पंजाब में संगठन के फेरबदल ने बढ़ाई BJP की मुसीबत

दिल्ली में BJP के शीर्ष नेतृत्व को लगता है कि पंजाब में पार्टी को अगली बड़ी राजनीतिक सफलता मिल सकती है लेकिन राज्य इकाई में हालिया फेरबदल ने पार्टी की अंदरूनी कलह को सामने ला दिया है

पंजाब BJP के नेताओं के साथ पीएम मोदी (फाइल फोटो)

BJP 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए यह संदेश देना चाहती है कि वह पूरी तरह से तैयार है. हालांकि प्रदेश इकाई में हालिया फेरबदल ने पार्टी के भीतर मौजूद गहरे मतभेदों को उजागर कर दिया है.

3 अगस्त को पार्टी ने पंजाब में अपनी नई टीम की घोषणा की. इसमें राज्य स्तर पर पदाधिकारियों और छह जिला अध्यक्षों की नियुक्ति की गई. संगठन में फेरबदल के बाद नाराजगी आम बात है लेकिन इस बार मामला इससे कहीं आगे बढ़ गया.

कुछ ही घंटों में कई वरिष्ठ नेताओं ने इन नियुक्तियों पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए. कुछ नेताओं ने निजी तौर पर अपनी नाराजगी जताई. उनकी शिकायत सिर्फ नई टीम को लेकर नहीं थी, बल्कि इस पूरी प्रक्रिया को लेकर भी थी.

आलोचना का केंद्र BJP के संगठन महामंत्री मंत्री श्रीनिवासलु रहे जो पंजाब में पार्टी के संगठनात्मक मामलों के सबसे प्रमुख नेता बनकर उभरे हैं. राज्य इकाई के भीतर कई नेताओं का मानना है कि पार्टी की कमान अब उनके हाथ में है. यही धारणा अब बढ़ते असंतोष की वजह बन गई है.

कई महीनों से पंजाब BJP के पुराने नेता शिकायत कर रहे हैं कि अब पार्टी में निष्ठा की कोई अहमियत नहीं रह गई है. उनका कहना है कि जब पार्टी का प्रभाव मुख्य रूप से शहरी इलाकों तक सीमित था, तभी से कई कार्यकर्ता पार्टी के लिए काम कर रहे हैं.

अब इन्हीं पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज किया जा रहा है. उनका आरोप है कि हर नियुक्ति में पुराने कार्यकर्ताओं की जगह दूसरी पार्टियों से आए नेताओं को तरजीह दी जा रही है.

दिलचस्प बात यह है कि इस बार दूसरी पार्टियों से आए कई नेता भी संतुष्ट नहीं हैं. 3 अगस्त की नियुक्तियों का मकसद कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल (SAD) और आम आदमी पार्टी (AAP) से आए नेताओं को जगह देना था. पार्टी के 12 उपाध्यक्षों में से छह दूसरी पार्टियों से आए हैं लेकिन यह संतुलन बनाने की कोशिश भी किसी पक्ष को संतुष्ट नहीं कर सकी.

सबसे बड़ी शिकायत पांच अहम महासचिवों की नियुक्ति को लेकर है. इनमें तीन लुधियाना से हैं- अनिल सरीन, राजेश धीमान और परमिंदर बराड़. हालांकि बराड़ का नाम मोहाली से दिखाया गया है लेकिन उनका काम मुख्य रूप से लुधियाना में है. बाकी दो जीवन गर्ग (संगरूर) और राकेश बग्गा (जालंधर) हैं. अमृतसर, गुरदासपुर और होशियारपुर लोकसभा सीटों से किसी को प्रतिनिधित्व नहीं मिला जबकि BJP पिछले 30 वर्षों से इन सीटों पर चुनाव लड़ती रही है.

पुराने नेता खुद को हाशिए पर महसूस कर रहे हैं. वहीं, दूसरी पार्टियों से हाल ही में आए कई नेताओं का मानना है कि उन्हें उनके राजनीतिक प्रभाव के अनुरूप पद नहीं मिला. अहम पदों पर क्षेत्रीय संतुलन नहीं होने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. अलग-अलग क्षेत्रों के नेताओं का कहना है कि उन्हें नजरअंदाज किया गया है.

