कौन हैं प्रेमानंद महाराज, उनका आश्रम विवादों में क्यों आया?
कानपुर के अखरी गांव से वृंदावन तक का सफर, राधा-कृष्ण भक्ति से मिली पहचान, संकरी गली के आश्रम से बढ़ा प्रभाव और विवादों ने अब प्रेमानंद महाराज को फिर सुर्खियों में ला दिया

प्रेमानंद महाराज के शिष्य दीपक लोधी (दाएं) की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत के चलते वृंदावन का आश्रम चर्चा में है
वृंदावन के चर्चित संत प्रेमानंद महाराज का श्रीहित राधा केलिकुंज आश्रम इन दिनों विवादों में है. 25 सितंबर को आश्रम से जुड़े 25 वर्षीय साधु रसिक दुलारी शरण उर्फ दीपक लोधी की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हुई. दीपक चौथी मंजिल से नीचे गिरा था. पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज और दूसरे साक्ष्यों के आधार पर जांच शुरू की. आश्रम ने घटना पर दुख जताते हुए पुलिस जांच में सहयोग की बात कही और लोगों से अपुष्ट जानकारी तथा अफवाहों से बचने की अपील की.
इसी दौरान हाथरस के 17 वर्षीय अनुज चौधरी के लापता होने का मामला भी आश्रम से जुड़ी चर्चा का हिस्सा बना. अनुज ने प्रेमानंद महाराज से दीक्षा ली थी और बाद में परिवार ने उसके लापता होने की शिकायत की. परिजनों ने आश्रम के बाहर प्रदर्शन भी किया. पुलिस की तलाश के बाद अनुज को बरसाना क्षेत्र के एक दूसरे आश्रम से बरामद कर लिया गया.
अब पुलिस यह पता कर रही है कि वह इतने समय तक कहां रहा और परिवार से उसका संपर्क क्यों नहीं हुआ. इन घटनाओं ने प्रेमानंद महाराज के आश्रम की व्यवस्था को लेकर सवाल जरूर खड़े किए हैं लेकिन जिस संत को आज देश-दुनिया में लाखों लोग सुनते हैं, उनकी कहानी इन विवादों से बहुत पुरानी है. उनका मूल नाम अनिरुद्ध कुमार पांडेय बताया जाता है.
एक ग्रामीण धार्मिक परिवार में जन्मे अनिरुद्ध ने पांच वर्ष की उम्र से भक्ति में रुचि दिखाई, 13 वर्ष की उम्र में घर छोड़ दिया, काशी में कठिन साधना की और रासलीला के अनुभव के बाद वृंदावन पहुंचे. यहीं उनकी आध्यात्मिक यात्रा ने राधा-कृष्ण भक्ति की दिशा पकड़ी.
कानपुर के अखरी गांव से वृंदावन तक
उपलब्ध जानकारियों के अनुसार प्रेमानंद महाराज का जन्म वर्ष 1969 में उत्तर प्रदेश में कानपुर क्षेत्र के सरसौल ब्लॉक के अखरी गांव में हुआ था. उनका बचपन का नाम अनिरुद्ध कुमार पांडेय था. पिता का नाम शंभू पांडेय और मां का नाम रमा देवी बताया जाता है. परिवार खेती से जुड़ा था और धार्मिक वातावरण वाला था.
प्रेमानंद महाराज के एक बड़े भाई संस्कृत के विद्वान थे और धार्मिक अध्ययन से जुड़े थे. कुछ जानकार प्रेमानंद को तीन भाइयों में मंझला बताते हैं. करीब पांच वर्ष की उम्र से ही अनिरुद्ध को भजन, कीर्तन और धार्मिक कथाओं में रुचि होने लगी थी. मंदिर में बैठकर रामायण, श्रीमद्भगवद्गीता और भागवत की कथा सुनना उन्हें पसंद था.
इस दौरान उन्होंने नरवल क्षेत्र के एक जूनियर हाईस्कूल से आठवीं तक पढ़ाई की. इसके बाद भास्करानंद विद्यालय में दाखिला लिया लेकिन उनका मन औपचारिक शिक्षा में ज्यादा नहीं लगा. धर्म और अध्यात्म की ओर उनका झुकाव लगातार बढ़ता गया. किशोरावस्था तक पहुंचते-पहुंचते करीब 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने मां से घर छोड़कर भगवान की खोज में जाने की इच्छा जताई.
