मुताबिक वर्ष 2011-12 से सितंबर 2025 तक RTIDF में 8,974.6 करोड़ रुपए जमा हुए थे. वहीं दिसंबर 2025 तक इसमें से 6,272.04 करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके थे.

इसलिए NGT के सामने सवाल यह था कि क्या ग्रीन टैक्स के तहत जमा किए गए पैसे का इस्तेमाल तय नियमों में बताए गए कामों के अलावा दूसरे कामों में किया जा सकता है. जयपुर में वायु प्रदूषण स्थिति को देखते हुए NGT की चिंता और बढ़ जाती है. उसके सामने रखी गई जानकारी में सड़क की धूल, बायोमास और नगर निगम के ठोस कचरे को जलाना, औद्योगिक गतिविधियां, निर्माण कार्य से उठने वाली धूल और वाहनों का धुआं प्रदूषण के स्रोतों में शामिल थे. NGT ने हवा में पार्टिकुलेट प्रदूषण के बढ़ते स्तर के सबूत भी दर्ज किए और इसकी निगरानी बढ़ाने व सुधार के कदम उठाने के निर्देश दिए.

यानी एक तरफ प्रदूषण मुक्त परिवहन व्यवस्था बनाने से जुड़े फंड के तहत हजारों करोड़ रुपए जमा किए गए. वहीं दूसरी तरफ NGT ने पाया कि इस पैसे का इस्तेमाल सरकारी बस सेवाओं की आर्थिक जरूरतें पूरी करने में किया जा रहा था.

अधिकरण ने राज्य को प्रदूषण वाले इलाकों की पहचान करने के लिए एक सिस्टम बनाने और जयपुर के लिए ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) लागू करने का निर्देश दिया. उसने राजस्थान स्टेट पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड को नियमित जांच करने और जहां प्रदूषण का स्तर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के निर्धारित मानकों से अधिक हो वहां कार्रवाई शुरू करने को कहा.

NGT ने कच्ची सड़कों के पक्कीकरण, वैक्यूम आधारित रोड स्वीपिंग मशीनें लगाने, डीजल जनरेटर के उपयोग में कमी, प्रदूषण जांच केंद्रों की संख्या बढ़ाने, साफ ईंधन और इलेक्ट्रिक या हाइब्रिड वाहनों को बढ़ावा देने और सड़कों के किनारे हुए अतिक्रमण व ट्रैफिक की रुकावटों को दूर करने के लिए भी कहा.

सबसे अहम बात यह है कि परिवहन विभाग को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है कि ग्रीन टैक्स का इस्तेमाल सिर्फ उन्हीं कामों के लिए हो जिनकी अनुमति तय नियमों में दी गई है. यह आदेश राजस्थान के लिए जवाबदेही की एक मुश्किल कसौटी सामने रखता है: जब राज्य प्रदूषण से लड़ने के नाम पर टैक्स वसूलता है तो टैक्स देने वालों को यह दिखना चाहिए कि उस पैसे से प्रदूषण रोकने में क्या फायदा हुआ.

NGT ने राज्य सरकार को इस मामले पर ध्यान देने के लिए कहा है. अब सवाल यह है कि राजस्थान सिर्फ कागजों पर इस आदेश का पालन करेगा या ग्रीन टैक्स के खर्च को इतना पारदर्शी बनाएगा कि लोगों को भरोसा हो सके?

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