इस फेरबदल का मकसद संगठन को मजबूत करना था लेकिन इससे पहले से मौजूद मतभेद और गहरे हो गए. सामान्य तौर पर ऐसी संगठनात्मक खींचतान राज्य स्तर तक ही सीमित रहती है लेकिन पंजाब में ऐसा नहीं है. यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब BJP का केंद्रीय नेतृत्व पंजाब को अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक प्राथमिकताओं में शामिल कर चुका है. इसके बाद तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश का नंबर आता है.

दिल्ली में पार्टी की सोच साफ है. BJP का मानना है कि पिछले दो दशकों की तुलना में पंजाब की राजनीति इस समय सबसे ज्यादा बदलाव के दौर में है. आम आदमी पार्टी की सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी माहौल बन रहा है. कांग्रेस गुटबाजी से जूझ रही है. किसानों आंदोलन और BJP से गठबंधन टूटने के बाद शिरोमणि अकाली दल भी कमजोर हुआ है.

2020 में गठबंधन टूटने के बाद पहली बार BJP को लगता है कि वह पंजाब में अपने दम पर एक मजबूत राजनीतिक विकल्प बन सकती है. इसी सोच के तहत पार्टी ने कई बदलाव शुरू किए हैं. नए प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर पहले जाट सिख नेता केवल सिंह ढिल्लों को नियुक्त किया गया. इसके अलावा, जाट सिख समुदाय से आने वाले रवनीत सिंह बिट्टू का राज्यसभा कार्यकाल नहीं बढ़ाया गया.

सवर्ण नेता तरुण चुघ को मध्य प्रदेश से राज्यसभा भेजा गया. पार्टी के पुराने नेता हरजीत सिंह ग्रेवाल को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष बनाया गया. BJP राज्य के नेताओं को राष्ट्रीय संगठन और केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी ज्यादा जगह देने पर विचार कर रही है. इसका मकसद राज्य इकाई की अहमियत बढ़ाना और कार्यकर्ताओं में उत्साह पैदा करना है. यही वजह है कि हाल के महीनों में पंजाब पर केंद्रीय नेतृत्व का विशेष ध्यान रहा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले महीने जालंधर में बड़ी जनसभा की. इससे पहले BJP के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बी.एल. संतोष ने नई दिल्ली स्थित अपने आवास पर पंजाब संगठन की विस्तृत समीक्षा बैठक की. इसमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन भी शामिल हुए. इससे साफ है कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व पंजाब पर करीबी नजर रख रहा है.

दिल्ली से अब यह संदेश साफ होता जा रहा है कि BJP अब सुखबीर सिंह बादल की अगुआई वाले शिरोमणि अकाली दल के साथ दोबारा गठबंधन की उम्मीद में नहीं बैठना चाहती. पार्टी अपने दम पर सत्ता हासिल करने की तैयारी कर रही है.

यह रणनीति सिर्फ संगठन तक सीमित नहीं है. पिछले एक साल में BJP ने पंजाब में लगभग हर बड़े राजनीतिक दल से नेताओं को शामिल कर अपना सामाजिक आधार बढ़ाने की कोशिश की है. सबसे बड़ी सफलता तब मिली जब आम आदमी पार्टी के 10 में से सात राज्यसभा सांसद BJP में शामिल हो गए.

इनमें ऐसे नेता भी थे जो पार्टी के संगठन और चुनावी रणनीति से जुड़े रहे थे. BJP इन्हें सिर्फ अपने साथ जोड़ना नहीं, बल्कि विरोधी दलों को भीतर से कमजोर करना भी मानती है. चुनावी आंकड़े भी राष्ट्रीय नेतृत्व का उत्साह बढ़ाते हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव में BJP को पंजाब में करीब 19 फीसद वोट मिले. अकाली दल से अलग होने के बाद यह BJP का अच्छा प्रदर्शन था.