परिवार ने इसे उस उम्र की भावनात्मक अवस्था माना लेकिन उनका फैसला नहीं बदला. वे एक दिन तड़के करीब तीन बजे घर से निकल पड़े. घर छोड़ने के बाद उनकी यात्रा काशी तक पहुंची. कहते हैं कि वाराणसी के घाटों और मंदिरों के बीच उन्होंने साधना की. गंगा स्नान, ध्यान, भजन और सीमित भोजन उनकी दिनचर्या का हिस्सा बने.
काशी में एक धार्मिक आयोजन के दौरान रासलीला देखने का अवसर उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बना. राधा-कृष्ण की लीला और भक्ति संगीत ने उनके मन पर गहरा असर डाला. बताया जाता है कि वह करीब एक महीने तक लगातार रासलीला देखने जाते रहे. आयोजन समाप्त होने के बाद कलाकार वृंदावन लौटने लगे तो उनके भीतर भी वृंदावन जाने की इच्छा हुई. पैसे नहीं थे इसलिए उन्होंने सेवा करने के बदले साथ ले जाने की इच्छा जताई.
वह दल उन्हें साथ नहीं ले गया लेकिन वृंदावन जाने की सलाह दी. यही सलाह उनके जीवन की दिशा बदलने वाली साबित हुई. वृंदावन पहुंचने के बाद उनका संपर्क राधावल्लभ संप्रदाय की भक्ति परंपरा से हुआ. मोहित गोस्वामी से उन्हें शरणागति मंत्र की दीक्षा मिलने और बाद में श्री गौरांगी शरण जी महाराज के सान्निध्य में आने का उल्लेख मिलता है.
गौरांगी शरण जी महाराज प्रेमानंद महाराज के बड़े गुरुजी माने जाते हैं. उनके मार्गदर्शन में अनिरुद्ध की साधना को व्यवस्थित दिशा मिली. बताया जाता है कि उन्होंने करीब दस वर्षों तक गुरु सेवा की. आश्रम के दैनिक काम से लेकर गुरु की देखभाल और सत्संग की तैयारियों तक वे विभिन्न जिम्मेदारियां निभाते रहे. उनके लिए गुरु सेवा केवल सेवा नहीं, साधना का हिस्सा थी.
प्रेमानंद महाराज का आश्रम
वृंदावन में प्रेमानंद महाराज की पहचान आज सबसे ज्यादा श्री हित राधा केलि कुंज से जुड़ी है. यह आश्रम वृंदावन के परिक्रमा मार्ग पर वराह घाट के पास, रमण रेती इलाके में स्थित है. इसका पता श्री हित राधा केलिकुंज, वराह घाट, श्री प्रेमानंद रोड, रमण रेती, वृंदावन-281121 बताया जाता है.
यह भक्तिवेदांत स्वामी मार्ग और वराह घाट के आसपास का इलाका है और इस्कॉन मंदिर तथा भक्तिवेदांत क्षेत्र के भी करीब है. आश्रम की खासियत उसका आकार या कोई भव्य स्थापत्य नहीं बल्कि उसका धार्मिक माहौल और यहां होने वाली नियमित साधना है.
आश्रम की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार यहां प्रतिदिन सुबह प्रेमानंद महाराज का सत्संग होता है. सुबह की दिनचर्या में 4:15 बजे से सत्संग, 5:15 बजे मंगला आरती, इसके बाद राधा सुधानिधि पाठ, सेवक वाणी पाठ या हित चौरासी पाठ, श्रृंगार आरती और राधा नाम संकीर्तन शामिल हैं. शाम को धूप आरती, वाणी पाठ, रिकॉर्डेड सत्संग और संध्या आरती होती है. यही आश्रम प्रेमानंद महाराज की सार्वजनिक आध्यात्मिक पहचान का मुख्य केंद्र बन गया है.