इससे भी अहम बात यह रही कि पार्टी 23 विधानसभा क्षेत्रों में आगे रही और 12 अन्य सीटों पर दूसरे स्थान पर रही. इससे यह संकेत मिला कि उसका समर्थन अब सिर्फ कुछ शहरी सीटों तक सीमित नहीं है. हालांकि, ये आंकड़े लोकसभा सीटें जीतने के लिए पर्याप्त नहीं थे लेकिन केंद्रीय नेतृत्व इन्हें अगले दो वर्षों में मजबूत राजनीतिक आधार बनाने की शुरुआत मानता है.

पार्टी का मानना है कि विधानसभा चुनाव सिर्फ राष्ट्रीय नेतृत्व की लोकप्रियता से नहीं बल्कि मजबूत संगठन और प्रभावी राजनीतिक संदेश के दम पर जीते जाते हैं. BJP के भीतर यह भी माना जा रहा है कि पंजाब आज वैसा ही है जैसा एक दशक पहले पश्चिम बंगाल था.

वहां भी पार्टी ने पहले अपना वोट फीसद बढ़ाया फिर संगठन मजबूत किया और आखिरकार पुराने राजनीतिक दलों की जगह मुख्य विपक्षी दल बनकर सत्ता तक पहुंची. केंद्रीय नेतृत्व के कई नेताओं का मानना है कि पंजाब भी इसी राह पर चल सकता है. हालांकि, हर राज्य का राजनीतिक सफर एक जैसा नहीं होता.

पश्चिम बंगाल में चुनावी सफलता से पहले BJP का संगठन लगातार मजबूत और एकजुट हुआ. पंजाब में स्थिति इसके उलट है. पार्टी को राजनीतिक अवसर तो दिखाई दे रहा है लेकिन संगठन अब भी एकजुट नहीं हो पाया है. यही विरोधाभास अब साफ नजर आने लगा है.

हर बड़ा संगठनात्मक फैसला नई नाराजगी पैदा कर रहा है. पुराने नेता खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं. दूसरी पार्टियों से आए नेता जल्दी पदोन्नति चाहते हैं. जिला स्तर के नेता फैसलों के अत्यधिक केंद्रीकरण की शिकायत कर रहे हैं.

प्रतिनिधित्व, क्षेत्रीय संतुलन और सलाह-मशविरा न होने जैसे सवाल लगातार उठ रहे हैं. अब पंजाब BJP के भीतर चर्चा आम आदमी पार्टी, कांग्रेस या अकाली दल को हराने की नहीं, बल्कि संगठन पर किसका नियंत्रण रहेगा, इसकी ज्यादा हो रही है.

BJP लंबे समय तक हिंदू वोटों में मजबूत रही और सिख वोटों के लिए अकाली दल पर निर्भर थी. उसका संगठन भी उसी आधार पर बना था लेकिन अब जब पार्टी अपना विस्तार कर रही है तो उन्हीं पुराने मजबूत इलाकों से असंतोष सामने आ रहे हैं.

सबसे बड़ी नाराजगी यह है कि दो सप्ताह के भीतर पार्टी ने पांच जिला अध्यक्ष बदल दिए. 18 जुलाई को हुई नियुक्तियों के बाद भी संगठनात्मक फेरबदल नहीं रुका और दो सप्ताह तक लगातार पार्टी ने जिला से प्रदेश स्तर तक कई अहम बदलाव किए.

3 अगस्त को नई राज्य कार्यकारिणी की घोषणा के साथ ही पार्टी ने चुपचाप एक और सूची जारी की, जिसमें कई जिला अध्यक्ष बदल दिए गए. फरीदकोट के जिला अध्यक्ष गौरव कक्कड़ की जगह संदीप सिंह बराड़, होशियारपुर ग्रामीण के योगेश सप्रा की जगह संजीव मनहास, होशियारपुर शहरी के सतीश ठाकुर 'बावा' की जगह नितेन गुप्ता 'नन्नू', मुक्तसर के सतीश असीजा की जगह कुलदीप सिंह भंगेवाला और संगरूर-1 के मतिंदर सिंह की जगह सरजीवन जिंदल को नियुक्त किया गया.

साथ ही नए या खाली संगठनात्मक जिले के लिए अनूप शर्मा को जिला अध्यक्ष बनाया गया. होशियारपुर BJP का मजबूत गढ़ माना जाता है और सबसे बड़ा विरोध भी वहीं देखने को मिला. पहली सूची आने के कुछ ही दिनों बाद हुए इन बदलावों से यह धारणा और मजबूत हुई कि पंजाब BJP का संगठनात्मक पुनर्गठन अभी भी पूरी तरह से पूरा नहीं हुआ है. इससे उन नेताओं को और बल मिला जो नेतृत्व पर बिना ठोस योजना के फैसले लेने का आरोप लगा रहे हैं.

पूर्व मंत्री तीक्ष्ण सूद ने खुले तौर पर इस बात पर नाराजगी जताई कि जिला (शहरी) अध्यक्ष सतीश बावा को नियुक्ति के महज दो सप्ताह बाद ही हटा दिया गया. बावा को सूद और पूर्व केंद्रीय मंत्री सोम प्रकाश का करीबी माना जाता है. उनकी जगह नितिन गुप्ता 'नन्नू' को नियुक्त किया गया, जिन्हें पूर्व प्रदेश अध्यक्ष विजय सांपला का करीबी बताया जाता है. वहीं. फरीदकोट में कैप्टन अमरिंदर सिंह के करीबी रहे संदीप सिंह बराड़ ने गौरव कक्कड़ की जगह ली.

यह सिर्फ संगठन की अंदरूनी समस्या नहीं है. पंजाब उन राज्यों जैसा नहीं है, जहां BJP ने मुख्य रूप से नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और हिंदुत्व के आधार पर विस्तार किया हो. पार्टी नेतृत्व जानता है कि पंजाब में स्थानीय नेतृत्व, सामाजिक नेटवर्क, जातीय समीकरण और संगठन की विश्वसनीयता की भूमिका कहीं अधिक महत्वपूर्ण है.

राज्य में बार-बार वही दल सफल हुए हैं जो स्थानीय समाज से जुड़े हुए दिखाई दिए हैं, न कि सिर्फ राष्ट्रीय मुद्दों के सहारे चुनाव लड़ते रहे हैं. दिल्ली में BJP नेतृत्व इसे अच्छी तरह समझता है. इसलिए पार्टी ने सिख नेताओं को आगे बढ़ाने, अपने पारंपरिक शहरी हिंदू आधार से बाहर निकलने और दूसरी पार्टियों के प्रभावशाली नेताओं को शामिल करने पर इतना जोर दिया है. हालांकि, सिर्फ सामाजिक संतुलन बनाने से संगठन मजबूत नहीं हो जाता.

अगर कोई पार्टी पंजाब में मुख्य राजनीतिक विकल्प बनना चाहती है तो हर नई नियुक्ति के बाद उसे अपने ही संगठन के विवाद सुलझाने में ऊर्जा नहीं लगानी चाहिए. विडंबना यह है कि राष्ट्रीय नेतृत्व को लगता है कि पंजाब BJP के अगले बड़े विस्तार की कहानी बनने वाला है, जबकि पंजाब BJP अभी भी खुद को व्यवस्थित करने की कोशिश करती हुई दिखाई दे रही है.

इसमें कोई संदेह नहीं कि पंजाब की राजनीति बदल रही है. पारंपरिक दोध्रुवीय मुकाबला कमजोर हुआ है. हर बड़ा दल अगले चुनाव से पहले अपने-अपने बोझ के साथ मैदान में है. विपक्षी दलों के लिए अवसर जरूर मौजूद हैं लेकिन केवल अवसर होने से राजनीतिक सफलता नहीं मिलती. उसके लिए मजबूत संगठन चाहिए.

यही BJP की सबसे बड़ी चुनौती है. पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व मानता है कि पंजाब अब BJP के लिए तैयार है लेकिन 3 अगस्त के फेरबदल के बाद की घटनाएं बताती हैं कि शायद अभी BJP पंजाब के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है.

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