यहां होने वाले सत्संग के वीडियो बाद में सोशल मीडिया के जरिए देश-दुनिया तक पहुंचते हैं. आश्रम की आधिकारिक वेबसाइट भी प्रेमानंद महाराज को राधावल्लभ परंपरा के रसिक संत के रूप में प्रस्तुत करती है और उनकी साधना में राधा नाम, पूर्ण समर्पण तथा वृंदावन धाम के आश्रय को महत्वपूर्ण मानती है. आश्रम की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यहां दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं.
प्रेमानंद महाराज की लोकप्रियता बढ़ने के साथ सुबह होने वाले उनके दर्शन और सत्संग को लेकर वृंदावन में भक्तों की भीड़ भी बढ़ी है. उनके साथ विराट कोहली, अनुष्का शर्मा और दूसरी चर्चित हस्तियों की मुलाकातों ने भी इस आश्रम को देशव्यापी पहचान दिलाई है.
दिलचस्प बात यह है कि यह कोई विशाल आधुनिक परिसर नहीं है. यह संकरी गली में स्थित अपेक्षाकृत साधारण आश्रम है. यहां भव्य प्रवेश द्वार या बड़े व्यावसायिक स्वागत परिसर की बजाय धार्मिक गतिविधियां और अनुशासित दर्शन व्यवस्था प्रमुख हैं.
यहीं से प्रेमानंद महाराज का वह रूप सामने आया जिसे सोशल मीडिया ने घर-घर पहुंचाया. वे रोजमर्रा के सवालों पर जवाब देते हैं और आध्यात्मिक बातों को सामान्य जीवन के उदाहरणों से जोड़ते हैं. प्रेम, भक्ति, सेवा, परिवार, रिश्ते, इच्छाओं, असफलता और मन की बेचैनी उनके सत्संगों के प्रमुख विषय हैं.
वर्ष 2016 में वृंदावन में श्रीहित राधा केलिकुंज ट्रस्ट की स्थापना से भी उनका नाम जुड़ा. ट्रस्ट से धार्मिक गतिविधियों के साथ सेवा कार्यों को बढ़ावा देने की बात कही जाती है.
लोकप्रियता, बीमारी और अब आश्रम की परीक्षा
पिछले कुछ वर्षों में प्रेमानंद महाराज की लोकप्रियता में सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका रही है. उनके सत्संगों के छोटे-छोटे वीडियो तेजी से वायरल हुए और उनका दायरा वृंदावन से निकलकर देश और विदेश तक पहुंच गया. विराट कोहली, अनुष्का शर्मा, हेमा मालिनी और ग्रेट खली समेत कई चर्चित हस्तियों के उनके पास पहुंचने से भी उनकी सार्वजनिक पहचान मजबूत हुई. लेकिन उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष स्वास्थ्य भी है.
प्रेमानंद महाराज को पॉलीसिस्टिक किडनी डिजीज यानी PKD की समस्या होने की जानकारी सार्वजनिक रूप से सामने आती रही है. यह आनुवंशिक बीमारी है जिसमें किडनी में कई सिस्ट बन सकते हैं और समय के साथ उसकी कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है. उनकी बीमारी के बारे में जानने के बाद कई भक्तों ने उन्हें किडनी दान करने की इच्छा जताने की बात कही.
स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों के बावजूद उनका सत्संग और भक्तों से संवाद जारी रहा. यही निरंतरता उनके अनुयायियों के बीच उनकी लोकप्रियता का एक कारण है. लेकिन अब उनकी लोकप्रियता के साथ उनके आश्रम की जवाबदेही भी बढ़ी है.
दीपक लोधी उर्फ रसिक दुलारी शरण की मौत और अनुज चौधरी के लापता होने के मामलों ने आश्रम में रहने वाले साधकों की सुरक्षा, रिकॉर्ड व्यवस्था, परिवारों से संवाद और प्रबंधन की कार्यप्रणाली जैसे सवालों को सार्वजनिक बहस में ला दिया है.
अनुज चौधरी को बरसाना क्षेत्र के दूसरे आश्रम से बरामद किया जा चुका है और पुलिस मामले की परिस्थितियों की जांच कर रही है. दीपक की मौत के मामले में भी जांच जारी है. ऐसे में इन घटनाओं पर अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही निकाला जाना चाहिए. आश्रम ने भी लोगों से अपुष्ट जानकारी और अफवाहों से बचने की अपील की है.